श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
क्रियाओंका त्याग तो न करे, पर उनमें अपना कर्तृत्व न माने अर्थात् उनको अपने द्वारा होनेवाली तथा अपने लिये न माने। क्रिया चाहे लौकिक हो, चाहे पारमार्थिक हो, उसका महत्त्व वास्तवमें जड़ताका ही महत्त्व है। शास्त्रविहित होनेके कारण पारमार्थिक क्रियाओंका अन्तःकरणमें जो विशेष महत्त्व रहता है, वह भी जड़ताका ही महत्त्व होनेसे साधकके लिये बाधक है*। पारमार्थिक क्रियाओंका उद्देश्य परमात्मा रहनेसे वे कल्याणकारक हो जाती हैं। ज्यों-ज्यों क्रियाकी गौणता और भगवत्सम्बन्धकी मुख्यता होती है, त्यों-त्यों अधिक लाभ होता है। क्रियाकी मुख्यता होनेपर वर्षातिक साधन करनेपर भी लाभ नहीं होता। अतः क्रियाका महत्त्व न होकर भगवान्में प्रियता होनी चाहिये। प्रियता ही भजन है, क्रिया नहीं।
जिसकी बुद्धि विवेकरहित है अर्थात् जिसने विवेकको महत्त्व नहीं दिया है, वह दुर्मीत है। बोधमें विवेक कारण है, बुद्धि नहीं। बुद्धि विवेकसे शुद्ध होती है। बुद्धिकी शुद्धिमें शुभ कर्म भी कुछ सहायक होते हैं, पर विवेक-विचारसे बुद्धिकी जैसी शुद्धि होती है, वैसी शुभ कर्मोंसे नहीं होती। विवेकको महत्त्व न देना जितना दोषी है, उतने मल-विक्षेप-आवरण दोषी नहीं हैं। विवेक अनादि और नित्य है। इसलिये मल-विक्षेप-आवरणके रहते हुए भी विवेक जाग्रत् हो सकता है। पापसे विवेक नष्ट नहीं होता, प्रत्युत विवेक जाग्रत् नहीं होता। विवेकको महत्त्व न देनेमें कारण है—क्रिया और पदार्थका महत्त्व। क्रिया और पदार्थको महत्त्व देनेवाला ही 'दुर्मीत' है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें यह बताया कि शुद्ध स्वरूपको कर्ता देखनेवाला दुर्मीत ठीक नहीं देखता। तो ठीक देखनेवाला कौन है—इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥
| यस्य | = जिसका | यस्य | = जिसकी | हत्वा | = मारकर |
|---|---|---|---|---|---|
| अहङ्कृतः, | बुद्धिः | = बुद्धि | अपि | = भी | |
| भावः | = अहंकृतभाव | ||||
| (‘मैं कर्ता हूँ’— | |||||
| ऐसा भाव) | न, लिप्यते | = लिप्त नहीं होती, | न | = न | |
| न | = नहीं है (और) | सः | = वह (युद्धमें) | हन्ति | = मारता है (और) |
| इमान् | = इन | न | = न | ||
| लोकान् | = सम्पूर्ण प्राणियोंको | निबध्यते | = बँधता है। |
व्याख्या —‘यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते’—जिसमें ‘मैं करता हूँ’—ऐसा अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धिमें ‘मेरको फल मिलेगा’—ऐसे स्वार्थ-भावका लेप नहीं है। इसको ऐसे समझना चाहिये—जैसे शास्त्रविहित और शास्त्रनिषिद्ध—ये सभी क्रियाएँ एक प्रकारशमें होती हैं और प्रकाशके ही आश्रित होती हैं; परन्तु प्रकाश किसी भी क्रियाका ‘कर्ता’ नहीं बनता अर्थात् प्रकाश उन क्रियाओंको न करनेवाला है और न करनेवाला है। ऐसे ही स्वरूपकी सताके बिना विहित और निषिद्ध—कोई भी क्रिया नहीं होती; परन्तु वह सत्ता उन क्रियाओंको न करनेवाली है और न करनेवाली है—ऐसा जिसको साक्षात् अनुभव हो जाता है, उसमें ‘मैं क्रियाओंको करनेवाला हूँ’—
ऐसा अहंकृतभाव नहीं रहता और ‘अमुक चीज चाहिये, अमुक चीज नहीं चाहिये’; ‘अमुक घटना होनी चाहिये, अमुक घटना नहीं होनी चाहिये’—ऐसा बुद्धिमें लेप (द्रष्टमोह) नहीं रहता। अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेसे उसके कर्तृत्व और भोक्तृत्व—दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् अपनेमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व—ये दोनों ही नहीं हैं, इसका वास्तविक अनुभव हो जाता है।
प्रकृतिका कार्य स्वतः-स्वाभाविक ही चल रहा है, परिवर्तित हो रहा है और अपना स्वरूप केवल उसका प्रकाशक है—ऐसा समझकर जो अपने स्वरूपमें स्थित रहता है, उसमें ‘मैं करता हूँ’ ऐसा अहंकृतभाव नहीं होता; क्योंकि अहंकृतभाव प्रकृतिके कार्य शरीरको स्वीकार
- भगवान्के लिये की गयी उपासनामें भगवान्की कृपा प्रधान होती है; अतः इसमें साधकका कर्तृत्व नहीं है। क्रिया, कर्म, उपासना और विवेक—चारों अलग-अलग हैं। ‘क्रिया’ किसीके भी साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ती। ‘कर्म’ अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति (फल)-के साथ सम्बन्ध जोड़ता है। ‘उपासना’ भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़ती है। ‘विवेक’ जड़-चेतनका सम्बन्ध-विच्छेद करता है।