श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
भी अवस्थामें किंचिन्मात्र भी भंग नहीं होती। निर्विकल्प-बोधमें कभी परिवर्तन हुआ नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं। तात्पर्य है कि उस निर्विकल्प-बोधमें कभी हलचल आदि नहीं होते, यही 'न हन्ति न निबध्यते' का भाव है।
अहंकृतभाव और बुद्धिमें लेप न रहनेका उपाय क्या है? क्रियारूपसे परिवर्तन केवल प्रकृतिमें ही होता है और
परिशिष्ट भाव —अहंकृतभाव नहीं होनेका तात्पर्य है—अहंतारहित होना और बुद्धि लिप्त नहीं होनेका तात्पर्य है—कामना, ममता और स्वार्थभावसे रहित होना।
अर्जुनने कहा था कि इन आततायियोंको मारनेसे हमारेको पाप लगेगा—'पापमेवाश्रयेदस्माद्भूतैतानातातयिनः' (गीता १।३६) और गुरुजनोंको मारनेसे पाप लगेगा—'गुरुन्हन्त्वा हि महानुभावान्' (गीता २।५)। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि इनको मारनेसे पाप लगनेकी तो बात ही क्या है, सम्पूर्ण प्राणियोंको मारनेसे भी पाप नहीं लगेगा, क्योंकि पाप लगनेमें हेतु अहंता और बुद्धिकी लिप्तता है। बुद्धि कामना, ममता और स्वार्थभावसे लिप्त होती है। गंगाजीमें कोई डूबकर मर जाता है तो गंगाजीको पाप नहीं लगता और कोई उसका जल पीता है, स्नान करता है, खेती करता है तो उससे गंगाजीको पुण्य नहीं लगता है। वर्षासे कई जीव मर जाते हैं और कड़ियोंको जीवन मिल जाता है, पर वर्षाको पाप-पुण्य नहीं लगते। कारण कि गंगाजीमें और वर्षामें अहंकृतभाव और बुद्धिका लेप नहीं है। अगर डॉक्टरमें कामना, ममता और स्वार्थबुद्धि न हो तो ऑपरेशनमें अंग काटनेपर भी उसको पाप नहीं लगता। अगर उसमें अहंकृतभाव भी न हो तो फिर पाप लगनेकी बात ही क्या है।
ज्ञानयोगसे 'अहंकृतभाव' का नाश होता है और कर्मयोगसे 'बुद्धिकी लिप्तता' नष्ट होती है। दोनोंमेंसे किसी एकका नाश होनेपर दूसरा भी नष्ट हो जाता है। अहंकृतभावके कारण ही जीवमें भोग और मोक्षकी इच्छा पैदा होती है। अहंकृतभाव मिटनेसे भोगेच्छा भी मिट जाती है—'बुद्धिर्यस्य न लिप्यते'। भोगेच्छा मिटनेपर मोक्षकी इच्छा स्वतः पूरी हो जाती है; क्योंकि मोक्ष स्वतःसिद्ध है।
सम्बन्ध—ज्ञान और प्रवृत्ति (क्रिया) दोषी नहीं होते, प्रत्युत कर्तृत्वाभिमान ही दोषी होता है; क्योंकि कर्तृत्वाभिमानसे ही कर्मसंग्रह होता है—यह बात आगेके श्लोकमें बताते हैं।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तैति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥ १८ ॥
| ज्ञानम् | = ज्ञान, | कर्मचोदना | = कर्मप्रेरणा होती है | कर्ता | = कर्ता— |
|---|---|---|---|---|---|
| ज्ञेयम् | = ज्ञेय (और) | (तथा) | इति | = इन | |
| परिज्ञाता | = परिज्ञाता | करणम् | = करण, | त्रिविधः | = तीनोंसे |
| त्रिविधा | = इन तीनोंसे | कर्म | = कर्म (और) | कर्मसङ्ग्रहः | = कर्मसंग्रह होता है। |
व्याख्या —[इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मके बननेमें पाँच हेतु बताये—अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव (संस्कार)। इन पाँचोंमें भी मूल हेतु है—कर्ता। इसी मूल हेतुको मिटानेके लिये भगवान्ने सोलहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव रखनेवालेकी बड़ी निन्दा की और सत्रहवें श्लोकमें कर्तृत्वभाव न रखनेवालेकी बड़ी प्रशंसा की। कर्तृत्वभाव बिलकुल न रहे,
यह साफ-साफ समझानेके लिये ही अठारहवाँ श्लोक कहा गया है।]
'ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना'—ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता—इन तीनोंसे कर्म-प्रेरणा होती है। 'ज्ञान' को सबसे पहले कहनेमें यह भाव है कि हरेक मनुष्यकी कोई भी प्रवृत्ति होती है तो प्रवृत्तिसे पहले ज्ञान होता है। जैसे, जल पीनेकी प्रवृत्तिसे पहले प्यासका ज्ञान