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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1158

श्लोक ३२ ]

  • साधक-संजीवनी *

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सात्त्विकी बुद्धिमें कही हुई प्रवृत्ति-निवृत्ति, भय-अभय और बन्ध-मोक्षको भी यहाँ 'एव च' पदोंसे ले लेना चाहिये।

'अथयावत्यजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी'— राग होनेसे राजसी बुद्धिमें स्वार्थ, पक्षपात, विषमता आदि दोष आ जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए बुद्धि धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य, भय-अभय, बन्ध-मोक्ष आदिके वास्तविक तत्त्वको ठीक-ठीक नहीं जान सकती। अतः किस वर्ण-आश्रमके लिये किस परिस्थितिमें कौन-सा धर्म कहा जाता है और कौन-सा अधर्म कहा जाता है? वह धर्म किस वर्ण-आश्रमके लिये कर्तव्य हो जाता है और किसके लिये अकर्तव्य हो जाता है; किससे भय होता है और किससे मनुष्य अभय हो जाता है? इन बातोंको जो बुद्धि ठीक-ठीक नहीं जान सकती, वह बुद्धि राजसी है।

जब सांसारिक वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया, पदार्थ आदिमें राग (आसक्ति) हो जाता है, तो वह राग दूसरोंके प्रति द्वेष पैदा करनेवाला हो जाता है। फिर जिसमें राग हो जाता है उसके दोषोंको और जिसमें द्वेष हो जाता है, उसके गुणोंको मनुष्य नहीं देख सकता। राग और

परिशिष्ट भाव— जो धर्म और अधर्मको तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बन्धन और मोक्षको कैसे जानेगा? नहीं जान सकता। बुद्धि रागात्मिका होनेसे वह इनको ठीक तरहसे नहीं जानता; क्योंकि रागकी मुख्यता होनेसे वह विवेकको महत्त्व नहीं दे पाता। उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका रंग चढ़नेसे उसका विवेक लुप्त हो जाता है।

सम्बन्ध—अब तामसी बुद्धिके लक्षण बताते हैं।

अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥

पार्थ= हे पृथानन्दन!अधर्मम्= अधर्मकोसर्वार्थान्= सम्पूर्ण चीजोंको
तमसा= तमोगुणसेधर्मम्= धर्म—विपरीतान्= उलटा
आवृता= घिरी हुईइति= ऐसा(मान लेती है),
या= जोमन्यते= मान लेती हैसा= वह
बुद्धिः= बुद्धि= औरतामसी= तामसी है।

व्याख्या— 'अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता'— ईश्वरकी निन्दा करना; शास्त्र, वर्ण, आश्रम और लोक-मर्यादाके विपरीत काम करना; माता-पिताके साथ अच्छा बर्ताव न करना; सन्त-महात्मा, गुरु-आचार्य आदिका अपमान करना; झूठ, कपट, बेईमानी, जालसाजी, अभक्ष्य भोजन, परस्त्रीगमन आदि शास्त्रनिषिद्ध पाप-कर्मोंको धर्म

द्वेष—इन दोनोंमें संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है। संसारके साथ सम्बन्ध जुड़नेपर मनुष्य संसारको नहीं जान सकता। ऐसे ही परमात्मासे अलग रहनेपर मनुष्य परमात्माको नहीं जान सकता। संसारसे अलग होकर ही संसारको जान सकता है और परमात्मासे अभिन्न होकर ही परमात्माको जान सकता है। वह अभिन्नता चाहे प्रेमसे हो, चाहे ज्ञानसे हो।

परमात्मासे अभिन्न होनेमें सात्त्विकी बुद्धि ही काम करती है; क्योंकि सात्त्विकी बुद्धिमें विवेकशक्ति जाग्रत् रहती है। परन्तु राजसी बुद्धिमें वह विवेकशक्ति रागके कारण धुँधली-सी रहती है। जैसे जलमें मिट्टी घुल जानेसे जलमें स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती, ऐसे ही बुद्धिमें रजोगुण आ जानेसे बुद्धिमें उतनी स्वच्छता, निर्मलता नहीं रहती। इसलिये धर्म-अधर्म आदिको समझनेमें कठिनता पड़ती है। राजसी बुद्धि होनेपर मनुष्य जिस-किसी विषयमें प्रवेश करता है, उसको उस विषयको समझनेमें कठिनता पड़ती है। उस विषयके गुण-दोषोंको ठीक-ठीक समझे बिना वह ग्रहण और त्यागको अपने आचरणमें नहीं ला सकता अर्थात् वह ग्राह्य वस्तुका ग्रहण नहीं कर सकता और त्याज्य वस्तुका त्याग नहीं कर सकता।

मानना—यह सब अधर्मको 'धर्म' मानना है। अपने शास्त्र, वर्ण, आश्रमकी मर्यादामें चलना; माता-पिताकी आज्ञाका पालन करना तथा उनकी तन-मन-धनसे सेवा करना; संत-महात्माओंके उपदेशोंके अनुसार अपना जीवन बनाना; धार्मिक ग्रन्थोंका पठन-पाठन करना; दूसरोंकी सेवा-उपकार करना; शुद्ध-पवित्र भोजन करना आदि