श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
शास्त्रविहित कर्मोंको उचित न मानना—यह धर्मको 'अधर्म' मानना है।
तामसी बुद्धिवाले मनुष्योंके विचार होते हैं कि 'शास्त्रकारोंने, ब्राह्मणोंने अपनेको बड़ा बता दिया और तरह-तरहके नियम बनाकर लोगोंको बाँध दिया, जिससे भारत परतन्त्र हो गया; जबतक ये शास्त्र रहेंगे, ये धार्मिक पुस्तकें रहेंगी, तबतक भारतका उत्थान नहीं होगा, भारत परतन्त्रताकी बेड़ीमें ही जकड़ा हुआ रहेगा, आदि-आदि। इसलिये वे मर्यादाओंको तोड़नेमें ही धर्म मानते हैं।
'सर्वार्थान्विपरीतांश्च' —आत्माको स्वरूप न मानकर शरीरको ही स्वरूप मानना; ईश्वरको न मान करके दृश्य जगत्को ही सच्चा मानना; दूसरोंको तुच्छ समझकर अपनेको ही सबसे बड़ा मानना; दूसरोंको मूर्ख समझकर
परिशिष्ट भाव —जिनकी बुद्धि तामसी होती है, उनको व्यवहारमें और परमार्थमें सब जगह उलटा ही दीखता है। इसका उदाहरण वर्तमान समयमें स्पष्ट दीखनेमें आ रहा है। जैसे—पशुओंके विनाशको 'मांसका उत्पादन' कहा जाता है! गर्भपातरूपी महापापको और मनुष्यकी उत्पादक शक्तिके विनाशको 'परिवार-कल्याण' कहा जाता है! स्त्रियोंकी उच्छृंखलताको, मर्यादाके नाशको 'नारी-मुक्ति' कहा जाता है! पहले स्त्री घरकी स्वामिनी (गृहलक्ष्मी) होती थी, अब घरसे बाहर अनेक पुरुषोंकी दासता (नौकरी) करनेको 'नारीकी स्वाधीनता' कहा जाता है! इस प्रकार पराधीनताको स्वाधीनताका लक्षण माना जाता है। नैतिक पतनको उन्नतिकी संज्ञा दी जाती है। पशुताको सभ्यताका चिह्न माना जाता है। धार्मिकताको साम्प्रदायिकता और धर्मविरुद्धको धर्म-निरपेक्ष कहा जाता है। जब विनाशकाल समीप आता है, तभी ऐसी विपरीत, तामसी बुद्धि पैदा होती है—'विनाशकाले विपरीतबुद्धिः '; 'बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ' (गीता २।६३)।
सम्बन्ध—अब भगवान् सात्त्विकी धृतिके लक्षण बताते हैं।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ! | द्वारा | धारयते | = धारण करता है |
|---|---|---|---|---|
| योगेन | = समतासे युक्त | (मनुष्य) | अर्थात् | |
| यया | = जिस | मनःप्राणेन्द्रिय- | संयम रखता है, | |
| अव्यभि- | क्रियाः | = मन, प्राण | सा | |
| चारिण्या | = अव्यभिचारिणी | और इन्द्रियोंकी | धृतिः | |
| धृत्या | = धृतिके | क्रियाओंको | सात्त्विकी |
व्याख्या—'धृत्या यया धारयते'... 'योगेनाव्यभिचारिण्या'—सांसारिक लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख, आदर-निरादर, सिद्धि-असिद्धिमें सम रहनेका नाम 'योग' (समता) है।
परमात्माको चाहनेके साथ-साथ इस लोकमें सिद्धि, असिद्धि, वस्तु, पदार्थ, सत्कार, पूजा आदि और परलोकमें
अपनेको ही पढ़ा-लिखा, विद्वान् समझना; जितने संत-महात्मा हो गये हैं, उनकी मान्यताओंसे अपनी मान्यताको श्रेष्ठ मानना; सच्चे सुखकी तरफ ध्यान न देकर वर्तमानमें मिलनेवाले संयोगजन्य सुखको ही सच्चा मानना; न करनेयोग्य कार्यको ही अपना कर्तव्य समझना; अपवित्र वस्तुओंको ही पवित्र मानना—यह सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मानना है।
'बुद्धिः सा पार्थ तामसी' —तमोगुणसे आवृत जो बुद्धि अधर्मको धर्म, धर्मको अधर्म और अच्छेको नुरा, सुलटेको उलटा मानती है, वह बुद्धि तामसी है। यह तामसी बुद्धि ही मनुष्यको अधोगतिमें ले जानेवाली है—'अधोगच्छन्ति तामसाः ' (गीता १४।१८)। इसलिये अपना उद्धार चाहनेवालेको इसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये।
सुख-भोगको चाहना 'व्यभिचार' है और इस लोक तथा परलोकके सुख, भोग, वस्तु, पदार्थ आदिकी किंचिन्मात्र भी इच्छा न रखकर केवल परमात्माको चाहना 'अव्यभिचार' है। यह अव्यभिचार जिसमें होता है, वह धृति 'अव्यभिचारिणी' कहलाती है।
अपनी मान्यता, सिद्धान्त, लक्ष्य, भाव, क्रिया, वृत्ति,