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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1165

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —चौदहवें अध्यायमें तो सात्त्विक सुखको बाँधनेवाला बताया था—‘सुखसंगेन बध्नाति ’ (१४।६), पर यहाँ उसको दुःखोंका नाश करनेवाला बताते हैं—‘दुःखान्तं च निगच्छति ’। इसका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक सुखमें रमण (भोग) करनेसे वह बाँधनेवाला हो जाता है अर्थात् गुणातीत नहीं होने देता। अगर रमण न करे तो वह सात्त्विक सुख दुःखोंका नाश करनेवाला हो जाता है। सुख भोगनेसे दुःखका नाश नहीं होता। भोगका त्याग करनेसे ही योग होता है। इसलिये सात्त्विक सुखसे भी असंगता होनी चाहिये। संग होनेसे बन्धनकारक रजोगुण आ जाता है। सत्त्वगुणमें रजोगुण आनेसे पतन होता है।

विवेकको महत्त्व न देनेके कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह दीखता है। राजस मनुष्य विवेकको आदर नहीं देता। अतः सात्त्विक सुखका आरम्भमें विषकी तरह दीखना राजसपना है। तात्पर्य है कि सात्त्विक सुख दुःखदायी नहीं होता, प्रत्युत मनुष्यकी बुद्धिमें राजसपना होनेसे सात्त्विक सुख भी उसको विषकी तरह दुःखदायी दीखता है। उसका उद्देश्य तो सात्त्विक सुखका है, पर भीतर राजस भाव पड़ा है।

सम्बन्ध—अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥

यत्= जोअग्रे= आरम्भमें(अतः)
सुखम्= सुखअमृतोपमम्= अमृतकी तरह
(और)तत्= वह
विषयेन्द्रियसंयोगात्= इन्द्रियों और
विषयोंके संयोगसे
(होता है),परिणामे= परिणाममेंराजसम्= राजस
तत्= वहविषम्= विषकीस्मृतम्
है।
इव= तरह प्रतीत होता है;

व्याख्या —‘विषयेन्द्रियसंयोगात् ’—विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख है, उसमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि यह प्राणी किसी भी योनियें जाता है, वहाँ उसको विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला सुख मिलता ही है। शब्द, स्पर्श आदि पाँचों विषयोंका सुख पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि सभी प्राणियोंको मिलता है। अतः उस सुखमें प्राणिमात्रका स्वाभाविक अभ्यास रहता है। मनुष्यजीवनमें भी बचपनसे देखा जाय तो अनुकूलतामें राजी होना और प्रतिकूलतामें नाराज होना स्वाभाविक ही होता आया है। इसलिये इस राजस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है।

‘यत्तदग्रेऽमृतोपमम्’ —राजस सुखको आरम्भमें अमृतकी तरह कहनेका भाव यह है कि सांसारिक विषयोंकी प्राप्तिकी सम्भावनाके समय मनमें जितना सुख होता है, उतना सुख मस्ती और राजीपन विषयोंके मिलनेपर नहीं रहता। मिलनेपर भी आरम्भमें (संयोग होते ही) जैसा सुख होता है, थोड़े समयके बाद वैसा सुख नहीं रहता और उस विषयको भोगते-भोगते जब भोगनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है, उस समय सुख नहीं होता, प्रत्युत विषयभोगसे

अरुचि हो जाती है। भोग भोगनेकी शक्ति क्षीण होनेके बाद भी अगर विषयोंको भोगा जाय तो दुःख, जलन पैदा हो जाती है, चित्तमें सुख नहीं रहता, इसलिये यह राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है।

अमृतकी तरह कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब मन विषयोंमें खिंचता है, तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। विषयों और भोगोंकी बातें सुननेमें जितना रस आता है, उतना भोगोंमें नहीं आता। इसलिये गीतामें आया है—‘यामिमां पुष्यितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ’ (२।४२); राजस पुरुष स्वर्गके भोगोंका सुख सुनते हैं तो उनको वह सुख बड़ा प्रिय लगता है और वे उसके लिये ललचा उठते हैं। तात्पर्य है कि वे स्वर्गके सुख दूरसे सुनकर ही बड़े प्रिय लगते हैं; परन्तु स्वर्गमें जाकर सुख भोगनेसे उनको उतना सुख नहीं मिलता और वह उतना प्रिय भी नहीं लगता!

‘परिणामे विषमिव’ —आरम्भमें विषय बड़े सुन्दर लगते हैं, उनमें बड़ा सुख मालूम देता है; परन्तु उनको भोगते-भोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत