सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1164, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1164

श्लोक ३६-३७ ]

  • साधक-संजीवनी *

११६३

तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है—‘आत्मबुद्धिप्रसादजम्।’ जो उत्पन्न होनेवाला होता है, वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा? इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है, गुणातीत हो जाता है।

‘आत्मबुद्धिप्रसादजम्’—जिस बुद्धिमें सांसारिक मान, बड़ाई, आदर, धन-संग्रह, विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता, केवल परमात्म-विषयक विचार ही रहता है, उस बुद्धिकी प्रसन्नता(गीता—दूसरे अध्यायका चौसठवाँ श्लोक) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है, वह सुख सात्त्विक है।

‘यत्तदग्रे विषमिव’—यहाँ ‘यत्तत्’ कहनेका भाव यह है कि ‘यत्’—जो सात्त्विक सुख है; ‘तत्’—वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है, जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनाता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है, उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है—‘अग्रे विषमिव।’ तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं—उसका रस अभी मिला नहीं; इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।

राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है; इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।

वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है, प्रत्युत

राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे, बालकको खेल-कूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृंखलता, खेल-कूद छूट जाता है, तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एक-दो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि, प्रियता होने लगती है।

वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है, जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है, जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन, सत्संग, कथा-कीर्तन, साधन-भजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान, कर्म, बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं, उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट, परिश्रम, कठिनाता आदि मालूम ही नहीं देते।

‘परिणामेऽमृतोपमम्’—साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता, ज्ञानकी दीप्ति, शान्ति, निर्विकारता आदि सद्भाव-सदगुण प्रकट हो जाते हैं*। इन सदगुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता—पाँचवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।

‘तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम्’—सत्संग, स्वाध्याय, संकीर्तन, जप, ध्यान, चिन्तन आदिसे जो सुख होता है, वह मान, बड़ाई, आराम, रुपये, भोग आदि विषयेन्द्रिय-सम्बन्धका नहीं है और प्रमाद, आलस्य, निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

  • सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण अन्तःकरणमें अमूर्तरूपसे रहते हैं। इनका पता वृत्तियोंसे ही लगता है, जिसका वर्णन चौदहवें अध्यायमें ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक हुआ है।
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित) · पृष्ठ 1164, कुल 1299 में से · BharatKosha