श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है; क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है, उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम 'गुडाकेश' हुआ है।
'सुखं तु इदानीम्' —ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बतानेके बाद यहाँ 'तु' पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं, उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्न-बाधा है, तो वह है—सुखकी इच्छा।
सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य—ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय, तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं, अगर समाधिक सुख भी लिया जाय, तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है—'सुखसंगेन बध्नाति' (गीता १४।६)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें? वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता, प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता—पौंचवें अध्यायका इक्कीसवाँ और छठे अध्यायका इक्कीसवाँ तथा अठ्ठाईसवाँ श्लोक)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय सुख स्वतः—स्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष ख्याल करानेके लिये भगवान् यहाँ 'तु' पदका प्रयोग करते हैं।
यहाँ 'इदानीम्' कहनेका तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते हैं; अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही रहता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।
'त्रिविधं शृणु मे' —लोग रात-दिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण 'सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है; वे इन बातोंको समझ ही
नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया! वह सुख तीन प्रकारका होता है, उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजस-तामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजस-तामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।
'अभ्यासादमते यत्र' —सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतः—स्वाभाविक ही आकर्षण होता है।
राजस-तामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर, मन-बुद्धिका भोग-संग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य, अभिमानजन्य, प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं, उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं; और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं, दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है; क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।
इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है? श्रवण-मनन भी अभ्यास है, शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है और राजसी-तामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतः—स्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है, उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम 'अभ्यास' है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है, पर रमण करना बाधक है।
यहाँ 'अभ्यासादमते' पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय, प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि, प्रियता, प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।
'दुःखान्तं च निगच्छति' —उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्यों-ज्यों रुचि, प्रियता बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता, सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका पैंसठवाँ श्लोक)।
'च' अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा,