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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1162

श्लोक ३६-३७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामसभावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा, भय आदि तामसभावोंमें ही रचा-पचा रहता है।

पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती, जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें, चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है, यह सब क्रिया ही है। 'क्रिया तो शरीरोंमें होती है, पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है'—ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं-(चेतनस्वरूप-) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा

लक्ष्य होता है, उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है, वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार 'पार्थ' सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि 'पुथानन्दन! लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजस-तामसभाव न आने पायें—इसके लिये निरन्तर सजग रहो!'

परिशिष्ट भाव —निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख, घमण्ड आदि दोष तो रहेंगे ही, दूर हो ही नहीं सकते—ऐसा निश्चय करनेवाले मनुष्य 'दुर्मेधा' हैं। ऐसे मनुष्योंका दोषोंको छोड़नेकी तरफ खयाल ही नहीं जाता, छोड़नेकी हिम्मत ही नहीं होती, प्रत्युत वे इनको स्वाभाविक ही धारण किये रहते हैं।

अधिक निद्रा ही बाधक होती है। आवश्यक, यथायोग्य निद्रा बाधक नहीं होती (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ-सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुख कर्म-संग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्भमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥

भरतर्षभ= हे भरतवंशियोंमेंरमते= रमण होता हैआसक्तिके कारण)
श्रेष्ठ= और (जिससे)अग्रे
अर्जुन!दुःखान्तम्= दुःखोंका अन्तविषम्
इदानीम्= अबनिगच्छति= हो जाता है,इव
त्रिविधम्= तीन प्रकारकेतत्= ऐसा वह
सुखम्= सुखकोआत्मबुद्धि-परिणामे
तु= भी (तुम)प्रसादजम्= परमात्मविषयकअमृतोपमम्
मे= मुझसेबुद्धिकी प्रसन्नतासे
शृणु= सुनो।यत्= पैदा होनेवालातत्
यत्र= जिसमेंसुखम्= जोसात्त्विकम्
अभ्यासात्= अभ्यासे= सुख (सांसारिक)प्रोक्तम्

व्याख्या—'भरतर्षभ' —इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! तुम राजस-तामस सुखोंमें लुब्ध, मोहित होनेवाले नहीं हो; क्योंकि

तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है; क्योंकि स्वर्गकी उर्वशी-जैसी सुन्दरी अप्सराको भी