श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
संग्रह करना चाहिये—इस प्रकार धनमें ही रचे-पचे रहना 'अर्थ' को धारण करना है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस पुरुष शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार जो कुछ भी शुभ काम करता है, उसमें उसकी
यही कामना रहती है कि इस कर्मका मुझे इस लोकमें सुख, आराम, मान, सत्कार आदि मिले और परलोकमें सुख-भोग मिले। ऐसे फलकी कामनावाले तथा संसारमें अत्यन्त आसक्त मनुष्यकी धारण-शक्ति राजसी होती है।
सम्बन्ध—अब तामसी धृतिके लक्षण बताते हैं।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
| पार्थ | = हे पार्थ ! | भयम् | = भय, | विमुञ्चति | = छोड़ता |
|---|---|---|---|---|---|
| दुर्मेधाः | = दुष्ट | ||||
| बुद्धिवाला | |||||
| मनुष्य | शोकम् | = चिन्ता, | अर्थात् | धारण | |
| यया | = जिस धृतिके | विषादम् | = दुःख | किये रहता है, | |
| द्वारा | च | = और | सा | = वह | |
| स्वप्नम् | = निद्रा, | मदम् | = घमण्डको | धृतिः | = धृति |
| एव | = भी | तामसी | = तामसी है। | ||
| न | = नहीं |
व्याख्या—'यया स्वप्नं भयं'... सा पार्थ तामसी'—तामसी धारण-शक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा, बाहर और भीतरका भय, चिन्ता, दुःख और घमण्ड—इनका त्याग नहीं करता, प्रत्युत इन सबमें रचा-पचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है, कभी मृत्यु, बीमारी, अपयश, अपमान, स्वास्थ्य, धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है, कभी शोक-चिन्तामें डूबा रहता है, कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है।
निद्रा, भय, शोक आदिके सिवाय प्रमाद, अभिमान, दम्भ, द्वेष, ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा, दूसरोंका अपकार करना, उनको कष्ट देना, उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचारोंको भी 'एव च' पदोंसे मान लेना चाहिये।
इस प्रकार निद्रा, भय आदिको और दुर्गुण-दुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है।
भगवान्ने तैत्तिरीय-चौतीसवें श्लोकोंमें 'धारयते' पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है; परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्ट है, जिसकी बुद्धिमें अज्ञता, मूढ़ता भरी हुई है, ऐसा मलिन
अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा, भय, शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचा-पचा रहता है।
सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतियोंमें तो क्रमशः 'फलाकाङ्क्षी' और 'दुर्मेधाः' पदसे कर्ताका उल्लेख किया है, पर सात्त्विकी धृतियोंमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतियोंमें कर्ता निलिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता; परन्तु राजसी और तामसी धृतियोंमें कर्ता लिप्त होता है।
विशेष बात
मानवशरीर विवेक-प्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है, उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है, त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति- (धारणशक्ति-) में यह विवेक साफ-साफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतियोंमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता; फिर भी इस लोकमें सुख-आराम, मान-आदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले, भोग मिले—इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी