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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

संग्रह करना चाहिये—इस प्रकार धनमें ही रचे-पचे रहना 'अर्थ' को धारण करना है। संसारमें अत्यन्त राग (आसक्ति) होनेके कारण राजस पुरुष शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार जो कुछ भी शुभ काम करता है, उसमें उसकी

यही कामना रहती है कि इस कर्मका मुझे इस लोकमें सुख, आराम, मान, सत्कार आदि मिले और परलोकमें सुख-भोग मिले। ऐसे फलकी कामनावाले तथा संसारमें अत्यन्त आसक्त मनुष्यकी धारण-शक्ति राजसी होती है।

सम्बन्ध—अब तामसी धृतिके लक्षण बताते हैं।

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।

न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥

पार्थ= हे पार्थ !भयम्= भय,विमुञ्चति= छोड़ता
दुर्मेधाः= दुष्ट
बुद्धिवाला
मनुष्यशोकम्= चिन्ता,अर्थात्धारण
यया= जिस धृतिकेविषादम्= दुःखकिये रहता है,
द्वारा= औरसा= वह
स्वप्नम्= निद्रा,मदम्= घमण्डकोधृतिः= धृति
एव= भीतामसी= तामसी है।
= नहीं

व्याख्या—'यया स्वप्नं भयं'... सा पार्थ तामसी'—तामसी धारण-शक्तिके द्वारा मनुष्य ज्यादा निद्रा, बाहर और भीतरका भय, चिन्ता, दुःख और घमण्ड—इनका त्याग नहीं करता, प्रत्युत इन सबमें रचा-पचा रहता है। वह कभी ज्यादा नींदमें पड़ा रहता है, कभी मृत्यु, बीमारी, अपयश, अपमान, स्वास्थ्य, धन आदिके भयसे भयभीत होता रहता है, कभी शोक-चिन्तामें डूबा रहता है, कभी दुःखमें मग्न रहता है और कभी अनुकूल पदार्थोंके मिलनेसे घमण्डमें चूर रहता है।

निद्रा, भय, शोक आदिके सिवाय प्रमाद, अभिमान, दम्भ, द्वेष, ईर्ष्या आदि दुर्गुणोंको तथा हिंसा, दूसरोंका अपकार करना, उनको कष्ट देना, उनके धनका किसी तरहसे अपहरण करना आदि दुराचारोंको भी 'एव च' पदोंसे मान लेना चाहिये।

इस प्रकार निद्रा, भय आदिको और दुर्गुण-दुराचारोंको पकड़े रहनेवाली अर्थात् उनको न छोड़नेवाली धृति तामसी होती है।

भगवान्ने तैत्तिरीय-चौतीसवें श्लोकोंमें 'धारयते' पदसे सात्त्विक और राजस मनुष्यके द्वारा क्रमशः सात्त्विकी और राजसी धृतिको धारण करनेकी बात कही है; परन्तु यहाँ तामस मनुष्यके द्वारा तामसी धृतिको धारण करनेकी बात नहीं कही। कारण यह है कि जिसकी बुद्धि बहुत ही दुष्ट है, जिसकी बुद्धिमें अज्ञता, मूढ़ता भरी हुई है, ऐसा मलिन

अन्तःकरणवाला तामस मनुष्य निद्रा, भय, शोक आदि भावोंको छोड़ता ही नहीं। वह उनमें स्वाभाविक ही रचा-पचा रहता है।

सात्त्विकी, राजसी और तामसी—इन तीनों धृतियोंके वर्णनमें राजसी और तामसी धृतियोंमें तो क्रमशः 'फलाकाङ्क्षी' और 'दुर्मेधाः' पदसे कर्ताका उल्लेख किया है, पर सात्त्विकी धृतियोंमें कर्ताका उल्लेख किया ही नहीं। इसका कारण यह है कि सात्त्विकी धृतियोंमें कर्ता निलिप्त रहता है अर्थात् उसमें कर्तृत्वका लेप नहीं होता; परन्तु राजसी और तामसी धृतियोंमें कर्ता लिप्त होता है।

विशेष बात

मानवशरीर विवेक-प्रधान है। मनुष्य जो कुछ करता है, उसे वह विचारपूर्वक ही करता है। वह ज्यों ही विचारपूर्वक काम करता है, त्यों ही विवेक ज्यादा स्पष्ट प्रकट होता है। सात्त्विक मनुष्यकी धृति- (धारणशक्ति-) में यह विवेक साफ-साफ प्रकट होता है कि मुझे तो केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। राजस मनुष्यकी धृतियोंमें संसारके पदार्थों और भोगोंमें रागकी प्रधानता होनेके कारण विवेक वैसा स्पष्ट नहीं होता; फिर भी इस लोकमें सुख-आराम, मान-आदर मिले और परलोकमें अच्छी गति मिले, भोग मिले—इस विषयमें विवेक काम करता है और आचरण भी मर्यादाके अनुसार ही होता है। परन्तु तामस मनुष्यकी

श्लोक ३६-३७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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धृतिमें विवेक बिलकुल ही दब जाता है। तामसभावोंमें उसकी इतनी दृढ़ता हो जाती है कि उसे उन भावोंको धारण करनेकी आवश्यकता ही नहीं रहती। वह तो निद्रा, भय आदि तामसभावोंमें ही रचा-पचा रहता है।

पारमार्थिक मार्गमें क्रिया इतना काम नहीं करती, जितना अपना उद्देश्य काम करता है। स्थूल क्रियाकी प्रधानता स्थूलशरीरमें, चिन्तनकी प्रधानता सूक्ष्मशरीरमें और स्थिरताकी प्रधानता कारणशरीरमें होती है, यह सब क्रिया ही है। 'क्रिया तो शरीरोंमें होती है, पर मेरेको तो केवल पारमार्थिक मार्गपर ही चलना है'—ऐसा उद्देश्य या लक्ष्य स्वयं-(चेतनस्वरूप-) में ही रहता है। स्वयंमें जैसा

लक्ष्य होता है, उसके अनुसार स्वतः क्रियाएँ होती हैं। जो चीज स्वयंमें रहती है, वह कभी बदलती नहीं। उस लक्ष्यकी दृढ़ताके लिये सात्त्विकी बुद्धिकी आवश्यकता है और बुद्धिके निश्चयको अटल रखनेके लिये सात्त्विकी धृतिकी आवश्यकता है। इसलिये यहाँ तीसवेंसे पैंतीसवें श्लोकतक कुल छः श्लोकोंमें छः बार 'पार्थ' सम्बोधनका प्रयोग करके भगवान् साधकमात्रके प्रतिनिधि अर्जुनको चेताते हैं कि 'पुथानन्दन! लौकिक वस्तुओं और व्यक्तियोंके लिये चिन्ता न करके तुम अपने लक्ष्यको दृढ़तासे धारण किये रहो। अपनेमें कभी भी राजस-तामसभाव न आने पायें—इसके लिये निरन्तर सजग रहो!'

परिशिष्ट भाव —निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख, घमण्ड आदि दोष तो रहेंगे ही, दूर हो ही नहीं सकते—ऐसा निश्चय करनेवाले मनुष्य 'दुर्मेधा' हैं। ऐसे मनुष्योंका दोषोंको छोड़नेकी तरफ खयाल ही नहीं जाता, छोड़नेकी हिम्मत ही नहीं होती, प्रत्युत वे इनको स्वाभाविक ही धारण किये रहते हैं।

अधिक निद्रा ही बाधक होती है। आवश्यक, यथायोग्य निद्रा बाधक नहीं होती (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ-सत्रहवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध—मनुष्योंकी कर्मोंमें प्रवृत्ति सुखके लोभसे ही होती है अर्थात् सुख कर्म-संग्रहमें हेतु है। अतः आगेके चार श्लोकोंमें सुखके भेद बताते हैं।

सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्भमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६ ॥ यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥

भरतर्षभ= हे भरतवंशियोंमेंरमते= रमण होता हैआसक्तिके कारण)
श्रेष्ठ= और (जिससे)अग्रे
अर्जुन!दुःखान्तम्= दुःखोंका अन्तविषम्
इदानीम्= अबनिगच्छति= हो जाता है,इव
त्रिविधम्= तीन प्रकारकेतत्= ऐसा वह
सुखम्= सुखकोआत्मबुद्धि-परिणामे
तु= भी (तुम)प्रसादजम्= परमात्मविषयकअमृतोपमम्
मे= मुझसेबुद्धिकी प्रसन्नतासे
शृणु= सुनो।यत्= पैदा होनेवालातत्
यत्र= जिसमेंसुखम्= जोसात्त्विकम्
अभ्यासात्= अभ्यासे= सुख (सांसारिक)प्रोक्तम्

व्याख्या—'भरतर्षभ' —इस सम्बोधनको देनेमें भगवान्का भाव यह है कि भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! तुम राजस-तामस सुखोंमें लुब्ध, मोहित होनेवाले नहीं हो; क्योंकि

तुम्हारे लिये राजस और तामस सुखपर विजय करना कोई बड़ी बात नहीं है। तुमने राजस सुखपर विजय भी कर ली है; क्योंकि स्वर्गकी उर्वशी-जैसी सुन्दरी अप्सराको भी

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

तुमने ठुकरा दिया है। इसी प्रकार तुमने तामस सुखपर भी विजय कर ली है; क्योंकि प्राणिमात्रके लिये आवश्यक जो निद्राका तामस सुख है, उसको तुमने जीत लिया है। इसीसे तुम्हारा नाम 'गुडाकेश' हुआ है।

'सुखं तु इदानीम्' —ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बतानेके बाद यहाँ 'तु' पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि सुख भी तीन तरहका होता है। इसमें एक विशेष ध्यान देनेकी बात है कि आज पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले जितने भी साधक हैं, उन साधकोंकी ऊँची स्थिति न होनेमें अथवा उनको परमात्मतत्त्वका अनुभव न होनेमें अगर कोई विघ्न-बाधा है, तो वह है—सुखकी इच्छा।

सात्त्विक सुख भी आसक्तिके कारण बन्धनकारक हो जाता है। तात्पर्य है कि अगर साधनजन्य—ध्यान और एकाग्रताका सुख भी लिया जाय, तो वह भी बन्धनकारक हो जाता है। इतना ही नहीं, अगर समाधिक सुख भी लिया जाय, तो वह भी परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें बाधक हो जाता है—'सुखसंगेन बध्नाति' (गीता १४।६)। इस विषयमें कोई कहे कि परमात्मतत्त्वका सुख आ जाय तो क्या उस सुखको भी हम न लें? वास्तवमें परमात्मतत्त्वका सुख लिया नहीं जाता, प्रत्युत उस अक्षय सुखका स्वतः अनुभव होता है (गीता—पौंचवें अध्यायका इक्कीसवाँ और छठे अध्यायका इक्कीसवाँ तथा अठ्ठाईसवाँ श्लोक)। साधनजन्य सुखका भोग न करनेसे वह अक्षय सुख स्वतः—स्वाभाविक प्राप्त हो जाता है। उस अक्षय सुखकी तरफ विशेष ख्याल करानेके लिये भगवान् यहाँ 'तु' पदका प्रयोग करते हैं।

यहाँ 'इदानीम्' कहनेका तात्पर्य है कि अर्जुन संन्यास और त्यागके तत्त्वको जानना चाहते हैं; अतः उनकी जिज्ञासाके उत्तरमें भगवान्ने त्याग, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि और धृतिके तीन-तीन भेद बताये। परन्तु इन सबमें ध्येय तो सुखका ही रहता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम उसी ध्येयकी सिद्धिके लिये सुखके भेद सुनो।

'त्रिविधं शृणु मे' —लोग रात-दिन राजस और तामस सुखमें लगे रहते हैं और उसीको वास्तविक सुख मानते हैं। इस कारण 'सांसारिक भोगोंसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; प्राणोंके मोहसे ऊँचा उठकर भी कोई सुख मिल सकता है; राजस और तामस सुखसे आगे भी कोई सात्त्विक सुख है; वे इन बातोंको समझ ही

नहीं सकते। इसलिये भगवान् कहते हैं कि भैया! वह सुख तीन प्रकारका होता है, उनको तुम सुनो और उनमेंसे सात्त्विक सुखको ग्रहण करो और राजस-तामस सुखोंका त्याग करो। कारण कि सात्त्विक सुख परमात्माकी तरफ चलनेमें सहायता करनेवाला है और राजस-तामस सुख संसारमें फँसाकर पतन करनेवाले हैं।

'अभ्यासादमते यत्र' —सात्त्विक सुखमें अभ्याससे रमण होता है। साधारण मनुष्योंको अभ्यासके बिना इस सुखका अनुभव नहीं होता। राजस और तामस सुखमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। उसमें तो प्राणिमात्रका स्वतः—स्वाभाविक ही आकर्षण होता है।

राजस-तामस सुखमें इन्द्रियोंका विषयोंकी ओर, मन-बुद्धिका भोग-संग्रहकी ओर तथा थकावट होनेपर निद्रा आदिकी ओर स्वतः आकर्षण होता है। विषयजन्य, अभिमानजन्य, प्रशंसाजन्य और निद्राजन्य सुख सभी प्राणियोंको स्वतः ही अच्छे लगते हैं। कुत्ते आदि जो नीच प्राणी हैं, उनका भी आदर करते हैं तो वे राजी होते हैं; और निरादर करते हैं तो नाराज हो जाते हैं, दुःखी हो जाते हैं। तात्पर्य यह है कि राजस और तामस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है; क्योंकि इस सुखको सभी प्राणी अन्य योनियोंमें भी लेते आये हैं।

इस सात्त्विक सुखमें अभ्यास क्या है? श्रवण-मनन भी अभ्यास है, शास्त्रोंको समझना भी अभ्यास है और राजसी-तामसी वृत्तियोंको हटाना भी अभ्यास है। जिस राजस और तामस सुखमें प्राणिमात्रकी स्वतः—स्वाभाविक प्रवृत्ति हो रही है, उससे भिन्न नयी प्रवृत्ति करनेका नाम 'अभ्यास' है। सात्त्विक सुखमें अभ्यास करना तो आवश्यक है, पर रमण करना बाधक है।

यहाँ 'अभ्यासादमते' पदका यह भाव नहीं है कि सात्त्विक सुखका भोग किया जाय, प्रत्युत सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ही रुचि, प्रियता, प्रवृत्ति आदिके होनेको ही यहाँ रमण करना कहा गया है।

'दुःखान्तं च निगच्छति' —उस सात्त्विक सुखमें अभ्याससे ज्यों-ज्यों रुचि, प्रियता बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों परिणाममें दुःखोंका नाश होता जाता है और प्रसन्नता, सुख तथा आनन्द बढ़ते जाते हैं (गीता—दूसरे अध्यायका पैंसठवाँ श्लोक)।

'च' अव्यय देनेका तात्पर्य है कि जबतक सात्त्विक सुखमें रमण होगा अर्थात् साधक सात्त्विक सुख लेता रहेगा,

श्लोक ३६-३७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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तबतक दुःखोंका अत्यन्त अभाव नहीं होगा। कारण कि सात्त्विक सुख भी परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा हुआ है—‘आत्मबुद्धिप्रसादजम्।’ जो उत्पन्न होनेवाला होता है, वह जरूर नष्ट होता है। ऐसे सुखसे दुःखोंका अन्त कैसे होगा? इसलिये सात्त्विक सुखमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठनेसे मनुष्य दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है, गुणातीत हो जाता है।

‘आत्मबुद्धिप्रसादजम्’—जिस बुद्धिमें सांसारिक मान, बड़ाई, आदर, धन-संग्रह, विषयजन्य सुख आदिका महत्त्व नहीं रहता, केवल परमात्म-विषयक विचार ही रहता है, उस बुद्धिकी प्रसन्नता(गीता—दूसरे अध्यायका चौसठवाँ श्लोक) अर्थात् स्वच्छतासे यह सात्त्विक सुख पैदा होता है। तात्पर्य है कि सांसारिक संयोगजन्य सुखसे सर्वथा उपरत होकर परमात्मामें बुद्धिके विलीन होनेपर जो सुख होता है, वह सुख सात्त्विक है।

‘यत्तदग्रे विषमिव’—यहाँ ‘यत्तत्’ कहनेका भाव यह है कि ‘यत्’—जो सात्त्विक सुख है; ‘तत्’—वह परोक्ष है अर्थात् उसका अभी अनुभव नहीं हुआ है। अभी तो उस सुखका केवल उद्देश्य बनाया है, जबकि राजस और तामस सुखका अभी अनुभव होता है। इसलिये अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें कठिनाता आती है और लक्ष्यरूपमें जो सात्त्विक सुख है, उसकी प्राप्तिके लिये किया हुआ रसहीन परिश्रम (अभ्यास) आरम्भमें जहरकी तरह लगता है—‘अग्रे विषमिव।’ तात्पर्य यह है कि अनुभवजन्य राजस और तामस सुखका तो त्याग कर दिया और लक्ष्यवाला सात्त्विक सुख मिला नहीं—उसका रस अभी मिला नहीं; इसलिये वह सात्त्विक सुख आरम्भमें जहरकी तरह प्रतीत होता है।

राजस और तामस सुखको अनेक योनियोंमें भोगते आये हैं और उसे इस जन्ममें भी भोगा है। उस भोगे हुए सुखकी स्मृति आनेसे राजस और तामस सुखमें स्वाभाविक ही मन लग जाता है। परन्तु सात्त्विक सुख उतना भोगा हुआ नहीं है; इसलिये इसमें जल्दी मन नहीं लगता। इस कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह लगता है।

वास्तवमें सात्त्विक सुख विषकी तरह नहीं है, प्रत्युत

राजस और तामस सुखका त्याग विषकी तरह होता है। जैसे, बालकको खेल-कूद छोड़कर पढ़ाईमें लगाया जाय तो उसको पढ़ाईमें कैदीकी तरह होकर अभ्यास करना पड़ता है। पढ़ाईमें मन नहीं लगता तथा इधर उच्छृंखलता, खेल-कूद छूट जाता है, तो उसको पढ़ाई विषकी तरह मालूम देती है। परन्तु वही बालक पढ़ता रहे और एक-दो परीक्षाओंमें पास हो जाय तो उसका पढ़ाईमें मन लग जाता है अर्थात् उसको पढ़ाई अच्छी लगने लग जाती है। तब उसकी पढ़ाईके अभ्याससे रुचि, प्रियता होने लगती है।

वास्तवमें देखा जाय तो सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह उन्हीं लोगोंके लिये होता है, जिनका राजस और तामस सुखमें राग है। परन्तु जिनको सांसारिक भोगोंसे स्वाभाविक वैराग्य है, जिनकी पारमार्थिक शास्त्राध्ययन, सत्संग, कथा-कीर्तन, साधन-भजन आदिमें स्वाभाविक रुचि है और जिनके ज्ञान, कर्म, बुद्धि और धृति सात्त्विक हैं, उन साधकोंको यह सात्त्विक सुख आरम्भसे ही अमृतकी तरह आनन्द देनेवाला होता है। उनको इसमें कष्ट, परिश्रम, कठिनाता आदि मालूम ही नहीं देते।

‘परिणामेऽमृतोपमम्’—साधन करनेसे साधकमें सत्त्वगुण आता है। सत्त्वगुणके आनेपर इन्द्रियों और अन्तःकरणमें स्वच्छता, निर्मलता, ज्ञानकी दीप्ति, शान्ति, निर्विकारता आदि सद्भाव-सदगुण प्रकट हो जाते हैं*। इन सदगुणोंका प्रकट होना ही सात्त्विक सुखका परिणाममें अमृतकी तरह होना है। इसका उपभोग न करनेसे अर्थात् इसमें रस न लेनेसे वास्तविक अक्षय सुखकी प्राप्ति हो जाती है (गीता—पाँचवें अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

परिणाममें सात्त्विक सुख राजस और तामस सुखसे ऊँचा उठाकर जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करा देता है और इसमें आसक्ति न होनेसे अन्तमें परमात्माकी प्राप्ति करा देता है। इसलिये यह परिणाममें अमृतकी तरह है।

‘तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तम्’—सत्संग, स्वाध्याय, संकीर्तन, जप, ध्यान, चिन्तन आदिसे जो सुख होता है, वह मान, बड़ाई, आराम, रुपये, भोग आदि विषयेन्द्रिय-सम्बन्धका नहीं है और प्रमाद, आलस्य, निद्राका भी नहीं है। वह तो परमात्माके सम्बन्धका है। इसलिये वह सुख सात्त्विक कहा गया है।

  • सात्त्विक, राजस और तामस—ये तीनों गुण अन्तःकरणमें अमूर्तरूपसे रहते हैं। इनका पता वृत्तियोंसे ही लगता है, जिसका वर्णन चौदहवें अध्यायमें ग्यारहवेंसे तेरहवें श्लोकतक हुआ है।

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —चौदहवें अध्यायमें तो सात्त्विक सुखको बाँधनेवाला बताया था—‘सुखसंगेन बध्नाति ’ (१४।६), पर यहाँ उसको दुःखोंका नाश करनेवाला बताते हैं—‘दुःखान्तं च निगच्छति ’। इसका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक सुखमें रमण (भोग) करनेसे वह बाँधनेवाला हो जाता है अर्थात् गुणातीत नहीं होने देता। अगर रमण न करे तो वह सात्त्विक सुख दुःखोंका नाश करनेवाला हो जाता है। सुख भोगनेसे दुःखका नाश नहीं होता। भोगका त्याग करनेसे ही योग होता है। इसलिये सात्त्विक सुखसे भी असंगता होनी चाहिये। संग होनेसे बन्धनकारक रजोगुण आ जाता है। सत्त्वगुणमें रजोगुण आनेसे पतन होता है।

विवेकको महत्त्व न देनेके कारण सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह दीखता है। राजस मनुष्य विवेकको आदर नहीं देता। अतः सात्त्विक सुखका आरम्भमें विषकी तरह दीखना राजसपना है। तात्पर्य है कि सात्त्विक सुख दुःखदायी नहीं होता, प्रत्युत मनुष्यकी बुद्धिमें राजसपना होनेसे सात्त्विक सुख भी उसको विषकी तरह दुःखदायी दीखता है। उसका उद्देश्य तो सात्त्विक सुखका है, पर भीतर राजस भाव पड़ा है।

सम्बन्ध—अब राजस सुखका वर्णन करते हैं।

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् । परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥

यत्= जोअग्रे= आरम्भमें(अतः)
सुखम्= सुखअमृतोपमम्= अमृतकी तरह
(और)तत्= वह
विषयेन्द्रियसंयोगात्= इन्द्रियों और
विषयोंके संयोगसे
(होता है),परिणामे= परिणाममेंराजसम्= राजस
तत्= वहविषम्= विषकीस्मृतम्
है।
इव= तरह प्रतीत होता है;

व्याख्या —‘विषयेन्द्रियसंयोगात् ’—विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला जो सुख है, उसमें अभ्यास नहीं करना पड़ता। कारण कि यह प्राणी किसी भी योनियें जाता है, वहाँ उसको विषयों और इन्द्रियोंके संयोगसे होनेवाला सुख मिलता ही है। शब्द, स्पर्श आदि पाँचों विषयोंका सुख पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि सभी प्राणियोंको मिलता है। अतः उस सुखमें प्राणिमात्रका स्वाभाविक अभ्यास रहता है। मनुष्यजीवनमें भी बचपनसे देखा जाय तो अनुकूलतामें राजी होना और प्रतिकूलतामें नाराज होना स्वाभाविक ही होता आया है। इसलिये इस राजस सुखमें अभ्यासकी जरूरत नहीं है।

‘यत्तदग्रेऽमृतोपमम्’ —राजस सुखको आरम्भमें अमृतकी तरह कहनेका भाव यह है कि सांसारिक विषयोंकी प्राप्तिकी सम्भावनाके समय मनमें जितना सुख होता है, उतना सुख मस्ती और राजीपन विषयोंके मिलनेपर नहीं रहता। मिलनेपर भी आरम्भमें (संयोग होते ही) जैसा सुख होता है, थोड़े समयके बाद वैसा सुख नहीं रहता और उस विषयको भोगते-भोगते जब भोगनेकी शक्ति क्षीण हो जाती है, उस समय सुख नहीं होता, प्रत्युत विषयभोगसे

अरुचि हो जाती है। भोग भोगनेकी शक्ति क्षीण होनेके बाद भी अगर विषयोंको भोगा जाय तो दुःख, जलन पैदा हो जाती है, चित्तमें सुख नहीं रहता, इसलिये यह राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है।

अमृतकी तरह कहनेका दूसरा भाव यह है कि जब मन विषयोंमें खिंचता है, तब मनको वे विषय बड़े प्यारे लगते हैं। विषयों और भोगोंकी बातें सुननेमें जितना रस आता है, उतना भोगोंमें नहीं आता। इसलिये गीतामें आया है—‘यामिमां पुष्यितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ’ (२।४२); राजस पुरुष स्वर्गके भोगोंका सुख सुनते हैं तो उनको वह सुख बड़ा प्रिय लगता है और वे उसके लिये ललचा उठते हैं। तात्पर्य है कि वे स्वर्गके सुख दूरसे सुनकर ही बड़े प्रिय लगते हैं; परन्तु स्वर्गमें जाकर सुख भोगनेसे उनको उतना सुख नहीं मिलता और वह उतना प्रिय भी नहीं लगता!

‘परिणामे विषमिव’ —आरम्भमें विषय बड़े सुन्दर लगते हैं, उनमें बड़ा सुख मालूम देता है; परन्तु उनको भोगते-भोगते जब परिणाममें वह सुख नीरसतामें परिणत

श्लोक ३८ ]

  • साधक-संजीवनी *

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हो जाता है, उस सुखमें बिलकुल अरुचि हो जाती है, तब वही सुख जहरकी तरह मालूम देता है।

संसारमें जितने प्राणी कैदमें पड़े हैं, जितने चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़े हैं, उसका कारण देखा जाय तो उन्होंने विषयोंका भोग किया है, उनसे सुख लिया है, इसीसे वे कैद, नरक आदिमें दुःख पा रहे हैं; क्योंकि राजस सुखका परिणाम दुःख होता ही है—‘रजसस्तु फलं दुःखम् ’ (गीता १४।१६)।

आज भी जो लोग घबरा रहे हैं, दुःखी हो रहे हैं, वे सब पदार्थिक रागके कारण ही दुःख पा रहे हैं। जो धनी होकर फिर निर्धन हो गया है, वह जितना दुःखी और संतप्त है, उतना दुःख और सन्ताप स्वाभाविक निर्धनको नहीं है; क्योंकि उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक नहीं पड़े हैं। परन्तु धनीने राजस सुख अधिक भोगा है, उसके भीतर सुखके संस्कार अधिक पड़े हैं, इसलिये उसको धनके अभावका दुःख ज्यादा है। जैसे, जो मनुष्य तरह-तरहकी सामग्री भोजन करनेवाला है, उसके भोजनमें कभी थोड़ी-सी भी कमी रह जाय तो उसको वह कमी बड़ी खटकती है कि आज भोजनमें चटनी नहीं है, खटाई नहीं है, मिठाई नहीं है, अमुक-अमुक चीज नहीं है—इस प्रकार नहीं-नहींका ही तांता लगा रहता है। परन्तु साधारण आदमी बाजरेकी रूखी-सूखी रोटी खाकर भी मौजसे रहता है, उसको भोजनमें किसी चीजकी कमी खटकती ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि पदार्थिक संयोगसे जितना ज्यादा सुख लिया है, उतना ही उसके अभावका अनुभव होता है। अभावके अनुभवमें दुःख ही होता है।

जिस पदार्थकी कामना होती है, उसकी प्राप्तिके लिये मनुष्य उद्योग करते हैं। उद्योग करनेपर भी वस्तु मिलेगी या नहीं मिलेगी, इसमें संदेह रहता है। वस्तु न मिले तो उसके अभावका दुःख होता है, और वस्तु मिल जाय तो उस वस्तुको और भी अधिक प्राप्त करनेकी इच्छा हो जाती है। इस प्रकार इच्छापूर्ति नयी इच्छाका कारण बन जाती है और इच्छापूर्ति तथा फिर इच्छाकी उत्पत्ति—यह चक्कर चलता ही रहता है, इसका कभी अन्त नहीं आता। तात्पर्य यह है कि इच्छा कभी मिटती नहीं और इच्छाके रहते हुए अभाव खटकता रहता है। यह अभाव ही विषकी तरह है अर्थात् दुःखदायी है।

जब राजस सुख परिणाममें विषकी तरह है, तो फिर राजस सुख लेनेवाले जितने लोग हैं, उन सबको सुखभोगके अन्तमें मर जाना चाहिये? परन्तु राजस सुख

विषकी तरह मारता नहीं, प्रत्युत विषकी तरह अरुचिकारक हो जाता है। उसमें पहले जैसी रुचि होती है, वैसी रुचि अन्तमें नहीं रहती अर्थात् वह सुख विषकी तरह हो जाता है, साक्षात् विष नहीं होता।

राजस सुख विषकी तरह क्यों होता है? कारण कि विष तो एक जन्ममें ही मारता है, पर राजस सुख कई जन्मांतक मारता है। राजस सुख लेनेवाला रागी पुरुष शुभ कर्म करके यदि स्वर्गमें भी चला जाता है, तो वहाँ भी उसको सुख, शान्ति नहीं मिलती। स्वर्गमें भी अपनेसे ऊँची श्रेणीवालोंको देखकर ईर्ष्या होती है कि ये हमारेसे ऊँचे क्यों हो गये! समान पदवालोंको देखकर दुःख होता है कि ये हमारे समान पदपर आकर क्यों बैठ गये! और नीची श्रेणीवालोंको देखकर अभिमान आता है कि हम इनसे ऊँचे हैं! इस प्रकार उसके मनमें ईर्ष्या, दुःख और अभिमान होते ही रहते हैं, फिर उसके मनमें सुख कहाँ और शान्ति कहाँ? इतना ही नहीं, पुण्योंके क्षीण हो जानेपर उसको पुनः मृत्युलोकमें आना पड़ता है—‘क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ’ (गीता ९।२१)। यहाँ आकर फिर शुभ-कर्म करता है और फिर स्वर्गमें जाता है। इस प्रकार जन्म-मरणके चक्करमें चढ़ा ही रहता है—‘गतगतं कामकामा लभन्ते ’ (९।२१)। यदि वह रागके कारण पाप-कर्मोंमें लग जाता है तो परिणाममें चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें पड़ता हुआ न जाने कितने जन्मांतक जन्मता-मरता रहता है, जिसका कोई अन्त नहीं आता। इसलिये इस सुखको विषकी तरह कहा गया है।

तत्सुखं राजसं स्मृतम् ’—सात्त्विक सुखके लिये तो (सैतीसवें श्लोकमें) ‘प्रोक्तम् ’ पद कहा है, पर राजस सुखके लिये यहाँ ‘स्मृतम् ’ पद कहनेका तात्पर्य है कि पहले भी मनुष्यने राजस सुखका फल दुःख पाया है; परन्तु रागके कारण वह संयोगकी तरफ पुनः ललचा उठता है। कारण कि संयोगका प्रभाव उसपर पड़ा हुआ है और परिणामके प्रभावको वह स्वीकार नहीं करता। अगर वह परिणामके प्रभावको स्वीकार कर ले, तो फिर वह राजस सुखमें फँसेगा नहीं। स्मृति, शास्त्र, पुराण आदिमें ऐसे बहुत-से इतिहास आते हैं, जिनमें मनुष्योंके द्वारा राजस सुखके कारण बहुत दुःख पानेकी बात आयी है। इसी बातको स्मरण करानेके लिये यहाँ ‘स्मृतम् ’ पद आया है।

जिसकी वृत्ति जितनी सात्त्विक होती है, वह उतना ही हरेक विषयके परिणामकी तरफ देखता है। अश्विके

११६६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

तात्कालिक सुखकी तरफ वह ध्यान नहीं देता। परंतु राजसी वृत्तिवाला परिणामकी तरफ देखता ही नहीं, उसकी वृत्ति तात्कालिक सुखकी तरफ ही जाती है। इसलिये वह संसारमें फँसा रहता है। राजस पुरुषको संसारका सम्बन्ध

वर्तमानमें तो अच्छा मालूम देता है; परन्तु परिणाममें यह हानिकारक है—‘ये हि संस्पर्शंजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ (गीता ५।२२)। इसलिये साधकको संसारसे विरक्त हो जाना चाहिये; राजस सुखमें नहीं फँसना चाहिये।

परिशिष्ट भाव —सांसारिक भोगोंका सुख आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है। अविवेकी मनुष्य आरम्भको ही महत्त्व देता है। आरम्भ तो सदा रहता नहीं, पर उसकी कामना सदा रहती है, जो सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। परन्तु विवेकी मनुष्य आरम्भको न देखकर परिणामको देखता है, इसलिये वह भोगोंमें आसक्त नहीं होता—‘न तेषु रमते बुधः’ (गीता ५।२२)। परिणामको देखनेकी योग्यता मनुष्यमें ही है। परिणामको न देखना पशुता है।

वास्तवमें आरम्भ (संयोग) मुख्य नहीं है, प्रत्युत अन्त (वियोग) ही मुख्य है। मनुष्य आरम्भकालको चाहता है, पर वह रहता नहीं; क्योंकि प्रत्येक संयोगका वियोग होता है—यह नियम है। आरम्भ अनित्य होता है, पर अन्त नित्य होता है। अनित्यकी इच्छासे ही दुःखोंकी उत्पत्ति होती है। संसारमात्रका वियोग ही नित्य है। परन्तु राजसी वृत्तिके कारण संयोग अच्छा मालूम देता है। अगर मनुष्य आरम्भकालके सुखको महत्त्व न दे तो दुःख कभी आयेगा ही नहीं। आरम्भको देखनेसे भोग होता है और परिणामको देखनेसे योग होता है।

संसारके संयोगमें जो सुख प्रतीत होता है, उसमें दुःख भी मिला हुआ रहता है। परन्तु संसारके वियोगसे सुख-दुःखसे अतीत अखण्ड आनन्द प्राप्त होता है।

सम्बन्ध—अब तामस सुखका वर्णन करते हैं।

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।

निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहतम् ॥ ३१ ॥

निद्रालस्य-सुखम्= सुखआत्मनः= अपनेको
प्रमादोत्थम्अग्रे= आरम्भमेंमोहनम्= मोहित करनेवाला है,
= औरतत्= वह (सुख)
अनुबन्धे= परिणाममेंतामसम्= तामस
यत्= भीउदाहतम्= कहा गया है।

व्याख्या—‘निद्रालस्यप्रमादोत्थम्’ —जब राग अत्यधिक बढ़ जाता है, तब वह तमोगुणका रूप धारण कर लेता है। इसीको मोह कहते हैं। इस मोह-(मूहता-के) कारण मनुष्यको अधिक सोना अच्छा लगता है। अधिक सोनेवाले मनुष्यको गाढ़ नींद नहीं आती। गाढ़ नींद न आनेसे तन्द्वा ज्यादा आती है और स्वप्न भी ज्यादा आते हैं। तन्द्वा और स्वप्नमें तामस मनुष्यका बहुत समय बरबाद हो जाता है। परन्तु तामस मनुष्यको इसीसे ही सुख मिलता है, इसलिये इस सुखको निद्रासे उत्पन्न बताया है।

जब तमोगुण अधिक बढ़ जाता है, तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर वह आलस्यमें समय बरबाद कर देता

है। आवश्यक काम सामने आनेपर वह कह देता है कि ‘फिर कर लेंगे, अभी तो आराम कर रहे हैं।’ इस प्रकार आलस्य-अवस्थामें उसको सुख मालूम देता है। परन्तु निकम्मा रहनेके कारण उसकी इन्द्रियों और अन्तःकरणमें शिथिलता आ जाती है, मनमें संसारका फालतू चिन्तन होता रहता है और मनमें अशान्ति, शोक, विषाद, चिन्ता, दुःख होते रहते हैं।

जब इससे भी अधिक तमोगुण बढ़ जाता है, तब मनुष्य प्रमाद करने लग जाता है। वह प्रमाद दो तरहका होता है—अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद। घर, परिवार, शरीर आदिके आवश्यक कामोंको न करना और निटल्ले बैठे रहना ‘अक्रिय प्रमाद’* है। व्यर्थ क्रियाएँ (देखना, सुनना,

  • आलस्य और अक्रिय प्रमाद एक-जैसे दीखते हुए भी उनमें थोड़ा अन्तर है। आलस्यमें वृत्तियोंके भारी होनेसे सुख होता है और अक्रिय प्रमादमें कर्तव्य-कर्मोंको छोड़नेसे सुख होता है।

श्लोक ३१ ]

  • साधक-संजीवनी *

११६७

सोचना आदि) करना; बीड़ी, सिगरेट, शराब, भाँग, तम्बाकू, खेल-तमाशा आदि दुर्व्यसनोंमें लगना और चोरी, डकैती, झूठ, कपट, बेईमानी, व्यभिचार, अभक्ष्य-भक्षण आदि दुराचारोंमें लगना 'सक्रिय प्रमाद' है।

प्रमादके कारण तामस पुरुषोंको निरर्थक समय बरबाद करनेमें तथा झूठ, कपट, बेईमानी आदि करनेमें सुख मिलता है। जैसे काम-धंधा करनेवाले पैसे (मजदूरी या वेतन) तो पूरे ले लेते हैं, पर काम पूरा और ठीक ढंगसे नहीं करते। चिकित्सकलोग रोगियोंका ठीक ढंगसे इलाज नहीं करते, जिससे रोगीलोग बार-बार आते रहें और पैसे देते रहें। दूध बेचनेवाले पैसेको लोभमें दूधमें पानी मिलाकर बेचते हैं। पैसे अधिक देनेपर भी वे पानी मिलाना नहीं छोड़ते। ऐसे पापरूप प्रमादसे उनको घोर नरकोंकी प्राप्ति होती है।

जब तमोगुणी प्रमाद-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके विवेक-ज्ञानको ढक देती है और जब तमोगुणी निद्रा-आलस्य-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके प्रकाशको ढक देती है। विवेक-ज्ञानके ढकनेपर प्रमाद होता है तथा प्रकाशके ढकनेपर आलस्य और निद्रा आती है। तामस पुरुषको निद्रा, आलस्य और प्रमाद—तीनोंसे सुख मिलता है, इसलिये तामस सुखको इन तीनोंसे उत्पन्न बताया गया है।

विशेष बात

निद्रा दो प्रकारकी होती है—युकुनिद्रा और अतिनिद्रा। (१) 'युकुनिद्रा'—निद्रामें एक विश्राम मिलता है। विश्रामसे शरीर, मन, बुद्धि, अन्तःकरणमें नीरोगता, स्फूर्ति, स्वच्छता, निर्मलता और ताजगी आती है। ताजगी आनेसे साधन-भजन करनेमें और सांसारिक काम करनेमें भी शक्ति मिलती है और उत्साह रहता है। इसलिये युकुनिद्रा दोषी नहीं है, प्रत्युत सबके लिये आवश्यक है। भगवान्ने भी युकुनिद्राको आवश्यक बताया है—'युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा' (गीता ६।१७)।

ताजगीमात्रके लिये निद्रा साधकके लिये आवश्यक है। जिस साधकके रागपूर्वक सांसारिक संकल्प नहीं होते, उसको नींद बहुत जल्दी आ जाती है और जो ज्यादा संकल्पशील है, उसको नींद जल्दी नहीं आती। इससे यह सिद्ध हुआ कि संसारका जो सम्बन्ध है, वह निद्राका सुख भी नहीं लेने देता। निद्रा आवश्यक क्यों है? कारण कि निद्रामें जो स्थिर तत्त्व है, वह साधकको साधनमें प्रवृत्त करनेमें और सांसारिक कार्य करनेमें बल देता है, इसलिये

निद्रा आवश्यक है।

यद्यपि नींद तामसी है, तथापि नींदका जो बेहोशीपना है, वह त्याज्य है और जो विश्रामपना है, वह ग्राह्य है। परन्तु हरेक आदमी बेहोशीके बिना विश्रामपना ग्रहण नहीं कर सकता; अतः उनके लिये नींदका बेहोशीभाग भी ग्राह्य है। हाँ, जो साधना करके ऊँचे उठ गये हैं, उनको नींदके बेहोशीभागके बिना भी जाग्रत्-सुषुप्तिमें विश्राम मिल जाता है। कारण कि जाग्रत्-अवस्थामें संसारके चिन्तनका सर्वथा त्याग होकर परमात्मतत्त्वमें स्थिति हो जाती है तो महान् विश्राम, सुख मिलता है; इस स्थितिसे भी असंग होनेपर वास्तविक तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।

जो साधक हैं, उनको विश्रामके लिये नहीं सोना चाहिये। उनका तो यही भाव होना चाहिये कि पहले काम-धंधा करते हुए भगवान्का भजन करते थे, अब लेटे-लेटे भजन करना है।

(२) 'अतिनिद्रा'—समयपर सोना और समयपर जागना युकुनिद्रा है और अधिक सोना अतिनिद्रा है। अतिनिद्राके आदि और अन्तमें शरीरमें आलस्य भरा रहता है। शरीरमें भारीपन रहता है। अधिक नींद लेनेका स्वभाव होनेसे हरेक कार्यमें नींद आती रहती है।

चौदहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने पहले प्रमादको, दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें निद्राको रखा है—'प्रमादालस्यनिद्राभिस्तनिबध्नाति भारत।' परन्तु यहाँ पहले निद्राको, दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें प्रमादको रखा है—'निद्रालस्यप्रमादोत्थम्।' इस व्यतिक्रमका कारण यह है कि वहाँ इन तीनोंके द्वारा मनुष्यको बाँधनेका प्रसंग है और यहाँ मनुष्यका पतन करनेका प्रसंग है। बाँधनेके विषयमें प्रमाद सबसे अधिक बन्धनकारक है; अतः इसको सबसे पहले रखा है। कारण कि प्रमाद निषिद्ध आचरणोंमें प्रवृत्त करता है, जिससे अधोगति होती है। आलस्य केवल अच्छी प्रवृत्तिको रोकनेवाला होनेसे इसको दो नम्बरमें रखा है। निद्रा आवश्यक होनेसे बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत अतिनिद्रा ही बन्धनकारक है; अतः इसको तीसरे नम्बरमें रखा है। यहाँ उससे उलटा क्रम रखनेका अभिप्राय है कि सबके लिये आवश्यक होनेसे निद्रा इतना पतन करनेवाली नहीं है। निद्रासे अधिक आलस्य पतन करता है और आलस्यसे भी अधिक प्रमाद पतन करता है। कारण कि मनुष्य ज्यादा नींद लेगा तो वृक्ष आदि मृदू योनियोंकी प्राप्ति होगी; परन्तु

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

आलस्य और प्रमाद करेगा तो कर्तव्यच्युत होकर दुराचार करनेसे नरकमें जाना पड़ेगा१।

‘यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः’—निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है। इस सुखमें न तो आरम्भमें विवेक रहता है और न परिणाममें विवेक रहता है अर्थात् यह सुख विवेकको जाग्रत् नहीं होने देता। पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदिमें भी विवेक-शक्ति जाग्रत् न रहनेसे वे क्रियाके आरम्भ और परिणामको सोच नहीं पाते। ऐसे ही जिस सुखके कारण मनुष्य यह सोच ही नहीं सकता कि इस निद्रा आदिसे उत्पन्न हुए सुखका परिणाम हमारे लिये क्या होगा? उससे क्या लाभ होगा? क्या हानि होगी? क्या हित होगा? क्या अहित होगा? उस सुखको तामस कहा गया है—‘तत्तामसमुदाहृतम्’।

विशेष बात

(१) प्रकृति और पुरुष—दोनों अनादि हैं, और ‘ये दो हैं’ इस प्रकार इनकी पृथक्ताका विवेक भी अनादि है। यह विवेक पुरुषमें ही रहता है, प्रकृतिमें नहीं। जब यह पुरुष इस विवेकका अनादर करके अविवेकके कारण प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब इस सम्बन्धके कारण पुरुषमें राग पैदा हो जाता है१।

जब राग बहुत सूक्ष्म रहता है, तब विवेक प्रबल रहता है। जब राग बढ़ जाता है, तब विवेक दब जाता है, मिटता नहीं। पर विवेक ठीक तरहसे जाग्रत् हो जाय तो फिर राग टिकता नहीं अर्थात् रागका अभाव हो जाता है और उस समय पुरुष मुक्त कहलाता है।

उस रागके कारण मनुष्यकी प्रकृतिजन्म सुखमें आसक्ति हो जाती है। उस आसक्तिके रहते हुए जब मनुष्य किसी कारणवश सात्त्विक सुखको प्राप्त करना चाहता है, तब राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें उसे कठिनता मालूम देती है—‘यत्तदग्रे विषमिव’। परन्तु जब राग मिट

जाता है, तब वह सुख अमृतकी तरह हो जाता है—‘परिणामेऽमृतोपमम्’।

रागके कारण ही रजोगुणी सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है। पर वह सुख परिणाममें प्राणीके लिये जहरकी तरह अनिष्टकारक अर्थात् महान् दुःखरूप हो जाता है। प्रकृतिजन्म सुखकी आसक्ति होनेपर दुःखकी परम्पराका कोई अन्त नहीं आता।

जब वही राग तमोगुणका रूप धारण कर लेता है, तब मनुष्यकी वृत्तिर्थां भारी हो जाती हैं। फिर मनुष्य नींद और आलस्यमें समय बरबाद कर देता है तथा आवश्यक कर्तव्यसे विमुख होकर अकर्तव्यमें लग जाता है। परन्तु तामस पुरुषको इन्हींमें सुख मालूम देता है। इसलिये यह तामस सुख आदि और अन्तमें मोहित करनेवाला है।

(२) जो प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है, वह वास्तवमें ‘नहीं’ है। पर जो ‘नहीं’ को प्रकाशित करनेवाला तथा उसका आधार है, वह वास्तवमें ‘है’ तत्त्व है। उसी तत्त्वको ‘सच्चिदानन्द’ कहते हैं। निरन्तर सत्तारूपसे रहनेके कारण उसे ‘सत्’ कहते हैं, ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे ‘चित्’ कहते हैं और आनन्दस्वरूप होनेके कारण उसे ‘आनन्द’ कहते हैं। उस सच्चिदानन्द परमात्माका ही अंश होनेसे यह प्राणी भी सच्चिदानन्दस्वरूप है। परन्तु जब प्राणी असत् वस्तुकी इच्छा करता है कि अमुक वस्तु मुझे मिले, तब उस इच्छासे वह स्वतःस्वाभाविक आनन्द—सुख ढक जाता है। जब असत् वस्तुकी इच्छा मिट जाती है, तब उस इच्छाके मिटते ही वह स्वतःस्वाभाविक सुख प्रकट हो जाता है।

नित्य-निरन्तर रहनेवाला जो सुखरूप ‘तत्त्व’ है, उसमें जब सात्त्विकी बुद्धि तल्लीन हो जाती है, तब बुद्धिमें स्वच्छता, निर्मलता आ जाती है। उस स्वच्छ और निर्मल बुद्धिसे अनुभवमें आनेवाला वह स्वाभाविक सुख ही सात्त्विक कहलाता है। बुद्धिसे भी जब सम्बन्ध छूट जाता है, तब वास्तविक सुख रह जाता है। सात्त्विकी बुद्धिके सम्बन्धसे ही

१-तमोगुणकी वृत्ति जो प्रमाद है, वह तो अच्छी प्रवृत्तिको रोककर खेल-कूद आदि सामान्य फालतू क्रियाओंमें लगाता है; परन्तु जब प्रमादके साथ राग मिल जाता है (जो कि रजोगुणका रूप है), तब उससे कामना पैदा हो जाती है। कामनासे फिर अनेक तरहके पाप, अनर्थ होते हैं, जिनका परिणाम बड़ा भयंकर होता है।

२-रागसे अनेक विकार पैदा होते हैं, पर वे सब विकार प्रकृतिमें ही होते हैं, पुरुषमें नहीं। प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे पुरुष प्रकृतिके उन विकारोंको अपनेमें मान लेता है तो यह पुरुष भोगी हो जाता है। परन्तु जब इसको यह बोध हो जाता है कि विकार आते हैं और जाते हैं, उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं, पर विकारोंके आदि और अन्तको देखनेवाली अपनी नित्य सत्ता ज्यों-की-त्यों ही रहती है, तब उस अवस्थामें पुरुष योगी हो जाता है।

श्लोक ३९ ]

  • साधक-संजीवनी *

११६९

उस सुखकी 'सात्त्विक' संज्ञा होती है। बुद्धिसे सम्बन्ध छूटते ही उसकी 'सात्त्विक' संज्ञा नहीं रहती।

मनमें जब किसी वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छा होती है, तब वह वस्तु मनमें बस जाती है अर्थात् मन और बुद्धिका उसके साथ सम्बन्ध हो जाता है। जब वह मनोवाञ्छित वस्तु मिल जाती है, तब वह वस्तु मनसे निकल जाती है अर्थात् वस्तुका मनमें जो खिंचाव था, वह निकल जाता है। उसके निकलते ही अर्थात् वस्तुसे सम्बन्ध-विच्छेद होते ही वस्तुके अभावका जो दुःख था, वह निवृत्त हो जाता है और नित्य रहनेवाले स्वतःसिद्ध सुखका तात्कालिक अनुभव हो जाता है। वास्तवमें यह सुख वस्तुके मिलनेसे नहीं हुआ है, प्रत्युत रागके तात्कालिक मिटनेसे हुआ है, पर राजस पुरुष भूलसे उस सुखको वस्तुके मिलनेसे होनेवाला मान लेता है। वास्तवमें देखा जाय तो वस्तुका संयोग बाहरसे होता है और प्रसन्नता भीतरसे होती है। भीतरसे जो प्रसन्नता होती है, वह बाहरके संयोगसे पैदा नहीं होती, प्रत्युत भीतर (मनमें) बसी हुई वस्तुके साथ जो सम्बन्ध था, उस वस्तुसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर पैदा होती है। तात्पर्य यह है वस्तुके मिलते ही अर्थात् बाहरसे वस्तुका संयोग होते ही भीतरसे उस वस्तुसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और सम्बन्ध-विच्छेद होते ही नित्य रहनेवाले स्वाभाविक सुखका आभास हो जाता है। जब नींदमें बुद्धि तमोगुणमें लीन हो जाती है, तब बुद्धिकी स्थिरताको लेकर वह सुख प्रकट हो जाता है। कारण कि तमोगुणके प्रभावसे नींदमें जाग्रत् और स्वप्नके पदार्थोंकी विस्मृति हो जाती है। पदार्थोंकी स्मृति दुःखोंका कारण है। पदार्थोंकी विस्मृति होनेसे निद्रावस्थामें पदार्थोंका

वियोग हो जाता है तो उस वियोगके कारण स्वाभाविक सुखका आभास होता है, इसीको निद्राका सुख कहते हैं। परन्तु बुद्धिकी मलिनतासे वह स्वाभाविक सुख जैसा है, वैसा अनुभवमें नहीं आता। तात्पर्य है कि बुद्धिके तमोगुणी होनेसे बुद्धिमें स्वच्छता नहीं रहती और स्वच्छता न रहनेसे वह सुख स्पष्ट अनुभवमें नहीं आता। इसलिये निद्राके सुखको तामस कहा गया है*।

इन सबका तात्पर्य यह है कि सात्त्विक मनुष्यको संसारसे विमुख होकर तत्त्वमें बुद्धिके तल्लीन होनेसे सुख होता है; राजस मनुष्यको रागके कारण अन्तःकरणमें बसी हुई वस्तुके बाहर निकलनेसे सुख होता है और तामस मनुष्यको वस्तुओंके लिये किये जानेवाले कर्तव्य-कर्मोंकी विस्मृतिसे और निरर्थक क्रियाओंमें लगनेसे सुख होता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि जो नित्य-निरन्तर रहनेवाला सुखरूप तत्त्व है, वह असत्के सम्बन्धसे आच्छादित रहता है। विवेकपूर्वक असत्से सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर, रागवाली वस्तुओंके मनसे निकल जानेपर और बुद्धिके तमोगुणमें लीन हो जानेपर जो सुख होता है, वह उसी सुखका आभास है। तात्पर्य यह हुआ कि संसारसे विवेकपूर्वक विमुख होनेपर सात्त्विक सुख, भीतरसे वस्तुओंके निकलनेपर राजस सुख और मूढ़तासे निद्रा-आलस्यमें संसारको भूलनेपर तामस सुख होता है; परन्तु वास्तविक सुख तो प्रकृतिजन्य पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेदसे ही होता है। इन सुखोंमें जो प्रियता, आकर्षण और (सुखका) भोग है, वही पारमार्थिक उन्नतिमें बाधा देनेवाला और पतन करनेवाला है। इसलिये पारमार्थिक उन्नति चाहनेवाले साधकोंको इन तीनों सुखोंसे सम्बन्ध-विच्छेद करना अत्यन्त आवश्यक है।

परिशिष्ट भाव —तामस मनुष्यमें मोह रहता है—‘तमस्त्वज्ञानंजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्’ (गीता १४।८)। मोह विवेकमें बाधक होता है। तामसी वृत्ति विवेक जाग्रत् नहीं होने देती। इसलिये तामस मनुष्यका विवेक मोहके कारण लुप्त हो जाता है, जिससे वह आरम्भ या अन्तको देखता ही नहीं।

  • निद्राको तामस सुख कहनेका अभिप्राय यह है कि इसमें बुद्धि मोहित हो जाती है अर्थात् उसमें बेहोशी आ जाती है। उस बेहोशीसे संसारकी सर्वथा विस्मृति हो जाती है और जाग्रत्-अवस्था सर्वथा दब जाती है, इसलिये इसको तामस सुख कहा गया है। अगर इन्द्रियोंसहित बुद्धि मोहित न हो तो यही अवस्था 'समाधि' हो जाती है। समाधिसे भी विश्राम मिलता है। इस विश्राममें निद्रासे मिलनेवाली जो ताजगी है, वह मिल जाती है; परन्तु इस ताजगीका सुख लेनेसे गुणातीत नहीं होता। गुणातीत तो समाधिके सुखसे असंग होनेसे ही होता है।

प्रकृति क्रियाशील, परिवर्तनशील है और परमात्मतत्त्व अपरिवर्तनशील, निर्विचार, शान्त, निश्चल है। निद्रावस्थामें उस निश्चल तत्त्वमें स्थिति हो जाती है; परन्तु अन्तःकरणमें भोगोंका महत्त्व रहनेसे निद्राके बाद मनुष्यकी फिर भोग और संग्रहमें ही रुचि हो जाती है और वह उसीमें लग जाता है। इस प्रकार रागके कारण मनुष्य उस निश्चल तत्त्वसे लाभ नहीं ले सकता और निद्रासे केवल थकावट दूर कर लेता है। अगर वह भोग और ऐश्वर्यकी आसक्तिका सर्वथा त्याग कर दे तो उसकी निद्रामें और निद्राके बाद भी स्वरूपमें स्वतः-स्वाभाविक अटल स्थिति रहेगी।

११७०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

सम्बन्ध—बीसवेंसे उततलीसवें श्लोकतक भगवान्ने गुणोंकी मुख्यताको लेकर ज्ञान, कर्म आदिके तीन-तीन भेद बताये। अब इनके सिवाय गुणोंको लेकर सृष्टिकी सम्पूर्ण वस्तुओंके भी तीन-तीन भेद होते हैं—इसका लक्ष्य कराते हुए भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकरणका उपसंहार करते हैं।

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।

सत्त्वं प्रकृतिर्जैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥

पृथिव्याम्= पृथ्वीमेंतत्= वह (ऐसी कोई)प्रकृतिजैः= प्रकृतिसे उत्पन्न
वा= यासत्त्वम्= वस्तुएभिः= इन
दिवि= स्वर्गमें= नहींत्रिभिः= तीनों
वा= अथवाअस्ति= है,गुणैः= गुणोंसे
देवेषु= देवताओंमेंयत्= जोमुक्तम्= रहित
पुनः= तथा इनके सिवायस्यात्= हो।

व्याख्या —[इस अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने संन्यास और त्यागका तत्त्व जानना चाहा तो भगवान्ने पहले त्याग—कर्मयोगका वर्णन किया। उस प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान्ने कहा कि जो त्यागी नहीं हैं, उनको अनिष्ट, इष्ट और मिश्र—यह तीन प्रकारका कर्मोंका फल मिलता है और जो संन्यासी हैं, उनको कभी नहीं मिलता। ऐसा कहकर तेरहवें श्लोकसे संन्यास—सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करके पहले कर्मोंके होनेमें अधिष्ठानादि पाँच हेतु बताये। सोलहवें-सत्रहवें श्लोकोंमें कर्तृत्व माननेवालोंकी निन्दा और कर्तृत्वका त्याग करनेवालोंकी प्रशंसा की। अठारहवें श्लोकमें कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रहका वर्णन किया। परन्तु जो वास्तविक तत्त्व है, वह न कर्म-प्रेरक है और न कर्म-संग्रहक। कर्म-प्रेरणा और कर्म-संग्रह तो प्रकृतिके गुणोंके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही होते हैं। फिर गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके तीन-तीन भेदोंका वर्णन किया। सुखका वर्णन करते हुए यह बताया कि प्रकृतिके साथ यत्किंचित् सम्बन्ध रखते हुए ऊँचा-से-ऊँचा जो सुख होता है, वह सात्त्विक होता है। परंतु जो स्वरूपका वास्तविक सुख है, वह गुणातीत है, विलक्षण है, अलौकिक है (गीता—छठे अध्यायका इक्कीसवाँ श्लोक)।

सात्त्विक सुखको 'आत्मबुद्धिप्रसादजम् ' कहकर भगवान्ने उसको जन्म (उत्पन्न होनेवाला) बताया। जन्म वस्तु नित्य नहीं होती। इसलिये उसको जन्म बतानेका तात्पर्य है कि उस जन्म सुखसे भी ऊपर उठना है अर्थात् प्रकृति और प्रकृतिके तीनों गुणोंसे रहित होकर उस परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना है, जो कि सबका अपना

स्वाभाविक स्वरूप है। इसलिये कहते हैं—]

'न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः' —'यहाँ 'पृथिव्याम् ' पदसे मृत्युलोक और पृथ्वीके नीचेके अतल, वितल आदि सभी लोकोंका, 'दिवि ' पदसे स्वर्ग आदि लोकोंका, 'देवेषु ' पदको प्राणिमात्रके उपलक्षणके रूपमें उन-उन स्थानोंमें रहनेवाले मनुष्य, देवता, असुर, राक्षस, नाग, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, वृक्ष आदि सभी चर-अचर प्राणियोंका, और 'वा पुनः ' पदोंसे अनन्त ब्रह्माण्डोंका संकेत किया गया है। तात्पर्य यह हुआ कि त्रिलोक और अनन्त ब्रह्माण्ड तथा उनमें रहनेवाली कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो अर्थात् सब-के-सब त्रिगुणात्मक हैं—'सत्त्वं प्रकृतिर्जैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः '।'

प्रकृति और प्रकृतिका कार्य—यह सब-का-सब ही त्रिगुणात्मक और परिवर्तनशील है। इनसे सम्बन्ध जोड़नेसे ही बन्धन होता है और इनसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे ही मुक्ति होती है; क्योंकि स्वरूप असंग है। स्वरूप 'स्व' है और प्रकृति 'पर' है। प्रकृतिसे सम्बन्ध जुड़ते ही अहंकार पैदा हो जाता है, जो कि पराधीनताको पैदा करनेवाला है। यह एक विचित्र बात है कि अहंकारमें स्वाधीनता मालूम देती है, पर है वास्तवमें पराधीनता! कारण कि अहंकारसे प्रकृतिजन्म पदार्थोंमें आसक्ति, कामना आदि पैदा हो जाती है, जिससे पराधीनतामें भी स्वाधीनता दीखने लग जाती है। इसलिये प्रकृतिजन्म गुणोंसे रहित होना आवश्यक है।

प्रकृतिजन्म गुणोंमें रजोगुण और तमोगुणका त्याग करके सत्त्वगुण बढ़ानेकी आवश्यकता है। सत्त्वगुणमें भी प्रसन्नता और विवेक तो आवश्यक है; परन्तु सात्त्विक सुख

श्लोक ४१ ]

  • साधक-संजीवनी *

११७१

और ज्ञानकी आसक्ति नहीं होनी चाहिये; क्योंकि सुख और ज्ञानकी आसक्ति बंधनेवाली है। इसलिये इनकी आसक्तिका त्याग करके सत्त्वगुणसे ऊँचा उठे। इससे ऊँचा उठनेके लिये ही यहाँ गुणोंका प्रकरण आया है।

साधकको तो सात्त्विक ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख—इनपर ध्यान देकर इनके अनुरूप अपना जीवन बनाना चाहिये और सावधानीसे राजस-

तामसका त्याग करना चाहिये। इनका त्याग करनेमें सावधानी ही साधन है। सावधानीसे सब साधन स्वतः प्रकट होते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद करनेमें सात्त्विकता बहुत आवश्यक है। कारण कि इसमें प्रकाश अर्थात् विवेक जाग्रत् रहता है, जिससे प्रकृतिसे मुक्त होनेमें बड़ी सहायता मिलती है। वास्तवमें तो इससे भी असंग होना है।

परिशिष्ट भाव —दसवें अध्यायमें भगवान्ने भक्ति (विश्वास)-की दृष्टिसे सम्पूर्ण वस्तुओंको अपनेसे उत्पन्न होनेवाली बताया था—‘न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ’ (१०।३९)। यहाँ भगवान् ज्ञान (विवेक)-की दृष्टिसे सम्पूर्ण वस्तुओंको प्रकृतिजन्य गुणोंसे उत्पन्न होनेवाली बताते हैं। कारण कि विवेकीकी दृष्टिमें सत् और असत् दोनों रहते हैं, पर भक्तकी दृष्टिमें एक भगवान् ही रहते हैं—‘सदसच्चाहमर्जुन ’ (गीता ९।१९)। विवेकमार्गमें असत्का, गुणोंका त्याग मुख्य है, पर भक्तिमार्गमें भगवान्का सम्बन्ध मुख्य है।

‘संसारकी कोई भी वस्तु तीनों गुणोंसे रहित नहीं है’—यह बात अज्ञानीकी दृष्टिमें है, तत्त्वज्ञानीकी दृष्टिमें नहीं। तत्त्वज्ञानीकी दृष्टि सत्तामात्र स्वरूपकी तरफ रहती है, जो स्वतः—स्वाभाविक निर्गुण है (गीता—तेरहवें अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

सम्बन्ध —त्यागके प्रकरणमें भगवान्ने यह बताया कि नियत कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है। उनका मूढ़तापूर्वक त्याग करनेसे वह त्याग तामस हो जाता है; शारीरिक क्लेशके भयसे नियत कर्मोंका त्याग करनेसे वह त्याग राजस हो जाता है और फल एवं आसक्तिका त्याग करके नियत कर्मोंको करनेसे वह त्याग सात्त्विक हो जाता है (इसी अध्यायका सातवाँ, आठवाँ और नवाँ श्लोक)। सांख्ययोगकी दृष्टिसे सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु बताते हुए जहाँ सात्त्विक कर्मका वर्णन हुआ है, वहाँ नियत कर्मको कर्तृत्वाभिमानसे रहित, राग-द्वेषसे रहित और फलेच्छासे रहित मनुष्यके द्वारा किये जानेका उल्लेख किया है (इसी अध्यायका तेईसवाँ श्लोक)। उन कर्मोंमें किस वर्णके लिये कौन-से कर्म नियत कर्म हैं और उन नियत कर्मोंको कैसे किया जाय—इसको बतानेके लिये और साथ ही भक्तियोगकी बात बतानेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

ब्राह्मणक्षत्रियविशों शूद्राणां च परन्तप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥

परन्तप= हे परंतप!= औरउत्पन्न हुए
ब्राह्मणक्षत्रिय-शूद्राणाम्= शूद्रोंकेगुणैः
विशाम्= ब्राह्मण,कर्माणि= कर्मप्रविभक्तानि
क्षत्रिय, वैश्यस्वभावप्रभवैः= स्वभावसे

व्याख्या —‘ब्राह्मणक्षत्रियविशों शूद्राणां च परन्तप ’—येहाँ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनोंके लिये एक पद और शूद्रोंके लिये अलग एक पद देनेका तात्पर्य यह है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये द्विजाति हैं और शूद्र द्विजाति नहीं है। इसलिये इनके कर्मोंका विभाग अलग-अलग है और कर्मोंके अनुसार शास्त्रीय अधिकार भी अलग-अलग है।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ’—मनुष्य

जो कुछ भी कर्म करता है, उसके अन्तःकरणमें उस कर्मके संस्कार पड़ते हैं और उन संस्कारोंके अनुसार उसका स्वभाव बनता है। इस प्रकार पहलेके अनेक जन्मोंमें किये हुए कर्मोंके संस्कारोंके अनुसार मनुष्यका जैसा स्वभाव होता है, उसीके अनुसार उसमें सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणोंकी वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इन गुणवृत्तियोंके तारतम्यके अनुसार ही ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके कर्मोंका विभाग किया गया है (गीता—चौथे अध्यायका तेरहवाँ श्लोक)। कारण

१७२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

कि मनुष्यमें जैसी गुणवृतियाँ होती हैं, वैसा ही वह कर्म करता है।

विशेष बात

(१)

कर्म दो तरहके होते हैं—(१) जन्मारम्भक कर्म और (२) भोगदायक कर्म। जिन कर्मोंसे ऊँच-नीच योनियोंमें जन्म होता है, वे 'जन्मारम्भक कर्म' कहलाते हैं और जिन कर्मोंसे सुख-दुःखका भोग होता है, वे 'भोगदायक कर्म' कहलाते हैं। भोगदायक कर्म अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको पैदा करते हैं, जिसको गीतामें अनिष्ट, इष्ट और मिश्र नामसे कहा गया है (अठारहवें अध्यायका बारहवाँ श्लोक)।

गहरी दृष्टिसे देखा जाय तो मात्र कर्म भोगदायक होते हैं अर्थात् जन्मारम्भक कर्मोंसे भी भोग होता है और भोगदायक कर्मोंसे भी भोग होता है। जैसे, जिसका उत्तम कुलमें जन्म होता है, उसका आदर होता है, सत्कार होता है और जिसका नीच कुलमें जन्म होता है, उसका निरादर होता है, तिरस्कार होता है। ऐसे ही अनुकूल परिस्थितिवालेका आदर होता है और प्रतिकूल परिस्थितिवालेका निरादर होता है। तात्पर्य है कि आदर और निरादररूपसे भोग तो जन्मारम्भक और भोगदायक—दोनों कर्मोंका होता है। परन्तु जन्मारम्भक कर्मोंसे जो जन्म होता है, उसमें आदर-निरादररूप भोग गौण होता है; क्योंकि आदर-निरादर कभी-कभी हुआ करते हैं, हरदम नहीं हुआ करते और भोगदायक कर्मोंसे जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति आती है, उसमें परिस्थितिका भोग मुख्य होता है; क्योंकि परिस्थिति हरदम आती रहती है।

भोगदायक कर्मोंका सदुपयोग-दुरुपयोग करनेमें मनुष्यमात्र स्वतन्त्र है अर्थात् वह अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिसे सुखी-दुःखी भी हो सकता है और उसको साधन-सामग्री भी बना सकता है। जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिसे सुखी-दुःखी होते हैं, वे मूर्ख होते हैं और जो उसको साधन-सामग्री बनाते हैं, वे बुद्धिमान् साधक होते हैं। कारण कि मनुष्यजन्म परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है; अतः इसमें जो भी अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति

आती है, वह सब साधन-सामग्री ही है।

अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिको साधन-सामग्री बनाना क्या है? अनुकूल परिस्थिति आ जाय तो उसको दूसरोंकी सेवामें, दूसरोंके सुख-आराममें लगा दे, और प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय तो सुखकी इच्छाका त्याग कर दे। दूसरोंकी सेवा करना और सुखेच्छाका त्याग करना—ये दोनों साधन हैं।

(२)

शास्त्रोंमें आता है कि पुण्योंकी अधिकता होनेसे जीव स्वर्गमें जाता है और पापोंकी अधिकता होनेसे नरकोंमें जाता है तथा पुण्य-पाप समान होनेसे मनुष्य बनता है। इस दृष्टिसे किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, वेश आदिका कोई भी मनुष्य सर्वथा पुण्यात्मा या पापात्मा नहीं हो सकता।

पुण्य-पाप समान होनेपर जो मनुष्य बनता है, उसमें भी अगर देखा जाय तो पुण्य-पापोंका तारतम्य रहता है अर्थात् किसीके पुण्य अधिक होते हैं और किसीके पाप अधिक होते हैं*। ऐसे ही गुणोंका विभाग भी है। कुल मिलाकर सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ऊर्ध्वलोकमें जाते हैं, रजोगुणकी प्रधानतावाले मध्यलोक अर्थात् मनुष्यलोकमें आते हैं, और तमोगुणकी प्रधानतावाले अधोगतिमें जाते हैं। इन तीनोंमें भी गुणोंके तारतम्यसे अनेक तरहके भेद होते हैं।

सत्त्वगुणकी प्रधानतासे ब्राह्मण, रजोगुणकी प्रधानता और सत्त्वगुणकी गौणतासे क्षत्रिय, रजोगुणकी प्रधानता और तमोगुणकी गौणतासे वैश्य तथा तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्र होता है। यह तो सामान्य रीतिसे गुणोंकी बात बतायी। अब इनके अवांतर तारतम्यका विचार करते हैं—रजोगुण-प्रधान मनुष्योंमें सत्त्वगुणकी प्रधानतावाले ब्राह्मण हुए। इन ब्राह्मणोंमें भी जन्मके भेदसे ऊँच-नीच ब्राह्मण माने जाते हैं और परिस्थितिरूपसे कर्मोंका फल भी कई तरहका आता है अर्थात् सब ब्राह्मणोंकी एक समान अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति नहीं आती। इस दृष्टिसे ब्राह्मणयोनियोंमें भी तीनों गुण मानने पड़ेंगे। ऐसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी जन्मसे ऊँच-नीच माने जाते हैं और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति

  • जैसे परीक्षामें अनेक विषय होते हैं और उन विषयोंमेंसे किसी विषयमें कम और किसी विषयमें अधिक नम्बर मिलते हैं। उन सभी विषयोंके नम्बरोंको मिलाकर कुल जितने नम्बर आते हैं, उनसे परीक्षाफल तैयार होता है। ऐसे ही प्रत्येक मनुष्यके किसी विषयमें पुण्य अधिक होते हैं और किसी विषयमें पाप अधिक होते हैं, और कुल मिलाकर जितने पुण्य-पाप होते हैं, उसके अनुसार उसको जन्म मिलता है। अगर अलग-अलग विषयोंमें सबके पुण्य-पाप समान होते, तो सभीको बराबर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति मिलती, पर ऐसा होता नहीं। इसलिये सभीके पुण्य-पापोंमें अनेक प्रकारका तारतम्य रहता है। यही बात सत्त्वादि गुणोंके विषयमें भी समझनी चाहिये।

श्लोक ४२ ] * साधक-संजीवनी * ११७३

भी कई तरहकी आती है। इसलिये गीतामें कहा गया है कि तीनों लोकोंमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो तीनों गुणोंसे रहित हो (इसी अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)।

अब जो मनुष्येतर योनिवाले पशु-पक्षी आदि हैं, उनमें भी ऊँच-नीच माने जाते हैं; जैसे गाय आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं

और कुत्ता, गधा, सूअर आदि नीच माने जाते हैं। कबूतर आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कौआ, चील आदि नीच माने जाते हैं। इन सबको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भी एक समान नहीं मिलती। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति-वालोंमें भी कई तरहके जाति-भेद और परिस्थिति-भेद होते हैं।

परिशिष्ट भाव—चौथे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि चारों वर्णोंकी रचना मैंने गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक की है—'गुणकर्मविभागशः' (४।१३) और यहाँ कहते हैं कि चारों वर्णोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं—'स्वभावप्रभवैर्गुणैः'। चौथे अध्यायमें तो चारों वर्णोंके पैदा होनेकी बात है और यहाँ चारों वर्णोंके कर्मोंकी बात है। तात्पर्य, चौथे अध्यायमें भगवान्ने बताया कि चारों वर्णोंका जन्म पूर्वजन्मके गुणकर्मोंके अनुसार हुआ है और यहाँ बताते हैं कि जन्मके बाद चारों वर्णोंके अमुक-अमुक कर्म होने चाहिये, जिनके अनुसार उनकी आगे गति होगी।

सम्बन्ध—अब भगवान् ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिराजर्वमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ ४२॥

शम: = मनका निग्रह करना; दम: = इन्द्रियोंको वशमें करना; तप: = धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; शौचम् = बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; क्षान्ति: = दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; आर्जवम् = शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; ज्ञानम् = वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; विज्ञानम् = यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; च = और; आस्तिक्यम् = परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिकभाव रखना— एव = (ये सब-के-सब) ही; ब्रह्मकर्म, स्वभावजम् = ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।

व्याख्या—'शम:'—मनको जहाँ लगाना चाहें, वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाय—इस प्रकार मनके निग्रहको 'शम' कहते हैं।

'दम:'—जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें, तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें, तब वहाँसे हटा लें—इस प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना 'दम' है।

'तप:'—गीतामें शरीर, वाणी और मनके तपका वर्णन आता है (सत्रहवें अध्यायका चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ और सोलहवाँ श्लोक), उस तपको लेते हुए भी यहाँ वास्तवमें 'तप' का अर्थ है—अपने धर्मका पालन करते हुए जो कष्ट हो अथवा कष्ट आ जाय, उसको प्रसन्नतापूर्वक सहना अर्थात् कष्टके आनेपर चित्तमें प्रसन्नताका होना।

'शौचम्'—अपने मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिको पवित्र रखना तथा अपने खान-पान, व्यवहार आदिकी पवित्रता रखना—इस प्रकार शौचाचार-सदाचारका ठीक पालन करनेका नाम 'शौच' है।

'क्षान्ति:'—कोई कितना ही अपमान करे, निन्दा करे, दुःख दे और अपनेमें उसको दण्ड देनेकी योग्यता, बल, अधिकार भी हो, फिर भी उसको दण्ड न देकर उसके क्षमा माँगे बिना ही उसको प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देनेका नाम 'क्षान्ति' है।

'आर्जवम्'—शरीर, वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और मनमें छल, कपट, छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधा-सादापन हो, उसका नाम 'आर्जव' है।

'ज्ञानम्'—वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदिका अच्छी तरह अध्ययन होना और उनके भावोंका ठीक तरहसे बोध होना तथा कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध होना 'ज्ञान' है।

'विज्ञानम्'—यज्ञमें स्रुक्, स्रुवा आदि वस्तुओंका किस

११७४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

अवसरपर किस विधिसे प्रयोग करना चाहिये—इसका अर्थात् यज्ञविधिका तथा अनुष्ठान आदिकी विधिका अनुभव कर लेने ( अच्छी तरह करके देख लेने )-का नाम 'विज्ञान' है।

'आस्तिक्यम्'—परमात्मा, वेदादि शास्त्र, परलोक आदिका हृदयमें आदर हो, श्रद्धा हो और उनकी सत्यतामें कभी सन्देह न हो तथा उनके अनुसार अपना आचरण हो, इसका नाम 'आस्तिक्य' है।

'ब्राह्मकर्म स्वभावजम्'—ये शम, दम आदि ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म ( गुण ) हैं अर्थात् इन कर्मों—( गुणों— ) को धारण करनेमें ब्राह्मणको परिश्रम नहीं पड़ता।

जिन ब्राह्मणोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है, जिनकी वंश-परम्परा परम शुद्ध है और जिनके पूर्वजन्मकृत कर्म भी शुद्ध हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके लिये ही शम, दम आदि गुण

परिशिष्ट भाव—वर्ण-परम्परा ठीक हो तो ये गुण स्वाभाविक नहीं होते, इनमें कमी आ जाती है।

पूर्वश्लोकमें 'स्वभावप्रभैर्गुणैः' कहा, इसलिये यहाँ स्वभावज कर्म बताते हैं। स्वभाव बननेमें पहले जन्म मुख्य है, फिर जन्मके बाद संग मुख्य है। संग, स्वाध्याय, अभ्यास आदिके कारण स्वभाव बदल जाता है।

सम्बन्ध—अब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥

शौर्यम्= शूरवीरता,= तथा
तेजः= तेज,युद्धे= युद्धमें
धृतिः= धैर्यअपि= कभी
दाक्ष्यम्= प्रजाके संचालन
आदिकी विशेष
चतुरताअपलायनम्= पीठ न दिखाना,
दानम्= दान करना
= और

व्याख्या—'शौर्यम्'—मनमें अपने धर्मका पालन करनेकी तत्परता हो, धर्ममय युद्ध* प्राप्त होनेपर युद्धमें चोट लगने, अंग कट जाने, मर जाने आदिका किंचिन्मात्र भी भय न हो, घाव होनेपर भी मनमें प्रसन्नता और उत्साह रहे तथा सिर कटनेपर भी पहले—जैसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाता रहे, इसका नाम 'शौर्य' है।

'तेजः'—जिस प्रभाव या शक्तिके सामने पापी-दुराचारी मनुष्य भी पाप, दुराचार करनेमें हिचकते हैं, जिसके सामने

स्वाभाविक होते हैं और उनमें किसी गुणके न होनेपर अथवा किसी गुणमें कमी होनेपर भी उसकी पूर्ति करना उन ब्राह्मणोंके लिये सहज होता है।

चारों वर्णोंकी रचना गुणोंके तारतम्यसे की गयी है, इसलिये गुणोंके अनुसार उस-उस वर्णमें वे-वे कर्म स्वाभाविक प्रकट हो जाते हैं और दूसरे कर्म गौण हो जाते हैं। जैसे ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेसे उसमें शम, दम आदि कर्म ( गुण ) स्वाभाविक आते हैं तथा जीविकाके कर्म गौण हो जाते हैं और दूसरे वर्णोंमें रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता होनेसे उन वर्णोंके जीविकाके कर्म भी स्वाभाविक कर्मोंमें सम्मिलित हो जाते हैं। इसी दृष्टिसे गीतामें ब्राह्मणके स्वभावज कर्मोंमें जीविकाके कर्म न कह करके शम, दम आदि कर्म ( गुण ) ही कहे गये हैं।

ब्राह्मणमें स्वाभाविक होते हैं। परन्तु वर्णसंकरता आनेपर

ईश्वरभावः | = शासन करनेका भाव (—ये सब-के- सब) ---|--- क्षात्रम् | = क्षत्रियके स्वभावजम् | = स्वाभाविक कर्म | = कर्म हैं।

लोगोंकी मर्यादाविरुद्ध चलनेकी हिम्मत नहीं होती अर्थात् लोग स्वाभाविक ही मर्यादामें चलते हैं, उसका नाम 'तेज' है।

'धृतिः'—विपरीत-से-विपरीत अवस्थामें भी अपने धर्मसे विचलित न होने और शत्रुओंके द्वारा धर्म तथा नीतिसे विरुद्ध अनुचित व्यवहारसे सताये जानेपर भी धर्म तथा नीति-विरुद्ध कार्य न करके धैर्यपूर्वक उसी मर्यादामें चलनेका नाम 'धृति' है।

'दाक्ष्यम्'—प्रजापर शासन करनेकी, प्रजाको यथा-

  • अपना युद्ध करनेका विचार भी नहीं है, कोई स्वार्थ भी नहीं है, पर परिस्थितिवशात् केवल कर्तव्यरूपसे प्राप्त हुआ है, वह 'धर्ममय युद्ध' है।

श्लोक ४४ ]

  • साधक-संजीवनी *

११७५

योग्य व्यवस्थित रखनेकी और उसका संचालन करनेकी विशेष योग्यता, चतुराईका नाम 'दाक्ष्य' है।

'युद्धे चाप्यपलायनम् '—युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, मनमें कभी हार स्वीकार न करना, युद्ध छोड़कर कभी न भागना—यह युद्धमें 'अपलायन' है।

'दानम् '—क्षत्रियलोग दान करते हैं तो देनेमें कमी नहीं रखते, बड़ी उदारतापूर्वक देते हैं। वर्तमानमें दान-पुण्य करनेका स्वभाव वैश्योंमें देखनेमें आता है; परन्तु वैश्यलोग देनेमें कसाकसी करते हैं अर्थात् इतनेसे ही काम चल जाय तो अधिक क्यों दिया जाय—ऐसा द्रव्यका लोभ उनमें रहता है। द्रव्यका लोभ रहनेसे धर्मका पालन करनेमें बाधा आ जाती है, कमी आ जाती है, जिससे सात्त्विक दान (गीता—सत्रहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक) देनेमें कठिनता पड़ती है। परन्तु क्षत्रियोंमें दानवीरता होती है। इसलिये यहाँ

'दान' शब्द क्षत्रियोंके स्वभावमें आया है।

'ईश्वरभावश्च '—क्षत्रियोंमें स्वाभाविक ही शासन करनेकी प्रवृत्ति होती है। लोगोंके नीति, धर्म और मर्यादा-विरुद्ध आचरण देखनेपर उनके मनमें स्वाभाविक ही ऐसी बात आती है कि वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं और उनको नीति, धर्मके अनुसार चलानेकी इच्छा होती है। अपने शासनद्वारा सबको अपनी-अपनी मर्यादाके अनुसार चलानेका भाव रहता है। इस ईश्वरभावमें अभिमान नहीं होता; क्योंकि क्षत्रियजातिमें नम्रता, सरलता आदि गुण देखनेमें आते हैं।

'क्षत्रं कर्म स्वभावजम् '—जो मात्र प्रजाकी दुःखोंसे रक्षा करे, उसका नाम 'क्षत्रिय' है—'क्षतात् त्रायत इति क्षत्रियः। ' उस क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म हैं, वे क्षत्रकर्म कहलाते हैं।

परिशिष्ट भाव —क्षत्रिय (राजपूत) बड़े शूरवीर और तेजस्वी होते हैं। परन्तु ईर्ष्या-दोष होनेके कारण जिस राजाका राज्य हुआ, उसने अपने अधीन रहनेवाले राजपूतोंका उत्साह कम करनेकी चेष्टा की, उनकी उन्नति नहीं होने दी, जिससे कि वे प्रबल होकर राज्य न छीन लें। इस प्रकार ईर्ष्याके कारण आपसी फूट होनेसे तथा उत्साहमें कमी होनेसे ही विधर्मीलोग भारतपर अपना अधिकार करनेमें समर्थ हो सके।

सम्बन्ध—अब वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥

कृषिगौरक्ष्य-वाणिज्यम् = खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और व्यापार करना

(—ये सब-के-सब)वैश्यकर्म,सेवा
स्वभावजम् = वैश्यकेकरना
स्वाभाविकशूद्रस्य = शूद्रका
कर्म हैं
(तथा)अपि = भी
परिचर्यात्मकम् = चारों वर्णोंकीस्वभावजम् = स्वाभाविक
कर्म = कर्म है।

व्याख्या —'कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं स्वभावजम् '—खेती करना, गायोंकी रक्षा करना, उनकी वंश-वृद्धि करना और शुद्ध व्यापार करना—ये कर्म वैश्योंमें स्वाभाविक होते हैं।

शुद्ध व्यापार करनेका तात्पर्य है—जिस देशमें, जिस समय, जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, लोगोंके हितकी

भावनासे उस वस्तुको (जहाँ वह मिलती हो, वहाँसे ला करके) उसी देशमें पहुँचाना; प्रजाकी आवश्यक वस्तुओंके अभावकी पूर्ति कैसे हो, वस्तुओंके अभावमें कोई कष्ट न पाये—इस भावसे सच्चाईके साथ वस्तुओंका वितरण करना।

भगवान् श्रीकृष्ण (नन्दबाबाको लेकर) अपनेको वैश्य ही मानते हैं*। इसलिये उन्होंने स्वयं गायों और बछड़ोंको

  • कृषिवाणिज्यगौरक्षं कुसिदं तुर्यमुच्यते। वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम् ॥ (श्रीमद्भागवतम् १०।२४।२१)

'वैश्योंकी वार्तावृत्ति चार प्रकारकी है—कृषि, वाणिज्य, गौरक्षा और ब्याज लेना। हमलोग उन चारोंमेंसे केवल गोपालन ही सदासे करते आये हैं।'

११७६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८

चराया। मनु महाराजने वैश्य-वृत्तिमें 'पशूनां रक्षणम्'

(मनुस्मृति १।९०) (पशुओंकी रक्षा करना) कहा है, पर

यहाँ भगवान् (उपर्युक्त पदोंसे) अपने जाति-भाइयोंसे मानो

यह कहते हैं कि तुमलोग सब पशुओंका पालन, उनकी

रक्षा न कर सको तो कम-से-कम गायोंका पालन और

उनकी रक्षा जरूर करना। गायोंकी वृद्धि न कर सको तो

कोई बात नहीं; परन्तु उनकी रक्षा जरूर करना, जिससे

हमारा गोधन घट न जाय। इसलिये वैश्य-समाजको चाहिये

कि वह गायोंकी रक्षामें अपना तन-मन-धन लगा दे,

उनकी रक्षा करनेमें अपनी शक्ति बचाकर न रखे।

गोरक्षा-सम्बन्धी विशेष बात

मनुष्योंके लिये गाय सब दृष्टियोंसे पालनीय है। गायसे

अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि

होती है। आजके अर्थप्रधान युगमें तो गाय अत्यन्त ही

उपयोगी है। गोपालनसे, गायके दूध, घी, गोबर आदिसे

धनकी वृद्धि होती है। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः

यहाँ खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है, उतनी प्रधानता

अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती

है, पर खेतीमें जितना काम बैल कर सकता है, उतना भैंसा

नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है, पर वह धूप

सहन नहीं कर सकता। धूपमें चलनेसे वह जीभ निकाल

देता है, जबकि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण

कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता, जबकि बैलमें

सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते

हैं। ऐसे ही ऊँटसे भी खेती की जाती है, पर ऊँट भैंसेसे

भी कम होते हैं और बहुत मँहगे होते हैं। खेती करनेवाला

हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल अच्छे-

अच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी मँहगे हो

गये हैं, तो भी वे ऊँट जितने मँहगे नहीं हैं। यदि घरोंमें

गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं, खरीदने

नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं, वे खेतीमें काम

नहीं आ सकते; क्योंकि उनके कन्धे न होनेसे उनपर जुआ

नहीं रखा जा सकता।

गाय पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली

हवा भी पवित्र होती है। गायके गोबर-गोमूत्र भी पवित्र

होते हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग, हैजा आदि भयंकर

बीमारियाँ नहीं आतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे

लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता, जितना

सीमेन्ट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है। गोबरमें जहर

खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई व्यक्ति साँप

काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाह-क्रिया करने लिये

उसको गंगाके किनारे ले गये। वहाँपर एक साधु रहते थे।

उन्होंने पूछा कि इस व्यक्तिको क्या हुआ? लोगोंने कहा

कि यह साँप काटनेसे मरा है।

साधुने कहा कि यह मरा नहीं है, तुमलोग गायका

गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने उस व्यक्तिकी

नासिकाको छोड़कर उसके पूरे शरीरमें (नीचे-ऊपर)

गोबरका लेप कर दिया। आधे घण्टेके बाद गोबरका फिर

दूसरा लेप किया। इससे उस व्यक्तिके श्वास चलने लगे

और वह जी उठा। हृदयके रोगोंको दूर करने लिये

गोमूत्र बहुत उपयोगी है। छोटी बछड़ीका गोमूत्र रोज

तोला-दो-तोला पीनेसे पेटके रोग दूर हो जाते हैं। एक

संतको दमाकी शिकायत थी, उनको गोमूत्र-सेवनसे बहुत

फायदा हुआ है। आजकल तो गोबर और गोमूत्रसे अनेक

रोगोंकी दवाइयाँ बनायी जा रही हैं। गोबरसे गैस भी बनने

लगी है।

खेतोंमें गोबर-गोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है,

वह भी पवित्र होता है। खेतोंमें गायोंके रहनेसे, गोबर और

गोमूत्रसे जमीनकी जैसी पुष्टि होती है, वैसी पुष्टि विदेशी

रासायनिक खादोंसे नहीं होती। जैसे, एक बार अंगूरकी

खेती करनेवालेने बताया कि गोबरकी खाद डालनेसे

अंगूरके गुच्छे जितने बड़े-बड़े होते हैं, उतने विदेशी खाद

डालनेसे नहीं होते। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें

जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊ-शक्ति

नष्ट हो जाती है। परन्तु गोबर-गोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊ-

शक्ति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। विदेशोंमें रासायनिक

खादसे बहुत-से खेत खराब हो गये हैं, जिन्हें उपजाऊ

बनानेके लिये वे लोग भारतसे गोबर मँगवा रहे हैं और

भारतसे गोबरके जहाज भरकर विदेशोंमें जा रहे हैं।

हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं। अतः

उनका दूध भी सात्त्विक होता है, जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण

होती है और स्वभाव शान्त, सौम्य होता है। विदेशी गायोंका

दूध तो ज्यादा होता है, पर उन गायोंमें गुस्सा बहुत होता है।

अतः उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव क्रूर होता है।

भैंसाका दूध भी ज्यादा होता है, पर वह दूध सात्त्विक नहीं

होता। उससे सात्त्विक बल नहीं आता। सैनिकोंके घोड़ोंको

गायका दूध पिलाया जाता है, जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते

हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसाका

दूध पिलाया, जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परन्तु जब नदी

पार करनेका काम पड़ा तो वे घोड़े पानीमें बैठ गये। भैंस

श्लोक ४४ ] * साधक-संजीवनी * ११७७

पानीमें बैठा करती है; अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ

गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है, पर उस दूधका दही,

मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति

देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट, कुत्ता, गधा आदिको

अस्पृश्य बताया गया है।

सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म,

चूड़ाकर्म, उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका, उसके

दूध, घी, गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके

घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थान-शुद्धिके लिये गोबरका

ही चौका लगाया जाता है। श्राद्ध-कर्ममें गायके दूधकी

खीर बनायी जाती है। नरकोंसे बचनेके लिये गोदान किया

जाता है। धार्मिक कृत्योंमें 'पंचगव्य' काममें लाया जाता

है, जो गायके दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र-इन

पाँचोंसे बनता है।

कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी

आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही

प्रधानता थी। पौष्टिक, वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध

और घीका मुख्य स्थान है।

निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है।

गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान्

श्रीकृष्णने भी बिना जूतेके गोचारणकी लीला की थी,

इसलिये उनका नाम 'गोपाल' पड़ा। प्राचीन-कालमें ऋषिलोग

वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध,

घीसे उनकी बुद्धि प्रखर, विलक्षण होती थी, जिससे वे बड़े-

बड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन

ग्रन्थोंको ठीक-ठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूध-

घीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम

'आयु' भी है। बड़े-बड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास

आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।

गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे

इतिहास, पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि

आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी

संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है! अगर इसी तरह

गो-हत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो

जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी, तब क्या दशा होगी, कितनी

आफतें आयेंगी-इसका अन्दाज नहीं लगाया जा सकता।

जब गायें खत्म हो जायँगी, तब गोबर नहीं रहेगा और

गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी।

जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी? खेती न

होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा? लोगोंको

शरीर-निर्वाहके लिये अन्न-जल और वस्त्र भी मिलना

मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध, घी, गोबर

आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके

अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी

अकाल, अनावृष्टि, भूकम्प, आपसी कलह आदिके होनेमें

गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति

लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना, उनको कत्लखानोंमें

जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है।

गायोंकी रक्षाके लिये भाई-बहनोंको चाहिये कि वे

गायोंका पालन करें, उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही

दूध-घी खायें, भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबर-गैसका

प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ

बनायी जायँ, दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचर-भूमियाँ

हैं, उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचर-

भूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्या-नीतिका विरोध

किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह

देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या

बन्द करे।

'परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्'-चारों

वर्णोंकी सेवा करना, सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों

वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा, अड़चन न आये, सबको सुख-

आराम हो-इस भावसे अपनी बुद्धि, योग्यता, बलके द्वारा

सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है।

यहाँ एक शंका पैदा होती है कि भगवान्ने चारों

वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणोंको

कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी

उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ

है, वहाँपर उसके अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, निद्रा, अप्रकाश,

अप्रवृत्ति और मोह-ये सात अवगुण बताये हैं (गीता-

चौदहवें अध्यायका आठवाँ और तेरहवें अध्यायका सत्रहवाँ

श्लोक)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा

कैसे होगी? क्योंकि वह आलस्य, प्रमाद आदिमें पड़ा

रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा? सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी

चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे

विधान किया?

यदि इस शंकापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय

तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें

जाते हैं, रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात्

मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं

(गीता-चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसमें भी

११७८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

वास्तवमें देखा जाय तो रजोगुणके बढ़नेपर जो मरता है, वह कर्मप्रधान मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है—‘रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्निषु जायते ’ (गीता १४।१५)। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यमात्र रजःप्रधान (रजोगुणकी प्रधानतावाला) है। रजःप्रधानवालोंमें जो सात्त्विक, राजस और तामस—तीन गुण होते हैं, उन तीनों गुणोंसे ही चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। इसलिये कर्म करना सबमें मुख्य होता है और इसीको लेकर मनुष्योंको कर्मयोनि कहा गया है तथा गीतामें भी चारों वर्णोंके कर्मोंके लिये ‘स्वभावज कर्म’, ‘स्वभावनियत कर्म’ आदि पद आये हैं। अतः शुद्धका परिचर्या अर्थात् सेवा करना ‘स्वभावज कर्म’ है, जिसमें उसे परिश्रम नहीं होता।

मनुष्यमात्र कर्मयोनि होनेपर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यमें विवेक-विचारका विशेष तारतम्य रहता है और शुद्धि भी रहती है; परन्तु शुद्धमें मोहकी प्रधानता रहनेसे उसमें विवेक बहुत दब जाता है। इस दृष्टिसे शुद्धके सेवा-कर्ममें विवेककी प्रधानता न होकर आज्ञापालनकी प्रधानता रहती है—‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा ’ (मानस २।३०१।२)। इसलिये चारों वर्णोंकी आज्ञाके अनुसार सेवा करना, सुख-सुविधा जुटा देना शुद्धके लिये स्वाभाविक होता है।

शुद्धोंके कर्म परिचर्यात्मक अर्थात् सेवास्वरूप होते हैं। उनके शारीरिक, सामाजिक, नागरिक, ग्रामणिक आदि सब-के-सब कर्म ठीक तरहसे सम्पन्न होते हैं, जिनसे चारों ही वर्णोंके जीवन-निर्वाहके लिये सुख-सुविधा, अनुकूलता और आवश्यकताकी पूर्ति होती है।

स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य

चेतन जीवात्मा और जड़ प्रकृति—दोनोंका स्वभाव भिन्न-भिन्न है। चेतन स्वाभाविक ही निर्वाकार अर्थात् परिवर्तनरहित है और प्रकृति स्वाभाविक ही विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है। अतः इन दोनोंका स्वभाव भिन्न-भिन्न होनेसे इनका सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है; किंतु चेतनने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उस सम्बन्धकी सद्भावना कर ली है अर्थात् ‘सम्बन्ध है’ ऐसा मान लिया है। इसीको गुणोंका संग कहते हैं, जो जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ’ (गीता १३।२१)। इस संगके कारण, गुणोंके तारतम्यसे जीवका ब्राह्मणादि वर्णमें जन्म होता है। गुणोंके तारतम्यसे

जिस वर्णमें जन्म होता है, उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म स्वाभाविक, सहज होते हैं; जैसे—ब्राह्मणके लिये शम, दम आदि; क्षत्रियके लिये शौर्य, तेज आदि; वैश्यके लिये खेती, गौरक्षा आदि और शुद्धके लिये सेवा—ये कर्म स्वतःस्वाभाविक होते हैं। तात्पर्य है कि चारों वर्णोंको इन कर्मोंको करनेमें परिश्रम नहीं होता; क्योंकि गुणोंके अनुसार स्वभाव और स्वभावके अनुसार उनके लिये कर्मोंका विधान है। इसलिये इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक ही रुचि होती है। मनुष्य इन स्वाभाविक कर्मोंको जब अपने लिये अर्थात् अपने स्वार्थ, भोग और आरामके लिये करता है, तब वह उन कर्मोंसे बँध जाता है। जब उन्हीं कर्मोंको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक संसारके हितके लिये करता है, तब ‘कर्मयोग’ हो जाता है और उन्हीं कर्मोंसे सब संसारमें व्यापक परमात्माका पूजन करता है अथवा भगवत्परायण होकर केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म (जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि) करता है, तब वह ‘भक्तियोग’ हो जाता है। फिर प्रकृतिके गुणोंका सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर केवल एक परमात्मतत्त्व ही रह जाता है, जिसमें सिद्ध महापुरुषके स्वरूपकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रता, अखण्डता, निर्वाकारताकी अनुभूति रह जाती है। ऐसा होनेपर भी उसके शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अपने-अपने वर्ण, आश्रमकी मर्यादाके अनुसार निलिप्ततापूर्वक शास्त्रविहित कर्म स्वाभाविक होते हैं, जो कि संसारमात्रके लिये आदर्श होते हैं। प्रभुकी तरफ आकृष्ट होनेसे प्रतिक्षण प्रेम बढ़ता रहता है, जो अनन्त आनन्दस्वरूप है।

जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे ?

ऊँच-नीच योनियोंमें जितने भी शरीर मिलते हैं, वे सब गुण और कर्मके अनुसार ही मिलते हैं। गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है; इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। अतः स्थूलशरीरकी दृष्टिसे विवाह, भोजन आदि कर्म जन्मकी प्रधानतासे ही करने चाहिये अर्थात् अपनी जाति या वर्णके अनुसार ही भोजन, विवाह आदि कर्म होने चाहिये।

दूसरी बात, जिस प्राणीका सांसारिक भोग, धन, मान, आराम, सुख आदिका उद्देश्य रहता है, उसके लिये वर्णके अनुसार कर्तव्य-कर्म करना और वर्णकी मर्यादामें चलना आवश्यक हो जाता है। यदि वह वर्णकी मर्यादामें नहीं चलता,

श्लोक ४४ ]

  • साधक-संजीवनी *

११७९

तो उसका पतन हो जाता है१। परन्तु जिसका उद्देश्य केवल परमात्मा ही है, संसारके भोग आदि नहीं, उसके लिये सत्संग, स्वाध्याय, जप, ध्यान, कथा, कीर्तन, परस्पर विचार-विनिमय आदि भगवत्सम्बन्धी काम मुख्य होते हैं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें प्राणीके पारमार्थिक भाव, आचरण आदिकी मुख्यता है, जाति या वर्णकी नहीं।

तीसरी बात, जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्तिका है, वह भगवत्सम्बन्धी कार्योंको मुख्यतासे करते हुए भी वर्ण-आश्रमके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंको पूजन-बुद्धिसे केवल भगवत्प्रतीत्यर्थ ही करता है।

आगे छियालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बड़ी श्रेष्ठ बात बतायी है कि जिससे सम्पूर्ण संसार पैदा हुआ है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका ही लक्ष्य रखकर, उसके प्रीत्यर्थ ही पूजन-रूपसे अपने-अपने वर्णके अनुसार कर्म किये जायें। इसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। देवता, असुर, पशु, पक्षी आदिका स्वतः अधिकार नहीं है; परन्तु उनके लिये भी परमात्माकी तरफसे निषेध नहीं है। कारण कि सभी परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके सभी अधिकारी हैं। प्राणिमात्रका भगवान्पर पूरा अधिकार है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आपसके व्यवहारमें अर्थात् रोटी, बेटी और शरीर आदिके साथ बर्ताव करनेमें तो 'जन्म' की प्रधानता है और परमात्माकी प्राप्तिमें भाव, विवेक और 'कर्म' की प्रधानता है। इसी आशयको लेकर भागवतकारने कहा है कि जिस मनुष्यके वर्णको बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है, वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझ लेना चाहिये२। अभिप्राय यह

है कि ब्राह्मणके शम-दम आदि जितने लक्षण हैं, वे लक्षण या गुण स्वाभाविक ही किसीमें हों तो जन्ममात्रसे नीचा होनेपर भी उसको नीचा नहीं मानना चाहिये। ऐसे ही महाभारतमें युधिष्ठिर और नहुषके संवादमें आया है कि जो शूद्र आचरणोंमें श्रेष्ठ है, उस शूद्रको शूद्र नहीं मानना चाहिये और जो ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे रहित है, उस ब्राह्मणको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये३ अर्थात् वहाँ कर्मोंकी ही प्रधानता ली गयी है, जन्मकी नहीं।

शास्त्रोंमें जो ऐसे वचन आते हैं, उन सबका तात्पर्य है कि कोई भी नीच वर्णवाला साधारण-से-साधारण मनुष्य अपनी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है, इसमें संदेहकी कोई बात नहीं है। इतना ही नहीं, वह उसी वर्णमें रहता हुआ शम, दम आदि जो सामान्य धर्म हैं, उनका सांगोपांग पालन करता हुआ अपनी श्रेष्ठताको प्रकट कर सकता है। जन्म तो पूर्वकर्मिक अनुसार हुआ है, इसमें वह बेचारा क्या कर सकता है? परन्तु वहाँ (नीच वर्णमें) रहकर भी वह अपनी नयी उन्नति कर सकता है। उस नयी उन्नतिमें प्रोत्साहित करनेके लिये ही शास्त्र-वचनोंका आशय मालूम देता है कि नीच वर्णवाला भी नयी उन्नति करनेमें हिम्मत न हारे। जो ऊँचे वर्णवाला होकर भी वर्णोचित काम नहीं करता, उसको भी अपने वर्णोचित काम करनेके लिये शास्त्रोंमें प्रोत्साहित किया है; जैसे—

'ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं शूद्रकामाय नेष्यते।'

(श्रीमद्भागवत ११।१७।४२)

जिन ब्राह्मणोंका खान-पान, आचरण सर्वथा भ्रष्ट है, उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये—ऐसा स्मृतिमें आया है४। परन्तु जिनके आचरण

१-आचारहीन न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिर्द्वैः॥ छन्दोस्येन मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः॥

(वसिष्ठस्मृति ६।३२)

'शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष—इन छहों अंगोंसहित अध्ययन किये हुए वेद भी आचारहीन पुरुषको पवित्र नहीं करते। पंख पैदा होनेपर पक्षी जैसे अपने घोंसलेको छोड़ देता है, ऐसे ही मृत्युसमयमें आचारहीन पुरुषको वेद छोड़ देते हैं।'

२-यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुरो वर्णाभिध्वजकम्। यदयत्रापि दृश्यते तत् तेनैव विनिर्दिशेत्॥ (श्रीमद्भागवत ७।११।३५)

३-शूद्रे तु यद् भवेत्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते। न वै शूद्रे भवेच्छूद्रे ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः॥

यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः। यत्रैतन भवेत् सर्पं तं शूद्रमिति निर्दिशेत्॥

(महाभारत, वनपर्व १८०।२५-२६)

४-पाषण्डिनो विकर्मस्था-बैडालव्रतिकाञ्छठात्। हेतुकान्बकवृत्तीश्च वाइमात्रेणापि नार्चयेत्॥

(मनुस्मृति ४।३०)

'पाखण्डिन, विरुद्ध कर्म करनेवाले, बैडालव्रती, शठ, हेतुवादी, बकवृत्ति ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर न करे।'

न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रतिके द्विजे। न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्॥

(मनुस्मृति ४।१९२)

'धर्मज्ञ गृहश्रमी बैडालव्रती, बकव्रती और वेदको नहीं जाननेवाले ब्राह्मणके लिये पानी भी न दे।'