श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
अवसरपर किस विधिसे प्रयोग करना चाहिये—इसका अर्थात् यज्ञविधिका तथा अनुष्ठान आदिकी विधिका अनुभव कर लेने ( अच्छी तरह करके देख लेने )-का नाम 'विज्ञान' है।
'आस्तिक्यम्'—परमात्मा, वेदादि शास्त्र, परलोक आदिका हृदयमें आदर हो, श्रद्धा हो और उनकी सत्यतामें कभी सन्देह न हो तथा उनके अनुसार अपना आचरण हो, इसका नाम 'आस्तिक्य' है।
'ब्राह्मकर्म स्वभावजम्'—ये शम, दम आदि ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म ( गुण ) हैं अर्थात् इन कर्मों—( गुणों— ) को धारण करनेमें ब्राह्मणको परिश्रम नहीं पड़ता।
जिन ब्राह्मणोंमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है, जिनकी वंश-परम्परा परम शुद्ध है और जिनके पूर्वजन्मकृत कर्म भी शुद्ध हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके लिये ही शम, दम आदि गुण
परिशिष्ट भाव—वर्ण-परम्परा ठीक हो तो ये गुण स्वाभाविक नहीं होते, इनमें कमी आ जाती है।
पूर्वश्लोकमें 'स्वभावप्रभैर्गुणैः' कहा, इसलिये यहाँ स्वभावज कर्म बताते हैं। स्वभाव बननेमें पहले जन्म मुख्य है, फिर जन्मके बाद संग मुख्य है। संग, स्वाध्याय, अभ्यास आदिके कारण स्वभाव बदल जाता है।
सम्बन्ध—अब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥ ४३ ॥
| शौर्यम् | = शूरवीरता, | च | = तथा |
|---|---|---|---|
| तेजः | = तेज, | युद्धे | = युद्धमें |
| धृतिः | = धैर्य | अपि | = कभी |
| दाक्ष्यम् | = प्रजाके संचालन | ||
| आदिकी विशेष | |||
| चतुरता | अपलायनम् | = पीठ न दिखाना, | |
| दानम् | = दान करना | ||
| च | = और |
व्याख्या—'शौर्यम्'—मनमें अपने धर्मका पालन करनेकी तत्परता हो, धर्ममय युद्ध* प्राप्त होनेपर युद्धमें चोट लगने, अंग कट जाने, मर जाने आदिका किंचिन्मात्र भी भय न हो, घाव होनेपर भी मनमें प्रसन्नता और उत्साह रहे तथा सिर कटनेपर भी पहले—जैसे ही अस्त्र-शस्त्र चलाता रहे, इसका नाम 'शौर्य' है।
'तेजः'—जिस प्रभाव या शक्तिके सामने पापी-दुराचारी मनुष्य भी पाप, दुराचार करनेमें हिचकते हैं, जिसके सामने
स्वाभाविक होते हैं और उनमें किसी गुणके न होनेपर अथवा किसी गुणमें कमी होनेपर भी उसकी पूर्ति करना उन ब्राह्मणोंके लिये सहज होता है।
चारों वर्णोंकी रचना गुणोंके तारतम्यसे की गयी है, इसलिये गुणोंके अनुसार उस-उस वर्णमें वे-वे कर्म स्वाभाविक प्रकट हो जाते हैं और दूसरे कर्म गौण हो जाते हैं। जैसे ब्राह्मणमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होनेसे उसमें शम, दम आदि कर्म ( गुण ) स्वाभाविक आते हैं तथा जीविकाके कर्म गौण हो जाते हैं और दूसरे वर्णोंमें रजोगुण तथा तमोगुणकी प्रधानता होनेसे उन वर्णोंके जीविकाके कर्म भी स्वाभाविक कर्मोंमें सम्मिलित हो जाते हैं। इसी दृष्टिसे गीतामें ब्राह्मणके स्वभावज कर्मोंमें जीविकाके कर्म न कह करके शम, दम आदि कर्म ( गुण ) ही कहे गये हैं।
ब्राह्मणमें स्वाभाविक होते हैं। परन्तु वर्णसंकरता आनेपर
ईश्वरभावः | = शासन करनेका भाव (—ये सब-के- सब) ---|--- क्षात्रम् | = क्षत्रियके स्वभावजम् | = स्वाभाविक कर्म | = कर्म हैं।
लोगोंकी मर्यादाविरुद्ध चलनेकी हिम्मत नहीं होती अर्थात् लोग स्वाभाविक ही मर्यादामें चलते हैं, उसका नाम 'तेज' है।
'धृतिः'—विपरीत-से-विपरीत अवस्थामें भी अपने धर्मसे विचलित न होने और शत्रुओंके द्वारा धर्म तथा नीतिसे विरुद्ध अनुचित व्यवहारसे सताये जानेपर भी धर्म तथा नीति-विरुद्ध कार्य न करके धैर्यपूर्वक उसी मर्यादामें चलनेका नाम 'धृति' है।
'दाक्ष्यम्'—प्रजापर शासन करनेकी, प्रजाको यथा-
- अपना युद्ध करनेका विचार भी नहीं है, कोई स्वार्थ भी नहीं है, पर परिस्थितिवशात् केवल कर्तव्यरूपसे प्राप्त हुआ है, वह 'धर्ममय युद्ध' है।