श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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योग्य व्यवस्थित रखनेकी और उसका संचालन करनेकी विशेष योग्यता, चतुराईका नाम 'दाक्ष्य' है।
'युद्धे चाप्यपलायनम् '—युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, मनमें कभी हार स्वीकार न करना, युद्ध छोड़कर कभी न भागना—यह युद्धमें 'अपलायन' है।
'दानम् '—क्षत्रियलोग दान करते हैं तो देनेमें कमी नहीं रखते, बड़ी उदारतापूर्वक देते हैं। वर्तमानमें दान-पुण्य करनेका स्वभाव वैश्योंमें देखनेमें आता है; परन्तु वैश्यलोग देनेमें कसाकसी करते हैं अर्थात् इतनेसे ही काम चल जाय तो अधिक क्यों दिया जाय—ऐसा द्रव्यका लोभ उनमें रहता है। द्रव्यका लोभ रहनेसे धर्मका पालन करनेमें बाधा आ जाती है, कमी आ जाती है, जिससे सात्त्विक दान (गीता—सत्रहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक) देनेमें कठिनता पड़ती है। परन्तु क्षत्रियोंमें दानवीरता होती है। इसलिये यहाँ
'दान' शब्द क्षत्रियोंके स्वभावमें आया है।
'ईश्वरभावश्च '—क्षत्रियोंमें स्वाभाविक ही शासन करनेकी प्रवृत्ति होती है। लोगोंके नीति, धर्म और मर्यादा-विरुद्ध आचरण देखनेपर उनके मनमें स्वाभाविक ही ऐसी बात आती है कि वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं और उनको नीति, धर्मके अनुसार चलानेकी इच्छा होती है। अपने शासनद्वारा सबको अपनी-अपनी मर्यादाके अनुसार चलानेका भाव रहता है। इस ईश्वरभावमें अभिमान नहीं होता; क्योंकि क्षत्रियजातिमें नम्रता, सरलता आदि गुण देखनेमें आते हैं।
'क्षत्रं कर्म स्वभावजम् '—जो मात्र प्रजाकी दुःखोंसे रक्षा करे, उसका नाम 'क्षत्रिय' है—'क्षतात् त्रायत इति क्षत्रियः। ' उस क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म हैं, वे क्षत्रकर्म कहलाते हैं।
परिशिष्ट भाव —क्षत्रिय (राजपूत) बड़े शूरवीर और तेजस्वी होते हैं। परन्तु ईर्ष्या-दोष होनेके कारण जिस राजाका राज्य हुआ, उसने अपने अधीन रहनेवाले राजपूतोंका उत्साह कम करनेकी चेष्टा की, उनकी उन्नति नहीं होने दी, जिससे कि वे प्रबल होकर राज्य न छीन लें। इस प्रकार ईर्ष्याके कारण आपसी फूट होनेसे तथा उत्साहमें कमी होनेसे ही विधर्मीलोग भारतपर अपना अधिकार करनेमें समर्थ हो सके।
सम्बन्ध—अब वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥ ४४ ॥
कृषिगौरक्ष्य-वाणिज्यम् = खेती करना, गायोंकी रक्षा करना और व्यापार करना
| (—ये सब-के-सब) | वैश्यकर्म, | सेवा |
|---|---|---|
| स्वभावजम् = वैश्यके | करना | |
| स्वाभाविक | शूद्रस्य = शूद्रका | |
| कर्म हैं | ||
| (तथा) | अपि = भी | |
| परिचर्यात्मकम् = चारों वर्णोंकी | स्वभावजम् = स्वाभाविक | |
| कर्म = कर्म है। |
व्याख्या —'कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं स्वभावजम् '—खेती करना, गायोंकी रक्षा करना, उनकी वंश-वृद्धि करना और शुद्ध व्यापार करना—ये कर्म वैश्योंमें स्वाभाविक होते हैं।
शुद्ध व्यापार करनेका तात्पर्य है—जिस देशमें, जिस समय, जिस वस्तुकी आवश्यकता हो, लोगोंके हितकी
भावनासे उस वस्तुको (जहाँ वह मिलती हो, वहाँसे ला करके) उसी देशमें पहुँचाना; प्रजाकी आवश्यक वस्तुओंके अभावकी पूर्ति कैसे हो, वस्तुओंके अभावमें कोई कष्ट न पाये—इस भावसे सच्चाईके साथ वस्तुओंका वितरण करना।
भगवान् श्रीकृष्ण (नन्दबाबाको लेकर) अपनेको वैश्य ही मानते हैं*। इसलिये उन्होंने स्वयं गायों और बछड़ोंको
- कृषिवाणिज्यगौरक्षं कुसिदं तुर्यमुच्यते। वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोऽनिशम् ॥ (श्रीमद्भागवतम् १०।२४।२१)
'वैश्योंकी वार्तावृत्ति चार प्रकारकी है—कृषि, वाणिज्य, गौरक्षा और ब्याज लेना। हमलोग उन चारोंमेंसे केवल गोपालन ही सदासे करते आये हैं।'