सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1177, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1177

११७६ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८

चराया। मनु महाराजने वैश्य-वृत्तिमें 'पशूनां रक्षणम्'

(मनुस्मृति १।९०) (पशुओंकी रक्षा करना) कहा है, पर

यहाँ भगवान् (उपर्युक्त पदोंसे) अपने जाति-भाइयोंसे मानो

यह कहते हैं कि तुमलोग सब पशुओंका पालन, उनकी

रक्षा न कर सको तो कम-से-कम गायोंका पालन और

उनकी रक्षा जरूर करना। गायोंकी वृद्धि न कर सको तो

कोई बात नहीं; परन्तु उनकी रक्षा जरूर करना, जिससे

हमारा गोधन घट न जाय। इसलिये वैश्य-समाजको चाहिये

कि वह गायोंकी रक्षामें अपना तन-मन-धन लगा दे,

उनकी रक्षा करनेमें अपनी शक्ति बचाकर न रखे।

गोरक्षा-सम्बन्धी विशेष बात

मनुष्योंके लिये गाय सब दृष्टियोंसे पालनीय है। गायसे

अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंकी सिद्धि

होती है। आजके अर्थप्रधान युगमें तो गाय अत्यन्त ही

उपयोगी है। गोपालनसे, गायके दूध, घी, गोबर आदिसे

धनकी वृद्धि होती है। हमारा देश कृषिप्रधान है। अतः

यहाँ खेतीमें जितनी प्रधानता बैलोंकी है, उतनी प्रधानता

अन्य किसीकी भी नहीं है। भैंसेके द्वारा भी खेती की जाती

है, पर खेतीमें जितना काम बैल कर सकता है, उतना भैंसा

नहीं कर सकता। भैंसा बलवान् तो होता है, पर वह धूप

सहन नहीं कर सकता। धूपमें चलनेसे वह जीभ निकाल

देता है, जबकि बैल धूपमें भी चलता रहता है। कारण

कि भैंसेमें सात्त्विक बल नहीं होता, जबकि बैलमें

सात्त्विक बल होता है। बैलोंकी अपेक्षा भैंसे कम भी होते

हैं। ऐसे ही ऊँटसे भी खेती की जाती है, पर ऊँट भैंसेसे

भी कम होते हैं और बहुत मँहगे होते हैं। खेती करनेवाला

हरेक आदमी ऊँट नहीं खरीद सकता। आजकल अच्छे-

अच्छे जवान बैल मारे जानेके कारण बैल भी मँहगे हो

गये हैं, तो भी वे ऊँट जितने मँहगे नहीं हैं। यदि घरोंमें

गायें रखी जायँ तो बैल घरोंमें ही पैदा हो जाते हैं, खरीदने

नहीं पड़ते। विदेशी गायोंके जो बैल होते हैं, वे खेतीमें काम

नहीं आ सकते; क्योंकि उनके कन्धे न होनेसे उनपर जुआ

नहीं रखा जा सकता।

गाय पवित्र होती है। उसके शरीरका स्पर्श करनेवाली

हवा भी पवित्र होती है। गायके गोबर-गोमूत्र भी पवित्र

होते हैं। गोबरसे लिपे हुए घरोंमें प्लेग, हैजा आदि भयंकर

बीमारियाँ नहीं आतीं। इसके सिवाय युद्धके समय गोबरसे

लिपे हुए मकानोंपर बमका उतना असर नहीं होता, जितना

सीमेन्ट आदिसे बने हुए मकानोंपर होता है। गोबरमें जहर

खींचनेकी विशेष शक्ति होती है। काशीमें कोई व्यक्ति साँप

काटनेसे मर गया। लोग उसकी दाह-क्रिया करने लिये

उसको गंगाके किनारे ले गये। वहाँपर एक साधु रहते थे।

उन्होंने पूछा कि इस व्यक्तिको क्या हुआ? लोगोंने कहा

कि यह साँप काटनेसे मरा है।

साधुने कहा कि यह मरा नहीं है, तुमलोग गायका

गोबर ले आओ। गोबर लाया गया। साधुने उस व्यक्तिकी

नासिकाको छोड़कर उसके पूरे शरीरमें (नीचे-ऊपर)

गोबरका लेप कर दिया। आधे घण्टेके बाद गोबरका फिर

दूसरा लेप किया। इससे उस व्यक्तिके श्वास चलने लगे

और वह जी उठा। हृदयके रोगोंको दूर करने लिये

गोमूत्र बहुत उपयोगी है। छोटी बछड़ीका गोमूत्र रोज

तोला-दो-तोला पीनेसे पेटके रोग दूर हो जाते हैं। एक

संतको दमाकी शिकायत थी, उनको गोमूत्र-सेवनसे बहुत

फायदा हुआ है। आजकल तो गोबर और गोमूत्रसे अनेक

रोगोंकी दवाइयाँ बनायी जा रही हैं। गोबरसे गैस भी बनने

लगी है।

खेतोंमें गोबर-गोमूत्रकी खादसे जो अन्न पैदा होता है,

वह भी पवित्र होता है। खेतोंमें गायोंके रहनेसे, गोबर और

गोमूत्रसे जमीनकी जैसी पुष्टि होती है, वैसी पुष्टि विदेशी

रासायनिक खादोंसे नहीं होती। जैसे, एक बार अंगूरकी

खेती करनेवालेने बताया कि गोबरकी खाद डालनेसे

अंगूरके गुच्छे जितने बड़े-बड़े होते हैं, उतने विदेशी खाद

डालनेसे नहीं होते। विदेशी खाद डालनेसे कुछ ही वर्षोंमें

जमीन खराब हो जाती है अर्थात् उसकी उपजाऊ-शक्ति

नष्ट हो जाती है। परन्तु गोबर-गोमूत्रसे जमीनकी उपजाऊ-

शक्ति ज्यों-की-त्यों बनी रहती है। विदेशोंमें रासायनिक

खादसे बहुत-से खेत खराब हो गये हैं, जिन्हें उपजाऊ

बनानेके लिये वे लोग भारतसे गोबर मँगवा रहे हैं और

भारतसे गोबरके जहाज भरकर विदेशोंमें जा रहे हैं।

हमारे देशकी गायें सौम्य और सात्त्विक होती हैं। अतः

उनका दूध भी सात्त्विक होता है, जिसको पीनेसे बुद्धि तीक्ष्ण

होती है और स्वभाव शान्त, सौम्य होता है। विदेशी गायोंका

दूध तो ज्यादा होता है, पर उन गायोंमें गुस्सा बहुत होता है।

अतः उनका दूध पीनेसे मनुष्यका स्वभाव क्रूर होता है।

भैंसाका दूध भी ज्यादा होता है, पर वह दूध सात्त्विक नहीं

होता। उससे सात्त्विक बल नहीं आता। सैनिकोंके घोड़ोंको

गायका दूध पिलाया जाता है, जिससे वे घोड़े बहुत तेज होते

हैं। एक बार सैनिकोंने परीक्षाके लिये कुछ घोड़ोंको भैंसाका

दूध पिलाया, जिससे घोड़े खूब मोटे हो गये। परन्तु जब नदी

पार करनेका काम पड़ा तो वे घोड़े पानीमें बैठ गये। भैंस