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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1178, कुल 1299 में से

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पृष्ठ 1178

श्लोक ४४ ] * साधक-संजीवनी * ११७७

पानीमें बैठा करती है; अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ

गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है, पर उस दूधका दही,

मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति

देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट, कुत्ता, गधा आदिको

अस्पृश्य बताया गया है।

सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म,

चूड़ाकर्म, उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका, उसके

दूध, घी, गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके

घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थान-शुद्धिके लिये गोबरका

ही चौका लगाया जाता है। श्राद्ध-कर्ममें गायके दूधकी

खीर बनायी जाती है। नरकोंसे बचनेके लिये गोदान किया

जाता है। धार्मिक कृत्योंमें 'पंचगव्य' काममें लाया जाता

है, जो गायके दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र-इन

पाँचोंसे बनता है।

कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी

आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही

प्रधानता थी। पौष्टिक, वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध

और घीका मुख्य स्थान है।

निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है।

गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान्

श्रीकृष्णने भी बिना जूतेके गोचारणकी लीला की थी,

इसलिये उनका नाम 'गोपाल' पड़ा। प्राचीन-कालमें ऋषिलोग

वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध,

घीसे उनकी बुद्धि प्रखर, विलक्षण होती थी, जिससे वे बड़े-

बड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन

ग्रन्थोंको ठीक-ठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूध-

घीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम

'आयु' भी है। बड़े-बड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास

आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।

गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे

इतिहास, पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि

आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी

संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है! अगर इसी तरह

गो-हत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो

जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी, तब क्या दशा होगी, कितनी

आफतें आयेंगी-इसका अन्दाज नहीं लगाया जा सकता।

जब गायें खत्म हो जायँगी, तब गोबर नहीं रहेगा और

गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी।

जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी? खेती न

होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा? लोगोंको

शरीर-निर्वाहके लिये अन्न-जल और वस्त्र भी मिलना

मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध, घी, गोबर

आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके

अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी

अकाल, अनावृष्टि, भूकम्प, आपसी कलह आदिके होनेमें

गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति

लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना, उनको कत्लखानोंमें

जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है।

गायोंकी रक्षाके लिये भाई-बहनोंको चाहिये कि वे

गायोंका पालन करें, उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही

दूध-घी खायें, भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबर-गैसका

प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ

बनायी जायँ, दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचर-भूमियाँ

हैं, उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचर-

भूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्या-नीतिका विरोध

किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह

देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या

बन्द करे।

'परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्'-चारों

वर्णोंकी सेवा करना, सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों

वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा, अड़चन न आये, सबको सुख-

आराम हो-इस भावसे अपनी बुद्धि, योग्यता, बलके द्वारा

सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है।

यहाँ एक शंका पैदा होती है कि भगवान्ने चारों

वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणोंको

कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी

उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ

है, वहाँपर उसके अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, निद्रा, अप्रकाश,

अप्रवृत्ति और मोह-ये सात अवगुण बताये हैं (गीता-

चौदहवें अध्यायका आठवाँ और तेरहवें अध्यायका सत्रहवाँ

श्लोक)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा

कैसे होगी? क्योंकि वह आलस्य, प्रमाद आदिमें पड़ा

रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा? सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी

चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे

विधान किया?

यदि इस शंकापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय

तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें

जाते हैं, रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात्

मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं

(गीता-चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसमें भी