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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ४४ ] * साधक-संजीवनी * ११७७

पानीमें बैठा करती है; अतः वही स्वभाव घोड़ोंमें भी आ

गया। ऊँटनीका दूध भी निकलता है, पर उस दूधका दही,

मक्खन होता ही नहीं। उसका दूध तामसी होनेसे दुर्गति

देनेवाला होता है। स्मृतियोंमें ऊँट, कुत्ता, गधा आदिको

अस्पृश्य बताया गया है।

सम्पूर्ण धार्मिक कार्योंमें गायकी मुख्यता है। जातकर्म,

चूड़ाकर्म, उपनयन आदि सोलह संस्कारोंमें गायका, उसके

दूध, घी, गोबर आदिका विशेष सम्बन्ध रहता है। गायके

घीसे ही यज्ञ किया जाता है। स्थान-शुद्धिके लिये गोबरका

ही चौका लगाया जाता है। श्राद्ध-कर्ममें गायके दूधकी

खीर बनायी जाती है। नरकोंसे बचनेके लिये गोदान किया

जाता है। धार्मिक कृत्योंमें 'पंचगव्य' काममें लाया जाता

है, जो गायके दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र-इन

पाँचोंसे बनता है।

कामनापूर्तिके लिये किये जानेवाले यज्ञोंमें गायका घी

आदि काममें आता है। रघुवंशके चलनेमें गायकी ही

प्रधानता थी। पौष्टिक, वीर्यवर्धक चीजोंमें भी गायके दूध

और घीका मुख्य स्थान है।

निष्कामभावसे गायकी सेवा करनेसे मुक्ति होती है।

गायकी सेवा करनेमात्रसे अन्तःकरण निर्मल होता है। भगवान्

श्रीकृष्णने भी बिना जूतेके गोचारणकी लीला की थी,

इसलिये उनका नाम 'गोपाल' पड़ा। प्राचीन-कालमें ऋषिलोग

वनमें रहते हुए अपने पास गाय रखा करते थे। गायके दूध,

घीसे उनकी बुद्धि प्रखर, विलक्षण होती थी, जिससे वे बड़े-

बड़े ग्रन्थोंकी रचना किया करते थे। आजकल तो उन

ग्रन्थोंको ठीक-ठीक समझनेवाले भी कम हैं। गायके दूध-

घीसे वे दीर्घायु होते थे। इसलिये गायके घीका एक नाम

'आयु' भी है। बड़े-बड़े राजालोग भी उन ऋषियोंके पास

आते थे और उनकी सलाहसे राज्य चलाते थे।

गोरक्षाके लिये बलिदान करनेवालोंकी कथाओंसे

इतिहास, पुराण भरे पड़े हैं। बड़े भारी दुःखकी बात है कि

आज हमारे देशमें पैसोंके लोभसे रोजाना हजारोंकी

संख्यामें गायोंकी हत्या की जा रही है! अगर इसी तरह

गो-हत्या चलती रही तो एक समय गोवंश समाप्त हो

जायगा। जब गायें नहीं रहेंगी, तब क्या दशा होगी, कितनी

आफतें आयेंगी-इसका अन्दाज नहीं लगाया जा सकता।

जब गायें खत्म हो जायँगी, तब गोबर नहीं रहेगा और

गोबरकी खाद न रहनेसे जमीन भी उपजाऊ नहीं रहेगी।

जमीनके उपजाऊ न रहनेसे खेती कैसे होगी? खेती न

होनेसे अन्न तथा वस्त्र (कपास) कैसे मिलेगा? लोगोंको

शरीर-निर्वाहके लिये अन्न-जल और वस्त्र भी मिलना

मुश्किल हो जायगा। गाय और उसके दूध, घी, गोबर

आदिके न रहनेसे प्रजा बहुत दुःखी हो जायगी। गोधनके

अभावमें देश पराधीन और दुर्बल हो जायगा। वर्तमानमें भी

अकाल, अनावृष्टि, भूकम्प, आपसी कलह आदिके होनेमें

गायोंकी हत्या मुख्य कारण है। अतः अपनी पूरी शक्ति

लगाकर हर हालतमें गायोंकी रक्षा करना, उनको कत्लखानोंमें

जानेसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है।

गायोंकी रक्षाके लिये भाई-बहनोंको चाहिये कि वे

गायोंका पालन करें, उनको अपने घरोंमें रखें। गायका ही

दूध-घी खायें, भैंस आदिका नहीं। घरोंमें गोबर-गैसका

प्रयोग किया जाय। गायोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही गोशालाएँ

बनायी जायँ, दूधके उद्देश्यसे नहीं। जितनी गोचर-भूमियाँ

हैं, उनकी रक्षा की जाय तथा सरकारसे और गोचर-

भूमियाँ छुड़ाई जायँ। सरकारकी गोहत्या-नीतिका विरोध

किया जाय और सरकारसे अनुरोध किया जाय कि वह

देशकी रक्षाके लिये पूरे देशमें तत्काल पूर्णरूपसे गोहत्या

बन्द करे।

'परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्'-चारों

वर्णोंकी सेवा करना, सेवाकी सामग्री तैयार करना और चारों

वर्णोंके कार्योंमें कोई बाधा, अड़चन न आये, सबको सुख-

आराम हो-इस भावसे अपनी बुद्धि, योग्यता, बलके द्वारा

सबकी सेवा करना शूद्रका स्वाभाविक कर्म है।

यहाँ एक शंका पैदा होती है कि भगवान्ने चारों

वर्णोंकी उत्पत्तिमें सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणोंको

कारण बताया। उसमें तमोगुणकी प्रधानतासे शूद्रकी

उत्पत्ति बतायी और गीतामें जहाँ तमोगुणका वर्णन हुआ

है, वहाँपर उसके अज्ञान, प्रमाद, आलस्य, निद्रा, अप्रकाश,

अप्रवृत्ति और मोह-ये सात अवगुण बताये हैं (गीता-

चौदहवें अध्यायका आठवाँ और तेरहवें अध्यायका सत्रहवाँ

श्लोक)। अतः ऐसे तमोगुणकी प्रधानतावाले शूद्रसे सेवा

कैसे होगी? क्योंकि वह आलस्य, प्रमाद आदिमें पड़ा

रहेगा तो सेवा कैसे कर सकेगा? सेवा बहुत ऊँचे दर्जेकी

चीज है। ऐसे ऊँचे कर्मका भगवान्ने शूद्रके लिये कैसे

विधान किया?

यदि इस शंकापर गुणोंकी दृष्टिसे विचार किया जाय

तो गीतामें आया है कि सत्त्वगुणवाले ऊँचे लोकोंमें

जाते हैं, रजोगुणवाले मरकर पीछे मध्यलोक अर्थात्

मृत्युलोकमें जाते हैं और तमोगुणवाले अधोगतिमें जाते हैं

(गीता-चौदहवें अध्यायका अठारहवाँ श्लोक)। इसमें भी

११७८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

वास्तवमें देखा जाय तो रजोगुणके बढ़नेपर जो मरता है, वह कर्मप्रधान मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है—‘रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्निषु जायते ’ (गीता १४।१५)। इन सबका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्यमात्र रजःप्रधान (रजोगुणकी प्रधानतावाला) है। रजःप्रधानवालोंमें जो सात्त्विक, राजस और तामस—तीन गुण होते हैं, उन तीनों गुणोंसे ही चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। इसलिये कर्म करना सबमें मुख्य होता है और इसीको लेकर मनुष्योंको कर्मयोनि कहा गया है तथा गीतामें भी चारों वर्णोंके कर्मोंके लिये ‘स्वभावज कर्म’, ‘स्वभावनियत कर्म’ आदि पद आये हैं। अतः शुद्धका परिचर्या अर्थात् सेवा करना ‘स्वभावज कर्म’ है, जिसमें उसे परिश्रम नहीं होता।

मनुष्यमात्र कर्मयोनि होनेपर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यमें विवेक-विचारका विशेष तारतम्य रहता है और शुद्धि भी रहती है; परन्तु शुद्धमें मोहकी प्रधानता रहनेसे उसमें विवेक बहुत दब जाता है। इस दृष्टिसे शुद्धके सेवा-कर्ममें विवेककी प्रधानता न होकर आज्ञापालनकी प्रधानता रहती है—‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा ’ (मानस २।३०१।२)। इसलिये चारों वर्णोंकी आज्ञाके अनुसार सेवा करना, सुख-सुविधा जुटा देना शुद्धके लिये स्वाभाविक होता है।

शुद्धोंके कर्म परिचर्यात्मक अर्थात् सेवास्वरूप होते हैं। उनके शारीरिक, सामाजिक, नागरिक, ग्रामणिक आदि सब-के-सब कर्म ठीक तरहसे सम्पन्न होते हैं, जिनसे चारों ही वर्णोंके जीवन-निर्वाहके लिये सुख-सुविधा, अनुकूलता और आवश्यकताकी पूर्ति होती है।

स्वाभाविक कर्मोंका तात्पर्य

चेतन जीवात्मा और जड़ प्रकृति—दोनोंका स्वभाव भिन्न-भिन्न है। चेतन स्वाभाविक ही निर्वाकार अर्थात् परिवर्तनरहित है और प्रकृति स्वाभाविक ही विकारी अर्थात् परिवर्तनशील है। अतः इन दोनोंका स्वभाव भिन्न-भिन्न होनेसे इनका सम्बन्ध स्वाभाविक नहीं है; किंतु चेतनने प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उस सम्बन्धकी सद्भावना कर ली है अर्थात् ‘सम्बन्ध है’ ऐसा मान लिया है। इसीको गुणोंका संग कहते हैं, जो जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ’ (गीता १३।२१)। इस संगके कारण, गुणोंके तारतम्यसे जीवका ब्राह्मणादि वर्णमें जन्म होता है। गुणोंके तारतम्यसे

जिस वर्णमें जन्म होता है, उन गुणोंके अनुसार ही उस वर्णके कर्म स्वाभाविक, सहज होते हैं; जैसे—ब्राह्मणके लिये शम, दम आदि; क्षत्रियके लिये शौर्य, तेज आदि; वैश्यके लिये खेती, गौरक्षा आदि और शुद्धके लिये सेवा—ये कर्म स्वतःस्वाभाविक होते हैं। तात्पर्य है कि चारों वर्णोंको इन कर्मोंको करनेमें परिश्रम नहीं होता; क्योंकि गुणोंके अनुसार स्वभाव और स्वभावके अनुसार उनके लिये कर्मोंका विधान है। इसलिये इन कर्मोंमें उनकी स्वाभाविक ही रुचि होती है। मनुष्य इन स्वाभाविक कर्मोंको जब अपने लिये अर्थात् अपने स्वार्थ, भोग और आरामके लिये करता है, तब वह उन कर्मोंसे बँध जाता है। जब उन्हीं कर्मोंको स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके निष्कामभावपूर्वक संसारके हितके लिये करता है, तब ‘कर्मयोग’ हो जाता है और उन्हीं कर्मोंसे सब संसारमें व्यापक परमात्माका पूजन करता है अथवा भगवत्परायण होकर केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म (जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि) करता है, तब वह ‘भक्तियोग’ हो जाता है। फिर प्रकृतिके गुणोंका सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जानेपर केवल एक परमात्मतत्त्व ही रह जाता है, जिसमें सिद्ध महापुरुषके स्वरूपकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रता, अखण्डता, निर्वाकारताकी अनुभूति रह जाती है। ऐसा होनेपर भी उसके शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा अपने-अपने वर्ण, आश्रमकी मर्यादाके अनुसार निलिप्ततापूर्वक शास्त्रविहित कर्म स्वाभाविक होते हैं, जो कि संसारमात्रके लिये आदर्श होते हैं। प्रभुकी तरफ आकृष्ट होनेसे प्रतिक्षण प्रेम बढ़ता रहता है, जो अनन्त आनन्दस्वरूप है।

जाति जन्मसे मानी जाय या कर्मसे ?

ऊँच-नीच योनियोंमें जितने भी शरीर मिलते हैं, वे सब गुण और कर्मके अनुसार ही मिलते हैं। गुण और कर्मके अनुसार ही मनुष्यका जन्म होता है; इसलिये मनुष्यकी जाति जन्मसे ही मानी जाती है। अतः स्थूलशरीरकी दृष्टिसे विवाह, भोजन आदि कर्म जन्मकी प्रधानतासे ही करने चाहिये अर्थात् अपनी जाति या वर्णके अनुसार ही भोजन, विवाह आदि कर्म होने चाहिये।

दूसरी बात, जिस प्राणीका सांसारिक भोग, धन, मान, आराम, सुख आदिका उद्देश्य रहता है, उसके लिये वर्णके अनुसार कर्तव्य-कर्म करना और वर्णकी मर्यादामें चलना आवश्यक हो जाता है। यदि वह वर्णकी मर्यादामें नहीं चलता,

श्लोक ४४ ]

  • साधक-संजीवनी *

११७९

तो उसका पतन हो जाता है१। परन्तु जिसका उद्देश्य केवल परमात्मा ही है, संसारके भोग आदि नहीं, उसके लिये सत्संग, स्वाध्याय, जप, ध्यान, कथा, कीर्तन, परस्पर विचार-विनिमय आदि भगवत्सम्बन्धी काम मुख्य होते हैं। तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्तिमें प्राणीके पारमार्थिक भाव, आचरण आदिकी मुख्यता है, जाति या वर्णकी नहीं।

तीसरी बात, जिसका उद्देश्य परमात्माकी प्राप्तिका है, वह भगवत्सम्बन्धी कार्योंको मुख्यतासे करते हुए भी वर्ण-आश्रमके अनुसार अपने कर्तव्य-कर्मोंको पूजन-बुद्धिसे केवल भगवत्प्रतीत्यर्थ ही करता है।

आगे छियालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बड़ी श्रेष्ठ बात बतायी है कि जिससे सम्पूर्ण संसार पैदा हुआ है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका ही लक्ष्य रखकर, उसके प्रीत्यर्थ ही पूजन-रूपसे अपने-अपने वर्णके अनुसार कर्म किये जायें। इसमें मनुष्यमात्रका अधिकार है। देवता, असुर, पशु, पक्षी आदिका स्वतः अधिकार नहीं है; परन्तु उनके लिये भी परमात्माकी तरफसे निषेध नहीं है। कारण कि सभी परमात्माका अंश होनेसे परमात्माकी प्राप्तिके सभी अधिकारी हैं। प्राणिमात्रका भगवान्पर पूरा अधिकार है। इससे भी यह सिद्ध होता है कि आपसके व्यवहारमें अर्थात् रोटी, बेटी और शरीर आदिके साथ बर्ताव करनेमें तो 'जन्म' की प्रधानता है और परमात्माकी प्राप्तिमें भाव, विवेक और 'कर्म' की प्रधानता है। इसी आशयको लेकर भागवतकारने कहा है कि जिस मनुष्यके वर्णको बतानेवाला जो लक्षण कहा गया है, वह यदि दूसरे वर्णवालेमें भी मिले तो उसे भी उसी वर्णका समझ लेना चाहिये२। अभिप्राय यह

है कि ब्राह्मणके शम-दम आदि जितने लक्षण हैं, वे लक्षण या गुण स्वाभाविक ही किसीमें हों तो जन्ममात्रसे नीचा होनेपर भी उसको नीचा नहीं मानना चाहिये। ऐसे ही महाभारतमें युधिष्ठिर और नहुषके संवादमें आया है कि जो शूद्र आचरणोंमें श्रेष्ठ है, उस शूद्रको शूद्र नहीं मानना चाहिये और जो ब्राह्मण ब्राह्मणोचित कर्मोंसे रहित है, उस ब्राह्मणको ब्राह्मण नहीं मानना चाहिये३ अर्थात् वहाँ कर्मोंकी ही प्रधानता ली गयी है, जन्मकी नहीं।

शास्त्रोंमें जो ऐसे वचन आते हैं, उन सबका तात्पर्य है कि कोई भी नीच वर्णवाला साधारण-से-साधारण मनुष्य अपनी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है, इसमें संदेहकी कोई बात नहीं है। इतना ही नहीं, वह उसी वर्णमें रहता हुआ शम, दम आदि जो सामान्य धर्म हैं, उनका सांगोपांग पालन करता हुआ अपनी श्रेष्ठताको प्रकट कर सकता है। जन्म तो पूर्वकर्मिक अनुसार हुआ है, इसमें वह बेचारा क्या कर सकता है? परन्तु वहाँ (नीच वर्णमें) रहकर भी वह अपनी नयी उन्नति कर सकता है। उस नयी उन्नतिमें प्रोत्साहित करनेके लिये ही शास्त्र-वचनोंका आशय मालूम देता है कि नीच वर्णवाला भी नयी उन्नति करनेमें हिम्मत न हारे। जो ऊँचे वर्णवाला होकर भी वर्णोचित काम नहीं करता, उसको भी अपने वर्णोचित काम करनेके लिये शास्त्रोंमें प्रोत्साहित किया है; जैसे—

'ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं शूद्रकामाय नेष्यते।'

(श्रीमद्भागवत ११।१७।४२)

जिन ब्राह्मणोंका खान-पान, आचरण सर्वथा भ्रष्ट है, उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये—ऐसा स्मृतिमें आया है४। परन्तु जिनके आचरण

१-आचारहीन न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिर्द्वैः॥ छन्दोस्येन मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः॥

(वसिष्ठस्मृति ६।३२)

'शिक्षा, कल्प, निरुक्त, छन्द, व्याकरण और ज्योतिष—इन छहों अंगोंसहित अध्ययन किये हुए वेद भी आचारहीन पुरुषको पवित्र नहीं करते। पंख पैदा होनेपर पक्षी जैसे अपने घोंसलेको छोड़ देता है, ऐसे ही मृत्युसमयमें आचारहीन पुरुषको वेद छोड़ देते हैं।'

२-यस्य यल्लक्षणं प्रोक्तं पुरो वर्णाभिध्वजकम्। यदयत्रापि दृश्यते तत् तेनैव विनिर्दिशेत्॥ (श्रीमद्भागवत ७।११।३५)

३-शूद्रे तु यद् भवेत्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते। न वै शूद्रे भवेच्छूद्रे ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः॥

यत्रैतल्लक्ष्यते सर्प वृत्तं स ब्राह्मणः स्मृतः। यत्रैतन भवेत् सर्पं तं शूद्रमिति निर्दिशेत्॥

(महाभारत, वनपर्व १८०।२५-२६)

४-पाषण्डिनो विकर्मस्था-बैडालव्रतिकाञ्छठात्। हेतुकान्बकवृत्तीश्च वाइमात्रेणापि नार्चयेत्॥

(मनुस्मृति ४।३०)

'पाखण्डिन, विरुद्ध कर्म करनेवाले, बैडालव्रती, शठ, हेतुवादी, बकवृत्ति ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर न करे।'

न वार्यपि प्रयच्छेत्तु बैडालव्रतिके द्विजे। न बकव्रतिके विप्रे नावेदविदि धर्मवित्॥

(मनुस्मृति ४।१९२)

'धर्मज्ञ गृहश्रमी बैडालव्रती, बकव्रती और वेदको नहीं जाननेवाले ब्राह्मणके लिये पानी भी न दे।'

११८०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

श्रेष्ठ हैं, जो भगवान् के भक्त हैं, उन ब्राह्मणोंकी भागवत आदि पुराणोंमें और महाभारत, रामायण आदि इतिहास-ग्रन्थोंमें बहुत महिमा गायी गयी है।

भगवान् का भक्त चाहे कितनी ही नीची जातिका क्यों न हो, वह भक्तिहीन विद्वान् ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है।*

ब्राह्मणको विराट् रूप भगवान् का मुख, क्षत्रियको हाथ, वैश्यको ऊरू (मध्यभाग) और शूद्रको पैर बताया गया है। ब्राह्मणको मुख बतानेका तात्पर्य है कि उनके पास ज्ञानका संग्रह है, इसलिये चारों वर्णोंको पढ़ाना, अच्छी शिक्षा देना और उपदेश सुनाना—यह मुखका ही काम है। इस दृष्टिसे ब्राह्मण ऊँचे माने गये।

क्षत्रियको हाथ बतानेका तात्पर्य है कि वे चारों वर्णोंकी शत्रुओंसे रक्षा करते हैं। रक्षा करना मुख्यरूपसे हाथोंका ही काम है; जैसे—शरीरमें फोड़ा-फुंसी आदि हो जाय तो हाथोंसे ही रक्षा की जाती है; शरीरपर चोट आती हो तो रक्षाके लिये हाथ ही आड़ देते हैं और अपनी रक्षाके लिये दूसरोंपर हाथोंसे ही चोट पहुँचायी जाती है; आदमी कहीं गिरता है तो पहले हाथ ही टिकते हैं। इसलिये क्षत्रिय हाथ हो गये। अराजकता फैल जानेपर तो जन, धन आदिकी रक्षा करना चारों वर्णोंका धर्म हो जाता है।

वैश्यको मध्यभाग कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पेटमें

अन्न, जल, औषध आदि डाले जाते हैं तो उनसे शरीरके सम्पूर्ण अवयवोंको खुराक मिलती है और सभी अवयव पुष्ट होते हैं, ऐसे ही वस्तुओंका संग्रह करना, उनका यातायात करना, जहाँ जिस चीजकी कमी हो वहाँ पहुँचाना, प्रजाको किसी चीजका अभाव न होने देना वैश्यका काम है। पेटमें अन्न-जलका संग्रह सब शरीरके लिये होता है और साथमें पेटको भी पुष्टि मिल जाती है; क्योंकि मनुष्य केवल पेटके लिये पेट नहीं भरता। ऐसे ही वैश्य केवल दूसरोंके लिये ही संग्रह करे, केवल अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मण आदिको दान देता है, क्षत्रियोंको टैक्स देता है, अपना पालन करता है और शूद्रोंको मेहनताना देता है। इस प्रकार वह सबका पालन करता है। यदि वह संग्रह नहीं करेगा, कृषि, गौरक्ष्य और वाणिज्य नहीं करेगा तो क्या देगा?

शूद्रको चरण बतानेका तात्पर्य है कि जैसे चरण सारे शरीरको उठाये फिरते हैं और पूरे शरीरकी सेवा चरणोंसे ही होती है, ऐसे ही सेवाके आधारपर ही चारों वर्ण चलते हैं। शूद्र अपने सेवा-कर्मके द्वारा सबके आवश्यक कार्योंकी पूर्ति करता है।

उपर्युक्त विवेचनमें एक ध्यान देनेकी बात है कि गीतामें चारों वर्णोंके उन स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन है, जो कर्म

  • (१) अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्। तेषुस्तपस्ते जुहुवुः सप्तुरायां ब्रह्मानुचूर्णम गुणन्ति ये ते॥ (श्रीमद्भग० ३।३३।७)

‘अहो! वह चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ है, जिसकी जीभके अग्रभागपर आपका नाम विराजता है। जो श्रेष्ठ पुरुष आपका नाम उच्चारण करते हैं, उन्होंने तप, हवन, तीर्थस्नान, सदाचारका पालन और वेदाध्ययन—सब कुछ कर लिया।’

(२) विप्राद् द्विषद्गुणयुतादरविन्दनाभपादरविन्दविमुखच्छवपचं वरिष्ठम्।

मन्ये तदपि तमनोवचनेहि तार्थप्राणं पुनाति स कुलं न तु भूमिमानः॥

(श्रीमद्भग० ७।१।१०)

‘मेरी समझसे बारह गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् कमलनाभके चरण-कमलोंसे विमुख हो तो वह चाण्डाल श्रेष्ठ है, जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राणोंको भगवान् के अर्पण कर दिया है; क्योंकि वह चाण्डाल तो अपने कुलतकको पवित्र कर देता है; परन्तु बड़प्पनका अभिमान रखनेवाला भगवद्विमुख ब्राह्मण अपनेको भी पवित्र नहीं कर सकता।’

(३) चाण्डालोऽपि मुनेः श्रेष्ठो विष्णुभक्तिपरायणः। विष्णुभक्तिविहीनस्तु द्विजोऽपि श्वपचोऽधमः॥

(पद्मपुराण)

‘हरिभक्तिमें लीन रहनेवाला चाण्डाल भी मुनिसे श्रेष्ठ है, और हरिभक्तिसे रहित ब्राह्मण चाण्डालसे भी अधम है।’

(४) अवैष्णवाद् द्विजाद् विप्र चाण्डालो वैष्णवो वरः॥ सगणः श्वपचो मुक्तो ब्राह्मणो नरकं ब्रजेत्।

(ब्रह्मवैवर्त्त०, ब्रह्म० ११।३९)

‘अवैष्णव ब्राह्मणसे वैष्णव चाण्डाल श्रेष्ठ है; क्योंकि वह वैष्णव चाण्डाल अपने बन्धुगणोंसहित भव-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और वह अवैष्णव ब्राह्मण नरकमें पड़ता है।’

(५) न शूद्रा भगवद्भक्ता विप्रा भागवताः स्मृताः। सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये ह्यभक्ता जनार्दने॥ (महाभारत)

‘यदि भगवद्भक्त शूद्र है तो वह शूद्र नहीं, परमश्रेष्ठ ब्राह्मण है। वास्तवमें सभी वर्णोंमें शूद्र वह है, जो भगवान्की भक्तिसे रहित है।’

श्लोक ४४ ]

  • साधक-संजीवनी *

११८१

स्वतः होते हैं अर्थात् उनको करनेमें अधिक परिश्रम नहीं पड़ता। चारों वर्णोंके लिये और भी दूसरे कर्मोंका विधान है, उनको स्मृति-ग्रन्थोंमें देखना चाहिये और उनके अनुसार अपने आचरण बनाने चाहिये(गीता—सोलहवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)।

वर्तमानमें चारों वर्णोंमें गड़बड़ी आ जानेपर भी यदि चारों वर्णोंके समुदायोंको इकट्ठा करके अलग-अलग समुदायमें देखा जाय तो ब्राह्मण-समुदायमें शम, दम आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे, उतने क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-समुदायमें नहीं मिलेंगे। क्षत्रिय-समुदायमें शौर्य, तेज आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे, उतने ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र-समुदायमें नहीं मिलेंगे। वैश्य-समुदायमें व्यापार करना, धनका उपार्जन करना, धनको पचना (धनका भभका ऊपरसे न दीखने देना) आदि गुण जितने अधिक मिलेंगे, उतने ब्राह्मण, क्षत्रिय और शूद्र-समुदायमें नहीं मिलेंगे। शूद्र-समुदायमें सेवा करनेकी प्रवृत्ति जितनी अधिक मिलेगी, उतनी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य-समुदायमें नहीं मिलेगी। तात्पर्य यह है कि आज सभी वर्ण मर्यादारहित और उच्छृंखल होनेपर भी उनके स्वभावज कर्म उनके समुदायोंमें विशेषतासे देखनेमें आते हैं अर्थात् यह चीज व्यक्तिगत न दीखकर समुदायगत देखनेमें आती है।

जो लोग शास्त्रके गहरे रहस्यको नहीं जानते, वे कह देते हैं कि ब्राह्मणोंके हाथमें कलम रही, इसलिये उन्होंने 'ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ है' ऐसा लिखकर ब्राह्मणोंको सर्वोच्च कह दिया। जिनके पास राज्य था, उन्होंने ब्राह्मणोंसे कहा—क्यों महाराज! हमलोग कुछ नहीं हैं क्या? तो ब्राह्मणोंने कह दिया—नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं। आपलोग भी हैं, आपलोग दो नम्बरमें हैं। वैश्योंने ब्राह्मणोंसे कहा—क्यों महाराज! हमारे बिना कैसे जीविका चलेगी आपकी? ब्राह्मणोंने कहा—हाँ, हाँ, आपलोग तीसरे नम्बरमें हैं। जिनके पास न राज्य था, न धन था, वे ऊँचे उठने लगे तो ब्राह्मणोंने कह दिया—आपके भाग्यमें राज्य और धन लिखा नहीं है। आपलोग तो इन ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्योंकी सेवा करो। इसलिये चौथे नम्बरमें आपलोग हैं। इस तरह सबको भुलावेमें डालकर विद्या, राज्य और धनके प्रभावसे अपनी एकता करके चौथे वर्णको पददलित कर दिया—यह

लिखनेवालोंका अपना स्वार्थ और अभिमान ही है।

इसका समाधान यह है कि ब्राह्मणोंने कहीं भी अपने ब्राह्मण-धर्मके लिये ऐसा नहीं लिखा है कि ब्राह्मण सर्वोपरि हैं, इसलिये उनको बड़े आरामसे रहना चाहिये, धन सम्पत्तिसे युक्त होकर मौज करनी चाहिये इत्यादि, प्रत्युत ब्राह्मणोंके लिये ऐसा लिखा है कि उनको त्याग करना चाहिये, कष्ट सहना चाहिये; तपश्चर्या करनी चाहिये। गृहस्थमें रहते हुए भी उनको धन-संग्रह नहीं करना चाहिये, अन्नका संग्रह भी थोड़ा ही होना चाहिये—कुम्भीधान्य अर्थात् एक घड़ा भरा हुआ अनाज हो, लौकिक भोगोंमें आसक्ति नहीं होनी चाहिये, और जीवन-निर्वाहके लिये किसीसे दान भी लिया जाय तो उसका काम करके अर्थात् यज्ञ, होम, जप, पाठ आदि करके ही लेना चाहिये। गोदान आदि लिया जाय तो उसका प्रायश्चित्त करना चाहिये।

यदि कोई ब्राह्मणको श्राद्धका निमन्त्रण देना चाहे तो वह श्राद्धके पहले दिन दे, जिससे ब्राह्मण उसके पितरोंका अपनेमें आवाहन करके रात्रिमें ब्रह्मचर्य और संयमपूर्वक रह सके। दूसरे दिन वह यजमानके पितरोंका पिण्डदान, तर्पण ठीक विधि-विधानसे करवाये। उसके बाद वहाँ भोजन करे। निमन्त्रण भी एक ही यजमानका स्वीकार करे और भोजन भी एक ही घरका करे। श्राद्धका अन्न खानेके बाद गायत्री-जप आदि करके शुद्ध होना चाहिये। दान लेना, श्राद्धका भोजन करना ब्राह्मणके लिये ऊँचा दर्जा नहीं है। ब्राह्मणका ऊँचा दर्जा त्यागमें है। वे केवल यजमानके पितरोंका कल्याण करनेकी भावनासे ही श्राद्धका भोजन और दक्षिणा स्वीकार करते हैं, स्वार्थकी भावनासे नहीं; अतः यह भी उनका त्याग ही है।

ब्राह्मणोंने अपनी जीविकाके लिये ऋत, अमृत, मृत, सत्यानृत और प्रमृत—ये पाँच वृत्तियाँ बतायी हैं*—

(१) ऋत-वृत्ति सर्वोच्च वृत्ति मानी गयी है। इसको शिलोञ्छ या कपोत-वृत्ति भी कहते हैं। खेती करनेवाले खेतमेंसे धान काटकर ले जायँ, उसके बाद वहाँ जो अन्न (ऊमी, सिट्टा आदि) पृथ्वीपर गिरा पड़ा हो, वह भूदेवों (ब्राह्मणों) का होता है; अतः उनको चुनकर अपना निर्वाह करना 'शिलोञ्छवृत्ति' है अथवा धान्यमण्डीमें जहाँ धान्य

  • ऋतामृताभ्यां जीवेत्तु मृतेन प्रमृतेन वा। सत्यानृताभ्यामपि वा न श्वबृत्त्या कदाचन ॥ (मनुस्मृति ४।४)

‘ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृत—इनमेंसे किसी भी वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करे; परन्तु श्ववृत्ति अर्थात् सेवावृत्तिसे कभी भी जीवन-निर्वाह न करे।’

१८२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

तीला जाता है, वहाँ पृथ्वीपर गिरे हुए दाने भूदेवीके होते हैं; अतः उनको चुनकर जीवन-निर्वाह करना 'कपीतवृत्ति' है।

(२) बिना याचना किये और बिना इशारा किये कोई यजमान आकर देता है तो निर्वाहमात्रकी वस्तु लेना 'अमृत-वृत्ति' है। इसको 'अयाचितवृत्ति' भी कहते हैं।

(३) सुबह भिक्षाके लिये गाँवमें जाना और लोगोंको वार, तिथि, मुहूर्त आदि बताकर (इस रूपमें काम करके) भिक्षामें जो कुछ मिल जाय, उसीसे अपना जीवन-निर्वाह करना 'मृत-वृत्ति' है।

(४) व्यापार करके जीवन-निर्वाह करना 'सत्यानृत-वृत्ति' है।

(५) उपर्युक्त चारों वृत्तियोंसे जीवन-निर्वाह न हो तो खेती करे, पर वह भी कठोर विधि-विधानसे करे; जैसे—एक बैलसे हल न चलाये, धूपके समय हल न चलाये आदि, यह 'प्रमृत-वृत्ति' है।

उपर्युक्त वृत्तियोंमेंसे किसी भी वृत्तिसे निर्वाह किया जाय, उसमें 'पंचमहायज्ञ, अतिथि-सेवा करके यज्ञशेष भोजन करना चाहिये'।

श्रीमद्भगवद्गीतापर विचार करते हैं तो ब्राह्मणके लिये पालनीय जो नौ स्वाभाविक धर्म बताये गये हैं, उनमें जीविका पैदा करनेवाला एक भी धर्म नहीं है। क्षत्रियके लिये सात स्वाभाविक धर्म बताये हैं। उनमें युद्ध करना और शासन करना—ये दो धर्म कुछ जीविका पैदा करनेवाले हैं। वैश्यके लिये तीन धर्म बताये हैं—खेती, गोरक्षा और व्यापार; ये तीनों ही जीविका पैदा करनेवाले हैं। शूद्रके लिये एक सेवा ही धर्म बताया है, जिसमें पैदा-ही-पैदा होती है। शूद्रके लिये खान-पान, जीवन-निर्वाह आदिमें भी बहुत छूट दी गयी है।

भगवान्ने 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः' (गीता १८।४५) पदोंसे कितनी विचित्र बात बतायी है कि शम, दम आदि नौ धर्मोंके पालनसे ब्राह्मणका जो कल्याण होता है, वही कल्याण शौर्य, तेज आदि सात धर्मोंके पालनसे क्षत्रियका होता है, वही कल्याण खेती, गोरक्षा और व्यापारके पालनसे वैश्यका होता है और वही

कल्याण केवल सेवा करनेसे शूद्रका हो जाता है।

आगे भगवान्ने एक विलक्षण बात बतायी है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अपने-अपने वर्णोचित कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन करके परम सिद्धिको प्राप्त हो जाते हैं—'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः' (१८।४६)। वास्तवमें कल्याण वर्णोचित कर्मोंसे नहीं होता, प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक पूजनसे ही होता है। शूद्रका तो स्वाभाविक कर्म ही परिचर्यात्मक अर्थात् पूजनरूप है; अतः उसका पूजनके द्वारा पूजन होता है अर्थात् उसके द्वारा दुगुनी पूजा होती है! इसलिये उसका कल्याण जितनी जल्दी होगा, उतनी जल्दी ब्राह्मण आदिका नहीं होगा।

शास्त्रकारोंने उद्धार करनेमें छोटेको ज्यादा प्यार दिया है; क्योंकि छोटा प्यारका पात्र होता है और बड़ा अधिकारका पात्र होता है। बड़ेपर चिन्ता-फिक्र ज्यादा रहती है, छोटेपर कुछ भी भार नहीं रहता। शूद्रको भाररहित करके उसकी जीविका बतायी गयी है और प्यार भी दिया गया है।

वास्तवमें देखा जाय तो जो वर्ण-आश्रममें जितना ऊँचा होता है, उसके लिये शास्त्रोंके अनुसार उतने ही कठिन नियम होते हैं। उन नियमोंका सांगोपांग पालन करनेमें कठिनता अधिक मालूम देती है। परन्तु जो वर्ण-आश्रममें नीचा होता है, उसका कल्याण सुगमतासे हो जाता है। इस विषयमें विष्णुपुराणमें एक कथा आती है—एक बार बहुत-से ऋषि-मुनि मिलकर श्रेष्ठताका निर्णय करनेके लिये भगवान् वेदव्यासजीके पास गये। व्यासजीने सबको आदरपूर्वक बिठाया और स्वयं गंगामें स्नान करने चले गये। गंगामें स्नान करते हुए उन्होंने कहा—'कलियुग, तुम धन्य हो! सित्रयो, तुम धन्य हो! शूद्रो, तुम धन्य हो! जब व्यासजी स्नान करके ऋषियोंके पास आये तो ऋषियोंने कहा—महाराज! आपने कलियुग, सित्रयो और शूद्रोंको धन्यवाद कैसे दिया!' तो उन्होंने कहा कि कलियुगमें अपने धर्मका पालन करनेसे सित्रयो और शूद्रोंका कल्याण जल्दी और सुगमतापूर्वक हो जाता है।

यहाँ एक और बात सोचनेकी है कि जो अपने स्वार्थका

  • ब्राह्मण और क्षत्रियके लिये यह निषेध आया है कि वह श्ववृत्ति अर्थात् सेवावृत्ति कभी न करे—'न श्ववृत्त्या कदाचन' (मनु० ४।४), 'सेवा श्ववृत्तिरान्ध्याता तस्मात्तौ परिवर्जयेत्' (मनु० ४।६)। वास्तवमें सेवावृत्तिका ही निषेध किया गया है, सेवाका नहीं। माता-पिताकी तरह वे नीच-से-नीच वर्णकी नीची-से-नीची सेवा कर सकते हैं। नीच वर्णोंकी सेवा करनेमें उनकी महत्ता ही है। इसलिये वृत्तिकी ही निन्दा की गयी है। मान, बड़ाई, उपार्जन आदि स्वार्थके लिये सेवा करनेकी निन्दा है, स्वार्थका त्याग करके सेवा करनेको निन्दा नहीं है।

श्लोक ४५ ]

  • साधक-संजीवनी *

११८३

काम करता है, वह समाजमें और संसारमें आदरका पात्र नहीं होता। समाजमें ही नहीं, घरमें भी जो व्यक्ति पेटू और चटटू होता है, उसकी दूसरे निन्दा करते हैं। ब्राह्मणोंने स्वार्थ-दृष्टिसे अपने ही मुँहसे अपनी (ब्राह्मणोंकी) प्रशंसा, श्रेष्ठताकी बात नहीं कही है। उन्होंने ब्राह्मणोंके लिये त्याग ही बताया है। सात्त्विक मनुष्य अपनी प्रशंसा नहीं करते, प्रत्युत दूसरोंकी प्रशंसा, दूसरोंका आदर करते हैं। तात्पर्य है कि ब्राह्मणोंने कभी अपने स्वार्थ और अभिमानकी बात नहीं कही। यदि वे स्वार्थ और अभिमानकी बात कहते तो वे इतने आदरणीय नहीं होते, संसारमें और शास्त्रोंमें आदर न पाते। वे जो आदर पाते हैं, वह त्यागसे ही पाते हैं।

इस प्रकार मनुष्यको शास्त्रोंका गहरा अध्ययन करके उपर्युक्त सभी बातोंको समझना चाहिये और ऋषि-मुनियोंपर, शास्त्रकारोंपर झूठा आक्षेप नहीं करना चाहिये।

सम्बन्ध—स्वभावज कर्मोंका वर्णन करनेका प्रयोजन क्या है—इसको अब आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।

स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥

स्वे, स्वे= अपने-अपने(परमात्मा)-कोसिद्धिम्= सिद्धिको
कर्मणि= कर्ममेंलभते= प्राप्त करविन्दति
अभिरतः= प्रीतिपूर्वक लगा हुआस्वकर्मनिरतः= अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्यतत्
नरः= मनुष्ययथा= जिस प्रकारशृणु
संसिद्धिम्= सम्यक् सिद्धि

व्याख्या—‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः’ —गीताके अध्ययनसे ऐसा मालूम होता है कि मनुष्यकी जैसी स्वतःसिद्ध स्वाभाविक प्रकृति (स्वभाव) है, उसमें अगर वह कोई नयी उलझन पैदा न करे, राग-द्वेष न करे तो वह प्रकृति उसका स्वाभाविक ही कल्याण कर दे। तात्पर्य है कि प्रकृतिके द्वारा प्रवाहरूपसे अपने-आप होनेवाले जो स्वाभाविक कर्म हैं, उनका स्वार्थ-त्यागपूर्वक प्रीति और तत्परतासे आचरण करे; परन्तु कर्मोंके प्रवाहके साथ न राग हो, न द्वेष हो और न फलेच्छा हो। राग-द्वेष और फलेच्छासे रहित होकर क्रिया करनेसे ‘करनेका वेग’ शान्त हो जाता है और कर्ममें आसक्ति न होनेसे नया वेग पैदा नहीं होता। इससे प्रकृतिके पदार्थों और क्रियाओंके साथ निलिप्तता (असंगता) आ जाती है। निलिप्तता होनेसे प्रकृतिकी क्रियाओंका प्रवाह

ऊँच-नीच वर्णोंमें प्राणियोंका जन्म मुख्यरूपसे गुणों और कर्मोंके अनुसार होता है—‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ’ (गीता ४।१३); परन्तु ऋणानुबन्ध, शाप, वरदान, संग आदि किसी कारणविशेषसे भी ऊँच-नीच वर्णोंमें जन्म हो जाता है। उन वर्णोंमें जन्म होनेपर भी वे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार ही आचरण करते हैं। यही कारण है कि ऊँचे वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी उनके नीच आचरण देखे जाते हैं, जैसे धनुष्यकारी आदि; और नीच वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी वे महापुरुष होते हैं, जैसे विदुर, कबीर, रैदास आदि।

आज जिस समुदायमें जातिगत, कुलपरम्परागत, समाजगत और व्यक्तिगत जो भी शास्त्र-विपरीत दोष आये हैं, उनको अपने विवेक-विचार, सत्संग, स्वाध्याय आदिके द्वारा दूर करके अपनेमें स्वच्छता, निर्मलता, पवित्रता लानी चाहिये, जिससे अपने मनुष्यजन्मका ध्येय सिद्ध हो सके।

स्वाभाविक ही चलता रहता है और उनके साथ अपना कोई सम्बन्ध न रहनेसे साधककी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, जो कि प्राणिमात्रकी स्वतः-स्वाभाविक है। अपने स्वरूपमें स्थिति होनेपर उसका परमात्माकी तरफ स्वाभाविक आकर्षण हो जाता है। परन्तु यह सब होता है कर्मोंमें ‘अभिरति’ होनेसे, आसक्ति होनेसे नहीं। कर्मोंमें एक तो ‘अभिरति’ होती है और एक ‘आसक्ति’ होती है। अपने स्वाभाविक कर्मोंको केवल दूसरोंके हितके लिये तत्परता और उत्साहपूर्वक करनेसे अर्थात् केवल देनेके लिये कर्म करनेसे मनमें जो प्रसन्नता होती है, उसका नाम ‘अभिरति’ है। फलकी इच्छासे कुछ करना अर्थात् कुछ पानेके लिये कर्म करना ‘आसक्ति’ है। कर्मोंमें अभिरतिसे कल्याण होता है और आसक्तिसे बन्धन होता है।

११८४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

इस प्रकरणके 'स्वे स्वे कर्मणि'; 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य'; 'स्वभावनियतं कर्म'; 'सहजं कर्म' आदि पदोंमें 'कर्म' शब्द एकवचनमें आया है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य प्रीति और तत्परतापूर्वक चाहे एक कर्म करे, चाहे अनेक कर्म करे, उसका उद्देश्य केवल परमात्मप्राप्ति होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक ही होती है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको लेकर मनुष्य जितने भी कर्म करता है, वे सब कर्म अन्तमें उसी उद्देश्यमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् उसी उद्देश्यकी पूर्ति करनेवाले हो जाते हैं। जैसे गंगाजी हिमालयसे निकलकर गंगासागरतक जाती हैं तो नद, नदियाँ, झरने, सरोवर, वर्षाका जल—ये सभी उसकी धारामें मिलकर गंगासे एक हो जाते हैं, ऐसे ही उद्देश्यवालेके सभी कर्म उसके उद्देश्यमें मिल जाते हैं। परन्तु जिसकी कर्मोंमें आसक्ति है, वह एक कर्म करके अनेक फल चाहता है अथवा अनेक कर्म करके एक फल चाहता है; अतः उसका उद्देश्य एक परमात्माकी प्राप्तिका न होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक नहीं होती (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)।

'स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु'— अपने कर्मोंमें प्रीतिपूर्वक तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य परमात्माको जैसे प्राप्त होता है, वह सुनो अर्थात् कर्ममात्र परमात्मप्राप्तिका साधन है, इस बातको सुनो और सुन करके ठीक तरहसे समझो।

विशेष बात

मालिककी सुख-सुविधाकी सामग्री जुटा देना, मालिकके दैनिक कार्योंमें अनुकूलता उपस्थित कर देना आदि कार्य तो वेतन लेनेवाला नौकर भी कर सकता है और करता भी है। परन्तु उसमें 'क्रिया' की (कि इतना काम करना है) और 'समय' की (कि इतने घंटे काम करना है) प्रधानता रहती है। इसलिये वह काम-धंधा 'सेवा' नहीं बन पाता। यदि मालिकका वह काम-धंधा आदरपूर्वक सेव्यबुद्धिसे, महत्त्वबुद्धिसे किया जाय तो वह 'सेवा' हो जाता है।

सेव्यबुद्धि, महत्त्वबुद्धि चाहे जन्मके सम्बन्धसे हो, चाहे विद्याके सम्बन्धसे; चाहे वर्ण-आश्रमके सम्बन्धसे हो; चाहे योग्यता, अधिकार, सदगुण-सदाचारके सम्बन्धसे। जहाँ महत्त्वबुद्धि हो जाती है, वहाँ सेव्यको सुख-आराम कैसे मिले? सेव्यकी प्रसन्नता किस बातमें है? सेव्यका

क्या रख है? क्या सचि है?—ऐसे भाव होनेसे जो भी काम किया जाय, वह 'सेवा' हो जाता है।

सेव्यका वही काम पूजाबुद्धि, भगवद्वुद्धि, गुरुबुद्धि आदिसे किया जाय और पूज्यभावसे चन्दन लगाया जाय, पुष्प चढ़ाये जायें, माला पहनायी जाय, आरती की जाय, तो वह काम 'पूजन' हो जाता है। इससे सेव्यके चरणस्पर्श अथवा दर्शनमात्रसे चितकी प्रसन्नता, हृदयकी गद्गदता, शरीरका रोमांचित होना आदि होते हैं और सेव्यके प्रति विशेष भाव प्रकट होते हैं। उससे सेव्यकी सेवामें कुछ शिथिलता आ सकती है; परन्तु भावोंके बढ़नेपर अन्तःकरण-शुद्धि, भगवत्प्रेम, भगवदर्शन आदि हो जाते हैं।

मालिकका समय-समयपर काम-धंधा करनेसे नौकरको पैसे मिल जाते हैं और सेव्यकी सेवा करनेसे सेवकको अन्तःकरण-शुद्धिपूर्वक भगवत्प्राप्ति हो जाती है; परन्तु पूजाभावके बढ़नेसे तो पूजकको तत्काल भगवत्प्राप्ति हो जाती है। तात्पर्य है कि चरणचौपी तो नौकर भी करता है, पर उसको सेवाका आनन्द नहीं मिलता; क्योंकि उसकी दृष्टि पैसोंपर रहती है। परन्तु जो सेवाबुद्धिसे चरणचौपी करता है, उसको सेवामें विशेष आनन्द मिलता है; क्योंकि उसकी दृष्टि सेव्यके सुखपर रहती है। पूजामें तो चरण छूनेमात्रसे शरीर रोमांचित हो जाता है और अन्तःकरणमें एक पारमार्थिक आनन्द होता है। उसकी दृष्टि पूज्यकी महतापर और अपनी लघुतापर रहती है। ऐसे देखा जाय तो नौकरके काम-धंधेसे मालिकको आराम मिलता है, सेवामें सेव्यको विशेष आराम तथा सुख मिलता है और पूजामें पूजकके भावसे पूज्यको प्रसन्नता होती है। पूजामें शरीरके सुख-आरामकी प्रधानता नहीं होती।

अपने स्वभावज कर्मोंके द्वारा पूजा करनेसे पूजकका भाव बढ़ जाता है तो उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरसे होनेवाली (चेष्टा, चिन्तन, समाधि आदि) सभी छोटी-बड़ी क्रियाएँ सब प्राणियोंमें व्यापक परमात्माकी पूजन-सामग्री बन जाती है। उसकी दैनिकचर्चा अर्थात् खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ भी पूजन-सामग्री बन जाती हैं।

जैसे ज्ञानयोगीका 'मैं कुछ भी नहीं करता हूँ' यह भाव हरदम बना रहता है, ऐसे ही अनेक प्रकारकी क्रियाएँ करनेपर भी भक्तके भीतर एक भगवद्भाव हरदम बना रहता है। उस भावकी गाढ़तामें उसका अहंभाव भी छूट जाता है।

श्लोक ४६ ]

  • साधक-संजीवनी *

११८५

परिशिष्ट भाव —अपने वर्णके सिवाय जिसने जो-जो कर्म स्वीकार कर लिये हैं, वे सब भी ‘स्वे स्वे कर्मणि’ के अन्तर्गत लेने चाहिये। जैसे, मनुष्य अपनेको वकील, नौकर, अध्यापक अथवा चिकित्सक आदि मानता है तो उसके कर्तव्यका प्रेमपूर्वक, आदरपूर्वक निःस्वार्थभावसे ठीक-ठीक पालन करना भी उसके लिये ‘स्वकर्म’ है।

मनुष्य स्वार्थबुद्धि, पक्षपात, कामना आदिको लेकर कर्म करता है तो वह ‘आसक्ति’ होती है। वह प्रेमपूर्वक, निष्कामभावसे और लोकहितके लिये कर्म करता है तो वह ‘अभिरति’ होती है। भगवान्ने कर्मोंमें ‘आसक्ति’ का निषेध किया है—‘न कर्मस्वनुषज्जते ’ (गीता ६।४)। मनुष्य जाति आदिको लेकर न अपनेको ऊँचा समझे, न नीचा समझे, प्रत्युत घड़ीके पुर्जेकी तरह अपनी जगह ठीक कर्तव्यका पालन करे और दूसरेकी निन्दा, तिरस्कार न करे तथा अपना अभिमान भी न करे, तब ‘अभिरति’ होगी।

वास्तवमें ‘कर्म’ की प्रधानता नहीं है, प्रत्युत ‘भाव’ की प्रधानता है। कर्ताका भाव शुद्ध होगा तो वह कल्याण करनेवाला हो जायगा, चाहे कर्ता किसी वर्णका हो। ‘कर्म’ में वर्णकी मुख्यता है और ‘भाव’ में दैवी अथवा आसुरी-सम्पत्तिकी मुख्यता है। अतः दैवी-आसुरी-सम्पत्ति किसी वर्णको लेकर नहीं होती, प्रत्युत सबमें हो सकती है। दैवी-सम्पत्ति मोक्ष देनेवाली और आसुरी-सम्पत्ति बाँधनेवाली है। इसलिये अगर ब्राह्मणमें भी अभिमान हो तो वह आसुरी-सम्पत्तिवाला हो जायगा अर्थात् उसका पतन हो जायगा—

नीच नीच सब तर गये, राम भजन लवलीन। जाति के अभिमान से, डूबे सभी कुलीन॥

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥

यतः= जिस परमात्मासेइदम्= यहअभ्यर्च्य= पूजन करके
भूतानाम्= सम्पूर्ण प्राणियोंकीसर्वम्= सम्पूर्ण संसारमानवः= मनुष्यमात्र
प्रवृत्तिः= प्रवृत्ति (उत्पत्ति)ततम्= व्याप्त है,सिद्धिम्= सिद्धिको
होती है (और)तम्= उस परमात्माकाविन्दति= प्राप्त हो
येन= जिससेस्वकर्मणा= अपने कर्मके द्वाराजाता है।

व्याख्या —‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्’—जिस परमात्मासे संसार पैदा हुआ है, जिससे सम्पूर्ण संसारका संचालन होता है, जो सबका उत्पादक, आधार और प्रकाशक है और जो सबमें परिपूर्ण है अर्थात् जो परमात्मा अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्तिसे पहले भी था, जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके लीन होनेपर भी रहेगा और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रहते हुए भी जो रहता है तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है, उसी परमात्माका अपने-अपने स्वभावज (वर्णाचित स्वाभाविक) कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये।

‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ —मनुस्मृतिमें ब्राह्मणोंके लिये छः कर्म बताये गये हैं—स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना, स्वयं यज्ञ करना और दूसरोंसे यज्ञ करना तथा

स्वयं दान लेना और दूसरोंको दान देना१ (इनमें पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना—ये तीन कर्म जीविकाके हैं और पढ़ना, यज्ञ करना और दान देना—ये तीन कर्तव्यकर्म हैं)। उपर्युक्त शास्त्रनियत छः कर्म और शम-दम आदि नौ स्वभावज कर्म तथा इनके अतिरिक्त खाना-पीना, उठना-बैठना आदि जितने भी कर्म हैं, उन कर्मोंके द्वारा ब्राह्मण चारों वर्णोंमें व्याप्त परमात्माका पूजन करें। तात्पर्य है कि परमात्माकी आज्ञासे, उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवद्वुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।

ऐसे ही क्षत्रियोंके लिये पाँच कर्म बताये गये हैं—प्रजाकी रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन करना और विषयोंमें आसक्त न होना१। इन पाँच कर्मों तथा शौर्य,

१-अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ (मनु० १।८८)

२-प्रजानां रक्षणं दानमिच्छाध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः ॥ (मनु० १।८९)

११८६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

तेज आदि सात स्वभावज कर्मोंके द्वारा और खाना-पीना आदि सभी कर्मोंके द्वारा क्षत्रिय सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें।

वैश्य यज्ञ करना, अध्ययन करना, दान देना और व्याज लेना तथा कृषि, गौरक्ष्य और वाणिज्य—इन शास्त्र-नियत और स्वभावज कर्मोंके द्वारा और शूद्र शास्त्रविहित तथा स्वभावज कर्म सेवा के द्वारा सर्वत्र व्यापक परमात्माका पूजन करें अर्थात् अपने शास्त्रविहित, स्वभावज और खाना-पीना, सोना-जागना आदि सभी कर्मोंके द्वारा भगवान्की आज्ञासे, भगवान्की प्रसन्नताके लिये, भगवद्वृद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।

शास्त्रोंमें मनुष्यके लिये अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जो-जो कर्तव्य-कर्म बताये गये हैं, वे सब संसाररूप परमात्माकी पूजाके लिये ही हैं। अगर साधक अपने कर्मोंके द्वारा भावसे उस परमात्माका पूजन करता है, तो उसकी मात्र क्रियाएँ परमात्माकी पूजा हो जाती हैं। जैसे, पितामह भीष्मने (अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए) अर्जुनके सारथि बने हुए भगवान्की अपने युद्धरूप कर्मोंके द्वारा (बाणोंसे) पूजा की। भीष्मके बाणोंसे भगवान्का कवच टूट गया, जिससे भगवान्के शरीरमें घाव हो गये और हाथकी अंगुलियोंमें छोटे-छोटे बाण लगनेसे अंगुलियोंसे लगाम पकड़ना कठिन हो गया। ऐसी पूजा करके अन्तसमयमें शर-शय्यापर पड़े हुए पितामह भीष्म अपने बाणोंद्वारा पूजित भगवान्का ध्यान करते हैं—‘युद्धमें मेरे तीखे बाणोंसे जिनका कवच टूट गया है, जिनकी त्वचा विच्छिन्न हो गयी है, परिश्रमके कारण जिनके मुखपर स्वेदकण सुशोभित हो रहे हैं, घोड़ोंकी टापोंसे उड़ी हुई रज जिनकी सुन्दर अलकावलियोंमें लगी हुई है, इस प्रकार बाणोंसे अलंकृत भगवान् कृष्णमें मेरे मन-बुद्धि लग जायँ।’

लौकिक और पारमार्थिक कर्मोंके द्वारा उस परमात्माका पूजन तो करना चाहिये, पर उन कर्मोंमें और उनको करनेके करणों-उपकरणोंमें ममता नहीं रखनी चाहिये। कारण कि जिन वस्तुओं, क्रियाओं आदिमें ममता हो जाती

है, वे सभी चीजें अपवित्र हो जानेसे पूजा-सामग्री नहीं रहती (अपवित्र फल, फूल आदि भगवान्पर नहीं चढ़ते)। इसलिये ‘मेरे पास जो कुछ है, वह सब उस सर्वव्यापक परमात्माका ही है, मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्तिसे उनका पूजन करना है’—इस भावसे जो कुछ किया जाय, वह सब-का-सब परमात्माका पूजन हो जाता है। इसके विपरीत उन क्रियाओं, वस्तुओं आदिको मनुष्य जितनी अपनी मान लेता है, उतनी ही वे (अपनी मानी हुई) क्रियाएँ, वस्तुएँ (अपवित्र होनेसे) परमात्माके पूजनसे वंचित रह जाती हैं।

‘सिद्धि विन्दति मानवः’—सिद्धिको प्राप्त होनेका तात्पर्य है कि अपने कर्मोंसे परमात्माका पूजन करनेवाला मनुष्य प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित होकर स्वतः अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है। स्वरूपमें स्थित होनेपर पहले जो परमात्माके समर्पण किया था, उस संस्कारके कारण उसका प्रभुमें अनन्यप्रेम जाग्रत् हो जाता है। फिर उसके लिये कुछ भी पाना बाकी नहीं रहता।

यहाँ ‘मानवः’ पदका तात्पर्य केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—इन वर्णों और आश्रमों आदिसे ही नहीं है, प्रत्युत हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, पारसी, यहूदी आदि सभी जातियों और सम्प्रदायोंसे है। किसी भी जाति, सम्प्रदाय आदिके कोई भी व्यक्ति क्यों न हो, सब-के-सब ही परमात्माके पूजनके अधिकारी हैं; क्योंकि सभी परमात्माके अपने हैं। जैसे घरमें स्वभाव आदिके भेदसे अनेक तरहके बालक होते हैं, पर उन सबकी माँ एक ही होती है और उन बालकोंकी तरह-तरहकी जितनी भी क्रियाएँ होती हैं, उन सब क्रियाओंसे माँ प्रसन्न होती रहती है; क्योंकि उन बालकोंमें माँका अपनापन होता है। ऐसे ही भगवान्के सम्मुख हुए मनुष्योंकी सभी क्रियाओंको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं और प्रसन्न हो जाते हैं।

इसी अध्यायके सतरवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि कोई भी मनुष्य हम दोनोंके संवादका अध्ययन

१-पशूनां रक्षणं दानमिष्याध्ययनमेव च। वाणिज्यं कुर्याद् च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ (मनु० १।१०)

२-एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत्। एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनस्यया ॥ (मनु० १।११)

३-युधि तुगरजोविधूर्विष्वक्कचलुलितश्रमवार्यलङ्कृतास्ये । मम निशितशरीरविभ्रद्यमानत्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कृष्ण आत्मा ॥

(श्रीमद्भा० १।१।३४)

४-‘ममता मलं जरि जाइ’ (मानस ७।११७ क)

श्लोक ४६ ] * साधक-संजीवनी * ११८७

करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे

यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे, अध्ययन

करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे

ही जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंसे विमुख होकर

भगवान्के सम्मुख हो जाता है, उसकी क्रियाओंको भगवान्

अपना पूजन मान लेते हैं।

विशेष बात

कर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असंगता होती है और

भक्तियोगमें संसारसे असंगतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव

होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है।

कर्मयोगी तो अपने पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि

आदि जो कुछ संसारका जड-अंश है, उसको स्वार्थ,

अभिमान, कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा

देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर

उनसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, और जो स्वतः-

स्वाभाविक असंगता है, वह प्रकट हो जाती है।

भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समय-समयपर

किये गये पारमार्थिक कर्मों-(जप, ध्यान आदि-) के द्वारा

सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है।

इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर

हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको

सुख पहुँचानेमें लग जाता है, तो क्रियाओंको करनेका वेग

मिटकर स्वयंमें असंगता आ जाती है; और भक्तकी सम्पूर्ण

क्रियाएँ परमात्माकी पूजन-सामग्री बन जानेसे जडतासे

विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम

बढ़ जाता है।

भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपने-

आपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके अनन्यता-

पूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खाना-पीना, काम-

धंधा आदि लौकिक और जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय

आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती

हैं। उसकी लौकिक-पारमार्थिक क्रियाओंमें केवल

बाहरसे भेद देखनेमें आता है; परन्तु वास्तवमें कोई भेद

नहीं रहता।

कर्मयोगी और ज्ञानयोगी-ये दोनों अन्तमें एक हो

जाते हैं। जैसे, कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता

है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण

हो जाती हैं और स्वयं असंग हो जाता है और ज्ञानयोगी

विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके

द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और

स्वयं असंग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण

करनेके प्रकारमें अन्तर है, पर असंगतामें दोनों एक हो

जाते हैं*। इस असंगतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी-दोनों

स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किंचिन्मात्र भी कर्मोंका

बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही

कर्तव्य-कर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते

हैं (गीता-चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), और

ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते

हैं (गीता-चौथे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। परन्तु इस

स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे

जिसको उपरति हो जाती है, उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट

हो सकता है।

परिशिष्ट भाव-यहाँ 'यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्' पदोंमें आये 'प्रवृत्तिः' पदका अर्थ 'उत्पत्ति' लेना चाहिये; क्योंकि

परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति तो होती है, पर क्रिया नहीं होती। क्रिया रजोगुणसे होती है-'लोभः

प्रवृत्तिरारम्भः०' (गीता १४।१२) पन्द्रहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी 'प्रवृत्ति' पद 'उत्पत्ति' अर्थमें आया है-

'यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी'।

यह संसार भगवान्का पहला अवतार है-'आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य' (श्रीमद्भा० २।६।४१)। अतः यह

संसार भगवान्की ही मूर्ति है, श्रीविग्रह है। जैसे मूर्तिमें हम भगवान्का पूजन करते हैं, पुष्प चढ़ाते हैं, चन्दन लगाते

हैं तो हमारा भाव मूर्तिमें न होकर भगवान्में होता है अर्थात् हम मूर्तिकी पूजा न करके भगवान्की करते हैं,

ऐसे ही हमें अपनी प्रत्येक क्रियासे संसाररूपमें भगवान्का पूजन करना है। श्रोता सुनकर वक्ताका पूजन करे, वक्ता

सुनाकर श्रोताका पूजन करे-इस प्रकार सभी अपने-अपने कर्मोंके द्वारा एक-दूसरेका पूजन करें। दृष्टि भगवान्की

तरफ ही हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णकी तरफ नहीं। भगवान् श्रीरामको ऋषि-मुनि प्रणाम करते हैं तो भगवान्के

  • ऐसे तो संसारसे असंग होना कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-इन तीनों योगोंके साधकोंके लिये आवश्यक है।

गीतामें 'संगं त्यक्त्वा' (५।११) पदोंसे कर्मयोगीको, 'मुक्तसंगः' (१८।२६) पदसे ज्ञानयोगीको और 'संगवर्जितः' (११।५५)

पदसे भक्तियोगको संगरहित होनेके लिये कहा गया है।

११८८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

भावसे प्रणाम करते हैं, क्षत्रियके भावसे नहीं। पूजनमें खास बात है—सब कुछ भगवान्‌का और भगवान्‌के लिये ही है। जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन करते हैं, ऐसे ही भगवान्‌की वस्तुओंसे भगवान्‌का पूजन करना है। वास्तवमें सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्‌का ही पूजन हैं, हमें केवल अपनी भूल मिटानी है। भगवान्‌की ही वस्तु भगवान्‌के अर्पित करनेसे अपनी स्वार्थबुद्धि, भोगबुद्धि, फलेच्छा मिट जायगी तथा अपनेमें सामर्थ्य भी भगवान्‌का ही माननेसे कर्तृत्व भी मिट जायगा और भगवत्प्राप्तिका अनुभव हो जायगा।

वास्तवमें भगवद्भावसे संसारका पूजन मूर्तिपूजासे भी विशेष मूल्यवान्‌ है। कारण कि मूर्तिका पूजन करनेसे मूर्ति प्रसन्न होती हुई नहीं दीखती, पर प्राणियोंकी सेवा करनेसे वे प्रत्यक्ष प्रसन्न (सुखी) होते हुए दीखते हैं।

अगर व्यक्तियोंको भगवान्‌का स्वरूप मानकर कर्मोंसे और पदार्थोंसे उनकी सेवा की जाय तो संसार लुप्त हो जायगा और एकमात्र भगवान्‌ रह जायेंगे अर्थात् 'सब कुछ भगवान्‌ ही हैं'—इसका अनुभव हो जायगा। जैसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिटनेपर साँप तो लुप्त हो जाता है, पर रस्सी तो रहती ही है, ऐसे ही भगवान्‌में जगत्‌का भ्रम मिटनेपर जगत्‌ जगत्‌रूपसे लुप्त हो जाता है और भगवद्रूपसे रहता है। कारण कि जगत्‌की तो मान्यता है, पर 'भगवान्‌ हैं' यह वास्तविकता है। श्रीमद्भगवतमें भगवान्‌ कहते हैं—

नरेष्वभीक्ष्णं मद्भ्रावं पुंसो भावयतोऽचिरात्। स्मर्थसूयातिरस्काराः साहङ्कारा वियन्ति हि ॥

(श्रीमद्भा० ११।२१।१५)

'जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है और उनमें मेरेको ही देखता है*, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषद्वष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित दूर हो जाते हैं।'

गीतामें भगवान्‌ने कहा है—'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः' (१०।२०) 'सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित आत्मा भी मैं ही हूँ। अतः भगवद्भावसे किसी प्राणीकी सेवा, आदर-सत्कार करेंगे तो वह भगवान्‌की ही सेवा होगी। अगर किसी प्राणीका अनादर-तिरस्कार करेंगे तो वह भगवान्‌का ही अनादर-तिरस्कार होगा—'कशयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः०' (१७।६)।

जैसे ज्ञानमार्गमें गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ('गुणा गुणेषु वर्तन्ते'), ऐसे ही भक्तिमार्गमें भगवान्‌की वस्तुओंसे भगवान्‌का ही पूजन हो रहा है। परन्तु दोनोंमें बड़ा अन्तर है। 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' में जड़ताकी मुख्यता है, जिसका ज्ञानमार्गी त्याग करता है; परन्तु 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य' में चिन्मयताकी मुख्यता है, जिसका भक्तिमार्गी ग्रहण करता है। इसलिये भक्तिमार्गमें जड़ता मिट जाती है, संसार संसाररूपसे छिप जाता है और भगवत्स्वरूपसे प्रकट हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें भगवान्‌ ही हैं। साधक अगर जगत्‌को जगत्‌रूपसे देखे तो उसकी 'सेवा' करे और भगवद्रूपसे देखे तो उसका 'पूजन' करे। अपने लिये कुछ नहीं करे। मात्र कर्म अपने लिये करना बन्धन है, संसारके लिये करना सेवा है और भगवान्‌के लिये करना पूजन है।

सम्बन्ध—स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय, तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये—इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाज्जोति किल्विषम् ॥ ४७ ॥

  • स्त्री-पुरुषोंमें भगवान्‌को देखनेके लिये इसलिये कहा है कि हम अधिकतर स्त्री-पुरुषोंमें ही गुण-दोष देखते हैं, जिससे उनमें भगवद्भाव नहीं होता। अतः स्त्री-पुरुषोंमें गुण-दोष न देखकर केवल भगवान्‌को देखनेसे सम्पूर्ण प्राणियों और पदार्थोंमें सगमतासे भगवद्भाव हो जायगा।

श्लोक ४७ ]

  • साधक-संजीवनी *

११८९

स्वप्नुत्तितात् = अच्छी तरह अनुष्ठान किये हुएस्वधर्मः = अपना धर्मकर्म = स्वधर्मरूप
परधर्मात् = परधर्मसेश्रेयान् = श्रेष्ठ है। (कारण कि)कूर्वन् = करता हुआ (मनुष्य)
विगुणः = गुणरहित (भी)स्वभाव-नियतम् = स्वभावसे नियत किये हुएकिल्विषम् = पापको
न, आप्नोति = प्राप्त नहीं होता।

व्याख्या —‘श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्-स्वप्नुत्तितात्’—यहाँ ‘स्वधर्म’ शब्दसे वर्ण-धर्म ही मुख्यतासे लिया गया है।

परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यवाला मनुष्य ‘स्व’ को अर्थात् अपनेको जो मानता है, उसका धर्म (कर्तव्य) ‘स्वधर्म’ है। जैसे कोई अपनेको मनुष्य मानता है, तो मनुष्यताका पालन करना उसके लिये स्वधर्म है। ऐसे ही कर्मोंके अनुसार अपनेको कोई विद्यार्थी या अध्यापक मानता है तो पढ़ना या पढ़ाना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको साधक मानता है, तो साधन करना उसका स्वधर्म हो जायगा। कोई अपनेको भक्त, जिज्ञासु और सेवक मानता है तो भक्ति, जिज्ञासा और सेवा उसका स्वधर्म हो जायगा। इस प्रकार जिसकी जिस कार्यमें नियुक्ति हुई है और जिसने जिस कार्यको स्वीकार किया है, उसके लिये उस कार्यको सांगोपांग करना स्वधर्म है।

ऐसे ही मनुष्य जन्म और कर्मके अनुसार अपनेको जिस वर्ण और आश्रमका मानता है, उसके लिये उसी वर्ण और आश्रमका धर्म स्वधर्म हो जायगा। ब्राह्मणवर्णमें उत्पन्न हुआ अपनेको ब्राह्मण मानता है तो यज्ञ कराना, दान लेना, पढ़ाना आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म उसके लिये स्वधर्म हैं। क्षत्रियके लिये युद्ध करना, ईश्वरभाव आदि; वैश्यके लिये कृषि, गौरक्षा, व्यापार आदि और शूद्रके लिये सेवा—ये जीविका-सम्बन्धी कर्म स्वधर्म हैं। ऐसा अपना स्वधर्म अगर दूसरोंके धर्मकी अपेक्षा गुणरहित है अर्थात् अपने स्वधर्ममें गुणोंकी कमी है, उसका अनुष्ठान करनेमें कमी रहती है तथा उसको कठिनतासे किया जाता है; परन्तु दूसरेका धर्म गुणोंसे परिपूर्ण है, दूसरेके धर्मका अनुष्ठान

सांगोपांग है और करनेमें बहुत सुगम है तो भी अपने स्वधर्मका पालन करना ही सर्वश्रेष्ठ है।

शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंका विधान किया है, उस वर्णके लिये वे कर्म ‘स्वधर्म’ हैं और उन्हीं कर्मोंका जिस वर्णके लिये निषेध किया है, उस वर्णके लिये वे कर्म ‘परधर्म’ हैं। जैसे यज्ञ कराना, दान लेना आदि कर्म ब्राह्मणके लिये शास्त्रकी आज्ञा होनेसे स्वधर्म हैं; परन्तु वे ही कर्म क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये शास्त्रका निषेध होनेसे परधर्म हैं। परन्तु आपत्कालको लेकर शास्त्रोंने जीविका-सम्बन्धी जिन कर्मोंका निषेध नहीं किया है, वे कर्म सभी वर्णोंके लिये स्वधर्म हो जाते हैं। जैसे आपत्कालमें अर्थात् आपत्तिके समय वैश्यके खेती, व्यापार आदि जीविका-सम्बन्धी कर्म ब्राह्मणके लिये भी स्वधर्म हो जाते हैं*।

ब्राह्मणके शम, दम आदि जितने भी स्वभावज कर्म हैं, वे सामान्य धर्म होनेसे चारों वर्णोंके लिये स्वधर्म हैं। कारण कि उनका पालन करनेके लिये सभीको शास्त्रकी आज्ञा है। उनका किसीके लिये भी निषेध नहीं है।

मनुष्य-शरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इस दृष्टिसे मनुष्यमात्र साधक है। अतः दैवी-सम्पत्तिके जितने भी सदगुण-सदाचार हैं, वे सभीके अपने होनेसे मनुष्यमात्रके लिये स्वधर्म हैं। परन्तु आसुरी-सम्पत्तिके जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे मनुष्यमात्रके लिये न तो स्वधर्म हैं और न परधर्म ही हैं; वे तो सभीके लिये निषिद्ध हैं, त्याज्य हैं; क्योंकि वे अधर्म हैं। दैवी-सम्पत्तिके गुणोंको धारण करनेमें और आसुरी-सम्पत्तिके पाप-कर्मोंका त्याग करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं, सभी सबल हैं, सभी अधिकारी हैं; कोई भी परतन्त्र, निर्बल तथा अनधिकारी नहीं है। हाँ,

  • आपत्तिके समय ब्राह्मण क्षात्रवृत्तिसे निर्वाह कर सकता है और ज्यादा आपत्ति (आफत) आ जाय तो वैश्यवृत्ति भी कर सकता है; परन्तु वैश्यवृत्तिमें फरक यह रहेगा कि ब्राह्मण खेती करे तो सुबह और शाम ठण्डे समय हल चलाये और दो बैलोंका ही हल चलाये, एक बैलका नहीं। ऐसे ही व्यापार करे तो रस-कसका व्यापार न करे अर्थात् चीनी, शक्कर, घी, तेल, नमक आदिका व्यापार न करे।

ऐसे ही आफतके समय क्षत्रिय वैश्यकी वृत्ति—गौरक्ष्य, कृषि और वाणिज्य कर सकता है और वैश्य शूद्रकी वृत्ति भी कर सकता है।

११९०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

यह बात अलग है कि कोई सदगुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है और कोई सदगुण किसीके स्वभावके अनुकूल पड़ता है। जैसे, किसीके स्वभावमें दया मुख्य होती है और किसीके स्वभावमें उपेक्षा मुख्य होती है, किसीका स्वभाव स्वतः क्षमा करनेका होता है और किसीका स्वभाव माँगनेपर क्षमा करनेका होता है, किसीके स्वभावमें उदारता स्वाभाविक होती है और किसीके स्वभावमें उदारता विचारपूर्वक होती है, आदि। ऐसा भेद रह सकता है।

‘स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाजोति किल्वषम्’ —शास्त्रोंमें विहित और निषिद्ध—दो तरहके वचन आते हैं। उनमें विहित कर्म करनेकी आज्ञा है और निषिद्ध कर्म करनेका निषेध है। उन विहित कर्मोंमें भी शास्त्रोंने जिस वर्ण, आश्रम, देश, काल, घटना, परिस्थिति, वस्तु, संयोग, वियोग आदिको लेकर अलग-अलग जो कर्म नियुक्त किये हैं, उस वर्ण, आश्रम आदिके लिये वे ‘नियत कर्म’ कहलाते हैं।

सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंको लेकर जो स्वभाव बनता है, उस स्वभावके अनुसार जो कर्म नियत किये जाते हैं, वे ‘स्वभावनियत कर्म’ कहलाते हैं। उन्हींको स्वभावप्रभव, स्वभावज, स्वधर्म, स्वकर्म और सहज कर्म कहा है।

तात्पर्य यह है कि जिस वर्ण, जातिमें जन्म लेनेसे पहले इस जीवके जैसे गुण और कर्म रहे हैं, उन्हीं गुणों और कर्मोंके अनुसार उस वर्णमें उसका जन्म हुआ है। कर्म तो करनेपर समाप्त हो जाते हैं, पर गुण-रूपसे उनके संस्कार रहते हैं। जन्म होनेपर उन गुणोंके अनुसार ही उसमें गुण और पालनीय आचरण स्वाभाविक ही उत्पन्न होते हैं अर्थात् उनको न तो कहींसे लाना पड़ता है और न उनके लिये परिश्रम ही करना पड़ता है। इसलिये उनको स्वभावज और स्वभावनियत कहा है।

यद्यपि ‘सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनान्निरिवावृताः’ (गीता १८।४८) के अनुसार कर्मामात्रमें दोष आता ही है, तथापि स्वभावके अनुसार शास्त्रने जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है, उन कर्मोंको अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे किया जाय, तो उस वर्णके व्यक्तिको उन कर्मोंका दोष (पाप) नहीं लगता। ऐसे ही जो केवल शरीर-निर्वाहके लिये कर्म करता है, उसको भी पाप नहीं लगता—‘शरीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाजोति किल्वषम्’ (गीता ४।२१)।

विशेष बात

यहाँ एक बड़ी भारी शंका पैदा होती है कि एक आदमी कसाईके घर पैदा होता है तो उसके लिये कसाईका कर्म सहज (साथ ही पैदा हुआ) है, स्वाभाविक है। स्वभावनियत कर्म करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता, तो क्या कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये? अगर उसको कसाईके कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये, तो फिर निषिद्ध आचरण कैसे छूटेगा? कल्याण कैसे होगा?

इसका समाधान है कि स्वभावनियत कर्म वह होता है, जो विहित हो, किसी रीतिसे निषिद्ध नहीं हो अर्थात् उससे किसीका भी अहित न होता हो। जो कर्म किसीके लिये भी अहितकारक होते हैं, वे सहज कर्ममें नहीं लिये जाते। वे कर्म आसक्ति, कामनाके कारण पैदा होते हैं। निषिद्ध कर्म चाहे इस जन्ममें बना हो, चाहे पूर्वजन्ममें बना हो, है वह दोषवाला ही। दोष-भाग त्याज्य होता है; क्योंकि दोष आसुरी-सम्पत्ति है और गुण दैवी-सम्पत्ति है। पहले जन्मके संस्कारोंसे भी दुर्गुण-दुराचारोंमें रुचि हो सकती है, पर वह रुचि दुर्गुण-दुराचार करनेमें बाध्य नहीं करती। विवेक, सद्ब्रचार, सत्संग, शास्त्र आदिके द्वारा उस रुचिको मिटाया जा सकता है।

युक्तिसे भी देखा जाय तो कोई भी प्राणी अपना अहित नहीं चाहता, अपनी हत्या नहीं चाहता। अतः किसीका अहित करनेका, हत्या करनेका अधिकार किसीको भी नहीं है। मनुष्य अपने लिये अच्छा काम चाहता है तो उसे दूसरोंके लिये भी अच्छा काम करना चाहिये। शास्त्रोंमें भी देखा जाय तो यही बात है कि जिसमें दोष होते हैं, पाप होते हैं, अन्याय होते हैं, वे कर्म ‘वैकृत’ हैं, ‘प्राकृत’ नहीं हैं अर्थात् वे विकारसे पैदा हुए हैं, स्वभावसे नहीं। तीसरे अध्यायमें अर्जुनने पूछा कि मनुष्य न चाहता हुआ भी किससे प्रेरित होकर पाप-कर्म करता है? तो भगवान्ने कहा कि कामनाके वशमें होकर ही मनुष्य पाप करता है (तीसरे अध्यायका छत्तीसवर्ग-सैतीसवर्ग श्लोक)। कामनाको लेकर, क्रोधको लेकर, स्वार्थ और अभिमानको लेकर जो कर्म किये जाते हैं, वे कर्म शुद्ध नहीं होते, अशुद्ध होते हैं।

परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे जो कर्म किये जाते हैं, उन कर्मोंमें भिन्नता तो रहती है, पर वे दोषी नहीं होते। ब्राह्मणके घर जन्म होगा तो ब्राह्मणोचित कर्म होंगे, शूद्रके घर जन्म होगा तो शूद्रोचित कर्म होंगे, पर दोषी-भाग किसीमें भी

श्लोक ४८ ]

  • साधक-संजीवनी *

११११

नहीं होगा। दोषी-भाग सहज नहीं है, स्वभावनियत नहीं है। दोषयुक्त कर्म स्वाभाविक हो सकते हैं, पर स्वभावनियत नहीं हो सकते। एक ब्राह्मणको परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाय तो प्राप्ति होनेके बाद भी वह वैसी ही पवित्रतासे भोजन बनायेगा; जैसी पवित्रतासे ब्राह्मणको रहना चाहिये, वैसी ही पवित्रतासे रहेगा। ऐसे ही एक अन्त्यजको परमात्माकी प्राप्ति हो जाय तो वह जूठन भी खा लेगा; जैसे पहले रहता था, वैसे ही रहेगा। परन्तु ब्राह्मण ऐसा नहीं करेगा; क्योंकि पवित्रतासे भोजन करना उसका स्वभावनियत कर्म है, जबकि अन्त्यजके लिये जूठन खाना दोषी नहीं बताया गया है। इसलिये सिद्ध महापुरुषोंमें एक-एकसे विचित्र कर्म होते हैं, पर वे दोषी नहीं होते। उनका स्वभाव राग-द्वेषसे रहित होनेके कारण शुद्ध होता है।

पहलेके किसी पाप-कर्मसे कसाईके घर जन्म हो गया तो वह जन्म पापका फल भोगनेके लिये हुआ है, पाप करनेके लिये नहीं। पापका फल जाति, आयु और भोग बताया गया है, नया कर्म नहीं बताया गया—‘सति मूले तद्विपाको जाल्यायुर्भोगाः’ (योगदर्शन २।१३)। कर्म करनेमें वह स्वतन्त्र है। यदि उसका चित्त शुद्ध हो जाय तो वह कसाई आदिका कर्म कर नहीं सकेगा। एक सन्तसे किसीने कहा कि अगर कोई अपना धर्म पशुओंको मारना ही मानता है तो वह क्या करे? तो उन सन्तने बड़ी दृढ़तासे कहा कि यदि वह अपने धर्मके अनुसार ही लगातार तीन वर्षतक पवित्रतापूर्वक भगवान्के नामका, अपने इष्टके नामका जप करे, तो फिर वह मार नहीं सकेगा। कारण कि उसका पूर्वजन्मका अथवा यहाँका जो स्वभाव पड़ा हुआ है, वह स्वभाव दोषी है। यदि सच्चे हृदयसे ठीक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति चाहेगा तो वह कसाईका काम नहीं कर सकेगा। उससे अपने-आप ग्लानि होगी, उपरति

होगी। बिना कहे-सुने उसमें सदगुण स्वाभाविक आयेगें। रामचरितमानसमें शबरीके प्रसंगमें आता है—भगवान् रामने शबरीसे कहा—‘नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥’ (३।३५।४) फिर नौ प्रकारकी भक्ति कहकर अन्तमें भगवान्ने कहा—‘सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें’ (३।३६।४)। तात्पर्य यह है कि भक्ति नौ प्रकारकी होती है, इसका शबरीको पता ही नहीं है; परन्तु शबरीमें सब प्रकारकी भक्ति स्वाभाविक ही थी। सत्संग, भजन, ध्यान आदि करनेसे जिन गुणोंका हमें ज्ञान नहीं है, वे गुण भी आ जाते हैं। जो केवल दूसरोंको सुनानेके लिये याद करते हैं, वे दूसरोंको तो बता देंगे, पर आचरणमें वे गुण तभी आयेगें, जब अपना स्वभाव शुद्ध करके परमात्माकी तरफ चलेगें। इसलिये मनुष्यको अपना स्वभाव और अपने कर्म शुद्ध, निर्मल बनाने चाहिये। इसमें कोई परतन्त्र नहीं है, कोई निर्बल नहीं है, कोई अयोग्य नहीं है, कोई अपात्र नहीं है। मनुष्यके मनमें ऐसा आता है कि मैं कर्तव्यका पालन करनेमें और सदगुणोंको लानेमें असमर्थ हूँ। परन्तु वास्तवमें वह असमर्थ नहीं है। सांसारिक भोगोंकी आदत और पदार्थिक संग्रहकी रुचि होनेसे ही असमर्थताका अनुभव होता है।

उद्धारके योग्य समझकर ही भगवान्ने मनुष्य-शरीर दिया है। इसलिये अपने स्वभावका सुधार करके अपना उद्धार करनेमें प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्र है, सबल है, योग्य है, समर्थ है। स्वभावका सुधार करना असम्भव तो है ही नहीं, कठिन भी नहीं है। मनुष्यको मुक्तिका द्वार कहा गया है—‘साधन धाम मोच्छ कर द्वार’ (मानस ७।४३।४)। यदि स्वभावका सुधार करना असम्भव होता तो इसे मुक्तिका द्वार कैसे कहा जा सकता? अगर मनुष्य अपने स्वभावका सुधार न कर सके, तो फिर मनुष्यजीवनकी सार्थकता क्या हुई?

परिशिष्ट भाव —स्वधर्मरूप कर्मको करनेसे पाप बन तो सकता है, पर लग नहीं सकता—‘कुर्वनान्मोति किल्विषम्’। पाप लगनेमें मुख्य कारण भाव है, क्रिया नहीं। अतः पाप कर्मोंसे नहीं लगता, प्रत्युत स्वार्थ और अभिमान आनेसे लगता है।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ ४८ ॥

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन!न, त्यजेत्= त्याग नहीं करनाअग्निः= अग्निकी
सदोषम्= दोषयुक्त होनेपरचाहिये;इव= तरह (किसी-न-
अपि= भीहि= क्योंकिकिसी)
सहजम्= सहजसर्वारम्भाः= सम्पूर्ण कर्मदोषेण= दोषसे
कर्म= कर्मकाधूमेन= धुएँसेआवृताः= युक्त हैं।

११९२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

व्याख्या —[पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने जो कर्म नियत किये हैं, उन कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। इससे सिद्ध होता है कि स्वभावनियत कर्मोंमें भी पाप-क्रिया होती है। अगर पाप-क्रिया न होती तो 'पापको प्राप्त नहीं होता' यह कहना नहीं बनता। अतः यहाँ भगवान् कहते हैं कि 'जो सहज कर्म हैं, उनमें कोई दोष भी आ जाय तो भी उनका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सब-के-सब कर्म धुएँसे अग्निकी तरह दोषसे आवृत हैं।']

'सहजं कर्म कोनैतय सदोषमपि न त्यजेत्'— स्वभावनियत कर्म सहज-कर्म कहलाते हैं; जैसे—ब्राह्मणके शम, दम आदि; क्षत्रियके शौर्य, तेज आदि; वैश्यके कृषि, गौरक्ष्य आदि और शूद्रके सेवा-कर्म—ये सभी सहज-कर्म हैं। जन्मके बाद शास्त्रोंने पूर्वके गुण और कर्मोंके अनुसार जिस वर्णके लिये जिन कर्मोंकी आज्ञा दी है, वे शास्त्रनियत कर्म भी सहज-कर्म कहलाते हैं; जैसे—ब्राह्मणके लिये यज्ञ करना और कराना, पढ़ना और पढ़ाना आदि; क्षत्रियके लिये यज्ञ करना, दान करना आदि; वैश्यके लिये यज्ञ करना आदि; और शूद्रके लिये सेवा।

सहज कर्ममें ये दोष हैं—

(१) परमात्मा और परमात्माका अंश—ये दोनों ही 'स्व' हैं तथा प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर आदि—ये दोनों ही 'पर' हैं। परन्तु परमात्माका अंश स्वयं प्रकृतिके वश होकर परतन्त्र हो जाता है अर्थात् क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और उस क्रियाको यह अपनेमें मान लेता है तो परतन्त्र हो जाता है। यह प्रकृतिके परतन्त्र होना ही महान् दोष है।

(२) प्रत्येक कर्ममें कुछ-न-कुछ आनुषंगिक अनिवार्य हिंसा आदि दोष होते ही हैं।

(३) कोई भी कर्म किया जाय, वह कर्म किसीके अनुकूल और किसीके प्रतिकूल होता ही है। किसीके प्रतिकूल होना भी दोष है।

(४) प्रमाद आदि दोषोंके कारण कर्मके करनेमें कमी रह जाना अथवा करनेकी विधिमें भूल हो जाना भी दोष है।

अपने सहज-कर्ममें दोष भी हो, तो भी उसको नहीं छोड़ना चाहिये। इसका तात्पर्य है कि जैसे ब्राह्मणके कर्म जितने सौम्य हैं, उतने ब्राह्मणेश्वर वर्णोंके कर्म सौम्य नहीं हैं। परन्तु सौम्य न होनेपर भी वे कर्म दोषी नहीं माने जाते अर्थात् ब्राह्मणके सहज कर्मोंकी अपेक्षा क्षत्रिय, वैश्य

आदिके सहज कर्मोंमें गुणोंकी कमी होनेपर भी उस कमीका दोष नहीं लगता और अनिवार्य हिंसा आदि भी नहीं लगते, प्रत्युत उनका पालन करनेसे लाभ होता है। कारण कि वे कर्म उनके स्वभावके अनुकूल होनेसे करनेमें सुगम हैं और शास्त्रविहित हैं।

ब्राह्मणके लिये भिक्षा बतायी गयी है। देखनेमें भिक्षा निर्दोष दीखती है, पर उसमें भी दोष आ जाते हैं। जैसे किसी गृहस्थके घरपर कोई भिक्षुक खड़ा है और उसी समय दूसरा भिक्षुक वहाँ आ जाता है तो गृहस्थको भार लगता है। भिक्षुकोंमें परस्पर ईर्ष्या होनेकी सम्भावना रहती है। भिक्षा देनेवालेके घरमें पूरी तैयारी नहीं है तो उसको भी दुःख होता है। यदि कोई गृहस्थ भिक्षा देना नहीं चाहता और उसके घरपर भिक्षुक चला जाय तो उसको बड़ा कष्ट होता है। अगर वह भिक्षा देता है तो खर्चा होता है और नहीं देता है तो भिक्षुक निराश होकर चला जाता है। इससे उस गृहस्थको पाप लगता है और बेचारा उसमें फँस जाता है। इस प्रकार यद्यपि भिक्षामें भी दोष होते हैं, तथापि ब्राह्मणको उसे छोड़ना नहीं चाहिये।

क्षत्रियके लिये न्याययुक्त युद्ध प्राप्त हो जाय तो उसको करनेसे क्षत्रियको पाप नहीं लगता। यद्यपि युद्धरूप कर्ममें दोष हैं; क्योंकि उसमें मनुष्योंको मारना पड़ता है, तथापि क्षत्रियके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे दोष नहीं लगता। ऐसे ही वैश्यके लिये खेती करना बताया गया है। खेती करनेमें बहुत-से जन्तुओंकी हिंसा होती है। परन्तु वैश्यके लिये सहज और शास्त्रविहित होनेसे हिंसाका इतना दोष नहीं लगता। इसलिये सहज कर्मोंको छोड़ना नहीं चाहिये।

सहज कर्मोंको करनेमें दोष (पाप) नहीं लगता—यह बात ठीक है; परन्तु इन साधारण सहज कर्मोंसे मुक्ति कैसे हो जायगी? वास्तवमें मुक्ति होनेमें सहज कर्म बाधक नहीं हैं। कामना, आसक्ति, स्वार्थ, अभिमान आदिसे ही बन्धन होता है और पाप भी इन कामना आदिके कारणसे ही होते हैं। इसलिये मनुष्यको निष्कामभावपूर्वक भगवत्प्रतिपक्ष सहज कर्मोंको करना चाहिये, तभी बन्धन छूटेगा।

'सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनागिरिवावृताः'— जितने भी कर्म हैं, वे सब-के-सब सदोष ही हैं; जैसे—आग सुलगायी जाय तो आरम्भमें धुआँ होता ही है। कर्म करनेमें देश, काल, घटना, परिस्थिति आदिकी परतन्त्रता और दूसरोंकी प्रतिकूलता भी दोष है, परन्तु स्वभावके अनुसार शास्त्रोंने आज्ञा दी है। उस आज्ञाके अनुसार निष्कामभावपूर्वक

श्लोक ४९ ]

  • साधक-संजीवनी *

११९३

कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि 'भैया! तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है, वह तेरा धर्म है;

क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है, इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है' (गीता—दूसरे अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।

परिशिष्ट भाव —निषिद्ध कर्ममें आसक्ति होनेसे अथवा निषिद्ध रीतिसे भोग भोगनेके कारण ही विहित कर्म कठिन प्रतीत होता है। वास्तवमें विहित कर्म सहज स्वाभाविक है, इसमें परिश्रम नहीं है।

इकतालिसवें श्लोकसे यहाँतक 'स्वकर्म', 'स्वधर्म' और 'सहजकर्म' शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इससे सिद्ध होता है कि गीता स्वकर्म और सहजकर्मको ही 'स्वधर्म' मानती है।

विहित कर्म करनेमें दोष तो होता है, पर कामना, सुखबुद्धि, भोगबुद्धि न रहनेसे दोष लगता नहीं। तात्पर्य है कि दोष लगना या न लगना कर्ताकी नीयतपर निर्भर है; जैसे—डॉक्टरकी नीयत ठीक हो, पैसोंका उद्देश्य न होकर सेवाका उद्देश्य हो तो ऑपरेशनमें रोगीका अंग काटनेपर भी उसको दोष नहीं लगता, प्रत्युत निःस्वार्थभाव और हितकी दृष्टि होनेसे पुण्य होता है।

सम्बन्ध—अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।

नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥

सर्वत्र,वशमें कर रहा है,परमाम्= सर्वश्रेष्ठ
असक्तबुद्धिः = जिसकी बुद्धिविगतस्पृहः = जो स्पृहारहित हैनैष्कर्म्य-
सब जगह(वह मनुष्य)सिद्धिम्= नैष्कर्म्यसिद्धिको
आसक्तिरहित है,सन्यासेन = सांख्ययोगकेअधिगच्छति= प्राप्त हो
जितात्मा = जिसने शरीरकोद्वाराजाता है।

व्याख्या—संन्यास- (सांख्य-) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये—यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं—

(१) 'असक्तबुद्धिः सर्वत्र'—जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश, काल, घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती।

(२) 'जितात्मा'—जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य, प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता, प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया, घटना, आदिसे हटना चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है, वह 'जितात्मा' कहलाता है।

(३) 'विगतस्पृहः'—जीवन-धारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है, उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम 'स्पृहा' है; जैसे—साग-पत्ती कुछ मिल जाय, रूखी-सूखी

रोटी ही मिल जाय, कुछ-न-कुछ खाये बिना हम कैसे जी सकते हैं! जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं! ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं! सांख्ययोगका साधक इन जीवन-निर्वाह-सम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता।

तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जड़ताका त्याग करना पड़ता है। उस जड़ताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है, तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।

'नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासेनाधिगच्छति'—ऐसा असक्तबुद्धि, जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता, तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किंचिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक, स्वतःसिद्ध निष्कर्माता—निलिप्तता है, वह प्रकट हो जाती है।

१९४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परिशिष्ट भाव —नैष्कर्म्यसिद्धिका अर्थ है—कर्म सर्वथा अकर्म हो जायें, कर्मोंके साथ बिलकुल सम्बन्ध न रहे, कर्म होते हुए भी लिप्तता न हो—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ’ (गीता ४।१८)। कर्मोंको न करना नैष्कर्म्य (निष्कर्मता) नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक), प्रत्युत कर्म करना तो साधकके लिये आवश्यक है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)।

‘असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः’ —यह कर्मयोगकी सिद्धि है (गीता—दूसरे अध्यायका इकहत्तरवाँ श्लोक), जिसके होनेपर कर्मयोगी सांख्ययोगमें जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका छठाँ श्लोक) और सांख्ययोगसे नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त करता है। इस प्रकार कर्मयोगसे तो ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है—‘न कर्मणामनारम्धानैष्कर्म्यं पुरुषोऽन्यन्ते ’ (गीता ३।४), पर भक्तियोगसे ‘परम नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है। कर्मयोग और ज्ञानयोग तो ‘निष्ठा’ है—‘लोकेऽस्मिन्निविधा निष्ठा० ’ (३।३), पर कर्मयोग-ज्ञानयोगकी ‘परा निष्ठा’ भक्तिसे ही होगी—‘निष्ठा ज्ञानस्य या परा ’ (१८।५०)। तात्पर्य है कि ‘परम नैष्कर्म्यसिद्धि’ और ‘परा निष्ठा’—दोनों भक्तिसे होती हैं।

सम्बन्ध—अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाज्योति निबोध मे।

समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥५०॥

कौन्तेय= हे कौन्तेय!या= जो कितथा= उस प्रकारको
सिद्धिम्= सिद्धिज्ञानस्य= ज्ञानकी(तुम)
(अन्तःकरणकीपरा= परामे= मुझसे
शुद्धि)-कोनिष्ठा= निष्ठा है,समासेन= संक्षेपमें
प्राप्तः= प्राप्त हुआ साधकयथा= जिस प्रकारसेएव= ही
ब्रह्म= ब्रह्मकोआज्योति= प्राप्त होता है,निबोध= समझो।

व्याख्या —‘सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाज्योति निबोध मे ’—यहाँ ‘सिद्धि’ नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है, जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये ‘असक्तबुद्धिः ’, ‘जितात्मा ’ और ‘विगतस्पृहः ’ पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किंचिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना, ममता और आसक्ति नहीं रही, उसके लिये कभी किंचिन्मात्र भी किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है। लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी, अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है; क्योंकि इसमें पराधीनता होती है, किसी बातकी कमी रहती है और किसी वस्तु, परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किंचिन्मात्र भी कामना पैदा न हो, वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे, वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है, प्रत्युत एक बन्धन

ही है।

अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, उसको मुझसे समझ—‘निबोध मे ’। कारण कि सांख्ययोगकी जो सार-सार बातें हैं, वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है।

‘निबोध’ पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें ‘निबोध ’ पद आया है।

‘समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा’ —सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है, जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती, वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सार-सार बातें कहूँगा।

श्लोक ५१—५३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१११५

परिशिष्ट भाव —यहाँ 'सिद्धिम्' पदका अर्थ है—साधनरूप कर्मयोगसे होनेवाली अन्तःकरणकी पूर्ण शुद्धि, जिसकी प्राप्तिके बाद कर्मयोगी ज्ञानयोगमें अथवा भक्तियोगमें कहीं भी जा सकता है—

तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता । मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन जायते ॥

(श्रीमद्भा० ११।२०।१)

'तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक भोगोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला-कथाके श्रवण-कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय।'

अगर कर्मयोगीके भीतर ज्ञानके संस्कार हैं तो वह ज्ञानमें चला जायगा और अगर भक्तिके संस्कार हैं तो वह भक्तिमें चला जायगा।

अगर किसी एकका आग्रह न हो तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों 'साधन' रूपसे भी हैं और 'साध्य' रूपसे भी हैं। साधनरूपसे तो तीनों अलग-अलग हैं, पर साध्यरूपसे तीनों एक ही हैं। इसलिये गीतामें कहाँ तो भगवान्ने भक्तिके द्वारा ज्ञानकी प्राप्ति अर्थात् साधन-भक्तिसे साध्य-ज्ञानकी प्राप्ति बतायी है—'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी' (१३।१०), 'मां च योऽव्यभिचारेण'……'ब्रह्मभूयाय कल्पते' (१४।२६), और कहीं ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति अर्थात् साधन-ज्ञानसे साध्य-भक्तिकी प्राप्ति बतायी है—'सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र'……'सर्वभूतहिते रताः' (१२।४), 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा'……'मद्भक्तिं लभते पराम्' (१८।५४)।

भगवान्ने पहले 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः' (१८।४६)—इन पदोंसे कर्मयोगके द्वारा भक्तिकी सिद्धि बतायी और यहाँ 'सिद्धिं प्राप्नो यथा ब्रह्म' पदोंसे कर्मयोगके द्वारा ज्ञानयोगकी सिद्धि बताते हैं। पाँचवें अध्यायमें भी साधनरूप कर्मयोगसे ज्ञानयोगकी शीघ्र सिद्धि बतायी है—'योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति' (५।६)।

सम्बन्ध—ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये किस साधन-सामग्रीकी आवश्यकता है, उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।

शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।

ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।

विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥

विशुद्ध्या= (जो) विशुद्ध (सात्त्विकी)आत्मानम्= इन्द्रियोंकानित्यम्= निरन्तर
बुद्ध्या= बुद्धिसेनियम्य= नियमन करके,ध्यानयोगपरः= ध्यानयोगके परायण
युक्तः= युक्त,यतवाक्कायमानसः= शरीर-वाणी-
मनको वशमें करके,हो जाता है, (वह)
वैराग्यम्= वैराग्यकेशब्दादीन्= शब्दादिअहङ्कारम्= अहंकार,
समुपाश्रितः= आश्रित,विषयान्= विषयोंकाबलम्= बल,
विविक्तसेवी= एकात्मका सेवन
करनेवाला (और)त्यक्त्वा= त्याग करकेदर्पम्= दर्प,
लघ्वाशी= नियमित भोजन
करनेवाला (साधक)= औरकामम्= काम,
धृत्या= धैर्यपूर्वकरागद्वेषौ= राग-द्वेषकोक्रोधम्= क्रोध
व्युदस्य= छोड़कर= और
परिग्रहम्= परिग्रहसे

११९६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

विमुच्य= रहित होकरनिर्ममः= ममतरहित (तथा)ब्रह्मभूयाय= ब्रह्मप्राप्तिका
(एवं)शान्तः= शान्त होकरकल्पते= पात्र हो जाता है।

व्याख्या—‘बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तः’ —‘जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है, उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता—इसी अध्यायका तीसवाँ श्लोक) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफ-साफ हो, उसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह न हो।

इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है, वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।

‘वैराग्यं समुपाश्रितः’ —‘जैसे संसारीलोग रागपूर्वक वस्तु, व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं, उनको अपना आश्रय, सहारा मानते हैं, ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय, स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।

‘विवित्तसेवी’ —‘सांख्ययोगके साधकका स्वभाव, उसकी रुचि स्वतः-स्वाभाविक एकात्ममें रहनेकी होती है। एकात्म-सेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है, पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकात्म न मिलनेपर मनमें विश्लेष, हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकात्म न मिले, प्रत्युत समुदाय मिले, खूब हल्ला-गुल्ला हो, तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धि-असिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा, उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकात्ममें रहनेका ही होना चाहिये, पर एकात्म न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है, जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।

‘एकात्ममें रहनेसे साधन अधिक होगा, मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा; अन्तःकरण निर्मल बनेगा’—इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है, वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु ‘एकात्ममें हल्ला-गुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा; अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी, वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा, वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा, एकात्ममें रहनेसे लोग भी ज्यादा मान-बड़ाई, आदर करेंगे’—इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती

है, वह साधनमें बाधक होती है; क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुख-सुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये, प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।

‘लब्धाशी’ —साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित, मित और मध्य—ये तीन बातें बतायी गयी हैं। ‘हित’ का तात्पर्य है—भोजन शरीरके अनुकूल हो। ‘मित’ का तात्पर्य है—भोजन न तो अधिक करे और न कम करे, प्रत्युत जितने भोजनसे शरीर-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन करे (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा—ऐसे भावसे भोजन न करे, प्रत्युत केवल औषधकी तरह शुष्वा-निवृत्तिके लिये ही भोजन करे, जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। ‘मध्य’ का तात्पर्य है—भोजन पवित्र हो।

‘धृत्यात्मानं नियम्य च’ —सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना—ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता—इसी अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)—के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।

‘यतवाक्कायमानसः’ —शरीर, वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता—सत्रहवें अध्यायका चौदहवाँ, पंद्रहवाँ और सोलहवाँ श्लोक)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे, देखने-सुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे, आवश्यक होनेपर ही बोले, असत्य न बोले, निन्दा-चुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे, प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।

‘शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा’ —ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं, जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है, उन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेगी और विषयोंका चिन्तन होगा।