श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
भावसे प्रणाम करते हैं, क्षत्रियके भावसे नहीं। पूजनमें खास बात है—सब कुछ भगवान्का और भगवान्के लिये ही है। जैसे गंगाजलसे गंगाका पूजन करते हैं, ऐसे ही भगवान्की वस्तुओंसे भगवान्का पूजन करना है। वास्तवमें सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्का ही पूजन हैं, हमें केवल अपनी भूल मिटानी है। भगवान्की ही वस्तु भगवान्के अर्पित करनेसे अपनी स्वार्थबुद्धि, भोगबुद्धि, फलेच्छा मिट जायगी तथा अपनेमें सामर्थ्य भी भगवान्का ही माननेसे कर्तृत्व भी मिट जायगा और भगवत्प्राप्तिका अनुभव हो जायगा।
वास्तवमें भगवद्भावसे संसारका पूजन मूर्तिपूजासे भी विशेष मूल्यवान् है। कारण कि मूर्तिका पूजन करनेसे मूर्ति प्रसन्न होती हुई नहीं दीखती, पर प्राणियोंकी सेवा करनेसे वे प्रत्यक्ष प्रसन्न (सुखी) होते हुए दीखते हैं।
अगर व्यक्तियोंको भगवान्का स्वरूप मानकर कर्मोंसे और पदार्थोंसे उनकी सेवा की जाय तो संसार लुप्त हो जायगा और एकमात्र भगवान् रह जायेंगे अर्थात् 'सब कुछ भगवान् ही हैं'—इसका अनुभव हो जायगा। जैसे रस्सीमें साँपका भ्रम मिटनेपर साँप तो लुप्त हो जाता है, पर रस्सी तो रहती ही है, ऐसे ही भगवान्में जगत्का भ्रम मिटनेपर जगत् जगत्रूपसे लुप्त हो जाता है और भगवद्रूपसे रहता है। कारण कि जगत्की तो मान्यता है, पर 'भगवान् हैं' यह वास्तविकता है। श्रीमद्भगवतमें भगवान् कहते हैं—
नरेष्वभीक्ष्णं मद्भ्रावं पुंसो भावयतोऽचिरात्। स्मर्थसूयातिरस्काराः साहङ्कारा वियन्ति हि ॥
(श्रीमद्भा० ११।२१।१५)
'जब भक्तका सम्पूर्ण स्त्री-पुरुषोंमें निरन्तर मेरा ही भाव हो जाता है और उनमें मेरेको ही देखता है*, तब शीघ्र ही उसके चित्तसे ईर्ष्या, दोषद्वष्टि, तिरस्कार आदि दोष अहंकारसहित दूर हो जाते हैं।'
गीतामें भगवान्ने कहा है—'अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः' (१०।२०) 'सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित आत्मा भी मैं ही हूँ। अतः भगवद्भावसे किसी प्राणीकी सेवा, आदर-सत्कार करेंगे तो वह भगवान्की ही सेवा होगी। अगर किसी प्राणीका अनादर-तिरस्कार करेंगे तो वह भगवान्का ही अनादर-तिरस्कार होगा—'कशयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः०' (१७।६)।
जैसे ज्ञानमार्गमें गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ('गुणा गुणेषु वर्तन्ते'), ऐसे ही भक्तिमार्गमें भगवान्की वस्तुओंसे भगवान्का ही पूजन हो रहा है। परन्तु दोनोंमें बड़ा अन्तर है। 'गुणा गुणेषु वर्तन्ते' में जड़ताकी मुख्यता है, जिसका ज्ञानमार्गी त्याग करता है; परन्तु 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य' में चिन्मयताकी मुख्यता है, जिसका भक्तिमार्गी ग्रहण करता है। इसलिये भक्तिमार्गमें जड़ता मिट जाती है, संसार संसाररूपसे छिप जाता है और भगवत्स्वरूपसे प्रकट हो जाता है; क्योंकि वास्तवमें भगवान् ही हैं। साधक अगर जगत्को जगत्रूपसे देखे तो उसकी 'सेवा' करे और भगवद्रूपसे देखे तो उसका 'पूजन' करे। अपने लिये कुछ नहीं करे। मात्र कर्म अपने लिये करना बन्धन है, संसारके लिये करना सेवा है और भगवान्के लिये करना पूजन है।
सम्बन्ध—स्वभावज (सहज) कर्मोंको निष्कामभावपूर्वक और पूजाबुद्धिसे करते हुए उसमें कोई कमी रह भी जाय, तो भी उसमें साधकको हताश नहीं होना चाहिये—इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाज्जोति किल्विषम् ॥ ४७ ॥
- स्त्री-पुरुषोंमें भगवान्को देखनेके लिये इसलिये कहा है कि हम अधिकतर स्त्री-पुरुषोंमें ही गुण-दोष देखते हैं, जिससे उनमें भगवद्भाव नहीं होता। अतः स्त्री-पुरुषोंमें गुण-दोष न देखकर केवल भगवान्को देखनेसे सम्पूर्ण प्राणियों और पदार्थोंमें सगमतासे भगवद्भाव हो जायगा।