सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1188, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1188

श्लोक ४६ ] * साधक-संजीवनी * ११८७

करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित हो जाऊँगा। इससे

यह सिद्ध होता है कि कोई गीताका पाठ करे, अध्ययन

करे तो उसको भगवान् अपना पूजन मान लेते हैं। ऐसे

ही जो उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंसे विमुख होकर

भगवान्के सम्मुख हो जाता है, उसकी क्रियाओंको भगवान्

अपना पूजन मान लेते हैं।

विशेष बात

कर्मयोगमें कर्मोंके द्वारा जडतासे असंगता होती है और

भक्तियोगमें संसारसे असंगतापूर्वक परमात्माके प्रति पूज्यभाव

होनेसे परमात्माकी सम्मुखता रहती है।

कर्मयोगी तो अपने पास शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि

आदि जो कुछ संसारका जड-अंश है, उसको स्वार्थ,

अभिमान, कामनाका त्याग करके संसारकी सेवामें लगा

देता है। इससे अपनी मानी हुई चीजोंसे अपनापन छूटकर

उनसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है, और जो स्वतः-

स्वाभाविक असंगता है, वह प्रकट हो जाती है।

भक्त अपने वर्णोचित स्वाभाविक कर्मों और समय-समयपर

किये गये पारमार्थिक कर्मों-(जप, ध्यान आदि-) के द्वारा

सम्पूर्ण संसारमें व्याप्त परमात्माका पूजन करता है।

इन दोनोंमें भावकी भिन्नता होनेसे इतना ही अन्तर

हुआ कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाओंका प्रवाह सबको

सुख पहुँचानेमें लग जाता है, तो क्रियाओंको करनेका वेग

मिटकर स्वयंमें असंगता आ जाती है; और भक्तकी सम्पूर्ण

क्रियाएँ परमात्माकी पूजन-सामग्री बन जानेसे जडतासे

विमुखता होकर भगवान्की सम्मुखता आ जाती है और प्रेम

बढ़ जाता है।

भक्त तो पहलेसे ही भगवान्के सम्मुख होकर अपने-

आपको भगवान्के अर्पित कर देता है। स्वयंके अनन्यता-

पूर्वक भगवान्के समर्पित हो जानेसे खाना-पीना, काम-

धंधा आदि लौकिक और जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय

आदि पारमार्थिक क्रियाएँ भी भगवान्के अर्पण हो जाती

हैं। उसकी लौकिक-पारमार्थिक क्रियाओंमें केवल

बाहरसे भेद देखनेमें आता है; परन्तु वास्तवमें कोई भेद

नहीं रहता।

कर्मयोगी और ज्ञानयोगी-ये दोनों अन्तमें एक हो

जाते हैं। जैसे, कर्मयोगी कर्मोंके द्वारा जडताका त्याग करता

है अर्थात् सेवाके द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ संसारके अर्पण

हो जाती हैं और स्वयं असंग हो जाता है और ज्ञानयोगी

विचारके द्वारा जडताका त्याग करता है अर्थात् विचारके

द्वारा उसकी सभी क्रियाएँ प्रकृतिके अर्पण हो जाती हैं और

स्वयं असंग हो जाता है। तात्पर्य है कि दोनोंके अर्पण

करनेके प्रकारमें अन्तर है, पर असंगतामें दोनों एक हो

जाते हैं*। इस असंगतामें कर्मयोगी और ज्ञानयोगी-दोनों

स्वतन्त्र हो जाते हैं। उनके लिये किंचिन्मात्र भी कर्मोंका

बन्धन नहीं रहता। केवल कर्तव्य-पालनके लिये ही

कर्तव्य-कर्म करनेसे कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म लीन हो जाते

हैं (गीता-चौथे अध्यायका तेईसवाँ श्लोक), और

ज्ञानरूप अग्निसे ज्ञानयोगीके सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते

हैं (गीता-चौथे अध्यायका सैंतीसवाँ श्लोक)। परन्तु इस

स्वतन्त्रतामें भी जिसको संतोष नहीं होता अर्थात् स्वतन्त्रतासे

जिसको उपरति हो जाती है, उसमें भगवत्कृपासे प्रेम प्रकट

हो सकता है।

परिशिष्ट भाव-यहाँ 'यतः प्रवृत्तिर्भूतानाम्' पदोंमें आये 'प्रवृत्तिः' पदका अर्थ 'उत्पत्ति' लेना चाहिये; क्योंकि

परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति तो होती है, पर क्रिया नहीं होती। क्रिया रजोगुणसे होती है-'लोभः

प्रवृत्तिरारम्भः०' (गीता १४।१२) पन्द्रहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें भी 'प्रवृत्ति' पद 'उत्पत्ति' अर्थमें आया है-

'यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी'।

यह संसार भगवान्का पहला अवतार है-'आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य' (श्रीमद्भा० २।६।४१)। अतः यह

संसार भगवान्की ही मूर्ति है, श्रीविग्रह है। जैसे मूर्तिमें हम भगवान्का पूजन करते हैं, पुष्प चढ़ाते हैं, चन्दन लगाते

हैं तो हमारा भाव मूर्तिमें न होकर भगवान्में होता है अर्थात् हम मूर्तिकी पूजा न करके भगवान्की करते हैं,

ऐसे ही हमें अपनी प्रत्येक क्रियासे संसाररूपमें भगवान्का पूजन करना है। श्रोता सुनकर वक्ताका पूजन करे, वक्ता

सुनाकर श्रोताका पूजन करे-इस प्रकार सभी अपने-अपने कर्मोंके द्वारा एक-दूसरेका पूजन करें। दृष्टि भगवान्की

तरफ ही हो, ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्णकी तरफ नहीं। भगवान् श्रीरामको ऋषि-मुनि प्रणाम करते हैं तो भगवान्के

  • ऐसे तो संसारसे असंग होना कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग-इन तीनों योगोंके साधकोंके लिये आवश्यक है।

गीतामें 'संगं त्यक्त्वा' (५।११) पदोंसे कर्मयोगीको, 'मुक्तसंगः' (१८।२६) पदसे ज्ञानयोगीको और 'संगवर्जितः' (११।५५)

पदसे भक्तियोगको संगरहित होनेके लिये कहा गया है।