श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
परिशिष्ट भाव —नैष्कर्म्यसिद्धिका अर्थ है—कर्म सर्वथा अकर्म हो जायें, कर्मोंके साथ बिलकुल सम्बन्ध न रहे, कर्म होते हुए भी लिप्तता न हो—‘कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ’ (गीता ४।१८)। कर्मोंको न करना नैष्कर्म्य (निष्कर्मता) नहीं है (गीता—तीसरे अध्यायका चौथा श्लोक), प्रत्युत कर्म करना तो साधकके लिये आवश्यक है (गीता—छठे अध्यायका तीसरा श्लोक)।
‘असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः’ —यह कर्मयोगकी सिद्धि है (गीता—दूसरे अध्यायका इकहत्तरवाँ श्लोक), जिसके होनेपर कर्मयोगी सांख्ययोगमें जाता है (गीता—पाँचवें अध्यायका छठाँ श्लोक) और सांख्ययोगसे नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त करता है। इस प्रकार कर्मयोगसे तो ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है—‘न कर्मणामनारम्धानैष्कर्म्यं पुरुषोऽन्यन्ते ’ (गीता ३।४), पर भक्तियोगसे ‘परम नैष्कर्म्यसिद्धि’ होती है। कर्मयोग और ज्ञानयोग तो ‘निष्ठा’ है—‘लोकेऽस्मिन्निविधा निष्ठा० ’ (३।३), पर कर्मयोग-ज्ञानयोगकी ‘परा निष्ठा’ भक्तिसे ही होगी—‘निष्ठा ज्ञानस्य या परा ’ (१८।५०)। तात्पर्य है कि ‘परम नैष्कर्म्यसिद्धि’ और ‘परा निष्ठा’—दोनों भक्तिसे होती हैं।
सम्बन्ध—अब उस परम सिद्धिको प्राप्त करनेकी विधि बतानेकी प्रतिज्ञा करते हैं।
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाज्योति निबोध मे।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥५०॥
| कौन्तेय | = हे कौन्तेय! | या | = जो कि | तथा | = उस प्रकारको |
|---|---|---|---|---|---|
| सिद्धिम् | = सिद्धि | ज्ञानस्य | = ज्ञानकी | (तुम) | |
| (अन्तःकरणकी | परा | = परा | मे | = मुझसे | |
| शुद्धि)-को | निष्ठा | = निष्ठा है, | समासेन | = संक्षेपमें | |
| प्राप्तः | = प्राप्त हुआ साधक | यथा | = जिस प्रकारसे | एव | = ही |
| ब्रह्म | = ब्रह्मको | आज्योति | = प्राप्त होता है, | निबोध | = समझो। |
व्याख्या —‘सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाज्योति निबोध मे ’—यहाँ ‘सिद्धि’ नाम अन्तःकरणकी शुद्धिका है, जिसका वर्णन पूर्वश्लोकमें आये ‘असक्तबुद्धिः ’, ‘जितात्मा ’ और ‘विगतस्पृहः ’ पदोंसे हुआ है। जिसका अन्तःकरण इतना शुद्ध हो गया है कि उसमें किंचिन्मात्र भी किसी प्रकारकी कामना, ममता और आसक्ति नहीं रही, उसके लिये कभी किंचिन्मात्र भी किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदिकी जरूरत नहीं पड़ती अर्थात् उसके लिये कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। इसलिये इसको सिद्धि कहा है। लोकमें तो ऐसा कहा जाता है कि मनचाही चीज मिल गयी तो सिद्धि हो गयी, अणिमादि सिद्धियाँ मिल गयीं तो सिद्धि हो गयी। पर वास्तवमें यह सिद्धि नहीं है; क्योंकि इसमें पराधीनता होती है, किसी बातकी कमी रहती है और किसी वस्तु, परिस्थिति आदिकी जरूरत पड़ती है। अतः जिस सिद्धिमें किंचिन्मात्र भी कामना पैदा न हो, वही वास्तवमें सिद्धि है। जिस सिद्धिके मिलनेपर कामना बढ़ती रहे, वह सिद्धि वास्तवमें सिद्धि नहीं है, प्रत्युत एक बन्धन
ही है।
अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धिको प्राप्त हुआ साधक ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। वह जिस क्रमसे ब्रह्मको प्राप्त होता है, उसको मुझसे समझ—‘निबोध मे ’। कारण कि सांख्ययोगकी जो सार-सार बातें हैं, वे सांख्ययोगीके लिये अत्यन्त आवश्यक हैं और उन बातोंको समझनेकी बहुत जरूरत है।
‘निबोध’ पदका तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें क्रिया और सामग्रीकी प्रधानता नहीं है। किन्तु उस तत्त्वको समझनेकी प्रधानता है। इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भी सांख्ययोगीके विषयमें ‘निबोध ’ पद आया है।
‘समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा’ —सांख्ययोगीकी जो आखिरी स्थिति है, जिससे बढ़कर साधककी कोई स्थिति नहीं हो सकती, वही ज्ञानकी परा निष्ठा कही जाती है। उस परा निष्ठाको अर्थात् ब्रह्मको सांख्ययोगका साधक जिस प्रकारसे प्राप्त होता है, उसको मैं संक्षेपसे कहूँगा अर्थात् उसकी सार-सार बातें कहूँगा।