श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1194, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४९ ]
- साधक-संजीवनी *
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कर्म करता हुआ मनुष्य पापका भागी नहीं होता। इसीसे भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि 'भैया! तू जिस युद्धरूप क्रियाको घोर कर्म मान रहा है, वह तेरा धर्म है;
क्योंकि न्यायसे प्राप्त हुए युद्धको करना क्षत्रियोंका धर्म है, इसके सिवाय क्षत्रियके लिये दूसरा कोई श्रेयका साधन नहीं है' (गीता—दूसरे अध्यायका इकतीसवाँ श्लोक)।
परिशिष्ट भाव —निषिद्ध कर्ममें आसक्ति होनेसे अथवा निषिद्ध रीतिसे भोग भोगनेके कारण ही विहित कर्म कठिन प्रतीत होता है। वास्तवमें विहित कर्म सहज स्वाभाविक है, इसमें परिश्रम नहीं है।
इकतालिसवें श्लोकसे यहाँतक 'स्वकर्म', 'स्वधर्म' और 'सहजकर्म' शब्दोंका प्रयोग हुआ है। इससे सिद्ध होता है कि गीता स्वकर्म और सहजकर्मको ही 'स्वधर्म' मानती है।
विहित कर्म करनेमें दोष तो होता है, पर कामना, सुखबुद्धि, भोगबुद्धि न रहनेसे दोष लगता नहीं। तात्पर्य है कि दोष लगना या न लगना कर्ताकी नीयतपर निर्भर है; जैसे—डॉक्टरकी नीयत ठीक हो, पैसोंका उद्देश्य न होकर सेवाका उद्देश्य हो तो ऑपरेशनमें रोगीका अंग काटनेपर भी उसको दोष नहीं लगता, प्रत्युत निःस्वार्थभाव और हितकी दृष्टि होनेसे पुण्य होता है।
सम्बन्ध—अब भगवान् सांख्ययोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए पहले सांख्ययोगके अधिकारीका वर्णन करते हैं।
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
| सर्वत्र, | वशमें कर रहा है, | परमाम् | = सर्वश्रेष्ठ |
|---|---|---|---|
| असक्तबुद्धिः = जिसकी बुद्धि | विगतस्पृहः = जो स्पृहारहित है | नैष्कर्म्य- | |
| सब जगह | (वह मनुष्य) | सिद्धिम् | = नैष्कर्म्यसिद्धिको |
| आसक्तिरहित है, | सन्यासेन = सांख्ययोगके | अधिगच्छति | = प्राप्त हो |
| जितात्मा = जिसने शरीरको | द्वारा | जाता है। |
व्याख्या—संन्यास- (सांख्य-) योगका अधिकारी होनेसे ही सिद्धि होती है। अतः उसका अधिकारी कैसा होना चाहिये—यह बतानेके लिये श्लोकके पूर्वार्द्धमें तीन बातें बतायी हैं—
(१) 'असक्तबुद्धिः सर्वत्र'—जिसकी बुद्धि सब जगह आसक्तिरहित है अर्थात् देश, काल, घटना, परिस्थिति, वस्तु, व्यक्ति, क्रिया, पदार्थ आदि किसीमें भी जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती।
(२) 'जितात्मा'—जिसने शरीरपर अधिकार कर लिया है अर्थात् जो आलस्य, प्रमाद आदिसे शरीरके वशीभूत नहीं होता, प्रत्युत इसको अपने वशीभूत रखता है। तात्पर्य है कि वह किसी कार्यको अपने सिद्धान्तपूर्वक करना चाहता है तो उस कार्यमें शरीर तत्परतासे लग जाता है और किसी क्रिया, घटना, आदिसे हटना चाहता है तो वह वहाँसे हट जाता है। इस प्रकार जिसने शरीरपर विजय कर ली है, वह 'जितात्मा' कहलाता है।
(३) 'विगतस्पृहः'—जीवन-धारणमात्रके लिये जिनकी विशेष जरूरत होती है, उन चीजोंकी सूक्ष्म इच्छाका नाम 'स्पृहा' है; जैसे—साग-पत्ती कुछ मिल जाय, रूखी-सूखी
रोटी ही मिल जाय, कुछ-न-कुछ खाये बिना हम कैसे जी सकते हैं! जल पीये बिना हम कैसे रह सकते हैं! ठण्डीके दिनोंमें कपड़े बिलकुल न हों तो हम कैसे जी सकते हैं! सांख्ययोगका साधक इन जीवन-निर्वाह-सम्बन्धी आवश्यकताओंकी भी परवाह नहीं करता।
तात्पर्य यह हुआ कि सांख्ययोगमें चलनेवालेको जड़ताका त्याग करना पड़ता है। उस जड़ताका त्याग करनेमें उपर्युक्त तीन बातें आयी हैं। असक्तबुद्धि होनेसे वह जितात्मा हो जाता है और जितात्मा होनेसे वह विगतस्पृह हो जाता है, तब वह सांख्ययोगका अधिकारी हो जाता है।
'नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्यासेनाधिगच्छति'—ऐसा असक्तबुद्धि, जितात्मा और विगतस्पृह पुरुष सांख्ययोगके द्वारा परम नैष्कर्म्यसिद्धिको अर्थात् नैष्कर्म्यरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। कारण कि क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है और जब स्वयंका उस क्रियाके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता, तब कोई भी क्रिया और उसका फल उसपर किंचिन्मात्र भी लागू नहीं होता। अतः उसमें जो स्वाभाविक, स्वतःसिद्ध निष्कर्माता—निलिप्तता है, वह प्रकट हो जाती है।