श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1196, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ५१—५३ ]
- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —यहाँ 'सिद्धिम्' पदका अर्थ है—साधनरूप कर्मयोगसे होनेवाली अन्तःकरणकी पूर्ण शुद्धि, जिसकी प्राप्तिके बाद कर्मयोगी ज्ञानयोगमें अथवा भक्तियोगमें कहीं भी जा सकता है—
तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता । मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन जायते ॥
(श्रीमद्भा० ११।२०।१)
'तभीतक कर्म करना चाहिये, जबतक भोगोंसे वैराग्य न हो जाय अथवा जबतक मेरी लीला-कथाके श्रवण-कीर्तन आदिमें श्रद्धा न हो जाय।'
अगर कर्मयोगीके भीतर ज्ञानके संस्कार हैं तो वह ज्ञानमें चला जायगा और अगर भक्तिके संस्कार हैं तो वह भक्तिमें चला जायगा।
अगर किसी एकका आग्रह न हो तो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग—तीनों 'साधन' रूपसे भी हैं और 'साध्य' रूपसे भी हैं। साधनरूपसे तो तीनों अलग-अलग हैं, पर साध्यरूपसे तीनों एक ही हैं। इसलिये गीतामें कहाँ तो भगवान्ने भक्तिके द्वारा ज्ञानकी प्राप्ति अर्थात् साधन-भक्तिसे साध्य-ज्ञानकी प्राप्ति बतायी है—'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी' (१३।१०), 'मां च योऽव्यभिचारेण'……'ब्रह्मभूयाय कल्पते' (१४।२६), और कहीं ज्ञानसे भक्तिकी प्राप्ति अर्थात् साधन-ज्ञानसे साध्य-भक्तिकी प्राप्ति बतायी है—'सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र'……'सर्वभूतहिते रताः' (१२।४), 'ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा'……'मद्भक्तिं लभते पराम्' (१८।५४)।
भगवान्ने पहले 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः' (१८।४६)—इन पदोंसे कर्मयोगके द्वारा भक्तिकी सिद्धि बतायी और यहाँ 'सिद्धिं प्राप्नो यथा ब्रह्म' पदोंसे कर्मयोगके द्वारा ज्ञानयोगकी सिद्धि बताते हैं। पाँचवें अध्यायमें भी साधनरूप कर्मयोगसे ज्ञानयोगकी शीघ्र सिद्धि बतायी है—'योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति' (५।६)।
सम्बन्ध—ज्ञानकी परा निष्ठा प्राप्त करनेके लिये किस साधन-सामग्रीकी आवश्यकता है, उसको आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ ५१ ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३ ॥
| विशुद्ध्या | = (जो) विशुद्ध (सात्त्विकी) | आत्मानम् | = इन्द्रियोंका | नित्यम् | = निरन्तर |
|---|---|---|---|---|---|
| बुद्ध्या | = बुद्धिसे | नियम्य | = नियमन करके, | ध्यानयोगपरः | = ध्यानयोगके परायण |
| युक्तः | = युक्त, | यतवाक्कायमानसः | = शरीर-वाणी- | ||
| मनको वशमें करके, | हो जाता है, (वह) | ||||
| वैराग्यम् | = वैराग्यके | शब्दादीन् | = शब्दादि | अहङ्कारम् | = अहंकार, |
| समुपाश्रितः | = आश्रित, | विषयान् | = विषयोंका | बलम् | = बल, |
| विविक्तसेवी | = एकात्मका सेवन | ||||
| करनेवाला (और) | त्यक्त्वा | = त्याग करके | दर्पम् | = दर्प, | |
| लघ्वाशी | = नियमित भोजन | ||||
| करनेवाला (साधक) | च | = और | कामम् | = काम, | |
| धृत्या | = धैर्यपूर्वक | रागद्वेषौ | = राग-द्वेषको | क्रोधम् | = क्रोध |
| व्युदस्य | = छोड़कर | च | = और | ||
| परिग्रहम् | = परिग्रहसे |