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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

विमुच्य= रहित होकरनिर्ममः= ममतरहित (तथा)ब्रह्मभूयाय= ब्रह्मप्राप्तिका
(एवं)शान्तः= शान्त होकरकल्पते= पात्र हो जाता है।

व्याख्या—‘बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तः’ —‘जो सांख्ययोगी साधक परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है, उसकी बुद्धि विशुद्ध अर्थात् सात्त्विकी (गीता—इसी अध्यायका तीसवाँ श्लोक) हो। उसकी बुद्धिका विवेक साफ-साफ हो, उसमें किंचिन्मात्र भी सन्देह न हो।

इस सांख्ययोगके प्रकरणमें सबसे पहले बुद्धिका नाम आया है। इसका तात्पर्य है कि सांख्ययोगीके लिये जिस विवेककी आवश्यकता है, वह विवेक बुद्धिमें ही प्रकट होता है। उस विवेकसे वह जडताका त्याग करता है।

‘वैराग्यं समुपाश्रितः’ —‘जैसे संसारीलोग रागपूर्वक वस्तु, व्यक्ति आदिके आश्रित रहते हैं, उनको अपना आश्रय, सहारा मानते हैं, ऐसे ही सांख्ययोगका साधक वैराग्यके आश्रित रहता है अर्थात् जनसमुदाय, स्थान आदिसे उसकी स्वाभाविक ही निर्लिप्तता बनी रहती है। लौकिक और पारलौकिक सम्पूर्ण भोगोंसे उसका दृढ़ वैराग्य होता है।

‘विवित्तसेवी’ —‘सांख्ययोगके साधकका स्वभाव, उसकी रुचि स्वतः-स्वाभाविक एकात्ममें रहनेकी होती है। एकात्म-सेवनकी रुचि होनी तो बढ़िया है, पर उसका आग्रह नहीं होना चाहिये अर्थात् एकात्म न मिलनेपर मनमें विश्लेष, हलचल नहीं होनी चाहिये। आग्रह न होनेसे रुचि होनेपर भी एकात्म न मिले, प्रत्युत समुदाय मिले, खूब हल्ला-गुल्ला हो, तो भी साधक उकतायेगा नहीं अर्थात् सिद्धि-असिद्धिमें सम रहेगा। परन्तु आग्रह होगा तो वह उकता जायगा, उससे समुदाय सहा नहीं जायगा। अतः साधकका स्वभाव तो एकात्ममें रहनेका ही होना चाहिये, पर एकात्म न मिले तो उसके अन्तःकरणमें हलचल नहीं होनी चाहिये। कारण कि हलचल होनेसे अन्तःकरणमें संसारकी महत्ता आती है और संसारकी महत्ता आनेपर हलचल होती है, जो कि ध्यानयोगमें बाधक है।

‘एकात्ममें रहनेसे साधन अधिक होगा, मन भगवान्में अच्छी तरह लगेगा; अन्तःकरण निर्मल बनेगा’—इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती है, वह साधनमें सहायक होती है। परन्तु ‘एकात्ममें हल्ला-गुल्ला करनेवाला कोई नहीं होगा; अतः वहाँ नींद अच्छी आयेगी, वहाँ किसी भी प्रकारसे बैठ जायँ तो कोई देखनेवाला नहीं होगा, वहाँ सब प्रकारसे आराम रहेगा, एकात्ममें रहनेसे लोग भी ज्यादा मान-बड़ाई, आदर करेंगे’—इन बातोंको लेकर मनमें जो प्रसन्नता होती

है, वह साधनमें बाधक होती है; क्योंकि यह सब भोग है। साधकको इन सुख-सुविधाओंमें फँसना नहीं चाहिये, प्रत्युत इनसे सदा सावधान रहना चाहिये।

‘लब्धाशी’ —साधकका स्वभाव स्वल्प अर्थात् नियमित और सात्त्विक भोजन करनेका हो। भोजनके विषयमें हित, मित और मध्य—ये तीन बातें बतायी गयी हैं। ‘हित’ का तात्पर्य है—भोजन शरीरके अनुकूल हो। ‘मित’ का तात्पर्य है—भोजन न तो अधिक करे और न कम करे, प्रत्युत जितने भोजनसे शरीर-निर्वाह हो जाय, उतना भोजन करे (गीता—छठे अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। भोजनसे शरीर पुष्ट हो जायगा—ऐसे भावसे भोजन न करे, प्रत्युत केवल औषधकी तरह शुष्वा-निवृत्तिके लिये ही भोजन करे, जिससे साधनमें विघ्न न पड़े। ‘मध्य’ का तात्पर्य है—भोजन पवित्र हो।

‘धृत्यात्मानं नियम्य च’ —सांसारिक कितने ही प्रलोभन सामने आनेपर भी बुद्धिको अपने ध्येय परमात्मतत्त्वसे विचलित न होने देना—ऐसी दृढ़ सात्त्विकी धृति (गीता—इसी अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)—के द्वारा इन्द्रियोंका नियमन करे अर्थात् उनको मर्यादामें रखे। आठों पहर यह जागृति रहे कि इन्द्रियोंके द्वारा साधनके विरुद्ध कोई भी चेष्टा न हो।

‘यतवाक्कायमानसः’ —शरीर, वाणी और मनको संयत (वशमें) करना भी साधकके लिये बहुत जरूरी है (गीता—सत्रहवें अध्यायका चौदहवाँ, पंद्रहवाँ और सोलहवाँ श्लोक)। अतः वह शरीरसे वृथा न घूमे, देखने-सुननेके शौकसे कोई यात्रा न करे। वाणीसे वृथा बातचीत न करे, आवश्यक होनेपर ही बोले, असत्य न बोले, निन्दा-चुगली न करे। मनसे रागपूर्वक संसारका चिन्तन न करे, प्रत्युत परमात्माका चिन्तन करे।

‘शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा’ —ध्यानके समय बाहरके जितने सम्बन्ध हैं, जो कि विषयरूपसे आते हैं और जिनसे संयोगजन्य सुख होता है, उन शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—पाँचों विषयोंका स्वरूपसे ही त्याग कर देना चाहिये। कारण कि विषयोंका रागपूर्वक सेवन करनेवाला ध्यानयोगका साधन नहीं कर सकता। अगर विषयोंका रागपूर्वक सेवन करेगा तो ध्यानमें वृत्तियाँ (बहिर्मुख होनेसे) नहीं लगेगी और विषयोंका चिन्तन होगा।