श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1184, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४५ ]
- साधक-संजीवनी *
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काम करता है, वह समाजमें और संसारमें आदरका पात्र नहीं होता। समाजमें ही नहीं, घरमें भी जो व्यक्ति पेटू और चटटू होता है, उसकी दूसरे निन्दा करते हैं। ब्राह्मणोंने स्वार्थ-दृष्टिसे अपने ही मुँहसे अपनी (ब्राह्मणोंकी) प्रशंसा, श्रेष्ठताकी बात नहीं कही है। उन्होंने ब्राह्मणोंके लिये त्याग ही बताया है। सात्त्विक मनुष्य अपनी प्रशंसा नहीं करते, प्रत्युत दूसरोंकी प्रशंसा, दूसरोंका आदर करते हैं। तात्पर्य है कि ब्राह्मणोंने कभी अपने स्वार्थ और अभिमानकी बात नहीं कही। यदि वे स्वार्थ और अभिमानकी बात कहते तो वे इतने आदरणीय नहीं होते, संसारमें और शास्त्रोंमें आदर न पाते। वे जो आदर पाते हैं, वह त्यागसे ही पाते हैं।
इस प्रकार मनुष्यको शास्त्रोंका गहरा अध्ययन करके उपर्युक्त सभी बातोंको समझना चाहिये और ऋषि-मुनियोंपर, शास्त्रकारोंपर झूठा आक्षेप नहीं करना चाहिये।
सम्बन्ध—स्वभावज कर्मोंका वर्णन करनेका प्रयोजन क्या है—इसको अब आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥
| स्वे, स्वे | = अपने-अपने | (परमात्मा)-को | सिद्धिम् | = सिद्धिको |
|---|---|---|---|---|
| कर्मणि | = कर्ममें | लभते | = प्राप्त कर | विन्दति |
| अभिरतः | = प्रीतिपूर्वक लगा हुआ | स्वकर्मनिरतः | = अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य | तत् |
| नरः | = मनुष्य | यथा | = जिस प्रकार | शृणु |
| संसिद्धिम् | = सम्यक् सिद्धि |
व्याख्या—‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः’ —गीताके अध्ययनसे ऐसा मालूम होता है कि मनुष्यकी जैसी स्वतःसिद्ध स्वाभाविक प्रकृति (स्वभाव) है, उसमें अगर वह कोई नयी उलझन पैदा न करे, राग-द्वेष न करे तो वह प्रकृति उसका स्वाभाविक ही कल्याण कर दे। तात्पर्य है कि प्रकृतिके द्वारा प्रवाहरूपसे अपने-आप होनेवाले जो स्वाभाविक कर्म हैं, उनका स्वार्थ-त्यागपूर्वक प्रीति और तत्परतासे आचरण करे; परन्तु कर्मोंके प्रवाहके साथ न राग हो, न द्वेष हो और न फलेच्छा हो। राग-द्वेष और फलेच्छासे रहित होकर क्रिया करनेसे ‘करनेका वेग’ शान्त हो जाता है और कर्ममें आसक्ति न होनेसे नया वेग पैदा नहीं होता। इससे प्रकृतिके पदार्थों और क्रियाओंके साथ निलिप्तता (असंगता) आ जाती है। निलिप्तता होनेसे प्रकृतिकी क्रियाओंका प्रवाह
ऊँच-नीच वर्णोंमें प्राणियोंका जन्म मुख्यरूपसे गुणों और कर्मोंके अनुसार होता है—‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ’ (गीता ४।१३); परन्तु ऋणानुबन्ध, शाप, वरदान, संग आदि किसी कारणविशेषसे भी ऊँच-नीच वर्णोंमें जन्म हो जाता है। उन वर्णोंमें जन्म होनेपर भी वे अपने पूर्वस्वभावके अनुसार ही आचरण करते हैं। यही कारण है कि ऊँचे वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी उनके नीच आचरण देखे जाते हैं, जैसे धनुष्यकारी आदि; और नीच वर्णमें उत्पन्न होनेपर भी वे महापुरुष होते हैं, जैसे विदुर, कबीर, रैदास आदि।
आज जिस समुदायमें जातिगत, कुलपरम्परागत, समाजगत और व्यक्तिगत जो भी शास्त्र-विपरीत दोष आये हैं, उनको अपने विवेक-विचार, सत्संग, स्वाध्याय आदिके द्वारा दूर करके अपनेमें स्वच्छता, निर्मलता, पवित्रता लानी चाहिये, जिससे अपने मनुष्यजन्मका ध्येय सिद्ध हो सके।
स्वाभाविक ही चलता रहता है और उनके साथ अपना कोई सम्बन्ध न रहनेसे साधककी अपने स्वरूपमें स्थिति हो जाती है, जो कि प्राणिमात्रकी स्वतः-स्वाभाविक है। अपने स्वरूपमें स्थिति होनेपर उसका परमात्माकी तरफ स्वाभाविक आकर्षण हो जाता है। परन्तु यह सब होता है कर्मोंमें ‘अभिरति’ होनेसे, आसक्ति होनेसे नहीं। कर्मोंमें एक तो ‘अभिरति’ होती है और एक ‘आसक्ति’ होती है। अपने स्वाभाविक कर्मोंको केवल दूसरोंके हितके लिये तत्परता और उत्साहपूर्वक करनेसे अर्थात् केवल देनेके लिये कर्म करनेसे मनमें जो प्रसन्नता होती है, उसका नाम ‘अभिरति’ है। फलकी इच्छासे कुछ करना अर्थात् कुछ पानेके लिये कर्म करना ‘आसक्ति’ है। कर्मोंमें अभिरतिसे कल्याण होता है और आसक्तिसे बन्धन होता है।