श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
इस प्रकरणके 'स्वे स्वे कर्मणि'; 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य'; 'स्वभावनियतं कर्म'; 'सहजं कर्म' आदि पदोंमें 'कर्म' शब्द एकवचनमें आया है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य प्रीति और तत्परतापूर्वक चाहे एक कर्म करे, चाहे अनेक कर्म करे, उसका उद्देश्य केवल परमात्मप्राप्ति होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक ही होती है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको लेकर मनुष्य जितने भी कर्म करता है, वे सब कर्म अन्तमें उसी उद्देश्यमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् उसी उद्देश्यकी पूर्ति करनेवाले हो जाते हैं। जैसे गंगाजी हिमालयसे निकलकर गंगासागरतक जाती हैं तो नद, नदियाँ, झरने, सरोवर, वर्षाका जल—ये सभी उसकी धारामें मिलकर गंगासे एक हो जाते हैं, ऐसे ही उद्देश्यवालेके सभी कर्म उसके उद्देश्यमें मिल जाते हैं। परन्तु जिसकी कर्मोंमें आसक्ति है, वह एक कर्म करके अनेक फल चाहता है अथवा अनेक कर्म करके एक फल चाहता है; अतः उसका उद्देश्य एक परमात्माकी प्राप्तिका न होनेसे उसकी कर्तव्यनिष्ठा एक नहीं होती (गीता—दूसरे अध्यायका इकतालीसवाँ श्लोक)।
'स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु'— अपने कर्मोंमें प्रीतिपूर्वक तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य परमात्माको जैसे प्राप्त होता है, वह सुनो अर्थात् कर्ममात्र परमात्मप्राप्तिका साधन है, इस बातको सुनो और सुन करके ठीक तरहसे समझो।
विशेष बात
मालिककी सुख-सुविधाकी सामग्री जुटा देना, मालिकके दैनिक कार्योंमें अनुकूलता उपस्थित कर देना आदि कार्य तो वेतन लेनेवाला नौकर भी कर सकता है और करता भी है। परन्तु उसमें 'क्रिया' की (कि इतना काम करना है) और 'समय' की (कि इतने घंटे काम करना है) प्रधानता रहती है। इसलिये वह काम-धंधा 'सेवा' नहीं बन पाता। यदि मालिकका वह काम-धंधा आदरपूर्वक सेव्यबुद्धिसे, महत्त्वबुद्धिसे किया जाय तो वह 'सेवा' हो जाता है।
सेव्यबुद्धि, महत्त्वबुद्धि चाहे जन्मके सम्बन्धसे हो, चाहे विद्याके सम्बन्धसे; चाहे वर्ण-आश्रमके सम्बन्धसे हो; चाहे योग्यता, अधिकार, सदगुण-सदाचारके सम्बन्धसे। जहाँ महत्त्वबुद्धि हो जाती है, वहाँ सेव्यको सुख-आराम कैसे मिले? सेव्यकी प्रसन्नता किस बातमें है? सेव्यका
क्या रख है? क्या सचि है?—ऐसे भाव होनेसे जो भी काम किया जाय, वह 'सेवा' हो जाता है।
सेव्यका वही काम पूजाबुद्धि, भगवद्वुद्धि, गुरुबुद्धि आदिसे किया जाय और पूज्यभावसे चन्दन लगाया जाय, पुष्प चढ़ाये जायें, माला पहनायी जाय, आरती की जाय, तो वह काम 'पूजन' हो जाता है। इससे सेव्यके चरणस्पर्श अथवा दर्शनमात्रसे चितकी प्रसन्नता, हृदयकी गद्गदता, शरीरका रोमांचित होना आदि होते हैं और सेव्यके प्रति विशेष भाव प्रकट होते हैं। उससे सेव्यकी सेवामें कुछ शिथिलता आ सकती है; परन्तु भावोंके बढ़नेपर अन्तःकरण-शुद्धि, भगवत्प्रेम, भगवदर्शन आदि हो जाते हैं।
मालिकका समय-समयपर काम-धंधा करनेसे नौकरको पैसे मिल जाते हैं और सेव्यकी सेवा करनेसे सेवकको अन्तःकरण-शुद्धिपूर्वक भगवत्प्राप्ति हो जाती है; परन्तु पूजाभावके बढ़नेसे तो पूजकको तत्काल भगवत्प्राप्ति हो जाती है। तात्पर्य है कि चरणचौपी तो नौकर भी करता है, पर उसको सेवाका आनन्द नहीं मिलता; क्योंकि उसकी दृष्टि पैसोंपर रहती है। परन्तु जो सेवाबुद्धिसे चरणचौपी करता है, उसको सेवामें विशेष आनन्द मिलता है; क्योंकि उसकी दृष्टि सेव्यके सुखपर रहती है। पूजामें तो चरण छूनेमात्रसे शरीर रोमांचित हो जाता है और अन्तःकरणमें एक पारमार्थिक आनन्द होता है। उसकी दृष्टि पूज्यकी महतापर और अपनी लघुतापर रहती है। ऐसे देखा जाय तो नौकरके काम-धंधेसे मालिकको आराम मिलता है, सेवामें सेव्यको विशेष आराम तथा सुख मिलता है और पूजामें पूजकके भावसे पूज्यको प्रसन्नता होती है। पूजामें शरीरके सुख-आरामकी प्रधानता नहीं होती।
अपने स्वभावज कर्मोंके द्वारा पूजा करनेसे पूजकका भाव बढ़ जाता है तो उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरसे होनेवाली (चेष्टा, चिन्तन, समाधि आदि) सभी छोटी-बड़ी क्रियाएँ सब प्राणियोंमें व्यापक परमात्माकी पूजन-सामग्री बन जाती है। उसकी दैनिकचर्चा अर्थात् खाना-पीना आदि सब क्रियाएँ भी पूजन-सामग्री बन जाती हैं।
जैसे ज्ञानयोगीका 'मैं कुछ भी नहीं करता हूँ' यह भाव हरदम बना रहता है, ऐसे ही अनेक प्रकारकी क्रियाएँ करनेपर भी भक्तके भीतर एक भगवद्भाव हरदम बना रहता है। उस भावकी गाढ़तामें उसका अहंभाव भी छूट जाता है।