श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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परिशिष्ट भाव —अपने वर्णके सिवाय जिसने जो-जो कर्म स्वीकार कर लिये हैं, वे सब भी ‘स्वे स्वे कर्मणि’ के अन्तर्गत लेने चाहिये। जैसे, मनुष्य अपनेको वकील, नौकर, अध्यापक अथवा चिकित्सक आदि मानता है तो उसके कर्तव्यका प्रेमपूर्वक, आदरपूर्वक निःस्वार्थभावसे ठीक-ठीक पालन करना भी उसके लिये ‘स्वकर्म’ है।
मनुष्य स्वार्थबुद्धि, पक्षपात, कामना आदिको लेकर कर्म करता है तो वह ‘आसक्ति’ होती है। वह प्रेमपूर्वक, निष्कामभावसे और लोकहितके लिये कर्म करता है तो वह ‘अभिरति’ होती है। भगवान्ने कर्मोंमें ‘आसक्ति’ का निषेध किया है—‘न कर्मस्वनुषज्जते ’ (गीता ६।४)। मनुष्य जाति आदिको लेकर न अपनेको ऊँचा समझे, न नीचा समझे, प्रत्युत घड़ीके पुर्जेकी तरह अपनी जगह ठीक कर्तव्यका पालन करे और दूसरेकी निन्दा, तिरस्कार न करे तथा अपना अभिमान भी न करे, तब ‘अभिरति’ होगी।
वास्तवमें ‘कर्म’ की प्रधानता नहीं है, प्रत्युत ‘भाव’ की प्रधानता है। कर्ताका भाव शुद्ध होगा तो वह कल्याण करनेवाला हो जायगा, चाहे कर्ता किसी वर्णका हो। ‘कर्म’ में वर्णकी मुख्यता है और ‘भाव’ में दैवी अथवा आसुरी-सम्पत्तिकी मुख्यता है। अतः दैवी-आसुरी-सम्पत्ति किसी वर्णको लेकर नहीं होती, प्रत्युत सबमें हो सकती है। दैवी-सम्पत्ति मोक्ष देनेवाली और आसुरी-सम्पत्ति बाँधनेवाली है। इसलिये अगर ब्राह्मणमें भी अभिमान हो तो वह आसुरी-सम्पत्तिवाला हो जायगा अर्थात् उसका पतन हो जायगा—
नीच नीच सब तर गये, राम भजन लवलीन। जाति के अभिमान से, डूबे सभी कुलीन॥
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ ४६ ॥
| यतः | = जिस परमात्मासे | इदम् | = यह | अभ्यर्च्य | = पूजन करके |
|---|---|---|---|---|---|
| भूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंकी | सर्वम् | = सम्पूर्ण संसार | मानवः | = मनुष्यमात्र |
| प्रवृत्तिः | = प्रवृत्ति (उत्पत्ति) | ततम् | = व्याप्त है, | सिद्धिम् | = सिद्धिको |
| होती है (और) | तम् | = उस परमात्माका | विन्दति | = प्राप्त हो | |
| येन | = जिससे | स्वकर्मणा | = अपने कर्मके द्वारा | जाता है। |
व्याख्या —‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्’—जिस परमात्मासे संसार पैदा हुआ है, जिससे सम्पूर्ण संसारका संचालन होता है, जो सबका उत्पादक, आधार और प्रकाशक है और जो सबमें परिपूर्ण है अर्थात् जो परमात्मा अनन्त ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्तिसे पहले भी था, जो अनन्त ब्रह्माण्डोंके लीन होनेपर भी रहेगा और अनन्त ब्रह्माण्डोंके रहते हुए भी जो रहता है तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डोंमें व्याप्त है, उसी परमात्माका अपने-अपने स्वभावज (वर्णाचित स्वाभाविक) कर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये।
‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ —मनुस्मृतिमें ब्राह्मणोंके लिये छः कर्म बताये गये हैं—स्वयं पढ़ना और दूसरोंको पढ़ाना, स्वयं यज्ञ करना और दूसरोंसे यज्ञ करना तथा
स्वयं दान लेना और दूसरोंको दान देना१ (इनमें पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना—ये तीन कर्म जीविकाके हैं और पढ़ना, यज्ञ करना और दान देना—ये तीन कर्तव्यकर्म हैं)। उपर्युक्त शास्त्रनियत छः कर्म और शम-दम आदि नौ स्वभावज कर्म तथा इनके अतिरिक्त खाना-पीना, उठना-बैठना आदि जितने भी कर्म हैं, उन कर्मोंके द्वारा ब्राह्मण चारों वर्णोंमें व्याप्त परमात्माका पूजन करें। तात्पर्य है कि परमात्माकी आज्ञासे, उनकी प्रसन्नताके लिये ही भगवद्वुद्धिसे निष्कामभावपूर्वक सबकी सेवा करें।
ऐसे ही क्षत्रियोंके लिये पाँच कर्म बताये गये हैं—प्रजाकी रक्षा करना, दान देना, यज्ञ करना, अध्ययन करना और विषयोंमें आसक्त न होना१। इन पाँच कर्मों तथा शौर्य,
१-अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा। दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ (मनु० १।८८)
२-प्रजानां रक्षणं दानमिच्छाध्ययनमेव च। विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः ॥ (मनु० १।८९)