श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्लोक ४२ ] * साधक-संजीवनी * ११७३
भी कई तरहकी आती है। इसलिये गीतामें कहा गया है कि तीनों लोकोंमें ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो तीनों गुणोंसे रहित हो (इसी अध्यायका चालीसवाँ श्लोक)।
अब जो मनुष्येतर योनिवाले पशु-पक्षी आदि हैं, उनमें भी ऊँच-नीच माने जाते हैं; जैसे गाय आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं
और कुत्ता, गधा, सूअर आदि नीच माने जाते हैं। कबूतर आदि श्रेष्ठ माने जाते हैं और कौआ, चील आदि नीच माने जाते हैं। इन सबको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति भी एक समान नहीं मिलती। तात्पर्य है कि ऊर्ध्वगति, मध्यगति और अधोगति-वालोंमें भी कई तरहके जाति-भेद और परिस्थिति-भेद होते हैं।
परिशिष्ट भाव—चौथे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि चारों वर्णोंकी रचना मैंने गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक की है—'गुणकर्मविभागशः' (४।१३) और यहाँ कहते हैं कि चारों वर्णोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न हुए तीनों गुणोंके द्वारा विभक्त किये गये हैं—'स्वभावप्रभवैर्गुणैः'। चौथे अध्यायमें तो चारों वर्णोंके पैदा होनेकी बात है और यहाँ चारों वर्णोंके कर्मोंकी बात है। तात्पर्य, चौथे अध्यायमें भगवान्ने बताया कि चारों वर्णोंका जन्म पूर्वजन्मके गुणकर्मोंके अनुसार हुआ है और यहाँ बताते हैं कि जन्मके बाद चारों वर्णोंके अमुक-अमुक कर्म होने चाहिये, जिनके अनुसार उनकी आगे गति होगी।
सम्बन्ध—अब भगवान् ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म बताते हैं।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिराजर्वमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥ ४२॥
शम: = मनका निग्रह करना; दम: = इन्द्रियोंको वशमें करना; तप: = धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; शौचम् = बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; क्षान्ति: = दूसरोंके अपराधको क्षमा करना; आर्जवम् = शरीर, मन आदिमें सरलता रखना; ज्ञानम् = वेद, शास्त्र आदिका ज्ञान होना; विज्ञानम् = यज्ञविधिको अनुभवमें लाना; च = और; आस्तिक्यम् = परमात्मा, वेद आदिमें आस्तिकभाव रखना— एव = (ये सब-के-सब) ही; ब्रह्मकर्म, स्वभावजम् = ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।
व्याख्या—'शम:'—मनको जहाँ लगाना चाहें, वहाँ लग जाय और जहाँसे हटाना चाहें, वहाँसे हट जाय—इस प्रकार मनके निग्रहको 'शम' कहते हैं।
'दम:'—जिस इन्द्रियसे जब जो काम करना चाहें, तब वह काम कर लें और जिस इन्द्रियको जब जहाँसे हटाना चाहें, तब वहाँसे हटा लें—इस प्रकार इन्द्रियोंको वशमें करना 'दम' है।
'तप:'—गीतामें शरीर, वाणी और मनके तपका वर्णन आता है (सत्रहवें अध्यायका चौदहवाँ, पन्द्रहवाँ और सोलहवाँ श्लोक), उस तपको लेते हुए भी यहाँ वास्तवमें 'तप' का अर्थ है—अपने धर्मका पालन करते हुए जो कष्ट हो अथवा कष्ट आ जाय, उसको प्रसन्नतापूर्वक सहना अर्थात् कष्टके आनेपर चित्तमें प्रसन्नताका होना।
'शौचम्'—अपने मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिको पवित्र रखना तथा अपने खान-पान, व्यवहार आदिकी पवित्रता रखना—इस प्रकार शौचाचार-सदाचारका ठीक पालन करनेका नाम 'शौच' है।
'क्षान्ति:'—कोई कितना ही अपमान करे, निन्दा करे, दुःख दे और अपनेमें उसको दण्ड देनेकी योग्यता, बल, अधिकार भी हो, फिर भी उसको दण्ड न देकर उसके क्षमा माँगे बिना ही उसको प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देनेका नाम 'क्षान्ति' है।
'आर्जवम्'—शरीर, वाणी आदिके व्यवहारमें सरलता हो और मनमें छल, कपट, छिपाव आदि दुर्भाव न हों अर्थात् सीधा-सादापन हो, उसका नाम 'आर्जव' है।
'ज्ञानम्'—वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदिका अच्छी तरह अध्ययन होना और उनके भावोंका ठीक तरहसे बोध होना तथा कर्तव्य-अकर्तव्यका बोध होना 'ज्ञान' है।
'विज्ञानम्'—यज्ञमें स्रुक्, स्रुवा आदि वस्तुओंका किस