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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

आलस्य और प्रमाद करेगा तो कर्तव्यच्युत होकर दुराचार करनेसे नरकमें जाना पड़ेगा१।

‘यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः’—निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न हुआ सुख आरम्भमें और परिणाममें अपनेको मोहित करनेवाला है। इस सुखमें न तो आरम्भमें विवेक रहता है और न परिणाममें विवेक रहता है अर्थात् यह सुख विवेकको जाग्रत् नहीं होने देता। पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदिमें भी विवेक-शक्ति जाग्रत् न रहनेसे वे क्रियाके आरम्भ और परिणामको सोच नहीं पाते। ऐसे ही जिस सुखके कारण मनुष्य यह सोच ही नहीं सकता कि इस निद्रा आदिसे उत्पन्न हुए सुखका परिणाम हमारे लिये क्या होगा? उससे क्या लाभ होगा? क्या हानि होगी? क्या हित होगा? क्या अहित होगा? उस सुखको तामस कहा गया है—‘तत्तामसमुदाहृतम्’।

विशेष बात

(१) प्रकृति और पुरुष—दोनों अनादि हैं, और ‘ये दो हैं’ इस प्रकार इनकी पृथक्ताका विवेक भी अनादि है। यह विवेक पुरुषमें ही रहता है, प्रकृतिमें नहीं। जब यह पुरुष इस विवेकका अनादर करके अविवेकके कारण प्रकृतिके साथ सम्बन्ध जोड़ लेता है, तब इस सम्बन्धके कारण पुरुषमें राग पैदा हो जाता है१।

जब राग बहुत सूक्ष्म रहता है, तब विवेक प्रबल रहता है। जब राग बढ़ जाता है, तब विवेक दब जाता है, मिटता नहीं। पर विवेक ठीक तरहसे जाग्रत् हो जाय तो फिर राग टिकता नहीं अर्थात् रागका अभाव हो जाता है और उस समय पुरुष मुक्त कहलाता है।

उस रागके कारण मनुष्यकी प्रकृतिजन्म सुखमें आसक्ति हो जाती है। उस आसक्तिके रहते हुए जब मनुष्य किसी कारणवश सात्त्विक सुखको प्राप्त करना चाहता है, तब राजस और तामस सुखका त्याग करनेमें उसे कठिनता मालूम देती है—‘यत्तदग्रे विषमिव’। परन्तु जब राग मिट

जाता है, तब वह सुख अमृतकी तरह हो जाता है—‘परिणामेऽमृतोपमम्’।

रागके कारण ही रजोगुणी सुख आरम्भमें अमृतकी तरह दीखता है। पर वह सुख परिणाममें प्राणीके लिये जहरकी तरह अनिष्टकारक अर्थात् महान् दुःखरूप हो जाता है। प्रकृतिजन्म सुखकी आसक्ति होनेपर दुःखकी परम्पराका कोई अन्त नहीं आता।

जब वही राग तमोगुणका रूप धारण कर लेता है, तब मनुष्यकी वृत्तिर्थां भारी हो जाती हैं। फिर मनुष्य नींद और आलस्यमें समय बरबाद कर देता है तथा आवश्यक कर्तव्यसे विमुख होकर अकर्तव्यमें लग जाता है। परन्तु तामस पुरुषको इन्हींमें सुख मालूम देता है। इसलिये यह तामस सुख आदि और अन्तमें मोहित करनेवाला है।

(२) जो प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है, वह वास्तवमें ‘नहीं’ है। पर जो ‘नहीं’ को प्रकाशित करनेवाला तथा उसका आधार है, वह वास्तवमें ‘है’ तत्त्व है। उसी तत्त्वको ‘सच्चिदानन्द’ कहते हैं। निरन्तर सत्तारूपसे रहनेके कारण उसे ‘सत्’ कहते हैं, ज्ञानस्वरूप होनेके कारण उसे ‘चित्’ कहते हैं और आनन्दस्वरूप होनेके कारण उसे ‘आनन्द’ कहते हैं। उस सच्चिदानन्द परमात्माका ही अंश होनेसे यह प्राणी भी सच्चिदानन्दस्वरूप है। परन्तु जब प्राणी असत् वस्तुकी इच्छा करता है कि अमुक वस्तु मुझे मिले, तब उस इच्छासे वह स्वतःस्वाभाविक आनन्द—सुख ढक जाता है। जब असत् वस्तुकी इच्छा मिट जाती है, तब उस इच्छाके मिटते ही वह स्वतःस्वाभाविक सुख प्रकट हो जाता है।

नित्य-निरन्तर रहनेवाला जो सुखरूप ‘तत्त्व’ है, उसमें जब सात्त्विकी बुद्धि तल्लीन हो जाती है, तब बुद्धिमें स्वच्छता, निर्मलता आ जाती है। उस स्वच्छ और निर्मल बुद्धिसे अनुभवमें आनेवाला वह स्वाभाविक सुख ही सात्त्विक कहलाता है। बुद्धिसे भी जब सम्बन्ध छूट जाता है, तब वास्तविक सुख रह जाता है। सात्त्विकी बुद्धिके सम्बन्धसे ही

१-तमोगुणकी वृत्ति जो प्रमाद है, वह तो अच्छी प्रवृत्तिको रोककर खेल-कूद आदि सामान्य फालतू क्रियाओंमें लगाता है; परन्तु जब प्रमादके साथ राग मिल जाता है (जो कि रजोगुणका रूप है), तब उससे कामना पैदा हो जाती है। कामनासे फिर अनेक तरहके पाप, अनर्थ होते हैं, जिनका परिणाम बड़ा भयंकर होता है।

२-रागसे अनेक विकार पैदा होते हैं, पर वे सब विकार प्रकृतिमें ही होते हैं, पुरुषमें नहीं। प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेसे पुरुष प्रकृतिके उन विकारोंको अपनेमें मान लेता है तो यह पुरुष भोगी हो जाता है। परन्तु जब इसको यह बोध हो जाता है कि विकार आते हैं और जाते हैं, उत्पन्न होते हैं और नष्ट होते हैं, पर विकारोंके आदि और अन्तको देखनेवाली अपनी नित्य सत्ता ज्यों-की-त्यों ही रहती है, तब उस अवस्थामें पुरुष योगी हो जाता है।