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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1168

श्लोक ३१ ]

  • साधक-संजीवनी *

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सोचना आदि) करना; बीड़ी, सिगरेट, शराब, भाँग, तम्बाकू, खेल-तमाशा आदि दुर्व्यसनोंमें लगना और चोरी, डकैती, झूठ, कपट, बेईमानी, व्यभिचार, अभक्ष्य-भक्षण आदि दुराचारोंमें लगना 'सक्रिय प्रमाद' है।

प्रमादके कारण तामस पुरुषोंको निरर्थक समय बरबाद करनेमें तथा झूठ, कपट, बेईमानी आदि करनेमें सुख मिलता है। जैसे काम-धंधा करनेवाले पैसे (मजदूरी या वेतन) तो पूरे ले लेते हैं, पर काम पूरा और ठीक ढंगसे नहीं करते। चिकित्सकलोग रोगियोंका ठीक ढंगसे इलाज नहीं करते, जिससे रोगीलोग बार-बार आते रहें और पैसे देते रहें। दूध बेचनेवाले पैसेको लोभमें दूधमें पानी मिलाकर बेचते हैं। पैसे अधिक देनेपर भी वे पानी मिलाना नहीं छोड़ते। ऐसे पापरूप प्रमादसे उनको घोर नरकोंकी प्राप्ति होती है।

जब तमोगुणी प्रमाद-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके विवेक-ज्ञानको ढक देती है और जब तमोगुणी निद्रा-आलस्य-वृत्ति आती है, तब वह सत्त्वगुणके प्रकाशको ढक देती है। विवेक-ज्ञानके ढकनेपर प्रमाद होता है तथा प्रकाशके ढकनेपर आलस्य और निद्रा आती है। तामस पुरुषको निद्रा, आलस्य और प्रमाद—तीनोंसे सुख मिलता है, इसलिये तामस सुखको इन तीनोंसे उत्पन्न बताया गया है।

विशेष बात

निद्रा दो प्रकारकी होती है—युकुनिद्रा और अतिनिद्रा। (१) 'युकुनिद्रा'—निद्रामें एक विश्राम मिलता है। विश्रामसे शरीर, मन, बुद्धि, अन्तःकरणमें नीरोगता, स्फूर्ति, स्वच्छता, निर्मलता और ताजगी आती है। ताजगी आनेसे साधन-भजन करनेमें और सांसारिक काम करनेमें भी शक्ति मिलती है और उत्साह रहता है। इसलिये युकुनिद्रा दोषी नहीं है, प्रत्युत सबके लिये आवश्यक है। भगवान्ने भी युकुनिद्राको आवश्यक बताया है—'युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा' (गीता ६।१७)।

ताजगीमात्रके लिये निद्रा साधकके लिये आवश्यक है। जिस साधकके रागपूर्वक सांसारिक संकल्प नहीं होते, उसको नींद बहुत जल्दी आ जाती है और जो ज्यादा संकल्पशील है, उसको नींद जल्दी नहीं आती। इससे यह सिद्ध हुआ कि संसारका जो सम्बन्ध है, वह निद्राका सुख भी नहीं लेने देता। निद्रा आवश्यक क्यों है? कारण कि निद्रामें जो स्थिर तत्त्व है, वह साधकको साधनमें प्रवृत्त करनेमें और सांसारिक कार्य करनेमें बल देता है, इसलिये

निद्रा आवश्यक है।

यद्यपि नींद तामसी है, तथापि नींदका जो बेहोशीपना है, वह त्याज्य है और जो विश्रामपना है, वह ग्राह्य है। परन्तु हरेक आदमी बेहोशीके बिना विश्रामपना ग्रहण नहीं कर सकता; अतः उनके लिये नींदका बेहोशीभाग भी ग्राह्य है। हाँ, जो साधना करके ऊँचे उठ गये हैं, उनको नींदके बेहोशीभागके बिना भी जाग्रत्-सुषुप्तिमें विश्राम मिल जाता है। कारण कि जाग्रत्-अवस्थामें संसारके चिन्तनका सर्वथा त्याग होकर परमात्मतत्त्वमें स्थिति हो जाती है तो महान् विश्राम, सुख मिलता है; इस स्थितिसे भी असंग होनेपर वास्तविक तत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।

जो साधक हैं, उनको विश्रामके लिये नहीं सोना चाहिये। उनका तो यही भाव होना चाहिये कि पहले काम-धंधा करते हुए भगवान्का भजन करते थे, अब लेटे-लेटे भजन करना है।

(२) 'अतिनिद्रा'—समयपर सोना और समयपर जागना युकुनिद्रा है और अधिक सोना अतिनिद्रा है। अतिनिद्राके आदि और अन्तमें शरीरमें आलस्य भरा रहता है। शरीरमें भारीपन रहता है। अधिक नींद लेनेका स्वभाव होनेसे हरेक कार्यमें नींद आती रहती है।

चौदहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने पहले प्रमादको, दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें निद्राको रखा है—'प्रमादालस्यनिद्राभिस्तनिबध्नाति भारत।' परन्तु यहाँ पहले निद्राको, दूसरे नम्बरमें आलस्यको और तीसरे नम्बरमें प्रमादको रखा है—'निद्रालस्यप्रमादोत्थम्।' इस व्यतिक्रमका कारण यह है कि वहाँ इन तीनोंके द्वारा मनुष्यको बाँधनेका प्रसंग है और यहाँ मनुष्यका पतन करनेका प्रसंग है। बाँधनेके विषयमें प्रमाद सबसे अधिक बन्धनकारक है; अतः इसको सबसे पहले रखा है। कारण कि प्रमाद निषिद्ध आचरणोंमें प्रवृत्त करता है, जिससे अधोगति होती है। आलस्य केवल अच्छी प्रवृत्तिको रोकनेवाला होनेसे इसको दो नम्बरमें रखा है। निद्रा आवश्यक होनेसे बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत अतिनिद्रा ही बन्धनकारक है; अतः इसको तीसरे नम्बरमें रखा है। यहाँ उससे उलटा क्रम रखनेका अभिप्राय है कि सबके लिये आवश्यक होनेसे निद्रा इतना पतन करनेवाली नहीं है। निद्रासे अधिक आलस्य पतन करता है और आलस्यसे भी अधिक प्रमाद पतन करता है। कारण कि मनुष्य ज्यादा नींद लेगा तो वृक्ष आदि मृदू योनियोंकी प्राप्ति होगी; परन्तु