श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
तात्कालिक सुखकी तरफ वह ध्यान नहीं देता। परंतु राजसी वृत्तिवाला परिणामकी तरफ देखता ही नहीं, उसकी वृत्ति तात्कालिक सुखकी तरफ ही जाती है। इसलिये वह संसारमें फँसा रहता है। राजस पुरुषको संसारका सम्बन्ध
वर्तमानमें तो अच्छा मालूम देता है; परन्तु परिणाममें यह हानिकारक है—‘ये हि संस्पर्शंजा भोगा दुःखयोनय एव ते’ (गीता ५।२२)। इसलिये साधकको संसारसे विरक्त हो जाना चाहिये; राजस सुखमें नहीं फँसना चाहिये।
परिशिष्ट भाव —सांसारिक भोगोंका सुख आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है। अविवेकी मनुष्य आरम्भको ही महत्त्व देता है। आरम्भ तो सदा रहता नहीं, पर उसकी कामना सदा रहती है, जो सम्पूर्ण दुःखोंका कारण है। परन्तु विवेकी मनुष्य आरम्भको न देखकर परिणामको देखता है, इसलिये वह भोगोंमें आसक्त नहीं होता—‘न तेषु रमते बुधः’ (गीता ५।२२)। परिणामको देखनेकी योग्यता मनुष्यमें ही है। परिणामको न देखना पशुता है।
वास्तवमें आरम्भ (संयोग) मुख्य नहीं है, प्रत्युत अन्त (वियोग) ही मुख्य है। मनुष्य आरम्भकालको चाहता है, पर वह रहता नहीं; क्योंकि प्रत्येक संयोगका वियोग होता है—यह नियम है। आरम्भ अनित्य होता है, पर अन्त नित्य होता है। अनित्यकी इच्छासे ही दुःखोंकी उत्पत्ति होती है। संसारमात्रका वियोग ही नित्य है। परन्तु राजसी वृत्तिके कारण संयोग अच्छा मालूम देता है। अगर मनुष्य आरम्भकालके सुखको महत्त्व न दे तो दुःख कभी आयेगा ही नहीं। आरम्भको देखनेसे भोग होता है और परिणामको देखनेसे योग होता है।
संसारके संयोगमें जो सुख प्रतीत होता है, उसमें दुःख भी मिला हुआ रहता है। परन्तु संसारके वियोगसे सुख-दुःखसे अतीत अखण्ड आनन्द प्राप्त होता है।
सम्बन्ध—अब तामस सुखका वर्णन करते हैं।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहतम् ॥ ३१ ॥
| निद्रालस्य- | सुखम् | = सुख | आत्मनः | = अपनेको |
|---|---|---|---|---|
| प्रमादोत्थम् | अग्रे | = आरम्भमें | मोहनम् | = मोहित करनेवाला है, |
| च | = और | तत् | = वह (सुख) | |
| अनुबन्धे | = परिणाममें | तामसम् | = तामस | |
| यत् | च | = भी | उदाहतम् | = कहा गया है। |
व्याख्या—‘निद्रालस्यप्रमादोत्थम्’ —जब राग अत्यधिक बढ़ जाता है, तब वह तमोगुणका रूप धारण कर लेता है। इसीको मोह कहते हैं। इस मोह-(मूहता-के) कारण मनुष्यको अधिक सोना अच्छा लगता है। अधिक सोनेवाले मनुष्यको गाढ़ नींद नहीं आती। गाढ़ नींद न आनेसे तन्द्वा ज्यादा आती है और स्वप्न भी ज्यादा आते हैं। तन्द्वा और स्वप्नमें तामस मनुष्यका बहुत समय बरबाद हो जाता है। परन्तु तामस मनुष्यको इसीसे ही सुख मिलता है, इसलिये इस सुखको निद्रासे उत्पन्न बताया है।
जब तमोगुण अधिक बढ़ जाता है, तब मनुष्यकी वृत्तियाँ भारी हो जाती हैं। फिर वह आलस्यमें समय बरबाद कर देता
है। आवश्यक काम सामने आनेपर वह कह देता है कि ‘फिर कर लेंगे, अभी तो आराम कर रहे हैं।’ इस प्रकार आलस्य-अवस्थामें उसको सुख मालूम देता है। परन्तु निकम्मा रहनेके कारण उसकी इन्द्रियों और अन्तःकरणमें शिथिलता आ जाती है, मनमें संसारका फालतू चिन्तन होता रहता है और मनमें अशान्ति, शोक, विषाद, चिन्ता, दुःख होते रहते हैं।
जब इससे भी अधिक तमोगुण बढ़ जाता है, तब मनुष्य प्रमाद करने लग जाता है। वह प्रमाद दो तरहका होता है—अक्रिय प्रमाद और सक्रिय प्रमाद। घर, परिवार, शरीर आदिके आवश्यक कामोंको न करना और निटल्ले बैठे रहना ‘अक्रिय प्रमाद’* है। व्यर्थ क्रियाएँ (देखना, सुनना,
- आलस्य और अक्रिय प्रमाद एक-जैसे दीखते हुए भी उनमें थोड़ा अन्तर है। आलस्यमें वृत्तियोंके भारी होनेसे सुख होता है और अक्रिय प्रमादमें कर्तव्य-कर्मोंको छोड़नेसे सुख होता है।