श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1205, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१२०४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
परिशिष्ट भाव —ज्ञानयोगीके लिये तो भगवान्ने बताया कि वह सब विषयोंका त्याग करके संयमपूर्वक निरन्तर ध्यानके परायण रहे, तब वह अर्हता, ममता, काम, क्रोध आदिका त्याग करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र होता है (अठारहवें अध्यायका इक्यावनवाँ, बावनवाँ और तिरपनवाँ श्लोक)। परन्तु भक्तके लिये यहाँ बताया कि वह अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार सब विहित कर्मोंको सदा करते हुए भी मेरी कृपासे परमपदको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि उसने मेरा आश्रय लिया है—‘मद्व्यपाश्रयः ’। तात्पर्य है कि भगवान्के चरणोंका आश्रय लेनेसे सुगमतासे कल्याण हो जाता है। भक्तको अपना कल्याण खुद नहीं करना पड़ता, प्रत्युत अपने बल, विद्या आदिका किंचिन्मात्र भी आश्रय न रखकर केवल विश्वासपूर्वक भगवान्का ही आश्रय लेना पड़ता है। फिर भगवत्कृपा ही उसका कल्याण कर देती है—‘मत्प्रसादादावप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ’। भगवान् भी केवल भक्तके आश्रयको देखते हैं* उसके दोषोंको नहीं देखते। रामायणमें आया है—
रहित न प्रभु चित् चूक किए की। करत सुरति सय बार किए की॥
(बाल० २९।३)
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ॥
(उत्तर० १।३)
‘मद्व्यपाश्रयः ’ का अर्थ है—मेरा विशेष आश्रय अर्थात् अनन्य आश्रय, जिसमें दूसरे किसीका किंचिन्मात्र भी आश्रय न हो।
एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की॥
(मानस, अरण्य० १०।४)
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें अपना सामान्य विधान (नियम) बताकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके लिये विशेषरूपसे आज्ञा देते हैं।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य मत्परः।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७॥
| चेतसा | = चित्तसे | मत्परः | = मेरे परायण होकर | सततम् | = निरन्तर |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वकर्माणि | = सम्पूर्ण कर्म | (तथा) | मच्चित्तः | = मुझमें | |
| मयि | = मुझमें | बुद्धियोगम् | = समताका | चित्वाला | |
| सन्यस्य | = अर्पण करके, | उपाश्रित्य | = आश्रय लेकर | भव | = हो जा। |
व्याख्या —[इस श्लोकमें भगवान्ने चार बातें बतायी हैं—
(१) ‘चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य ’—सम्पूर्ण कर्मोंको चित्तसे मेरे अर्पण कर दे।
(२) ‘मत्परः ’—स्वयंको मेरे अर्पित कर दे।
(३) ‘बुद्धियोगमुपाश्रित्य ’—समताका आश्रय लेकर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कर ले।
(४) ‘मच्चित्तः सततं भव ’—निरन्तर मेरेमें चित्वाला हो जा अर्थात् मेरे साथ अटल सम्बन्ध कर ले।]
‘चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्यस्य ’—चित्तसे कर्मोंको अर्पित करनेका तात्पर्य है कि मनुष्य चित्तसे यह दृढ़तासे मान ले कि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि और संसारके
व्यक्ति, पदार्थ, घटना, परिस्थिति आदि सब भगवान्के ही हैं। भगवान् ही इन सबके मालिक हैं। इनमेंसे कोई भी चीज किसीकी व्यक्तिगत नहीं है। केवल इन वस्तुओंका सदुपयोग करनेके लिये ही भगवान्ने व्यक्तिगत अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकारको भी भगवान्के अर्पण कर देना है।
शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिसे जो कुछ शास्त्रविहित सांसारिक या पारमार्थिक क्रियाएँ होती हैं, वे सब भगवान्की मरजीसे ही होती हैं। मनुष्य तो केवल अहंकारके कारण उनको अपनी मान लेता है। उन क्रियाओंमें जो अपनापन है, उसे भी भगवान्के अर्पण कर देना है; क्योंकि वह अपनापन केवल मूर्खतासे माना हुआ है, वास्तवमें है नहीं। इसलिये
- ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। (गीता ४।११)