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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1206

श्लोक ५७ ]

  • साधक-संजीवनी *

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उनमें अपनेपनका भाव बिलकुल उठा देना चाहिये और उन सबपर भगवान्की मुहर लगा देनी चाहिये।

'मत्यरः' —भगवान् ही मेरे परम आश्रय हैं, उनके सिवाय मेरा कुछ नहीं है, मेरेको करना भी कुछ नहीं है, पाना भी कुछ नहीं है, किसीसे लेना भी कुछ नहीं है अर्थात् देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिसे मेरा किंचिन्मात्र कोई प्रयोजन नहीं है—ऐसा अनन्यभाव हो जाना ही भगवान्के परायण होना है।

एक बात खास ध्यान देनेकी है—रुपये-पैसे, कुटुम्ब, शरीर आदिको मनुष्य अपना मानते हैं और मनमें यह समझते हैं कि हम इनके मालिक बन गये, हमारा इनपर आधिपत्य है; परन्तु वास्तवमें यह बात बिलकुल झूठी है, कोरा वहम है और बड़ा भारी धोखा है। जो किसी चीजको अपनी मान लेता है, वह उस चीजका गुलाम बन जाता है और वह चीज उसका मालिक बन जाती है। फिर उस चीजके बिना वह रह नहीं सकता। अतः जिन चीजोंको मनुष्य अपनी मान लेता है, वे सब उसपर चढ़ जाती हैं और वह तुच्छ हो जाता है। वह चीज चाहे रुपया हो, चाहे कुटुम्बी हो, चाहे शरीर हो, चाहे विद्या-बुद्धि आदि हो। ये सब चीजें प्राकृत हैं और अपनेसे भिन्न हैं, पर हैं। इनके अधीन होना ही पराधीन होना है।

भगवान् स्वकीय हैं, अपने हैं। उनको मनुष्य अपना मानेगा, तो वे मनुष्यके वशमें हो जायेंगे। भगवान्के हृदयमें भक्तका जितना आदर है, उतना आदर करनेवाला संसारमें दूसरा कोई नहीं है। भगवान् भक्तके दास हो जाते हैं और उसे अपना मुकुटमणि बना लेते हैं—'मैं तो हूँ भगतनका दास भगत मेरे मुकुटमणि' , परन्तु संसार मनुष्यका दास बनकर उसे अपना मुकुटमणि नहीं बनायेगा। वह तो उसे अपना दास बनाकर पददलित ही करेगा। इसलिये केवल भगवान्के शरण होकर सर्वथा उन्हींके परायण हो जाना चाहिये।

'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' —गीताभरमें देखा जाय तो समताकी बड़ी भारी महिमा है। मनुष्यमें एक समता आ गयी तो वह ज्ञानी, ध्यानी, योगी, भक्त आदि सब कुछ बन गया। परन्तु यदि उसमें समता नहीं आयी तो अच्छे-अच्छे लक्षण आनेपर भी भगवान् उसको पूर्णता नहीं मानते। वह समता मनुष्यमें स्वाभाविक रहती है। केवल आने-जानेवाली परिस्थितियोंके साथ मिलकर वह सुखी-दुःखी हो जाता है। इसलिये उनमें मनुष्य सावधान रहे कि आने-जानेवाली

परिस्थितिके साथ मैं नहीं हूँ। सुख आया, अनुकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और सुख चला गया, अनुकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। ऐसे ही दुःख आया, प्रतिकूल परिस्थिति आयी तो भी मैं हूँ और दुःख चला गया, प्रतिकूल परिस्थिति चली गयी तो भी मैं हूँ। अतः सुख-दुःखमें, अनुकूलता-प्रतिकूलतामें, हानि-लाभमें मैं सदैव ज्यों-का-त्यों रहता हूँ। परिस्थितियोंके बदलनेपर भी मैं नहीं बदलता, सदा वही रहता हूँ। इस तरह अपने-आपमें स्थित रहे। अपने-आपमें स्थित रहनेसे सुख-दुःख आदिमें समता हो जायगी। यह समता ही भगवान्की आराधना है—'समत्वमाराधनमच्युतस्य' (विष्णुपुराण १। १७। ९०)। इसीलिये यहाँ भगवान् बुद्धियोग अर्थात् समताका आश्रय लेनेके लिये कहते हैं।

'मच्चित्तः सततं भव' —जो अपनेको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है, उसका चित्त भी सर्वथा भगवान्के चरणोंमें समर्पित हो जाता है। फिर उसपर भगवान्का जो स्वतः-स्वाभाविक अधिकार है, वह प्रकट हो जाता है और उसके चित्तमें स्वयं भगवान् आकर विराजमान हो जाते हैं। यही 'मच्चित्तः' होना है।

'मच्चित्तः' पदके साथ 'सततम्' पद देनेका अर्थ है कि निरन्तर मेरेमें (भगवान्में) चित्तवाला हो जा। भगवान्का निरन्तर चिन्तन तभी होगा, जब 'मैं भगवान्का हूँ' इस प्रकार अहंता भगवान्में लग जायगी। अहंता भगवान्में लग जानेपर चित्त स्वतः-स्वाभाविक भगवान्में लग जाता है। जैसे, शिष्य बननेपर 'मैं गुरुका हूँ' इस प्रकार अहंता गुरुमें लग जानेपर गुरुकी याद निरन्तर बनी रहती है। गुरुका सम्बन्ध अहंतामें बैठ जानेके कारण इस सम्बन्धकी याद आये तो भी याद है और याद न आये तो भी याद है; क्योंकि स्वयं निरन्तर रहता है। इसमें भी देखा जाय तो गुरुके साथ उसने खुद सम्बन्ध जोड़ा है; परन्तु भगवान्के साथ इस जीवका स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। केवल संसारके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही नित्य सम्बन्धकी विस्मृति हुई है। उस विस्मृतिको मिटानेके लिये भगवान् कहते हैं कि निरन्तर मेरेमें चित्तवाला हो जा।

साधक कोई भी सांसारिक काम-धंधा करे, तो उसमें यह एक सावधानी रखे कि अपने चित्तको उस काम-धंधेमें द्रवित न होने दे, चित्तको संसारके साथ घुलने-मिलने न दे अर्थात् तदाकार न होने दे, प्रत्युत उसमें अपने चित्तको कठोर रखे। परन्तु भगवान्नामका जप, कीर्तन, भगवत्कथा,