श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२०८ * श्रीमद्भगवद्गीता * [ अध्याय १८
भगवान्की तरफ ले जाता है। काममें दो होकर दो ही रहते और प्रेममें एक होकर दो होते हैं अर्थात् अभिन्नता कभी
हैं अर्थात् द्वैधभाव (भिन्नता या भेद) कभी मिटता नहीं मिटती नहीं*।
परिशिष्ट भाव—पूर्वश्लोकमें शाश्वत पदकी प्राप्ति बताकर अब उसकी विधि बताते हैं कि वह कैसे प्राप्त
होगा। साधकके लिये दो ही खास काम हैं—संसारके सम्बन्धका त्याग और भगवान्के साथ सम्बन्ध (प्रेम)। पूर्वश्लोकमें
आये 'मद्व्यपाश्रयः' पदमें भगवान्के साथ सम्बन्धकी मुख्यता है और इस श्लोकमें आये 'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' पदमें
संसारसे सम्बन्ध-विच्छेदकी मुख्यता है।
'बुद्धियोगमुपाश्रित्य' कहनेका तात्पर्य है कि संसारका सूक्ष्म सम्बन्ध भी न रहे—'दूरेण ह्यवरं कर्म
बुद्धियोगाद्धनंजय' (गीता २। ४९), किसीके प्रति किंचिन्मात्र भी राग-द्वेष न रहे।
एकमात्र भगवान्का चिन्तन करनेसे समता (बुद्धियोग) स्वतः आ जाती है, इसलिये 'मच्चित्तः सततं भव' कहा है।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें दी हुई आज्ञाको अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें क्रमशः अन्वय और व्यतिरेक-रीतिसे दृढ़ करते हैं।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ ५८ ॥
मच्चित्तः = मुझमें चित्तवाला होकर (तू) अथ = और चेत् = यदि न = नहीं श्रोष्यसि = सुनेगा
मत्प्रसादात् = मेरी कृपासे त्वम् = तू (तो) विनङ्क्ष्यसि = तेरा पतन हो
सर्वदुर्गाणि = सम्पूर्ण विघ्नों अहङ्कारात् = अहंकारके कारण (मेरी बात) जायेगा।
तरिष्यसि = तर जायगा
व्याख्या—'मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादा- दोषोंको, विघ्न-बाधाओंको दूर करनेकी पूरी जिम्मेदारी
त्तरिष्यसि'—भगवान् कहते हैं कि मेरेमें चित्तवाला होनेसे भगवान्की हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं—
तू मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न, बाधा, शोक, दुःख आदिको 'मत्प्रसादात्तरिष्यसि' अर्थात् मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्न-
तर जायगा अर्थात् उनको दूर करनेके लिये तुझे कुछ भी बाधाओंको तर जायगा। इसका तात्पर्य यह निकला कि
प्रयास नहीं करना पड़ेगा। भक्त अपनी तरफसे, उसको जितना समझमें आ जाय,
भगवद्भक्तने अपनी तरफसे सब कर्म भगवान्के अर्पण उतना पूरी सावधानीके साथ कर ले, उसके बाद जो कुछ
कर दिये, स्वयं भगवान्के अर्पित हो गया, समताके कमी रह जायगी, वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।
आश्रयसे संसारकी संयोगजन्य लोलुपतासे सर्वथा विमुख हो मनुष्यका अगर कुछ अपराध हुआ है तो वह यही
गया और भगवान्के साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया। यह हुआ है कि उसने संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया
सब कुछ हो जानेपर भी वास्तविक तत्त्वकी प्राप्तिमें यदि और भगवान्से विमुख हो गया। अब उस अपराधको दूर
कुछ कमी रह जाय या सांसारिक लोगोंकी अपेक्षा अपनेमें करने लिये वह अपनी ओरसे संसारका सम्बन्ध तोड़कर
कुछ विशेषता देखकर अभिमान आ जाय अथवा इस भगवान्के सम्मुख हो जाय। सम्मुख हो जानेपर जो कुछ
प्रकारके कोई सूक्ष्म दोष रह जायँ, तो उन दोषोंको दूर कमी रह जायगी, वह भगवान्की कृपासे पूरी हो जायगी।
करनेकी साधकपर कोई जिम्मेदारी नहीं रहती, प्रत्युत उन अब आगेका सब काम भगवान् कर लेंगे। तात्पर्य यह हुआ
- द्वैतं मोहय बोधात्प्राजाते बोधे मनीषया। भक्त्यर्थं कल्पितं (स्वीकृतं) द्वैतमद्वैतदपि सुन्दरम्॥
पारमार्थिकमद्वैतं द्वैतं भजनहेतवे। तादृशी यदि भक्तिः स्यात्सा तु मुक्तिस्ताधिका॥
(बोधसार भक्ति० ४२-४३)
'बोधसे पहलेका द्वैत मोहमें डाल सकता है। परन्तु बोध हो जानेपर भक्तिके लिये स्वीकृत द्वैत अद्वैतसे भी अधिक सुन्दर
होता है।'
'वास्तविक तत्त्व तो अद्वैत ही है, पर भजनके लिये द्वैत है। ऐसी यदि भक्ति है तो वह भक्ति मुक्तिसे भी सौगुनी श्रेष्ठ है।'