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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1210

श्लोक ५८ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२०९

कि भगवत्कृपा प्राप्त करनेमें संसारके साथ किंचित् भी सम्बन्ध मानना और भगवान्से विमुख हो जाना—यही बाधा थी। वह बाधा उसने मिटा दी तो अब पूर्णताकी प्राप्ति भगवत्कृपा अपने-आप करा देगी।

जिसका प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ सम्बन्ध है, उसपर ही शास्त्रोंका विधि-निषेध, अपने वर्ण-आश्रमके अनुसार कर्तव्यका पालन आदि नियम लागू होते हैं और उसको उन-उन नियमोंका पालन जरूर करना चाहिये। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरादिके सम्बन्धको लेकर ही पाप-पुण्य होते हैं और उनका फल सुख-दुःख भी भोगना पड़ता है। इसलिये उसपर शास्त्रीय मर्यादा और नियम विशेषतासे लागू होते हैं। परन्तु जो प्रकृति और प्रकृतिके कार्यसे सर्वथा ही विमुख होकर भगवान्के सम्मुख हो जाता है, वह शास्त्रीय विधि-निषेध और वर्ण-आश्रमोंकी मर्यादाका दास नहीं रहता। वह विधि-निषेधसे भी ऊँचा उठ जाता है अर्थात् उसपर विधि-निषेध लागू नहीं होते; क्योंकि विधि-निषेधकी मुख्यता प्रकृतिके राज्यमें ही रहती है। प्रभुके राज्यमें तो शरणागतिकी ही मुख्यता रहती है।

जीव साक्षात् परमात्माका अंश है (गीता—पन्द्रहवें अध्यायका सातवाँ श्लोक)। यदि वह केवल अपने अंशी परमात्माकी ही तरफ चलता है तो उसपर देव, ऋषि, प्राणी, माता-पिता आदि आप्तजन और दादा-परदादा आदि पितरोंका भी कोई ऋण नहीं रहता*; क्योंकि शुद्ध चेतन अंशने इनसे कभी कुछ लिया ही नहीं। लेना तभी बनता है, जब वह जड़ शरीरके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और सम्बन्ध जोड़नेसे ही कमी आती है; नहीं तो उसमें कभी कमी आती ही नहीं—‘नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २।१६)। जब उसमें कभी कमी आती ही नहीं, तो फिर वह उनका ऋणी कैसे बन सकता है? यही सम्पूर्ण विघ्नोंको तरना है!

साधन-कालमें जीवन-निर्वाहकी समस्या, शरीरमें रोग आदि अनेक विघ्न-बाधाएँ आती हैं; परन्तु उनके आनेपर भी भगवान्की कृपाका सहारा रहनेसे साधक विचलित नहीं होता। उसे तो उन विघ्न-बाधाओंमें भगवान्की विशेष

कृपा ही दीखती है। इसलिये उसे विघ्न-बाधाएँ बाधारूपसे दीखती ही नहीं, प्रत्युत कृपारूपसे ही दीखती हैं।

परमार्थिक साधनमें विघ्न-बाधाओंके आनेकी तथा भगवत्प्राप्तिमें आड़ लगनेकी सम्भावना रहती है। इसके लिये भगवान् कहते हैं कि मेरा आश्रय लेनेवालेके दोनों काम मैं कर दूँगा अर्थात् अपनी कृपासे साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर दूँगा और उस साधनके द्वारा अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा।

‘अथ चैत्त्वमहंकारान् श्रोष्यसि विनइक्ष्यसि’—

भगवान् अत्यधिक कृपालुताके कारण आत्मीयतापूर्वक अर्जुनसे कह रहे हैं कि ‘अथ’—पश्चात्तरमें मैंने जो कुछ कहा है, उसे न मानकर अगर अहंकारके कारण अर्थात् ‘मैं भी कुछ जानता हूँ, करता हूँ तथा मैं कुछ समझ सकता हूँ, कुछ कर सकता हूँ’ आदि भावोंके कारण तू मेरी बात नहीं सुनेगा, मेरे इशारेके अनुसार नहीं चलेगा, मेरा कहना नहीं मानेगा, तो तेरा पतन हो जायगा—‘विनइक्ष्यसि’।

यद्यपि अर्जुनके लिये यह किंचिन्मात्र भी सम्भव नहीं है कि वह भगवान्की बात न सुने अथवा न माने, तथापि भगवान् कहते हैं कि ‘चेत्’—अगर तू मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। तात्पर्य यह है कि अगर तू अज्ञता अर्थात् अनजानपनेसे मेरी बात न सुने अथवा किसी भूलके कारण न सुने, तो यह सब क्षय है; परन्तु यदि तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा; क्योंकि अहंकारसे मेरी बात न सुननेसे तेरा अभिमान बढ़ जायगा, जो सम्पूर्ण आसुरी-सम्पत्तिका मूल है।

पहले चौथे अध्यायमें भगवान् स्वयं अपने श्रीमुखसे कहकर आये हैं कि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है—‘भक्तोऽसि मे सखा चेति’ (४।३) और फिर नवें अध्यायमें उन्होंने कहा है कि हे अर्जुन! तू प्रतिज्ञा कर कि मेरे भक्तका पतन नहीं होता—‘कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति’ (९।३१)। इससे सिद्ध हुआ कि अर्जुन भगवान्के भक्त हैं; अतः वे कभी भगवान्से विमुख नहीं हो सकते और उनका पतन भी कभी नहीं हो सकता। परन्तु वे अर्जुन भी यदि भगवान्की बात नहीं सुनेगे तो भगवान्से विमुख हो जायेंगे और भगवान्से विमुख होनेके

  • देवर्षिभूताप्लुनां पितृनां न किङ्करो नायमृणी च राजन्। सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्दं परिह्वय कर्तव्यम्॥

(श्रीमद्भा० ११।५।४९)

‘राजन्! जो सारे कार्योंको छोड़कर सम्पूर्णरूपसे शरणागतवत्सल भगवान्की शरणमें आ जाता है, वह देव, ऋषि, प्राणी, कुटुम्बीजन और पितृगण—इनमेंसे किसीका भी ऋणी और सेवक नहीं रहता।’