श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
कारण उनका भी पतन हो जायगा। तात्पर्य यह कि भगवान्से विमुख होनेके कारण ही प्राणीका पतन होता है अर्थात् वह जन्म-मरणके चक्रमें पड़ता है (गीता—नवें अध्यायका तीसरा और सोलहवें अध्यायका बीसवाँ श्लोक)।
विशेष बात
इसी अध्यायके छ्पनवें श्लोकमें भगवान्ने प्रथम पुरुष 'अवाप्नोति ' का प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये कहा कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जाती है, और यहाँ मध्यम पुरुष 'तरिष्यसि ' का प्रयोग करके अर्जुनके लिये कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्न-बाधाओंको तर जायगा। इन दोनों बातोंका तात्पर्य यह है कि भगवान्की कृपामें जो शक्ति है, वह शक्ति किसी साधनमें नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं कि साधन न करें, प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करना मनुष्यका स्वाभाविक धर्म होना चाहिये; क्योंकि मनुष्य-जन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। मनुष्य-जन्मको प्राप्त करके भी जो परमात्माको प्राप्त नहीं करता, वह यदि ऊँचे-से-ऊँचे लोकोंमें भी चला जाय, तो भी उसे लौटकर संसार-(जन्म-मरण-में आना ही पड़ेगा* (गीता—आठवें अध्यायका सोलहवाँ श्लोक)। इसलिये जब यह मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है, तो फिर मनुष्यको जीते-जी ही भगवत्प्राप्ति कर लेनी चाहिये और जन्म-मरणसे रहित हो जाना चाहिये। कर्मयोगीके लिये भी भगवान्ने कहा है कि समतायुक्त पुरुष इस जीवित-अवस्थामें ही पुण्य और पाप—दोनोंसे रहित हो जाता है (गीता—दूसरे अध्यायका पचासवाँ श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि कर्म-बन्धनसे सर्वथा रहित होना अर्थात् जन्म-मरणसे रहित होना मनुष्यमात्रका
परम ध्येय है।
दसवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैं अपनी कृपासे भक्तोंके अन्तःकरणमें ज्ञान प्रकाशित कर देता हूँ, और ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मैंने अपनी कृपासे ही विरारूप दिखाया है। उसी कृपाको लेकर भगवान् यहाँ कहते हैं कि मेरी कृपासे परमपदकी प्राप्ति हो जायगी (इसी अध्यायका छ्पनवाँ श्लोक) और मेरी कृपासे ही सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा (इसी श्लोकमें)। परमपदको प्राप्त होनेपर किसी प्रकारकी विघ्न-बाधा सामने आनेकी सम्भावना ही नहीं रहती। फिर भी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको तरनेकी बात कहनेका तात्पर्य यह है कि अर्जुनके मनमें यह भय बैठा था कि युद्ध करनेसे मुझे पाप लगेगा; युद्धके कारण कुल-परम्पराके नष्ट होनेसे पितरोंका पतन हो जायगा और इस प्रकार अनर्थ-परम्परा बढ़ती ही जायगी; हमलोग राज्यके लोभमें आकर इस महान् पापको करनेके लिये तैयार हो गये हैं, इसलिये मैं शस्त्र छोड़कर बैठ जाऊँ और धृतराष्ट्रके पक्षके लोग मेरेको मार भी दें, तो भी मेरा कल्याण ही होगा (गीता—पहले अध्यायके छ्तीसवेंसे छ्ज्यालीसवें श्लोकतक)। इन सभी बातोंको लेकर और अनेक जन्मोंके दोषोंको भी लेकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको, पापोंको तर जायगा—'सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादातरिष्यसि ।' भगवान्ने बहुवचनमें 'दुर्गाणि ' पद देकर भी उसके साथ 'सर्व ' शब्द और जोड़ दिया है। इसका तात्पर्य यह है कि मेरी कृपासे तेरा किंचिन्मात्र भी पाप नहीं रहेगा; कोई भी बन्धन नहीं रहेगा और मेरी कृपासे सर्वथा शुद्ध होकर तू परमपदको प्राप्त हो जायगा।
परिशिष्ट भाव —भक्तका काम केवल भगवान्का आश्रय लेना है, भगवान्का ही चिन्तन करना है। फिर उसके सब काम भगवान् ही करते हैं। भगवान् भक्तपर विशेष कृपा करके उसके साधनकी सम्पूर्ण विघ्न-बाधाओंको भी दूर कर देते हैं और अपनी प्राप्ति भी करा देते हैं—'योगक्षेमं वहाय्यहम् ' (गीता ९।२२)। इसलिये ब्रह्मसूत्रमें आया है—'विशेषानुग्रहश्च ' (३।४।३८) 'भगवान्की भक्तिका अनुष्ठान करनेसे भगवान्का विशेष अनुग्रह होता है। ' वास्तवमें मनुष्यपर भगवान्की कृपा तो है ही, पर भगवान्का आश्रय लेनेसे भक्तको उसका विशेष अनुभव होता है।
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यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्यस्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९ ॥
- येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिन्सत्व्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्ग्यः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२।३२)