श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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| अहङ्कारम् | = अहंकारका | न, योत्स्ये | = युद्ध नहीं करूँगा, | (क्योंकि) |
|---|---|---|---|---|
| आश्रित्य | = आश्रय लेकर | ते | = तेरा | प्रकृतिः |
| यत् | = (तू) जो | एषः | = यह | त्वाम् |
| इति | = ऐसा | व्यवसायः | = निश्चय | नियोध्यति |
| मन्यसे | = मान रहा है कि (मैं) | मिथ्या | = मिथ्या (झूठा) है; |
व्याख्या—‘यदहंकारमाश्रित्य’ —प्रकृतिसे ही महत्त्व और महत्त्वसे अहंकार पैदा हुआ है। उस अहंकारका ही एक विकृत अंश है—‘मैं शरीर हूँ।’ इस विकृत अहंकारका आश्रय लेनेवाला पुरुष कभी भी क्रियारहित नहीं हो सकता। कारण कि प्रकृति हरदम क्रियाशील है, बदलेनेवाली है, इसलिये उसके आश्रित रहनेवाला कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रह सकता (गीता—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक)।
जब मनुष्य अहंकारपूर्वक क्रियाशील प्रकृतिके वशमें हो जाता है, तो फिर वह यह कैसे कह सकता है कि मैं अमुक कर्म करूँगा और अमुक कर्म नहीं करूँगा अर्थात् प्रकृतिके परवश हुआ मनुष्य करना और न करना—इन दोनोंसे छूटेगा नहीं। कारण कि प्रकृतिके परवश हुए मनुष्यका तो ‘करना’ भी कर्म है और ‘न करना’ भी कर्म है। परन्तु जब मनुष्य प्रकृतिके परवश नहीं रहता, उससे निलिप्त हो जाता है (जो कि इसका वास्तविक स्वरूप है), तो फिर उसके लिये करना और न करना—ऐसा कहना ही नहीं बनता। तात्पर्य यह है कि जो प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रखे और कर्म न करना चाहे, ऐसा उसके लिये सम्भव नहीं है। परन्तु जिसने प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लिया है अथवा जो सर्वथा भगवान्के शरण हो गया है, उसको कर्म करनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता।
‘न योत्स्य इति मन्यसे’ —दूसरे अध्यायमें अर्जुनने भगवान्के शरण होकर शिक्षाकी प्रार्थना की—‘शिष्यस्तेऽहं साधि मां त्वां प्रपन्म ’ (२।७) और उसके बाद अर्जुनने साफ-साफ कह दिया कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’—‘न योत्स्ये ’ (२।९)। यह बात भगवान्को अच्छी नहीं लगी। भगवान् मनमें सोचते हैं कि यह पहले तो मेरे शरण हो गया और फिर इसने मेरे कुछ कहे बिना ही अपनी
तरफसे साफ-साफ कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो फिर यह मेरी शरणागति कहाँ रही? यह तो अहंकारकी शरणागति हो गयी! कारण कि वास्तविक शरणागति होनेपर ‘मैं यह करूँगा, यह नहीं करूँगा’ ऐसा कहना ही नहीं बनता। भगवान्के शरणागति होनेपर तो भगवान् जैसा करायेंगे, वैसा ही करना होगा। इसी बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी (दूसरे अध्यायका दसवाँ श्लोक)। परन्तु अर्जुनपर अत्यधिक कृपा और स्नेह होनेके कारण भगवान्ने उपदेश देना आरम्भ कर दिया, नहीं तो भगवान् वहीँपर यह कह देते कि ‘जैसा चाहता है, वैसा कर’—‘यथेच्छसि तथा कुरु ’ (१८।६३) परन्तु अर्जुनकी यह बात कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ भगवान्के भीतर खटक गयी। इसलिये भगवान्ने यहाँ अर्जुनके उन्हीं शब्दों—‘न योत्स्ये ’ का प्रयोग करके यह कहा है कि तू अहंकारके ही शरण है, मेरे शरण नहीं। अगर तू मेरे शरण हो गया होता तो ‘युद्ध नहीं करूँगा’ ऐसा कहना बन ही नहीं सकता था। मेरे शरण होता तो ‘मैं क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा’ इसकी जिम्मेवारी मेरेपर होती। इसके अलावा मेरे शरणागति होनेपर यह प्रकृति भी तुझे बाध्य नहीं कर पाती (गीता—सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक)। यह त्रिगुणमयी माया अर्थात् प्रकृति उसीको बाध्य करती है, जो मेरे शरण नहीं हुआ है (गीता—सातवें अध्यायका तेरहवाँ श्लोक); क्योंकि यह नियम है कि प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ प्राणी प्रकृतिके गुणोंके द्वारा सदा ही परवश होता है।
यह एक बड़ी मार्मिक बात है कि मनुष्य जिन प्राकृत पदार्थोंको अपना मान लेते हैं, उन पदार्थोंके सदा ही परवश (पराधीन) हो जाते हैं। वे वहम तो यह रखते हैं कि हम इन पदार्थोंके मालिक हैं, पर हो जाते हैं उनके गुलाम! परन्तु जिन पदार्थोंको अपना नहीं मानते, उन पदार्थोंके
‘हे कमलनयन! जो लोग आपके चरणोंके शरण नहीं हैं और आपकी भक्तिसे रहित होनेके कारण जिनकी बुद्धि भी शुद्ध नहीं है, वे अपनेको मुक्त तो मानते हैं, पर वास्तवमें वे बद्ध ही हैं। वे यदि कष्टपूर्वक साधन करके ऊँचे-ऊँचे पदपर भी पहुँच जायें, तो भी वहाँसे नीचे गिर जाते हैं।’