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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1213

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

परवश नहीं होते। इसलिये मनुष्यको किसी भी प्राकृत पदार्थको अपना नहीं मानना चाहिये; क्योंकि वे वास्तवमें अपने हैं ही नहीं। अपने तो वास्तवमें केवल भगवान् ही हैं। उन भगवान्को अपना माननेसे मनुष्यकी परवशता सदाके लिये समाप्त हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य पदार्थ और क्रियाओंको अपनी मानता है तो सर्वथा परतन्त्र हो जाता है, और भगवान्को अपना मानता है और उनके अनन्य शरण होता है तो सर्वथा स्वतन्त्र हो जाता है। प्रभुके शरणागत होनेपर परतन्त्रता लेशमात्र भी नहीं रहती—यह शरणागतिकी महिमा है। परन्तु जो प्रभुकी शरण न लेकर अहंकारकी शरण लेते हैं, वे मौतके मार्ग—(संसार—)में बह जाते हैं—‘निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्तनिं’ (९।३)। इसी बातकी चेतावनी देते हुए भगवान् अर्जुनसे कह रहे हैं कि तू जो यह कहता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तो तेरा यह कहना, तेरी यह हेकड़ी चलेगी नहीं। तुझे क्षात्र-प्रकृतिके परवश होकर युद्ध करना ही पड़ेगा।

‘मिथ्यैष व्यवसायस्ते’—व्यवसाय अर्थात् निश्चय दो तरहका होता है—वास्तविक और अवास्तविक। परमात्माके साथ अपना जो नित्य सम्बन्ध है, उसका निश्चय करना तो वास्तविक है और प्रकृतिके साथ मिलकर प्राकृत पदार्थोंका निश्चय करना अवास्तविक है। जो निश्चय परमात्माको लेकर होता है, उसमें स्वयंकी प्रधानता रहती

परिशिष्ट भाव—पूर्वश्लोकमें यह बात आयी कि अहंकारके कारण ‘फल’ ठीक नहीं होगा और इस श्लोकमें यह बात आयी कि अहंकारके कारण ‘क्रिया’ ठीक नहीं होगी। तात्पर्य है कि सुनने या न सुननेसे पतन नहीं होगा, प्रत्युत अहंकारके कारण पतन होगा। कर्म करना या न करना बाधक नहीं है, प्रत्युत अहंकार बाधक है।

भगवान्ने कहा कि मैं अपनी प्राप्ति भी करा दूँगा और तेरे विघ्नोंको भी दूर कर दूँगा (अठारहवें अध्यायका छप्पनवाँ और अड़ान्वीं श्लोक)। परन्तु इतना कहनेपर भी अर्जुन बोले नहीं, जब कि उनको वहाँ ‘करिष्ये वचनं तव’ कह देना चाहिये था। तब भगवान् कहते हैं कि अगर तू भूलसे मेरी बात न सुने तो कोई बात नहीं, पर तू अहंकारसे मेरी बात नहीं सुनेगा तो तेरा पतन हो जायगा। भगवान्का भाव है कि जैसे भक्तका सब काम (साधन और सिद्धि) मैं कर देता हूँ, ऐसे ही भक्तको भी चाहिये कि वह सब प्रकारसे मेरा ही आश्रय ले। परन्तु मेरा आश्रय न लेकर वह अहंकारका आश्रय लेगा तो उसका पतन हो जायगा। अहंकारका आश्रय लेनेसे ‘मद्व्यप्याश्रय’ नहीं होगा; क्योंकि मेरे आश्रयकी जगह मेरी अपरा प्रकृति ‘अहंकार’ का आश्रय ले लिया। कर्तव्य कर्म (युद्ध)—में एक तो मैं लगाता हूँ और एक प्रकृति लगाती है। अगर तू मेरी बात नहीं मानेगा तो तेरी क्षात्र प्रकृति तेरेको युद्धमें लगायेगी। प्रकृति लगायेगी तो जिम्मेवारी तेरी होगी और मेरी बात सुनकर कर्तव्यमें लगेगा तो जिम्मेवारी मेरी होगी। तेरी जिम्मेवारी होनेसे तू बद्ध हो जायगा और मेरी जिम्मेवारी होनेसे तू मुक्त हो जायगा।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि प्रकृति तुझे कर्ममें लगा देगी, अब आगेके श्लोकमें उसीका विवेचन करते हैं।

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।

कर्तु नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥ ६० ॥

है और जो निश्चय प्रकृतिको लेकर होता है, उसमें अन्तःकरणकी प्रधानता रहती है। इसलिये भगवान् यहाँ अर्जुनसे कहते हैं कि अहंकारका अर्थात् प्रकृतिका आश्रय लेकर तू जो यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, ऐसा तेरा (क्षात्र-प्रकृतिके विरुद्ध) निश्चय अवास्तविक अर्थात् मिथ्या है, झूठा है। आश्रय परमात्माका ही होना चाहिये, प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारका नहीं।

यदि प्राणी यह निश्चय कर लेता है कि मैं परमात्माका ही हूँ और मुझे केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है, तो उसका यह निश्चय वास्तविक अर्थात् सत्य है, नित्य है। इस निश्चयकी महिमा भगवान्ने नवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें की है कि अगर दुराचारी—से—दुराचारी मनुष्य भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है तो उसको दुराचारी नहीं मानना चाहिये, प्रत्युत साधु ही मानना चाहिये, क्योंकि वह वास्तविक निश्चय कर चुका है कि मैं भगवान्का ही हूँ और भगवान्का ही भजन करूँगा।

‘प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति’—इन पदोंसे भगवान् कहते हैं कि तेरा क्षात्र-स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा। क्षत्रियका स्वभाव है—शूरवीरता, युद्धमें पीठ न दिखाना (गीता—इसी अध्यायका तैंतालिसवाँ श्लोक)। अतः धर्ममय युद्धका अवसर सामने आनेपर तू युद्ध किये बिना रह नहीं सकेगा।