सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1214, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1214

श्लोक ६० ]

  • साधक-संजीवनी *

१११३

कौन्तेय= हे कुन्तीनन्दन !मोहात्= मोहके कारणतत्= उसको
स्वेन= अपनेयत्= जिस युद्धकोअपि= भी (तू)
स्वभावजेन= स्वभावजन्य= नहींअवशः= (क्षत्र प्रकृतिके)
कर्मणा= कर्मसेकर्तुम्= करनापरवश होकर
निबद्धः= बँधा हुआ (तू)इच्छसि= चाहता,करिष्यसि= करेगा।

व्याख्या—‘स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा’— पूर्वजन्ममें जैसे कर्म और गुणोंकी वृत्तियाँ रही हैं, इस जन्ममें जैसे माता-पितासे पैदा हुए हैं अर्थात् माता- पिताके जैसे संस्कार रहे हैं, जन्मके बाद जैसा देखा-सुना है, जैसी शिक्षा प्राप्त हुई है और जैसे कर्म किये हैं—उन सबके मिलनेसे अपनी जो कर्म करनेकी एक आदत बनी है, उसका नाम स्वभाव है। इसको भगवान्ने स्वभावजन्य स्वकीय कर्म कहा है। इसीको स्वधर्म भी कहते हैं—‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि’ (गीता २।३१)। ‘कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यत्यवशोऽपि तत्’— स्वभावजन्य क्षत्र प्रकृतिसे बँधा हुआ तू मोहके कारण जो नहीं करना चाहता, उसको तू परवश होकर करेगा। स्वभावके अनुसार ही शास्त्रोंने कर्तव्य-पालनकी आज्ञा दी है। उस आज्ञामें यदि दूसरोंके कर्मोंकी अपेक्षा अपने कर्मोंमें कर्मियाँ अथवा दोष दीखते हों, तो भी वे दोष बाधक (पाप-जनक) नहीं होते—‘श्रेयान्स्वधर्मा विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्’ (गीता ३।३५; १८।४७)। उस स्वभावज कर्म (क्षत्र-धर्म)-के अनुसार तू युद्ध करनेके लिये परवश है। युद्धरूप कर्तव्यको न करनेका तेरा विचार मूढ़तापूर्वक किया गया है।

जो जीवन्मुक्त महापुरुष होते हैं, उनका स्वभाव सर्वथा शुद्ध होता है। अतः उनपर स्वभावका आधिपत्य नहीं रहता अर्थात् वे स्वभावके परवश नहीं होते; फिर भी वे किसी काममें प्रवृत्त होते हैं, तो अपनी प्रकृति-(स्वभाव-) के अनुसार ही काम करते हैं। परन्तु साधारण मनुष्य प्रकृतिके परवश होते हैं, इसलिये उनका स्वभाव उनको जबरदस्ती कर्ममें लगा देता है (गीता—तीसरे अध्यायका तैंतीसवाँ श्लोक)। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरा क्षत्र-स्वभाव भी तुझे जबरदस्ती युद्धमें लगा देगा; परन्तु उसका फल तेरे लिये बढ़िया नहीं होगा। यदि तू शास्त्र या सन्त-महापुरुषोंकी आज्ञासे अथवा मेरी आज्ञासे युद्धरूप कर्म करेगा, तो

वही कर्म तेरे लिये कल्याणकारी हो जायगा। कारण कि शास्त्र अथवा मेरी आज्ञासे कर्मोंको करनेसे, उन कर्मोंमें जो राग-द्वेष हैं, वे स्वाभाविक ही मिटते चले जायेंगे; क्योंकि तेरी दृष्टि आज्ञाकी तरफ रहेगी, राग-द्वेषकी तरफ नहीं। अतः वे कर्म बन्धनकारक न होकर कल्याणकारक ही होंगे।

विशेष बात

गीतामें प्रकृतिकी परवशताकी बात सामान्यरूपसे कई जगह आयी है (जैसे—तीसरे अध्यायका पाँचवाँ, आठवें अध्यायका उन्नीसवाँ और नवें अध्यायका आठवाँ श्लोक आदि); परन्तु दो जगह प्रकृतिकी परवशताकी बात विशेषरूपसे आयी है—‘प्रकृतिं यान्ति भूतानि’ (३।३३) और यहाँ ‘प्रकृतिस्त्वां नियोश्यति’ (१८।५९)*। इससे स्वभावकी प्रबलता ही सिद्ध होती है; क्योंकि कोई भी प्राणी जिस-किसी योनियें भी जन्म लेता है, उसकी प्रकृति अर्थात् स्वभाव उसके साथमें रहता है। अगर उसका स्वभाव परम शुद्ध हो अर्थात् स्वभावमें सर्वथा असंगता हो तो उसका जन्म ही क्यों होगा? यदि उसका जन्म होगा तो उसमें स्वभावकी ही मुख्याता रहेगी—‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योजिनजन्मसु’ (गीता १३।२१)। जब स्वभावकी ही मुख्याता अथवा परवशता रहेगी और प्रत्येक क्रिया स्वभावके अनुसार ही होगी, तो फिर शास्त्रोंका विधि-निषेध किसपर लागू होगा? गुरुजनोंकी शिक्षा किसके काम आयेगी? और मनुष्य दुर्गुण-दुराचारोंका त्याग करके सदगुण-सदाचारोंमें कैसे प्रवृत्त होगा?

उपर्युक्त प्रश्नोंका उत्तर यह है कि जैसे मनुष्य गंगाजीके प्रवाहको रोक तो नहीं सकता, पर उसके प्रवाहको मोड़ सकता है, घुमा सकता है। ऐसे ही मनुष्य अपने वर्णोचित स्वभावको छोड़ तो नहीं सकता, पर भगवत्प्राप्तिका उद्देश्य रखकर उसको राग-द्वेषसे रहित परम शुद्ध, निर्मल बना सकता है। तात्पर्य यह हुआ कि

  • ज्ञानयोगमें ज्ञानी प्रकृतिसे सम्बन्ध-विच्छेद कर लेता है, इसलिये उसके लिये प्रकृतिकी परवशताकी बात नहीं आयी है।