श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- साधक-संजीवनी *
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| अर्जुन | = हे अर्जुन ! | तिष्ठति | = रहता है (और) | सर्वभूतानि | = सम्पूर्ण प्राणियोंको |
|---|---|---|---|---|---|
| ईश्वरः | = ईश्वर | मायया | = अपनी मायासे | (उनके स्वभावके | |
| सर्वभूतानाम् | = सम्पूर्ण प्राणियोंके | यन्त्रारूढानि | = शरीररूपी यन्त्रपर | अनुसार) | |
| हृदेशे | = हृदयमें | आरूढ हुए | भ्रामयन् = भ्रमण करता रहता है। |
व्याख्या—‘ईश्वरः सर्वभूतानां ..... यन्त्रारूढानि मायया’ —इसका तात्पर्य यह है कि जो ईश्वर सबका शासक, नियामक, सबका भरण-पोषण करनेवाला और निरपेक्षरूपसे सबका संचालक है, वह अपनी शक्तिसे उन प्राणियोंको घुमाता है, जिन्होंने शरीरको ‘मैं’ और ‘मेरा’ मान रखा है।
जैसे, विद्युत्-शक्तिसे संचालित यन्त्र—रेलपर कोई आरूढ हो जाता है, चढ़ जाता है तो उसको परवशतासे रेलके अनुसार ही जाना पड़ता है। परन्तु जब वह रेलपर आरूढ नहीं रहता, नीचे उतर जाता है, तब उसको रेलके अनुसार नहीं जाना पड़ता। ऐसे ही जबतक मनुष्य शरीररूपी यन्त्रके साथ ‘मैं’ और ‘मेरे’-पनका सम्बन्ध रखता है, तबतक ईश्वर उसको उसके स्वभावके* अनुसार संचालित करता रहता है और वह मनुष्य जन्म-मरणरूप संसारके चक्रमें घूमता रहता है।
शरीरके साथ मैं-मेरेपनका सम्बन्ध होनेसे ही राग-द्वेष पैदा होते हैं, जिससे स्वभाव अशुद्ध हो जाता है। स्वभावके अशुद्ध होनेपर मनुष्य प्रकृति अर्थात् स्वभावके परवश हो जाता है। परन्तु शरीरसे सर्वथा सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर जब स्वभाव राग-द्वेषसे रहित अर्थात् शुद्ध हो जाता है, तब प्रकृतिकी परवशता नहीं रहती। प्रकृति-(स्वभाव-)की परवशता न रहनेसे ईश्वरकी माया उसको संचालित नहीं करती।
अब यहाँ यह शंका होती है कि जब ईश्वर ही हमारेको भ्रमण करवाता है, क्रिया करवाता है, तब यह काम करना चाहिये और यह काम नहीं करना चाहिये—ऐसी स्वतन्त्रता कहाँ रही? क्योंकि यन्त्रारूढ होनेके कारण हम यन्त्रके और यन्त्रके संचालक ईश्वरके अधीन हो गये, परतन्त्र हो गये, तो फिर यन्त्रका संचालक (प्रेरक) जैसा करायेगा, वैसा ही होगा? इसका समाधान इस प्रकार है—
जैसे, बिजलीसे संचालित होनेवाले यन्त्र अनेक तरहके होते हैं। एक ही बिजलीसे संचालित होनेपर भी किसी
यन्त्रमें बर्फ जम जाती है और किसी यन्त्रमें अग्नि जल जाती है अर्थात् उनमें एक-दूसरेसे बिलकुल विरुद्ध काम होता है। परन्तु बिजलीका यह आग्रह नहीं रहता कि मैं तो केवल बर्फ ही जमाऊँगी अथवा केवल अग्नि ही जलाऊँगी। यन्त्रोंका भी ऐसा आग्रह नहीं रहता कि हम तो केवल बर्फ ही जमायेंगे अथवा केवल अग्नि ही जलायेंगे, प्रत्युत यन्त्र बनानेवाले कारीगरने यन्त्रोंको जैसा बना दिया है, उसके अनुसार उनमें स्वाभाविक ही बर्फ जमती है और अग्नि जलती है। ऐसे ही मनुष्य, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, राक्षस आदि जितने भी प्राणी हैं, सब शरीररूपी यन्त्रोंपर चढ़े हुए हैं और उन सभी यन्त्रोंको ईश्वर संचालित करता है। उन अलग-अलग शरीरोंमें भी जिस शरीरमें जैसा स्वभाव है, उस स्वभावके अनुसार वे ईश्वरसे प्रेरणा पाते हैं और कार्य करते हैं। तात्पर्य यह है कि उन शरीरोंसे मैं-मेरेपनका सम्बन्ध माननेवालेका जैसा (अच्छा या मन्दा) स्वभाव होता है, उससे वैसी ही क्रियाएँ होती हैं। अच्छे स्वभाववाले (सज्जन) मनुष्यके द्वारा श्रेष्ठ क्रियाएँ होती हैं और मन्दे स्वभाववाले (दुष्ट) मनुष्यके द्वारा खराब क्रियाएँ होती हैं। इसलिये अच्छी या मन्दी क्रियाओंको करानेमें ईश्वरका हाथ नहीं है, प्रत्युत खुदके बनाये हुए अच्छे या मन्दे स्वभावका ही हाथ है।
जैसे बिजली यन्त्रके स्वभावके अनुसार ही उसका संचालन करती है, ऐसे ही ईश्वर प्राणीके (शरीरमें स्थित) स्वभावके अनुसार उसका संचालन करते हैं। जैसा स्वभाव होगा, वैसे ही कर्म होंगे। इसमें एक बात विशेष ध्यान देनेकी है कि स्वभावको सुधारनेमें और बिगाड़नेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं, कोई भी परतन्त्र नहीं है। परन्तु पशु, पक्षी, देवता, आदि जितने भी मनुष्येतर प्राणी हैं, उनमें अपने स्वभावको सुधारनेका न अधिकार है और न स्वतन्त्रता ही है। मनुष्य-शरीर अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है, इसलिये इसमें अपने स्वभावको सुधारनेका पूरा अधिकार है, पूरी स्वतन्त्रता है। उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके स्वभाव सुधारनेमें और स्वतन्त्रताका
- स्वभाव कारणशरीरमें रहता है। वही स्वभाव सूक्ष्म और स्थूल-शरीरमें प्रकट होता है।