श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
दुरुपयोग करके स्वभाव बिगाड़नेमें मनुष्य स्वयं ही हेतु है। ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयदेशमें रहता है—यह कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पृथ्वीमें सब जगह जल रहनेपर भी जहाँ कुआँ होता है, वहीसे जल प्राप्त होता है; ऐसे ही परमात्मा सब जगह समान रीतिसे परिपूर्ण होते हुए भी हृदयमें प्राप्त होते हैं अर्थात् हृदय सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिका विशेष स्थान है। ऐसे ही तीसरे अध्यायमें सर्वव्यापी परमात्माको यज्ञ-(निष्काम-कर्म-) में स्थित बताया गया है—‘तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्’ (गीता ३।१५)।
विशेष बात
साधककी प्रायः यह भूल होती है कि वह भजन, कीर्तन, ध्यान आदि करते हुए भी ‘भगवान् दूर हैं; वे अभी नहीं मिलेंगे; यहाँ नहीं मिलेंगे; अभी मैं योग्य नहीं हूँ; भगवान्की कृपा नहीं है’ आदि भावनाएँ बनाकर भगवान्की दूरीकी मान्यता ही दृढ़ करता रहता है। इस जगह साधकको यह सावधानी रखनी चाहिये कि जब भगवान् सभी प्राणियोंमें मौजूद हैं तो मेरेमें भी हैं। वे सर्वत्र व्यापक हैं तो मैं जो जप करता हूँ उस जपमें भी भगवान् हैं; मैं श्वास लेता हूँ तो उस श्वासमें भी भगवान् हैं; मेरे मनमें भी भगवान् हैं, बुद्धिमें भी भगवान् हैं; मैं जो ‘मैं-मैं’ कहता हूँ, उस ‘मैं’ में भी भगवान् हैं। उस ‘मैं’ का जो आधार है, वह अपना स्वरूप भगवान्से अभिन्न है अर्थात् ‘मैं’-पन तो दूर है, पर भगवान् ‘मैं’-पनसे भी नजदीक हैं। इस प्रकार अपनेमें भगवान्को मानते हुए ही भजन, जप, ध्यान आदि करने चाहिये।
अब शंका यह होती है कि अपनेमें परमात्माको माननेसे मैं और परमात्मा दो (अलग-अलग) हैं—यह
परिशिष्ट भाव—‘भ्रामयन्’ का तात्पर्य है कि संसारमात्रका संचालन भगवान्की ही शक्तिसे हो रहा है—‘मतः सर्वं प्रवर्तते’ (गीता १०।८)। भगवान् प्राणियोंको उनके स्व-स्वभावके अनुसार कर्म करनेकी प्रेरणा तो करते हैं, पर उसमें अपना आग्रह नहीं रखते। भगवान्का आग्रह न होनेके कारण ही मनुष्य अपनी कामना-ममता-आसक्तिके वशीभूत होकर पुण्य अथवा पाप करता है और उनका फल भोगनेके लिये स्वर्गादि लोकोंमें अथवा नरकों और नीच योनियोंमें जाता है। परन्तु जो भगवान्के शरण हो जाता है, उसको भगवान् विशेष प्रेरणा करते हैं। अहंकार न रहनेसे वह जो कुछ करता है, भगवान्की प्रेरणाके अनुसार ही करता है।
सम्बन्ध—अब भगवान् यन्त्रारूढ़ हुए प्राणियोंकी परवशताको मिटानेका उपाय बताते हैं।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परं शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥
द्वैतापत्ति होगी। इसका समाधान यह है कि परमात्माको अपनेमें माननेसे द्वैतापत्ति नहीं होती, प्रत्युत अहंकार-(‘मैं’-पन) को स्वीकार करनेसे जो अपनी अलग सत्ता प्रतीत होती है, उसीसे द्वैतापत्ति होती है। परमात्माको अपना और अपनेमें माननेसे तो परमात्मासे अभिन्नता होती है, जिससे प्रेम प्रकट होता है।
जैसे, गंगाजीमें बाढ़ आ जानेसे उसका जल बहुत बढ़ जाता है और फिर पीछे वर्षा न होनेसे उसका जल पुनः कम हो जाता है; परन्तु उसका जो जल गड़ढेमें रह जाता है अर्थात् गंगाजीसे अलग हो जाता है, उसको ‘गंगोज्झ’ कहते हैं। उस गंगोज्झको मदिराके समान महान् अपवित्र माना गया है। गंगाजीसे अलग होनेके कारण वह गंदा हो जाता है और उसमें अनेक कीटाणु पैदा हो जाते हैं, जो कि रोगोंके कारण हैं। परन्तु फिर कभी जोरकी बाढ़ आ जाती है, तो वह गंगोज्झ वापस गंगाजीमें मिल जाता है। गंगाजीमें मिलते ही उसकी एकदेशीयता, अपवित्रता, अशुद्धि आदि सभी दोष चले जाते हैं और वह पुनः महान् पवित्र गंगजल बन जाता है।
ऐसे ही यह मनुष्य जब अहंकारको स्वीकार करके परमात्मासे विमुख हो जाता है, तब इसमें परिच्छिन्नता, पराधीनता, जडता, विषमता, अभाव, अशान्ति, अपवित्रता आदि सभी दोष (विकार) आ जाते हैं। परन्तु जब यह अपने अंशी परमात्माके सम्मुख हो जाता है, उन्हींकी शरणमें चला जाता है अर्थात् अपना अलग कोई व्यक्तित्व नहीं रखता, तब उसमें आये हुए भिन्नता, पराधीनता आदि सभी दोष मिट जाते हैं। कारण कि स्वयं (चेतन स्वरूप-) में दोष नहीं हैं दोष तो अहंता-(मैं-पन) को स्वीकार करनेसे ही आते हैं।