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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1218

श्लोक ६२ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२१७

भारत | = हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! (तू) | शरणम् | = शरणमें | शान्तिम् | = शान्ति (संसारसे सर्वथा उपरति)-को ---|---|---|---|---|--- सर्वभावनेन | = सर्वभावसे | गच्छ | = चला जा। | शाश्वतम् | = (और) अविनाशी तम् | = उस ईश्वरकी | तत्प्रसादात् | = उसकी कृपासे (तू) | स्थानम् | = परमपदको एव | = ही | पराम् | = परम | प्राप्यसि | = प्राप्त हो जायगा।

व्याख्या —[मनुष्यमें प्रायः यह एक कमजोरी रहती है कि जब उसके सामने संत-महापुरुष विद्यमान रहते हैं, तब उसका उनपर श्रद्धा-विश्वास एवं महत्त्वबुद्धि नहीं होती*]; परन्तु जब वे चले जाते हैं, तब पीछे वह रोता है, पश्चात्ताप करता है। ऐसे ही भगवान् अर्जुनके रथके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं। वे ही भगवान् जब अर्जुनसे कहते हैं कि शरणागत भक्त मेरी कृपासे शाश्वत पदको प्राप्त हो जाता है; और तू भी मेरेमें चितवाला होकर मेरी कृपासे सम्पूर्ण विघ्नोंको तर जायगा, तब अर्जुन कुछ बोले ही नहीं। इससे यह सम्भावना भी हो सकती है कि भगवान्के वचनोंपर अर्जुनको पूरा विश्वास न हुआ हो। इसी दृष्टिसे भगवान्को यहाँ अर्जुनके लिये अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें जानेकी बात कहनी पड़ी।]

‘तमेव शरणं गच्छ’ —भगवान् कहते हैं कि जो सर्वव्यापक ईश्वर सबके हृदयमें विराजमान है और सबका संचालक है, तू उसीकी शरणमें चला जा। तात्पर्य है कि सांसारिक उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थ, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि किसीका किंचिन्मात्र भी आश्रय न लेकर केवल अविनाशी परमात्माका ही आश्रय ले ले।

पूर्वश्लोकमें यह कहा गया कि मनुष्य जबतक शरीररूपी यन्त्रके साथ मैं-मेरापनका सम्बन्ध रखता है तबतक ईश्वर अपनी मायासे उसको घुमाता रहता है। अब यहाँ ‘एव’ पदसे उसका निषेध करते हुए भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शरीररूपी यन्त्रके साथ किंचिन्मात्र भी मैं-मेरापनका सम्बन्ध न रखकर तू केवल उस ईश्वरकी शरणमें चला जा।

‘सर्वभावेन’ —सर्वभावसे शरणमें जानेका तात्पर्य यह हुआ कि मनसे उसी परमात्माका चिन्तन हो, शारीरिक क्रियाओंसे उसीका पूजन हो, उसीका प्रेमपूर्वक भजन हो और उसके प्रत्येक विधानमें परम प्रसन्नता हो। वह विधान चाहे शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदिके अनुकूल हो, चाहे

प्रतिकूल हो, उसे भगवान्का ही किया हुआ मानकर खूब प्रसन्न हो जाय कि अहो! भगवान्की मेरेपर कितनी कृपा है कि मेरेसे बिना पूछे ही, मेरे मन, बुद्धि आदिके विपरीत जानते हुए भी केवल मेरे हितकी भावनासे, मेरा परम कल्याण करनेके लिये उन्होंने ऐसा विधान किया है!

‘तत्प्रसादात्परं शान्तिं स्थानं प्राप्यसि शाश्वतम्’ —भगवान्ने पहले यह कह दिया था कि मेरी कृपासे शाश्वत पदकी प्राप्ति हो जाती है (छप्पनवाँ श्लोक) और मेरी कृपासे तू सम्पूर्ण विघ्नोंसे तर जायगा (अढ़ावनवाँ श्लोक)। वही बात यहाँ कहते हैं कि उस अन्तर्यामी परमात्माकी कृपासे तू परमशान्ति और शाश्वत स्थान-(पद-)को प्राप्त कर लेगा।

गीतामें अविनाशी परमपदको ही ‘परा शान्ति’ नामसे कहा गया है। परन्तु यहाँ भगवान्ने ‘परा शान्ति’ और ‘शाश्वत स्थान’ (परमपद)—दोनोंका प्रयोग एक साथ किया है। अतः यहाँ ‘परा शान्ति’ का अर्थ संसारसे सर्वथा उपरति और ‘शाश्वत स्थान’ का अर्थ परमपद लेना चाहिये।

भगवान्ने ‘तमेव शरणं गच्छ’ पदोंसे अर्जुनको सर्वव्यापी ईश्वरकी शरणमें जानेके लिये कहा है। इससे यह शंका हो सकती है कि क्या भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर नहीं हैं? क्योंकि अगर भगवान् श्रीकृष्ण ईश्वर होते, तो अर्जुनको ‘उसीकी शरणमें जा’—ऐसा (परोक्ष रीतिसे) नहीं कहते।

इसका समाधान यह है कि भगवान्ने सर्वव्यापक ईश्वरकी शरणागतिको तो ‘गुह्यादगुह्यतरम्’ (१८।६३) अर्थात् गुह्यसे गुह्यतर कहा है, पर अपनी शरणागतिको ‘सर्वगुह्यतमम्’ (१८।६४) अर्थात् सबसे गुह्यतम कहा है। इससे सर्वव्यापक ईश्वरकी अपेक्षा भगवान् श्रीकृष्ण बड़े ही सिद्ध हुए।

भगवान्ने पहले कहा है कि मैं अजन्मा, अविनाशी और सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको

  • ‘अतिपरिचयादवज्ञा’ अर्थात् जहाँ किसीसे अति परिचय होता है, वहाँ उसकी अवज्ञा होती है।