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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ (चौथे अध्यायका छठा श्लोक); मैं सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंका भोक्ता हूँ, सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ और सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् हूँ—ऐसा मुझे माननेसे शान्तिकी प्राप्ति होती है (पाँचवें अध्यायका उन्तीसवाँ श्लोक); परन्तु जो मुझे सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता और सबका मालिक नहीं मानते, उनका पतन होता है (नवें अध्यायका चौबीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अन्वय-व्यतिरेकसे भी भगवान् श्रीकृष्णका ईश्वरत्व सिद्ध हो जाता है।

इस अध्यायमें 'ईश्वरः सर्वभूतानां ह्देशऽर्जुन तिष्ठति' (१८।६१) पदोंसे अन्तर्यामी ईश्वरको सब प्राणियोंके हृदयमें स्थित बताया है और पंद्रहवें अध्यायमें 'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः' (१५।१५) पदोंसे अपनेको सबके हृदयमें स्थित बताया है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण दो नहीं हैं, एक ही हैं।

जब अन्तर्यामी परमात्मा और भगवान् श्रीकृष्ण एक ही हैं, तो फिर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको 'तमेव शरणं गच्छ' क्यों कहा? इसका कारण यह है कि पहले छप्पनवें

परिशिष्ट भाव—जीव ईश्वरका ही अंश है, इसलिये भगवान् ईश्वरकी ही शरणमें जानेके लिये कहते हैं। ईश्वरके शरण होनेसे अहंकार नहीं रहता। जबतक जीव ईश्वरके वश (शरण)-में नहीं होता, तभीतक वह प्रकृतिके वशमें रहता है। वह जितना-जितना जड़ताकी ओर जाता है, उतनी-उतनी आसुरी-सम्पत्ति आती है और जितना-जितना चिन्मयताकी ओर जाता है, उतनी-उतनी दैवी-सम्पत्ति आती है।

सम्बन्ध—पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि तू उस अन्तर्यामी ईश्वरकी शरणमें चला जा। ऐसा कहनेपर भी अर्जुन कुछ नहीं बोले। इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको चेतानेके लिये उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यादगुह्यतरं मया।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ ६३ ॥

इति= यहते= तुझेविमृश्य= विचार
गुह्यात्= गुह्यसे भीआख्यातम्= कह दिया।करके
गुह्यतरम्= गुह्यतरएतत्= (अब तू)यथा= जैसा
ज्ञानम्= (शरणागतिरूप)इसपरइच्छसि= चाहता है,
ज्ञानअशेषेण= अच्छीतथा= वैसा
मया= मैंनेतरहसेकुरु= कर।

व्याख्या—'इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यादगुह्यतरं मया'—पूर्वश्लोकमें सर्वव्यापक अन्तर्यामी परमात्माकी जो शरणागति बतायी गयी है, उसीका लक्ष्य यहाँ 'इति'

पदसे कराया गया है। भगवान् कहते हैं कि यह गुह्यसे भी गुह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान मैंने तेरे लिये कह दिया है। कर्मयोग 'गुह्य' है और अन्तर्यामी निराकार परमात्माकी