श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1220, कुल 1299 में से
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- साधक-संजीवनी *
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शरणागति 'गृह्यतर' है।
'विमृश्यैतदशेषेण'—गृह्य-से-गृह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान बताकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मैंने पहले जो भक्तिकी बातें कही हैं, उनपर तुम अच्छी तरहसे विचार कर लेना। भगवान्ने इसी अध्यायके सत्तावनवें-अठ्ठावनवें श्लोकोंमें अपनी भक्ति-(शरणागति-) की जो बातें कही हैं, उन्हें 'एतत्' पदसे लेना चाहिये। गीतामें जहाँ-जहाँ भक्तिकी बातें आयी हैं, उन्हें 'अशेषेण' पदसे लेना चाहिये।
'विमृश्यैतदशेषेण' कहनेमें भगवान्की अत्यधिक कृपालुताकी एक गूढ़ाभिसन्धि है कि कहीं अर्जुन मेरेसे विमुख न हो जाय, इसलिये यदि यह मेरी कही हुई बातोंकी तरफ विशेषतासे खयाल करेगा तो असली बात अवश्य ही इसकी
समझमें आ जायगी और फिर यह मेरेसे विमुख नहीं होगा।
'यथेच्छसि तथा कुरु'—पहले कही सब बातोंपर पूरा-पूरा विचार करके फिर तेरी जैसी मरजी आये, वैसा कर। तू जैसा करना चाहता है, वैसा कर—ऐसा कहनेमें भी भगवान्की आत्मीयता, कृपालुता और हितैषिता ही प्रत्यक्ष दीख रही है।
पहले 'वक्ष्याम्यशेषतः' (७।२), 'इदं तु ते गृह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनमूयते' (९।१); 'वक्ष्यामि हितकाम्यया' (१०।१) आदि श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके हितकी बात कहते आये हैं, पर इन वाक्योंमें भगवान्की अर्जुनपर 'सामान्य कृपा' है।
'न श्रोष्यसि विनइक्ष्यसि' (१८।५८)—इस श्लोकमें
१-योगयुक्त बुद्धिवाले कर्मफलका त्याग करके अनामय पदको प्राप्त हो जाते हैं (दूसरे अध्यायका इक्ष्यावनवों श्लोक); जो प्राप्ति ज्ञानयोगसे होती है, वह प्राप्ति कर्मयोगसे हो जाती है (चौथे अध्यायका अङ्गीतसवों श्लोक); योगयुक्त मुनि बहुत जल्दी परमात्माको प्राप्त हो जाता है (पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक); कर्मफलका त्याग करनेपर सदा रहनेवाली शांति प्राप्त होती है (पाँचवें अध्यायका बारहवों श्लोक) आदि श्लोकोंसे कर्मयोग परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन सिद्ध होता है। ऐसे कर्मयोगको 'गृह्य' कहते हैं।
जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करके निराकार परमात्माके शरण हो जाना—यह कर्मयोगसे भी अधिक महत्त्वका है, इसलिये इसे 'गृह्यतर' कहते हैं।
सूर्यको मैंने ही उपदेश दिया था, वही मैं तेरेको कह रहा हूँ (चौथे अध्यायका तीसरा श्लोक); सम्पूर्ण जगत् मेरेसे ही व्याप्त है (नवें अध्यायका चौथा श्लोक); क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम 'पुरुषोत्तम' मैं ही हूँ (पन्द्रहवें अध्यायका अठारहवों श्लोक) आदि बातोंमें भगवान्ने अपनी भगवत्ता प्रकट की है, इसलिये ये बातें 'गृह्यतम' हैं।
तू केवल मेरी ही शरणमें आ जा, फिर तेरेको किंचिन्मात्र भी करना नहीं है, मैं तेरेको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक-चिन्ता मत कर (अठारहवें अध्यायका छालठवों श्लोक)—इस प्रकार अपनी शरणागतिकी बात कहना 'सर्वगृह्यतम' है।
जिसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि सब साधनोंका वर्णन होता है, उस योगशास्त्रको 'परमगृह्य' कहा गया है (अठारहवें अध्यायका अड़सठवों और पचहत्तरवों श्लोक)।
२-गीतामें भक्तिकी बातें इन श्लोकोंमें आयी हैं—सम्पूर्ण योगियोंमें भक्तियोगी श्रेष्ठ है (छठे अध्यायका सैतालीसवों श्लोक); मेरी शरण लेनेवाले मायाको तर जाते हैं (सातवें अध्यायका चौदहवों श्लोक); सब कुछ वासुदेव ही है—इस प्रकार मेरी (भगवान्की) शरण लेनेवाले महात्मा अत्यन्त दुर्लभ हैं (सातवें अध्यायका उन्नीसवों श्लोक); अनन्य भक्तिसे मैं सुलभ हूँ (आठवें अध्यायका चौदहवों श्लोक); अनन्यभक्तिसे परम पुरुषकी प्राप्ति होती है (आठवें अध्यायका बाईसवों श्लोक); देवी-सम्पत्तिके आश्रित महात्मायोग अनन्यमनसे मेरा भजन करते हैं (नवें अध्यायका तेरहवों श्लोक); दृढ़ निश्चयवाले भक्त निरन्तर कीर्तन करते हुए तथा मुझे नमस्कार करते हुए भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं (नवें अध्यायका चौदहवों श्लोक); अनन्यभक्तका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (नवें अध्यायका बाईसवों श्लोक); भक्तद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पित पत्र, पुष्प, फल आदिकों मैं खाता हूँ (नवें अध्यायका छब्बीसवों श्लोक); तू जो करता है, हवन करता है, दान देता है और तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर (नवें अध्यायका सत्ताईसवों श्लोक); सब कर्म मेरे अर्पण कर दे तो तू शुभाशुभ फलरूप बन्धनसे मुक्त हो जायगा (नवें अध्यायका अठ्ठाईसवों श्लोक); मेरेमें मनवाला हो, मेरा भक्त हो, मेरा पूजन करनेवाला हो और मेरेको नमस्कार कर (नवें अध्यायका चौंतीसवों श्लोक); सब प्रकारसे मेरेमें लगे हुए भक्तोंका अज्ञान मैं दूर कर देता हूँ, जिससे वे मेरेको ही प्राप्त होते हैं (दसवें अध्यायका नवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक); अनन्यभक्तिसे ही मैं देखा और जाना जा सकता हूँ तथा मेरेमें प्रवेश किया जा सकता है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवों श्लोक); अनन्यभक्तिवाला पुरुष मेरेको ही प्राप्त होता है (ग्यारहवें अध्यायका पचपनवों श्लोक); मेरा भजन करनेवाला भक्त अति उत्तम योगी है (बारहवें अध्यायका दूसरा श्लोक); जो सब कर्मोंको मेरे अर्पण करके मेरे परायण हो गये हैं, उनका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (बारहवें अध्यायका छठा-सातवों श्लोक); तू मेरेमें ही मन और बुद्धिको अर्पित कर दे तो मेरी प्राप्ति हो जायगी (बारहवें अध्यायका आठवों श्लोक); अन्यभिचारी भक्तियोगसे मनुष्य गुणातीत हो जाता है (चौदहवें अध्यायका छब्बीसवों श्लोक); सर्वभावसे मेरा भजन करनेवाला भक्त सर्ववित् है (पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवों श्लोक), आदि-आदि।