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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

श्लोक ६३ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२११

शरणागति 'गृह्यतर' है।

'विमृश्यैतदशेषेण'—गृह्य-से-गृह्यतर शरणागतिरूप ज्ञान बताकर भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि मैंने पहले जो भक्तिकी बातें कही हैं, उनपर तुम अच्छी तरहसे विचार कर लेना। भगवान्ने इसी अध्यायके सत्तावनवें-अठ्ठावनवें श्लोकोंमें अपनी भक्ति-(शरणागति-) की जो बातें कही हैं, उन्हें 'एतत्' पदसे लेना चाहिये। गीतामें जहाँ-जहाँ भक्तिकी बातें आयी हैं, उन्हें 'अशेषेण' पदसे लेना चाहिये।

'विमृश्यैतदशेषेण' कहनेमें भगवान्की अत्यधिक कृपालुताकी एक गूढ़ाभिसन्धि है कि कहीं अर्जुन मेरेसे विमुख न हो जाय, इसलिये यदि यह मेरी कही हुई बातोंकी तरफ विशेषतासे खयाल करेगा तो असली बात अवश्य ही इसकी

समझमें आ जायगी और फिर यह मेरेसे विमुख नहीं होगा।

'यथेच्छसि तथा कुरु'—पहले कही सब बातोंपर पूरा-पूरा विचार करके फिर तेरी जैसी मरजी आये, वैसा कर। तू जैसा करना चाहता है, वैसा कर—ऐसा कहनेमें भी भगवान्की आत्मीयता, कृपालुता और हितैषिता ही प्रत्यक्ष दीख रही है।

पहले 'वक्ष्याम्यशेषतः' (७।२), 'इदं तु ते गृह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनमूयते' (९।१); 'वक्ष्यामि हितकाम्यया' (१०।१) आदि श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके हितकी बात कहते आये हैं, पर इन वाक्योंमें भगवान्की अर्जुनपर 'सामान्य कृपा' है।

'न श्रोष्यसि विनइक्ष्यसि' (१८।५८)—इस श्लोकमें

१-योगयुक्त बुद्धिवाले कर्मफलका त्याग करके अनामय पदको प्राप्त हो जाते हैं (दूसरे अध्यायका इक्ष्यावनवों श्लोक); जो प्राप्ति ज्ञानयोगसे होती है, वह प्राप्ति कर्मयोगसे हो जाती है (चौथे अध्यायका अङ्गीतसवों श्लोक); योगयुक्त मुनि बहुत जल्दी परमात्माको प्राप्त हो जाता है (पाँचवें अध्यायका छठा श्लोक); कर्मफलका त्याग करनेपर सदा रहनेवाली शांति प्राप्त होती है (पाँचवें अध्यायका बारहवों श्लोक) आदि श्लोकोंसे कर्मयोग परमात्मप्राप्तिका स्वतन्त्र साधन सिद्ध होता है। ऐसे कर्मयोगको 'गृह्य' कहते हैं।

जड़तासे सम्बन्ध-विच्छेद करके निराकार परमात्माके शरण हो जाना—यह कर्मयोगसे भी अधिक महत्त्वका है, इसलिये इसे 'गृह्यतर' कहते हैं।

सूर्यको मैंने ही उपदेश दिया था, वही मैं तेरेको कह रहा हूँ (चौथे अध्यायका तीसरा श्लोक); सम्पूर्ण जगत् मेरेसे ही व्याप्त है (नवें अध्यायका चौथा श्लोक); क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम 'पुरुषोत्तम' मैं ही हूँ (पन्द्रहवें अध्यायका अठारहवों श्लोक) आदि बातोंमें भगवान्ने अपनी भगवत्ता प्रकट की है, इसलिये ये बातें 'गृह्यतम' हैं।

तू केवल मेरी ही शरणमें आ जा, फिर तेरेको किंचिन्मात्र भी करना नहीं है, मैं तेरेको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, तू शोक-चिन्ता मत कर (अठारहवें अध्यायका छालठवों श्लोक)—इस प्रकार अपनी शरणागतिकी बात कहना 'सर्वगृह्यतम' है।

जिसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि सब साधनोंका वर्णन होता है, उस योगशास्त्रको 'परमगृह्य' कहा गया है (अठारहवें अध्यायका अड़सठवों और पचहत्तरवों श्लोक)।

२-गीतामें भक्तिकी बातें इन श्लोकोंमें आयी हैं—सम्पूर्ण योगियोंमें भक्तियोगी श्रेष्ठ है (छठे अध्यायका सैतालीसवों श्लोक); मेरी शरण लेनेवाले मायाको तर जाते हैं (सातवें अध्यायका चौदहवों श्लोक); सब कुछ वासुदेव ही है—इस प्रकार मेरी (भगवान्की) शरण लेनेवाले महात्मा अत्यन्त दुर्लभ हैं (सातवें अध्यायका उन्नीसवों श्लोक); अनन्य भक्तिसे मैं सुलभ हूँ (आठवें अध्यायका चौदहवों श्लोक); अनन्यभक्तिसे परम पुरुषकी प्राप्ति होती है (आठवें अध्यायका बाईसवों श्लोक); देवी-सम्पत्तिके आश्रित महात्मायोग अनन्यमनसे मेरा भजन करते हैं (नवें अध्यायका तेरहवों श्लोक); दृढ़ निश्चयवाले भक्त निरन्तर कीर्तन करते हुए तथा मुझे नमस्कार करते हुए भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं (नवें अध्यायका चौदहवों श्लोक); अनन्यभक्तका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (नवें अध्यायका बाईसवों श्लोक); भक्तद्वारा प्रेमपूर्वक अर्पित पत्र, पुष्प, फल आदिकों मैं खाता हूँ (नवें अध्यायका छब्बीसवों श्लोक); तू जो करता है, हवन करता है, दान देता है और तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर (नवें अध्यायका सत्ताईसवों श्लोक); सब कर्म मेरे अर्पण कर दे तो तू शुभाशुभ फलरूप बन्धनसे मुक्त हो जायगा (नवें अध्यायका अठ्ठाईसवों श्लोक); मेरेमें मनवाला हो, मेरा भक्त हो, मेरा पूजन करनेवाला हो और मेरेको नमस्कार कर (नवें अध्यायका चौंतीसवों श्लोक); सब प्रकारसे मेरेमें लगे हुए भक्तोंका अज्ञान मैं दूर कर देता हूँ, जिससे वे मेरेको ही प्राप्त होते हैं (दसवें अध्यायका नवेंसे ग्यारहवें श्लोकतक); अनन्यभक्तिसे ही मैं देखा और जाना जा सकता हूँ तथा मेरेमें प्रवेश किया जा सकता है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवों श्लोक); अनन्यभक्तिवाला पुरुष मेरेको ही प्राप्त होता है (ग्यारहवें अध्यायका पचपनवों श्लोक); मेरा भजन करनेवाला भक्त अति उत्तम योगी है (बारहवें अध्यायका दूसरा श्लोक); जो सब कर्मोंको मेरे अर्पण करके मेरे परायण हो गये हैं, उनका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (बारहवें अध्यायका छठा-सातवों श्लोक); तू मेरेमें ही मन और बुद्धिको अर्पित कर दे तो मेरी प्राप्ति हो जायगी (बारहवें अध्यायका आठवों श्लोक); अन्यभिचारी भक्तियोगसे मनुष्य गुणातीत हो जाता है (चौदहवें अध्यायका छब्बीसवों श्लोक); सर्वभावसे मेरा भजन करनेवाला भक्त सर्ववित् है (पन्द्रहवें अध्यायका उन्नीसवों श्लोक), आदि-आदि।

१२२०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

अर्जुनको धमकानेमँ भगवान्की 'विशेष कृपा' और अपनेपनका भाव टपकता है।

यहाँ 'यथेच्छसि तथा कुरु' कहकर भगवान् जो अपनेपनका त्याग कर रहे हैं, इसमें तो भगवान्की 'अत्यधिक कृपा' और आत्मीयता भरी हुई है। कारण कि भक्त भगवान्का धमकाया जाना तो सह सकता है, पर भगवान्का त्याग नहीं सह सकता। इसलिये 'न श्रोष्यसि विनइच्छ्यसि' आदि कहनेपर भी अर्जुनपर इतना असर नहीं पड़ा जितना 'यथेच्छसि तथा कुरु' कहनेपर पड़ा।

परिशिष्ट भाव— 'यथेच्छसि तथा कुरु'—यह भगवान् त्याग करनेके लिये नहीं कहते हैं, प्रत्युत अपनी तरफ विशेषतासे खींचनेके लिये कहते हैं; जैसे—गँद फेंकते हैं विशेषतासे पीछे लेनेके लिये, न कि त्याग करनेके लिये। तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें अन्तर्यामी निराकार ईश्वरकी शरणागतिकी बात कहकर अब भगवान् अर्जुनको अपनी तरफ अर्थात् सगुण-साकारकी तरफ खींचना चाहते हैं, जिससे अर्जुन समग्रकी प्राप्तिसे रीता न रह जाय। निराकारमें साकार नहीं आता, पर साकारमें निराकार भी आ जाता है।

सम्बन्ध— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने 'विमृश्यैतदशेषेण' पदसे अर्जुनको कहा कि मेरे इस पूरे उपदेशका सार निकाल लेना। परन्तु भगवान्के सम्पूर्ण उपदेशका सार निकाल लेना अर्जुनके वशकी बात नहीं थी; क्योंकि अपने उपदेशका सार निकालना जितना वक्ता जानता है, उतना श्रोता नहीं जानता। दूसरी बात, 'जैसी मरजी आये, वैसा कर'—इस प्रकार भगवान्के मुखसे अपने त्यागकी बात सुनकर अर्जुन बहुत डर गये, इसलिये आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् अपने प्रिय सखा अर्जुनको आश्वासन देते हैं।

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।

इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥

सर्वगुह्यतमम्= सबसे अत्यन्त गोपनीय
परमम्= सर्वोत्कृष्ट
वचः= वचन (तू)
भूयः= फिर
मे= मुझसे
शृणु= सुन। (तू)
मे= मेरा
दृढम्= अत्यन्त
इष्टः= प्रिय मित्र
असि= है,
ततः= इसलिये
इति= यह (विशेष)
हितम्= हितकी बात (मैं)
ते= तुझे
वक्ष्यामि= कहूँगा।

व्याख्या— 'सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः'—पहले तिरसठवँ श्लोकमें भगवान्ने गुह्य (कर्मयोगकी) और गुह्यतर (अन्तर्यामी निराकारकी शरणागतिकी) बात कही और 'इदं तु ते गुह्यतमम्' (९।१) तथा 'इति गुह्यतमं शास्त्रम्' (१५।२०)—इन पदोंसे गुह्यतम (अपने प्रभावकी) बात कह दी, पर सर्वगुह्यतम बात गीतामें पहले कहीं नहीं कही। अब यहाँ अर्जुनकी घबराहटको देखकर भगवान् कहते हैं कि मैं सर्वगुह्यतम अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय बात फिर कहूँगा, तू मेरे

इसे सुनकर अर्जुन घबरा गये कि भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे हैं! क्योंकि मैंने यह बड़ी भारी गलती की कि भगवान्के द्वारा प्यारसे समझाने, अपनेपनसे धमकाने और अन्तर्यामीकी शरणागतिकी बात कहनेपर भी मैं कुछ बोला नहीं, जिससे भगवान्को 'जैसी मरजी आये, वैसा कर'—यह कहना पड़ा। अब तो मैं कुछ भी कहनेके लायक नहीं हूँ!—ऐसा सोचकर अर्जुन बड़े दुःखी हो जाते हैं, तब भगवान् अर्जुनके बिना पुछे ही सर्वगुह्यतम वचनोंको कहते हैं, जिसका वर्णन आगेके श्लोकमें है।

परम, सर्वश्रेष्ठ वचनोंको सुन।

इस श्लोकमें 'सर्वगुह्यतमम्' पदसे भगवान्ने बताया कि यह हरेकके सामने प्रकट करनेकी बात नहीं है और सड़सठवँ श्लोकमें 'इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन' पदसे भगवान्ने बताया कि इस बातको असहिष्णु और अभक्तसे कभी मत कहना। इस प्रकार दोनों तरफसे निषेध करके बीचमें (छियासठवँ श्लोकमें) 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'—इस सर्वगुह्यतम बातको रखा है। दोनों तरफसे निषेध करनेका तात्पर्य है कि यह गीताभरमें

श्लोक ६४ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२२१

अत्यन्त रहस्यमय खास उपदेश है।

दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें 'धर्मसमूद्धचेताः' कहकर अर्जुन अपनेको धर्मका निर्णय करनेमें अयोग्य समझते हुए भगवान्से पूछते हैं, उनके शिष्य बनते हैं और शिक्षा देनेके लिये कहते हैं। अतः भगवान् यहाँ (छाछठवें श्लोकमें) कहते हैं कि तू धर्मके निर्णयका भार अपने ऊपर मत ले, वह भार मेरेपर छोड़ दे—मेरे ही अर्पण कर दे और अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। फिर तेरेको जो पाप आदिका डर है, उन सब पापोंसे मैं तुझे मुक्त कर दूँगा। तू सब चिन्ताओंको छोड़ दे। यही भगवान्का 'सर्वगृह्यतम परम वचन' है।

'भूयः शृणु' का तात्पर्य है कि मैंने यही बात दूसरे शब्दोंमें पहले भी कही थी, पर तुमने ध्यान नहीं दिया। अतः मैं फिर वही बात कहता हूँ। अब इस बातपर तुम विशेषरूपसे ध्यान दो।

यह सर्वगृह्यतमवाली बात भगवान्ने पहले 'मत्परः' मच्चित्तः सततं भव' (१८।५७) और 'मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि' (१८।५८) पदोंसे कह दी थी; परन्तु 'सर्वगृह्यतमम्' पद पहले नहीं कहा, और अर्जुनका भी उस बातपर लक्ष्य नहीं गया। इसलिये अब फिर उस बातपर अर्जुनका लक्ष्य करानेके लिये और उस बातका महत्त्व बतानेके लिये भगवान् यहाँ 'सर्वगृह्यतमम्' पद देते हैं।

'इच्छोऽसि मे दृढमिति'—इससे पहले भगवान्ने कहा था कि जैसी मरजी आये, वैसा कर। जो अनुयायी है, आज्ञा-पालक है, शरणागत है, उसके लिये ऐसी बात कहनेके समान दूसरा क्या दण्ड दिया जा सकता है! अतः

१-दसवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने 'भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः' कहा और यहाँ 'सर्वगृह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः' कहा। इन दोनोंमें केवल 'एव महाबाहो' की जगह 'सर्वगृह्यतमम्' पद आया है अर्थात् केवल छः अक्षर ही बदले हैं, बाकी दस अक्षर वे-के-वे ही हैं। वहाँ 'भूय एव महाबाहो' कहकर 'मच्चिताः' (१०।१) कहते हैं और यहाँ 'मच्चित्तः' (१८।५७-५८) कहकर 'सर्वगृह्यतमं भूयः' कहते हैं। परन्तु 'मच्चिताः' और 'मच्चित्तः' में थोड़ा फरक है। वहाँ 'मच्चिताः' में प्रथम पुरुषका प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये बात कही है, और यहाँ 'मच्चित्तः' में मध्यम पुरुषका प्रयोग करके अर्जुनके लिये विशेष आज्ञा दी है। वहाँ भी 'मेरी कृपासे अज्ञान दूर हो जायगा' ऐसा कहा है और यहाँ भी 'मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको तर जायगा' ऐसा कहा है।

वहाँ 'यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाय्या' (१०।१) कहा है और यहाँ 'ततो वक्ष्यामि ते हितम्' कहा है। वहाँ 'ममना भव' (१।३४) कहकर अन्व्यवहितरूपसे (लगतातर, पासमें ही) 'भूय एव महाबाहो' कहा है, और यहाँ 'सर्वगृह्यतमं भूयः' कहकर अन्व्यवहितरूपसे 'ममना भव' (१८।६५) कहा है।

जैसे 'सर्वगृह्यतमम्' पद गीतामें एक ही बार आया है, ऐसे ही 'सर्वधर्मान्यरित्यन्त्य मामेकं शरणं ब्रज'—ऐसा वाक्य भी एक ही बार आया है।

२-सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुह् कर सहज सुभाऊ॥ (मानस १।८१।२)

३-न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः। न च संकर्षणो न श्रीनैवात्मा च यथा भवान्॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१५)

४-सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥ (वाल्मीकि० ६।१८।३३)

इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें भय पैदा हो गया कि भगवान् मेरा त्याग कर रहे हैं। उस भयको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो। यदि अर्जुनके मनमें भय या संदेह न होता, तो भगवान्को 'तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो'—यह कहकर सफाई देनेकी क्या जरूरत थी? सफाई देना तभी बनता है, जब दूसरेके मनमें भय हो, सन्देह हो, हलचल हो।

'इष्टः' कहनेका दूसरा भाव यह है कि भगवान् अपने शरणागत भक्तको अपना इष्टदेव मान लेते हैं। भक्त सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्को अपना इष्ट मानता है, तो भगवान् भी उसको अपना इष्ट मान लेते हैं; क्योंकि भक्तके विषयमें भगवान्का यह कानून है—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (गीता ४।११) अर्थात् जो भक्त जैसे मेरे शरण होते हैं, मैं भी उनको वैसे ही आश्रय देता हूँ। भगवान्की दृष्टिमें भक्तके समान और कोई श्रेष्ठ नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं—'तुम्हारे-जैसे प्रेमी भक्त मुझे जितने प्यारे हैं, उतने प्यारे न ब्रह्माजी हैं, न शंकरजी हैं, न बलरामजी हैं; और तो क्या, मेरे शरीरमें निवास करनेवाली लक्ष्मीजी और मेरी आत्मा भी उतनी प्यारी नहीं है।'

'दृढम्' कहनेका तात्पर्य है कि जब तुमने एक बार कह दिया कि 'मैं आपके शरण हूँ' (दूसरे अध्यायका सातवाँ श्लोक) तो अब तुम्हें बिलकुल भी भय नहीं करना चाहिये। कारण कि जो मेरी शरणमें आकर एक बार भी सच्चे हृदयसे कह देता है कि 'मैं आपका ही हूँ' उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय (सुरक्षित) कर देता हूँ—यह मेरा व्रत है।

१२२२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८

'ततो वक्ष्यामि ते हितम्'-तू मेरा अत्यन्त प्यारा

मित्र है, इसलिये अपने हृदयकी अत्यन्त गोपनीय और

अपने दरबारकी श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ बात तुझे कहूँगा। दूसरी

बात, मैं जो आगे शरणागतिकी बात कहूँगा, उसका यह

तात्पर्य नहीं है कि मेरी शरणमें आनेसे मुझे कोई लाभ हो

जायगा, प्रत्युत इसमें केवल तेरा ही हित होगा। इससे सिद्ध

होता है कि प्राणिमात्रका हित केवल इसी बातमें है कि

वह किसी दूसरेका सहारा न लेकर केवल भगवान्‌की ही

शरण ले।

भगवान्‌की शरण होनेके सिवाय जीवका कहीं भी,

किंचिन्मात्र भी हित नहीं है। कारण यह है कि जीव साक्षात्

परमात्माका अंश है। इसलिये वह परमात्माको छोड़कर

किसीका भी सहारा लेगा तो वह सहारा टिकेगा नहीं। जब

संसारकी कोई भी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था

आदि स्थिर नहीं है, तो फिर उनका सहारा कैसे स्थिर रह

सकता है ? उनका सहारा तो रहेगा नहीं, पर चिन्ता, शोक,

दुःख आदि रह जायँगे ! जैसे, अग्निसे अंगार दूर हो जाता है

तो वह काला कोयला बन जाता है-'कोयला होय नहीं

उजला, सौ मन साबुन लगाय।' पर वही कोयला जब

पुनः अग्निसे मिल जाता है, तब वह अंगार (अग्निरूप) बन

जाता है और चमक उठता है। ऐसे ही यह जीव भगवान्‌से

विमुख हो जाता है तो बार-बार जन्मता-मरता और दुःख

पाता रहता है, पर जब यह भगवान्‌के सम्मुख हो जाता

है अर्थात् अनन्यभावसे भगवान्‌की शरणमें हो जाता है,

तब यह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है,

तथा संसारमात्रका कल्याण करनेवाला हो जाता है।

परिशिष्ट भाव-'तमेव शरणं गच्छ' (१८। ६२)-इसमें निराकारकी शरणागति है और 'मामेकं शरणं

व्रज' (१८।६६)-इसमें साकारकी शरणागति है। निराकारकी शरणमें जानेसे मुक्ति हो जायगी; परन्तु

साकारकी शरणमें जानेसे मुक्तिके साथ-साथ प्रेमकी भी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये साकारकी शरणागति 'सर्वगुह्यतम'

है। भगवान् भक्तिके प्रसंगमें ही 'परम वचन' कहते हैं। दसवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्‌ने कहा है-'शृणु

मे परमं वचः'।

अर्जुनने भगवान्‌से कहा था कि मैं आपका शिष्य हूँ-'शिष्यस्तेऽहम्' (२। ७), पर भगवान् कहते हैं कि

तू मेरा इष्ट मित्र है-'इष्टोऽसि'! तात्पर्य है कि गुरु तो चेला बनाता है, पर भगवान् चेला न बनाकर अपना मित्र

बनाते हैं!

भगवान्‌की तो हरेक बात ही हित करनेवाली है, पर उसमें भी विशेष हितकी बात होनेसे भगवान् 'ततो वक्ष्यामि

ते हितम्' कहते हैं।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥

मद्भक्तः

भव

मन्मनाः

मद्याजी

माम्

= (तू) मेरा भक्त

= हो जा,

= मुझमें मनवाला (हो

जा),

= मेरा पूजन करनेवाला

(हो जा और)

= मुझे

नमस्कुरु

माम्

एव

एष्यसि

ते

= नमस्कार कर।

(ऐसा करनेसे तू)

= मुझे

= ही

= प्राप्त हो जायगा

(-यह मैं)

= तेरे सामने

सत्यम्

प्रतिजाने

मे

प्रियः

असि

= सत्य

= प्रतिज्ञा करता हूँ;

(क्योंकि तू)

= मेरा

= अत्यन्त

प्रिय

= है।

व्याख्या-'मद्भक्तः'-साधकको सबसे पहले 'मैं

भगवान्‌का हूँ' इस प्रकार अपनी अहंता-(मैं-पन-) को

बदल देना चाहिये। कारण कि बिना अहंताके बदले साधन

सुगमतासे नहीं होता। अहंताके बदलनेपर साधन सुगमतासे,

स्वाभाविक ही होने लगता है। अतः साधकको सबसे पहले

'मद्भक्तः' होना चाहिये।

किसीका शिष्य बननेपर व्यक्ति अपनी अहंताको बदल

देता है कि 'मैं तो गुरु महाराजका ही हूँ।' विवाह हो जानेपर

कन्या अपनी अहंताको बदल देती है कि 'मैं तो ससुरालकी

ही हूँ', और पिताके कुलका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है।

श्लोक ६५ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२२३

ऐसे ही साधकको अपनी अहंता बदल देनी चाहिये कि 'मैं तो भगवान्का ही हूँ और भगवान् ही मेरे हैं; मैं संसारका नहीं हूँ और संसार मेरा नहीं है'। [ अहंताके बदलनेपर ममता भी अपने-आप बदल जाती है। ]

'मन्मना भव' —उपर्युक्त प्रकारसे अपनेको भगवान्का मान लेनेपर भगवान्में स्वाभाविक ही मन लगने लगता है। कारण कि जो अपना होता है, वह स्वाभाविक ही प्रिय लगता है और जहाँ प्रियता होती है, वहाँ स्वाभाविक ही मन लगता है। अतः भगवान्को अपना माननेसे भगवान् स्वाभाविक ही प्रिय लगते हैं। फिर मनसे स्वाभाविक ही भगवान्के नाम, गुण, प्रभाव, लीला आदिका चिन्तन होता है। भगवान्के नामका जप और स्वरूपका ध्यान बड़ी तत्परतासे और लगनपूर्वक होता है।

'मद्याजी' —अहंता बदल जानेपर अर्थात् अपने-आपको भगवान्का मान लेनेपर संसारका सब काम भगवान्की सेवाके रूपमें बदल जाता है अर्थात् साधक पहले जो संसारका काम करता था, वही काम अब भगवान्का काम हो जाता है। भगवान्का सम्बन्ध ज्यों-ज्यों दृढ़ होता जाता है, त्यों-ही-त्यों उसका सेवाभाव पूजाभावमें परिणत होता जाता है। फिर वह चाहे संसारका काम करे, चाहे घरका काम करे, चाहे शरीरका काम करे, चाहे ऊँचा-नीचा कोई भी काम करे, उसमें भगवान्की पूजाका ही भाव बना रहता है। उसकी यह दृढ़ धारणा हो जाती है कि भगवान्की पूजाके सिवाय मेरा कुछ भी काम नहीं है।

'मां नमस्कुरु' —भगवान्के चरणोंमें साष्टांग प्रणाम करके सर्वथा भगवान्के समर्पित हो जाय। मैं प्रभुके चरणोंमें ही पड़ा हुआ हूँ—ऐसा मनमें भाव रखते हुए जो कुछ अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाय, उसमें भगवान्का मंगलमय विधान मानकर परम प्रसन्न रहे।

भगवान्के द्वारा मेरे लिये जो कुछ भी विधान होगा, वह मंगलमय ही होगा। पूरी परिस्थिति मेरी समझमें आये या न आये—यह बात दूसरी है, पर भगवान्का विधान तो मेरे लिये कल्याणकारी ही है, इसमें कोई सन्देह नहीं। अतः जो कुछ होता है, वह मेरे कर्मोंका फल नहीं है, प्रत्युत भगवान्के द्वारा कृपा करके केवल मेरे हितके लिये भेजा हुआ विधान है।

परिशिष्ट भाव —अर्जुन भगवान्को प्राप्त ही हैं; अतः यहाँ 'मामेवैष्यसि' कहनेका तात्पर्य है कि तेरेको समग्र ('माम्')—की प्राप्ति हो जायगी, जिसके लिये भगवान्ने सातवें अध्यायके आरम्भमें कहा था—'असंशयं समग्रं मां

  • भगवान्का भक्त होना, उनमें मन लगाना, उनका पूजन करना और उन्हें नमस्कार करना—इन चारोंमें एक भी साधन वीक तरहसे होनेपर शेष तीनों साधन उसमें स्वतः आ जाते हैं।

कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् होनेसे जो कुछ विधान करते हैं, वह जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं। इसलिये भगवान् अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भेजकर प्राणियोंके पुण्य-पापोंका नाश करके, उन्हें परम शुद्ध बनाकर अपने चरणोंमें खींच रहे हैं—इस प्रकार दृढ़तासे भाव होना ही भगवान्के चरणोंमें नमस्कार करना है।

'मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे' —भगवान् कहते हैं कि इस प्रकार मेरा भक्त होनेसे, मेरेमें मनवाला होनेसे, मेरा पूजन करनेवाला होनेसे और मुझे नमस्कार करनेसे तू मेरेको ही प्राप्त होगा अर्थात् मेरेमें ही निवास करेगा*—ऐसी मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा प्यारा है।

'प्रियोऽसि मे' कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का जीवमात्रपर अत्यधिक स्नेह है। अपना ही अंश होनेसे कोई भी जीव भगवान्को अप्रिय नहीं है। भगवान् जीवोंको चाहे चौरासी लाख योनियोंमें भेजें, चाहे नरकोंमें भेजें, उनका उद्देश्य जीवोंको पवित्र करनेका ही होता है। जीवोंके प्रति भगवान्का जो यह कृपापूर्ण विधान है, यह भगवान्के प्यारका ही द्योतक है। इसी बातको प्रकट करनेके लिये भगवान् अर्जुनको जीवमात्रका प्रतिनिधि बनाकर 'प्रियोऽसि मे' वचन कहते हैं।

जीवमात्र भगवान्को अत्यन्त प्रिय है। केवल जीव ही भगवान्से विमुख होकर प्रतिक्षण वियुक्त होनेवाले संसार-(धन-सम्पत्ति, कुटुम्बी, शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, प्राण आदि-) को अपना मानने लगता है, जबकि संसारने कभी जीवको अपना नहीं माना है। जीव ही अपनी तरफसे संसारसे सम्बन्ध जोड़ता है। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और जीव नित्य अपरिवर्तनशील है। जीवसे यही गलती होती है कि वह प्रतिक्षण बदलनेवाले संसारके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। यही कारण है कि सम्बन्धीके न रहनेपर भी उससे माना हुआ सम्बन्ध रहता है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही अनर्थका हेतु है। इस सम्बन्धको मानने अथवा न माननेमें सभी स्वतन्त्र हैं। अतः इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करके, जिनसे हमारा वास्तविक और नित्य-सम्बन्ध है, उन भगवान्की शरणमें चले जाना चाहिये।

१२२४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु' । फिर तेरी मेरेसे आत्मीयता हो जायगी, जिसके लिये भगवान्ने सातवें अध्यायमें कहा था— 'ज्ञानी त्वात्सैव मे मतम्' (७।१८), 'प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः' (७।१७)।

सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें अर्जुनको आश्वासन देकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने उपदेशकी अत्यन्त गोपनीय सार बात बताते हैं।

सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥

सर्वधर्मान्= सम्पूर्ण धर्मोंकाशरणम्= शरणमेंपापोंसे
आश्रयव्रज= आ जा।मोक्षयिष्यामि= मुक्त कर
परित्यज्य= छोड़कर (तू)अहम्= मैं
एकम्= केवलत्वा= तुझेमा, शुचः
माम्= मेरीसर्वपापेभ्यः= सम्पूर्ण

व्याख्या— 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'—भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय, धर्मके निर्णयका विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है—इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा।

स्वयं भगवान्के शरणागत हो जाना—यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। इसमें शरणागत भक्तको अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता; जैसे—पतिव्रताका अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीरकी सार—सँभाल भी पतिके नाते, पतिके लिये ही करती है। वह घर, कुटुम्ब, वस्तु, पुत्र-पुत्री और अपने कहलानेवाले शरीरको भी अपना नहीं मानती, प्रत्युत पतिदेवका ही मानती है। तात्पर्य यह हुआ कि जिस प्रकार पतिव्रता पतिके परायण होकर पतिके गोत्रमें ही अपना गोत्र मिला देती है और पतिके ही घरपर रहती है, उसी प्रकार शरणागत भक्त भी शरीरको लेकर माने जानेवाले गोत्र, जाति, नाम आदिको भगवान्के चरणोंमें अर्पण करके निर्भय, निःशोक, निश्चिन्त और निःशंक हो जाता है।

गीताके अनुसार यहाँ 'धर्म' शब्द कर्तव्य-कर्मका वाचक है। कारण कि इसी अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक 'स्वभावज कर्म' शब्द आये हैं, फिर सैंतालीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें 'स्वधर्म' शब्द आया है।

उसके बाद, सैंतालीसवें श्लोकके ही उत्तरार्धमें तथा (प्रकरणके अन्तमें) अड़तालीसवें श्लोकमें 'कर्म' शब्द आया है। तात्पर्य यह हुआ कि आदि और अन्तमें 'कर्म' शब्द आया है और बीचमें 'स्वधर्म' शब्द आया है तो इससे स्वतः ही 'धर्म' शब्द कर्तव्य-कर्मका वाचक सिद्ध हो जाता है।

अब यहाँ प्रश्न यह होता है कि 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य' पदसे क्या धर्म अर्थात् कर्तव्य-कर्मका स्वरूपसे त्याग माना जाय? इसका उत्तर यह है कि धर्मका स्वरूपसे त्याग करना न तो गीताके अनुसार ठीक है और न यहाँके प्रसंगके अनुसार ही ठीक है; क्योंकि भगवान्की यह बात सुनकर अर्जुने कर्तव्य-कर्मका त्याग नहीं किया है, प्रत्युत 'करिष्ये वचनं तव' (१८।७३) कहकर भगवान्की आज्ञाके अनुसार कर्तव्य-कर्मका पालन करना स्वीकार किया है। केवल स्वीकार ही नहीं किया है, प्रत्युत अपने क्षेत्रधर्मके अनुसार युद्ध भी किया है। अतः उपर्युक्त पदमें धर्म अर्थात् कर्तव्यका त्याग करनेकी बात नहीं है। भगवान् भी कर्तव्यके त्यागकी बात कैसे कह सकते हैं! भगवान्ने इसी अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि यज्ञ, दान, तप और अपने-अपने वर्ण-आश्रमोंके जो कर्तव्य हैं, उनका कभी त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको जरूर करना चाहिये*।

  • तीसरे अध्यायमें तो भगवान्ने कर्तव्य-कर्मको न छोड़नेके लिये प्रकरण-का-प्रकरण ही कहा है—कर्मोंका त्याग करनेसे न तो निष्कर्मताकी प्राप्ति होती है और न सिद्धि ही होती है (चौथा श्लोक); कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता (पाँचवाँ श्लोक); जो बाहरसे कर्मोंका त्याग करके भीतरसे विषयोंका चिन्तन करता है,

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२२५

गीताका पूरा अध्ययन करनेसे यह मालूम होता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें कर्तव्य-कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। अर्जुन तो युद्धरूप कर्तव्य-कर्म छोड़कर भिक्षा माँगना श्रेष्ठ समझते थे (दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक); परन्तु भगवान्ने इसका निषेध किया (दूसरे अध्यायके इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक)। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ स्वरूपसे धर्मोका त्याग नहीं है।

अब विचार यह करना है कि यहाँ सम्पूर्ण धर्मोंके त्यागसे क्या लेना चाहिये? गीताके अनुसार सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् कर्मोंको भगवान्के अर्पण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। इसमें सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग करना और केवल भगवान्का आश्रय लेना—दोनों बातें सिद्ध हो जाती हैं। धर्मका आश्रय लेनेवाले बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—‘एवं त्रयीधर्ममनुष्यपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९।२१)। इसलिये धर्मका आश्रय छोड़कर भगवान्का ही आश्रय लेनेपर फिर अपने धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत नहीं रहती। आगे अर्जुनके जीवनमें ऐसा हुआ भी है।

अर्जुनका कर्णके साथ युद्ध हो रहा था। इस बीच कर्णके रथका चक्का पृथ्वीमें धँस गया। कर्ण रथसे नीचे उतरकर रथके चक्केको निकालनेका उद्योग करने लगा और अर्जुनसे बोला कि ‘जबतक मैं यह चक्का निकाल न लूँ, तबतक तुम ठहर जाओ; क्योंकि तुम रथपर हो और मैं रथसे

वह मिथ्याचारी है (छठों श्लोक); जो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके कर्तव्य-कर्म करता है, वही श्रेष्ठ है (सातवाँ श्लोक); कर्म किये बिना शरीरका निर्वाह भी नहीं होता, इसलिये कर्म करना चाहिये (आठवाँ श्लोक); बन्धनके भयसे भी कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है; क्योंकि केवल कर्तव्य-पालनके लिये कर्म करना बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत कर्तव्य-कर्मकी परम्परा सुरक्षित रखनेके सिवाय अपने लिये कुछ भी कर्म करना ही बन्धनकारक है (नवाँ श्लोक); ब्रह्माजीने कर्तव्यसहित प्रजाकी रचना करके कहा कि इस कर्तव्य-कर्मसे ही तुमलोगोंकी वृद्धि होगी और यही कर्तव्य-कर्म तुमलोगोंको कर्तव्य-सामग्री देनेवाला होगा (दसवाँ श्लोक); मनुष्य और देवता दोनों ही कर्तव्यका पालन करते हुए कल्याणको प्राप्त होंगे (ग्यारहवाँ श्लोक); जो कर्तव्यका पालन किये बिना प्राप्त सामग्रीका उपभोग करता है, वह चोर है (बारहवाँ श्लोक); कर्तव्य-कर्म करके अपना निर्वाह करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और जो केवल अपने लिये ही कर्म करता है, वह पापी पापका ही भक्ष्ण करता है। (तेरहवाँ श्लोक); कर्तव्य-पालनसे ही सुष्ठिचक्र चलता है; परन्तु जो सुष्ठिमें रहकर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसका जीना व्यर्थ है (सोलहवाँ श्लोक); आसक्तिसे रहित होकर कर्तव्य-कर्म करनेवाला मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है (उन्नीसवाँ श्लोक); जनकादि ज्ञानिजन भी कर्तव्य-कर्म करनेसे सिद्धिको प्राप्त हुए हैं; लोकसंग्रहकी दृष्टिसे भी कर्तव्य-कर्म करना चाहिये (बीसवाँ श्लोक); भगवान् अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अगर मैं सावधान रहकर कर्तव्य-कर्म न करूँ तो मैं वर्ण-संकरताका उत्पादक और लोकोका नाश करनेवाला बनूँ (तेईसवेंसे चौबीसवें श्लोकतक); ज्ञानी पुरुषको भी आसक्तिरहित होकर आस्तिक अज्ञानीकी तरह अपना कर्तव्य-कर्म करना चाहिये (पचीसवाँ श्लोक); ज्ञानीको चाहिये कि वह अज्ञानियोंमें बुद्धिभेद पैदा न करके अपने कर्तव्यका अच्छी तरहसे पालन करते हुए उनसे भी बेसे ही कराये (छब्बीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार तीसरे अध्यायमें भगवान्ने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करनेमें बड़ा जोर दिया है।

  • आतातयिनमायात्नं हन्यादेवाविचारयन्। नातातयिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन॥ (मनु० ८।३५०-३५१)

‘अपना अनिष्ट करनेके लिये आते हुए आतातयीको बिना विचार किये ही मार डालना चाहिये। आतातयीको मारनेसे मारनेवालेको कुछ भी दोष नहीं लगता।’

रहित हूँ और दूसरे कार्यमें लगा हुआ हूँ। ऐसे समय रथीको उचित है कि उसपर बाण न छोड़े। तुम सहस्त्रार्जुनके समान शस्त्र और शास्त्रके ज्ञाता हो और धर्मको जाननेवाले हो, इसलिये मेरे ऊपर प्रहार करना उचित नहीं है।’ कर्णकी बात सुनकर अर्जुनने बाण नहीं चलाया। तब भगवान्ने कर्णसे कहा कि ‘तुम्हारे-जैसे आतातयीको किसी तरहसे मार देना धर्म ही है, पाप नहीं* और अभी-अभी तुम छः महारथियोंने मिलकर अकेले अभिमन्युको घेरकर उसे मार डाला। अतः धर्मकी दुहाई देनेसे कोई लाभ नहीं है। हाँ, यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय तुम्हें धर्मकी बात याद आ रही है, पर जो स्वयं धर्मका पालन नहीं करता, उसे धर्मकी दुहाई देनेका कोई अधिकार नहीं है।’ ऐसा कहकर भगवान्ने अर्जुनको बाण चलानेकी आज्ञा दी तो अर्जुनने बाण चलाना आरम्भ कर दिया।

इस प्रकार यदि अर्जुन अपनी बुद्धिसे धर्मका निर्णय करते तो भूल कर बैठते; अतः उन्होंने धर्मका निर्णय भगवान्पर ही रखा और भगवान्ने धर्मका निर्णय किया भी।

अर्जुनके मनमें सन्देह था कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है (दूसरे अध्यायका छठा श्लोक)। यदि हम युद्ध करते हैं तो अपने कुटुम्बका नाश होता है और अपने कुटुम्बका नाश करना बड़ा भारी पाप है। इससे तो अनर्थ-परम्परा ही बढ़ेगी (पहले अध्यायके चालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक)।

१२२६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दूसरी तरफ हमलोग देखते हैं तो क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर श्रेयका कोई साधन नहीं है। अतः भगवान् कहते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, क्या धर्म है और क्या अधर्म है, इस पच्छेमें तू क्यों पड़ता है? तू धर्मके निर्णयका भार मेरेपर छोड़ दे। यही 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य' का तात्पर्य है।

'मामेकं शरणं ब्रज'—इन पदोंमें 'एकम्' पद 'माम्' का विशेषण नहीं हो सकता; क्योंकि 'माम्' (भगवान्) एक ही हैं, अनेक नहीं। इसलिये 'एकम्' पदका अर्थ 'अनन्य' लेना ही ठीक बैठता है। दूसरी बात, अर्जुनने 'तदेकं वद निश्चित्य' (३।२) और 'यच्छ्रेय एतयोरैकम्' (५।१) पदोंमें भी 'एकम्' पदसे सांख्य और कर्मयोगके विषयमें एक निश्चित श्रेयका साधन पूछा है। उसी 'एकम्' पदको लेकर भगवान् यहाँ यह बताया चाहते हैं कि सांख्ययोग, कर्मयोग आदि जितने भी भगवत्प्राप्तिके साधन हैं, उन सम्पूर्ण साधनोंमें मुख्य साधन एक अनन्य शरणागति ही है।

गीतामें अर्जुनने अपने कल्याणके साधनके विषयमें कई तरहके प्रश्न किये और भगवान्ने उनके उत्तर भी दिये। वे सब साधन होते हुए भी गीताके पूर्वापरको देखनेसे यह बात स्पष्ट दीखती है कि सम्पूर्ण साधनोंका सार और शिरोमणि साधन भगवान्के अनन्यशरण होना ही है।

भगवान्ने गीतामें जगह-जगह अनन्यभक्तिकी बहुत महिमा गायी है। जैसे, दुस्तर मायाको सुगमतासे तरनेका उपाय अनन्य शरणागति ही है (सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); अनन्यचेताके लिये मैं सुलभ हूँ (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); परम पुरुषकी प्राप्ति अनन्य भक्तिये ही होती है (आठवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); अनन्य भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); अनन्य भक्तिये ही भगवान्को जाना, देखना तथा प्राप्त किया जा सकता है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); अनन्य भक्तोंका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (बारहवें अध्यायका छठा-सातवाँ श्लोक); गुणातीत होनेका उपाय अनन्यभक्ति ही है (चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अनन्य भक्तिकी

महिमा गाकर भगवान् यहाँ पूरी गीताका सार बताते हैं—'मामेकं शरणं ब्रज।' तात्पर्य है कि उपाय और उपेय, साधन और साध्य मैं ही हूँ।

'मामेकं शरणं ब्रज' का तात्पर्य मन-बुद्धिके द्वारा शरणागतिको स्वीकार करना नहीं है, प्रत्युत स्वयंको भगवान्की शरणमें जाना है। कारण कि स्वयंके शरण होनेपर मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि भी उसीमें आ जाते हैं, अलग नहीं रहते।

'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः'—यहाँ कोई ऐसा मान सकता है कि पहले अध्यायमें अर्जुनने जो युद्धसे पाप होनेकी बातें कही थीं, उन पापोंसे छुटकारा दिलानेका प्रलोभन भगवान्ने दिया है। परन्तु यह मान्यता युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि जब अर्जुन सर्वथा भगवान्के शरण हो गये हैं, तब उनके पाप कैसे रह सकते हैं? और उनके लिये प्रलोभन कैसे दिया जा सकता है अर्थात् उनके लिये प्रलोभन देना बनता ही नहीं। हाँ, पापोंसे मुक्त करनेका प्रलोभन देना हो तो वह शरणागत होनेके पहले ही दिया जा सकता है, शरणागत होनेके बाद नहीं।

'मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा'—इसका भाव यह है कि जब तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर मेरी शरणमें आ गया और शरण होनेके बाद भी तुम्हारे भावों, वृत्तियों, आचरणों आदिमें फरक नहीं पड़ा अर्थात् उनमें सुधार नहीं हुआ; भगवत्प्रेम, भगवद्दर्शन आदि नहीं हुए और अपनेमें अयोग्यता, अनधिकारिता, निर्बलता आदि मालूम होती है, तो भी उनको लेकर तुम चिन्ता या भय मत करो। कारण कि जब तुम मेरी अनन्य-शरण हो गये तो वह कमी तुम्हारी कमी कैसे रही? उसका सुधार करना तुम्हारा काम कैसे रहा? वह कमी मेरी कमी है। अब उस कमीको दूर करना, उसका सुधार करना मेरा काम रहा। तुम्हारा तो बस, एक ही काम है; वह काम है—निर्भय, निःशोक, निश्चिन्त और निःशंक होकर मेरे चरणोंमें पड़े रहना! परन्तु अगर तेरेमें भय, चिन्ता, वहम आदि दोष आ जायेंगे तो वे शरणागतिमें बाधक हो जायेंगे और सब भार तेरेपर आ जायगा। शरण होकर अपनेपर भार लेना शरणागतिमें कलंक है।

१-इस श्लोकमें 'एव' पद 'अनन्यता' का ही वाचक है।

२-इस श्लोकमें 'अनन्यचेताः' पद अनन्य आश्रयका वाचक है।

३-सनमुख होड़ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस ५।४४।१)

४-काहू के बल भजन की, काहू के आचार। 'व्यास' भरोसे कुँवरि के, सोवत पाँव पसार॥

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२२७

जैसे, विभीषण भगवान् रामके चरणोंकी शरण हो जाते हैं, तो फिर विभीषणके दोषको भगवान् अपना ही दोष मानते हैं। एक समय विभीषणजी समुद्रके इस पार आये। वहाँ विप्रघोष नामक गाँवमें उनसे एक अज्ञात ब्राह्महत्या हो गयी। इसपर वहाँके ब्राह्मणोंने इकट्ठे होकर विभीषणको खूब मारा-पीटा, पर वे मेरे नहीं। फिर ब्राह्मणोंने उन्हें जंजीरोसे बाँधकर जमीनके भीतर एक गुफामें ले जाकर बंद कर दिया। रामजीको विभीषणके कैद होनेका पता लगा तो वे पुष्पकविमानके द्वारा तत्काल विप्रघोष नामक गाँवमें पहुँच गये और वहाँ विभीषणका पता लगाकर उनके पास गये। ब्राह्मणोंने रामजीका बहुत आदर-सत्कार किया और कहा कि 'महाराज! इसने ब्राह्महत्या कर दी है। इसको हमने बहुत मारा, पर यह मरा नहीं।' भगवान् रामने कहा कि 'हे ब्राह्मणो! विभीषणको मैंने कल्पतककी आयु और राज्य दे रखा है, वह कैसे मारा जा सकता है! और उसको मारनेकी जरूरत ही क्या है? वह तो मेरा भक्त है। भक्तके लिये मैं स्वयं मरनेको तैयार हूँ। दासके अपराधकी जिम्मेवारी वास्तवमें उसके मालिकपर ही होती है अर्थात् मालिक ही उसके दण्डका पात्र होता है। अतः विभीषणके बदलेमें आपलोग मेरेको ही दण्ड दें।' भगवान्की यह शरणागतवत्सलता देखकर सब ब्राह्मण आश्चर्य करने लगे और उन सबने भगवान्की शरण ले ली।

तात्पर्य यह हुआ कि 'मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस अपनेपनके समान योग्यता, पात्रता, अधिकारिता आदि कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। छोटा-सा बच्चा भी अपनेपनके बलपर ही आधी रातमें सारे घरको नचाता है अर्थात् जब वह रातमें रोता है तो सारे घरवाले उठ जाते हैं और उसे राजी करते हैं। इसलिये शरणागत भक्तको अपनी योग्यता आदिकी तरफ न देखकर भगवान्के साथ अपनेपनकी तरफ ही देखते रहना चाहिये।

'मा शुचः' का तात्पर्य है—

१-वर्मं मयैव मरणं मद्भक्तो हयते कथम्। राज्यमायुर्मया दत्तं तथैव स भविष्यति॥ भूत्पापराधे सर्वत्र स्वामिनो दण्ड इष्यते। रामवाक्यं द्विजाः श्रुत्वा विस्मयादिदमबुवन्॥

(पद्मपुराण, पाताल० १०४। १५०-१५१)

२-कौरवोंकी सभामें द्रौपदीका चीर खींचा गया तो द्रौपदी अपनी साड़ीको हाथोंसे, दांतोंसे पकड़ती है और भगवान्को पुकारती है। अपने बलका आश्रय रखते हुए भगवान्को पुकारनेसे भगवान्के आनेमें देरी लगती है। परन्तु जब द्रौपदी अपना उद्योग सर्वथा छोड़कर भगवान्पर ही निर्भर हो जाती है, तब दुःशासन चीरको खींच-खींचकर थक जाता है और चीरोंका ढेर लग जाता है, पर द्रौपदीका कोई भी अंग उघड़ता नहीं।

(१) मेरे शरण होकर तू चिन्ता करता है, यह मेरे प्रति अपराध है, तेरा अभिमान है और शरणागतिमें कर्लक है।

मेरे शरण होकर भी मेरा पूरा विश्वास, भरोसा न रखना ही मेरे प्रति अपराध है। अपने दोषोंको लेकर चिन्ता करना वास्तवमें अपने बलका अभिमान है; क्योंकि दोषोंको मिटानेमें अपनी सामर्थ्य मालूम देनेसे ही उनको मिटानेकी चिन्ता होती है। हाँ, अगर दोषोंको मिटानेमें चिन्ता न होकर दुःख होता है तो दुःख होना इतना दोषी नहीं है। जैसे, छोटे बालकके पास कुत्ता आता है तो वह कुत्तेको देखकर रोता है, चिन्ता नहीं करता। ऐसे ही दोषोंका न सुहाना दोष नहीं है, प्रत्युत चिन्ता करना दोष है। चिन्ता करनेका अर्थ यही होता है कि भीतरमें अपने छिपे हुए बलका आश्रय हैं और यही तेरा अभिमान है। मेरा भक्त होकर भी तू चिन्ता करता है तो तेरी चिन्ता दूर कहाँ होगी? लोग भी देखेंगे तो यही कहेंगे कि यह भगवान्का भक्त है और चिन्ता करता है! भगवान् इसकी चिन्ता नहीं मिटाते! तू मेरा विश्वास न करके चिन्ता करता है तो विश्वासकी कमी तो है तेरी और कर्लक आता है मेरेपर, मेरी शरणागतिपर। इसको तू छोड़ दे।

(२) तेरे भाव, वृत्तियाँ, आचरण शुद्ध नहीं हुए हैं तो भी तू इनकी चिन्ता मत कर। इनकी चिन्ता मैं करूँगा।

(३) दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरण हो जाते हैं और फिर आठवें श्लोकमें कहते हैं कि इस भूमण्डलका धन-धान्यसे सम्पन्न निष्कण्टक राज्य मिलनेपर अथवा देवताओंका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। भगवान् मानो कह रहे हैं कि तेरा कहना ठीक ही है; क्योंकि भौतिक नाशवान् पदार्थोंके सम्बन्धसे किसीका शोक कभी दूर हुआ नहीं, हो सकता नहीं और होनेकी सम्भावना भी नहीं। परन्तु मेरे शरण होकर जो तू शोक करता है, यह तेरी बड़ी भारी गलती है। तू मेरे शरण होकर भी भार अपने सिरपर ले रहा है।

१२२८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

(४) शरणागत होनेके बाद भक्तको लोक-परलोक, सद्गत-दुर्गति आदि किसी भी बातकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। इस विषयमें किसी भक्तने कहा है—

दिवि वा भुवि वा ममास्तु वासो नरके वा नरकान्तक प्रकामम्।

अवधीरितशरदारविन्दौ चरणौ ते मरणेऽपि चिन्तयामि॥

‘हे नरकासुरका अन्त करनेवाले प्रभो! आप मेरेको चाहे स्वर्गमें रखें, चाहे भूमण्डलपर रखें और चाहे यथेच्छ नरकमें रखें अर्थात् आप जहाँ रखना चाहें, वहाँ रखें। जो कुछ करना चाहें, वह करें। इस विषयमें मेरा कुछ भी कहना नहीं है। मेरी तो एक यही माँग है कि शरद्-ऋतुके कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले आपके अति सुन्दर चरणोंका मृत्यु-जैसी भयंकर अवस्थामें भी चिन्तन करता रहूँ; आपके चरणोंको भूलूँ नहीं।’

शरणागति-सम्बन्धी विशेष बात

शरणागत भक्त ‘मैं भगवान्का हूँ और भगवान् मेरे हैं’ इस भावको दृढ़तासे पकड़ लेता है, स्वीकार कर लेता है तो उसके भय, शोक, चिन्ता, शंका आदि दोषोंकी जड़ कट जाती अर्थात् दोषोंका आधार मिट जाता है। कारण कि भक्तकी दृष्टिसे सभी दोष भगवान्की विमुखातापर ही टिके रहते हैं।

भगवान्के सम्मुख होनेपर भी संसार और शरीरके आश्रयके संस्कार रहते हैं, जो भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर मिट जाते हैं। उनके मिटनेपर सब दोष भी मिट जाते हैं।

सम्बन्धका दृढ़ होना क्या है? भय, शोक, चिन्ता, शंका, परीक्षा और विपरीत भावनाका न होना ही सम्बन्धका दृढ़ होना है। अब इनपर विचार करें।

(१) निर्भय होना —आचरणोंकी कमी होनेसे भीतरसे

भय पैदा होता है और साँप, बिच्छू, बाघ आदिसे बाहरसे भय पैदा होता है। शरणागत भक्तके ये दोनों ही प्रकारके भय मिट जाते हैं। इतना ही नहीं, पतंजलि महाराजने जिस मृत्युके भयको पाँचवाँ क्लेश माना है और जो बड़े-बड़े विद्वानोंको भी होता है, वह भय भी सर्वथा मिट जाता है।

अब मेरी वृत्तियाँ खराब हो जायँगी!—ऐसा भयका भाव भी साधकको भीतरसे ही निकाल देना चाहिये; क्योंकि ‘मैं भगवान्की कृपामें तरान्तर हो गया हूँ, अब मेरेको किसी बातका भय नहीं है। इन वृत्तियोंको मेरी माननेसे ही मैं इनको शुद्ध नहीं कर सका; क्योंकि इनको मेरी मानना ही मलिनता है—‘ममता मल जरि जाड् ’ (मानस ७।११७ क)। अतः अब मैं कभी भी इनको मेरी नहीं मानूँगा। जब वृत्तियाँ मेरी हैं ही नहीं तो मेरेको भय किस बातका? अब तो केवल भगवान्की कृपा-ही-कृपा है! भगवान्की कृपा ही सर्वत्र परिपूर्ण हो रही है! यह बड़ी खुशीकी, बड़ी प्रसन्नताकी बात है।’

कई ऐसी शंका करते हैं कि भगवान्के शरण होकर उनका भजन करनेसे तो द्वैत हो जायगा अर्थात् भगवान् और भक्त—ये दो हो जायँगे और दूसरेसे भय होता है—‘द्वितीयद्वै भयं भवति ’ (बृहदारण्यक १।४।२)। पर यह शंका निराधार है। भय द्वितीयसे तो होता है, पर आत्मीयसे भय नहीं होता अर्थात् भय दूसरेसे होता है, अपनेसे नहीं। प्रकृति और प्रकृतिका कार्य शरीर-संसार द्वितीय है, इसलिये इनसे सम्बन्ध रखनेपर ही भय होता है; क्योंकि इनके साथ सदा सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। कारण यह है कि प्रकृति और पुरुषका स्वभाव सर्वथा भिन्न-भिन्न है; जैसे एक जड़ है और एक चेतन, एक विकारी है और एक निर्विकारी, एक परिवर्तनशील है और एक अपरिवर्तनशील, एक प्रकाश्य है और एक प्रकाशक, इत्यादि।

१-भगवान्के सम्बन्धकी दृढ़ता होनेपर जब संसार-शरीरका आश्रय सर्वथा नहीं रहता, तब जीनेकी आशा, मरनेका भय, करनेका राग और पानेका लालच—ये चारों ही नहीं रहते।

२-अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः। (योगदर्शन २।३)

३-स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः। (योगदर्शन २।९)

४-तथा न ते माधव तावकाः क्वचिद् भ्रश्यन्ति मार्गात्त्वयि बद्धसौहृदाः। त्वयाभिगुता विचरन्ति निर्भया विनायकानीकपमूर्धम् प्रभो॥

(श्रीमद्भा १०।२।२३३)

‘भगवन्! जो आपके भक्त हैं, जिन्होंने आपके चरणोंमें अपनी सच्ची प्रीति जोड़ रखी है, वे कभी ज्ञानाभिमानियोंकी तरह अपने साधनसे गिरते नहीं। प्रभो! वे बड़े-बड़े विघ्न डालनेवाली सेनाके सरदारोंके सिरपर पैर रखकर निर्भय होकर विचरते हैं, कोई भी विघ्न उनके मार्गमें रुकावट नहीं डाल सकते।’

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२२९

भगवान् द्वितीय नहीं हैं। वे तो आत्मीय हैं; क्योंकि जीव उनका सनातन अंश है, उनका स्वरूप है। अतः भगवान् के शरण होनेपर उनसे भय कैसे हो सकता है? प्रत्युत उनके शरण होनेपर मनुष्य सदाके लिये अभय हो जाता है। स्थूल दृष्टिसे देखा जाय तो बच्चेको माँसे दूर रहनेपर भय होता है, पर माँकी गोदमें चले जानेपर उसका भय मिट जाता है; क्योंकि माँ उसकी अपनी है। भगवान् का भक्त इससे विलक्षण होता है। कारण कि बच्चे और माँमें तो भेदभाव दीखता है, पर भक्त और भगवान्में भेदभाव सम्भव ही नहीं है।

(२) निःशोक होना —जो बात बीत चुकी है, उसको लेकर शोक होता है। बीती हुई बातको लेकर शोक करना बड़ी भारी भूल है; क्योंकि जो हुआ है, वह अवश्यम्भावी था और जो नहीं होनेवाला है, वह कभी हो ही नहीं सकता तथा अभी जो हो रहा है, वह ठीक-ठीक (वास्तविक) होनेवाला ही हो रहा है, फिर उसमें शोक करनेकी कोई बात ही नहीं है। प्रभुके इस मंगलमय विधानको जानकर शरणागत भक्त सदा निःशोक रहता है; शोक उसके पास कभी आता ही नहीं।

(३) निश्चिन्त होना —जब भक्त अपनी मानी हुई वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान् के समर्पित कर देता है, तब उसको लौकिक-पारलौकिक किंचिन्मात्र भी चिन्ता नहीं होती अर्थात् अभी जीवन-निर्वाह कैसे होगा? कहाँ रहना होगा? मेरी क्या दशा होगी? क्या गति होगी? आदि चिन्ताएँ बिलकुल नहीं रहतीं।

भगवान् के शरण होनेपर शरणागत भक्तमें यह एक बात आती है कि 'अगर मेरा जीवन प्रभुके लायक सुन्दर और शुद्ध नहीं बना तो भक्तोंकी बात मेरे आचरणमें कहाँ आयी? अर्थात् नहीं आयी; क्योंकि मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं रहतीं।' वास्तवमें 'मेरी वृत्तियाँ हैं' ऐसा मानना ही दोष है, वृत्तियाँ उतनी दोषी नहीं हैं। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदिमें जो मेरापन है—यही गलती है; क्योंकि जब मैं भगवान् के शरण हो गया और जब सब कुछ उनके अर्पण कर दिया, तो फिर मन, बुद्धि आदि मेरे कहाँ रहे? इसलिये शरणागतको मन, बुद्धि आदिकी अशुद्धिकी चिन्ता कभी नहीं करनी चाहिये अर्थात् मेरी वृत्तियाँ ठीक नहीं

हैं—ऐसा भाव कभी नहीं लाना चाहिये। किसी कारणवश अचानक ऐसी वृत्तियाँ आ भी जायँ तो आर्तभावसे 'हे मेरे नाथ! हे मेरे प्रभो! बचाओ! बचाओ!! बचाओ!!!' ऐसे प्रभुको पुकारना चाहिये; क्योंकि वे मेरे स्वामी हैं, मेरे सर्वसमर्थ प्रभु हैं तो अब मैं चिन्ता क्यों करूँ? और भगवान्ने भी कह दिया है कि 'तू चिन्ता मत कर' (मा शुचः)। अतः निश्चिन्त होकर मनसे भगवान् के चरणोंमें गिर जाय और भगवान्से कह दे—'हे नाथ! यह सब आपके हाथकी बात है, आप जानें।'

सर्वसमर्थ प्रभुके शरण भी हो गये और चिन्ता भी करें—ये दोनों बातें बड़ी विरोधी हैं; क्योंकि शरण हो गये तो चिन्ता कैसी? और चिन्ता होती है तो शरणागति कैसी? इसलिये शरणागतको ऐसा सोचना चाहिये कि जब भगवान् यह कहते हैं कि 'मैं सम्पूर्ण पापोंसे छुड़ा दूँगा', तो क्या ऐसी वृत्तियोंसे छूटनेके लिये मेरेको कुछ करना पड़ेगा? मैं तो बस, आपका हूँ। हे भगवान्! मेरेमें वृत्तियोंको अपना माननेका भाव कभी आये ही नहीं। हे नाथ! शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि—ये कभी मेरे दीखें ही नहीं। परन्तु हे नाथ! सब कुछ आपको देनेपर भी ये शरीर आदि कभी-कभी मेरे दीख जाते हैं; अब इस अपराधसे मेरेको आप ही छुड़ाइये—ऐसा कहकर निश्चिन्त हो जाय।

(४) निःशंक होना —भगवान् के सम्बन्धमें कभी यह सन्देह न करे कि मैं भगवान् का हुआ या नहीं? भगवान्ने मुझे स्वीकार किया या नहीं? प्रत्युत इस बातको देखे कि 'मैं तो अनादिकालसे भगवान् का ही था, भगवान् का ही हूँ और आगे भी सदा भगवान् का ही रहूँगा। मैंने ही अपनी मूर्खतासे अपनेको भगवान्से अलग—विमुख मान लिया था। परन्तु मैं अपनेको भगवान्से कितना ही अलग मान लूँ तो भी उनसे अलग हो सकता ही नहीं और होना सम्भव भी नहीं। अगर मैं भगवान्से अलग होना भी चाहूँ, तो भी अलग कैसे हो सकता हूँ?' क्योंकि भगवान्ने कहा है कि यह जीव मेरा ही अंश है—'मम एव अंशः ' (गीता १५।७)। इस प्रकार 'मैं भगवान् का हूँ और भगवान् मेरे हैं'—इस वास्तविकताकी स्मृति आते ही शंकाएँ—सन्देह मिट जाते हैं, शंकाओं—सन्देहोंके लिये किंचिन्मात्र भी गुंजाइश नहीं रहती।

१-(१) राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करे अन्यथा अस नहिं कोई॥ (मानस १।१२८।१)

(२) होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावे साखा॥ (मानस १।५२।४)

२-चिन्ता दीनदयालको, मो मन सदा अनन्द। जायो सो प्रतिपालसी, रामदास गोविन्द॥

१२३०

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

(५) परीक्षा न करना —भगवान् के शरण होकर ऐसी परीक्षा न करे कि 'जब मैं भगवान् के शरण हो गया हूँ तो मेरेमें ऐसे-ऐसे लक्षण घटने चाहिये। यदि ऐसे-ऐसे लक्षण मेरेमें नहीं हैं तो मैं भगवान् के शरण कहाँ हुआ?' प्रत्युत 'अद्वैष्टा ' आदि (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) गुणोंकी अपनेमें कमी दीखे तो आश्चर्य करे कि मेरेमें यह कमी कैसे रह गयी!* ऐसा भाव आते ही यह कमी नहीं रहेगी, मिट जायगी। कारण कि यह उसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि पहले अद्वैष्टा आदि गुण जितने कम थे, उतने कम अब नहीं हैं। शरणागत होनेपर भक्तोंके जितने भी लक्षण हैं, वे सब बिना प्रयत्न किये आते हैं।

(६) विपरीत धारणा न करना —भगवान् के शरणागत भक्तमें यह विपरीत धारणा भी कैसे हो सकती है कि 'मैं भगवान् का नहीं हूँ'; क्योंकि यह मेरे मानने अथवा न माननेपर निर्भर नहीं है। भगवान् का और मेरा परस्पर जो सम्बन्ध है, वह अटूट है, अखण्ड है, नित्य है। मैंने इस सम्बन्धकी तरफ खयाल नहीं किया, यह मेरी गलती थी। अब वह गलती मिट गयी, तो फिर विपरीत धारणा हो ही कैसे सकती है?

जो मनुष्य सच्चे हृदयसे प्रभुकी शरणागतिकी स्वीकार कर लेता है, उसमें भय, शोक, चिन्ता आदि दोष नहीं रहते। उसका शरणभाव स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है; जैसे—

  • इसे समझनेके लिये एक ग्रामीण कहानी है। एक माँके तीन लड़के थे। दो लड़के बड़े थे और काम-धंधा करते थे। तीसरा लड़का सीधा-सादा और भोला था। उनकी माँ मर गयी। दोनों बड़े भाइयोंने छोटे भाईसे कहा कि माँके फूल (अस्थियाँ) गंगाजीमें डाल दे, इतना काम तू कर दे। उसने कहा—'बहुत ठीक है।' वह माँके फूल लेकर अपने घरसे चला। घरसे गंगाजी ३०० कोस दूर थीं। पैदल रास्ता चलते-चलते वह थक गया तो किसीसे पूछा—'भैया! गंगाजी कितनी दूर हैं?' वह बोला—'तुम तो १५० कोस आये हो, अभी १५० कोस गंगाजी और आगे हैं। उसने सोचा कि गंगाजी कब पहुँचूँगा और फिर लौटकर कब आऊँगा! ऐसे दुःखी होकर उसने वे हड्डियाँ जंगलमें ही फेंक दीं और गाँवके पाससे वर्षाका मीठा जल बर्तनमें भर लिया; क्योंकि गंगाजी जाते हैं तो लौटते समय गंगाजल लाते हैं। फिर वह वहाँसे पीछे चला आया और अपने गाँव पहुँच गया। बड़े भाई सोचने लगे कि अगर यह गंगाजी जाकर आता तो इतने दिनोंमें नहीं आ सकता था, यह गंगाजी गया ही नहीं। बड़े भाइयोंने उससे पूछा—'तू गंगाजी जाकर आया है क्या? उसने कहा—हां, गंगाजी जाकर आया हूँ; ठीक गंगाजीके ब्रह्मकुण्डमें फूल डालकर वहाँसे गंगाजीका यह जल लाया हूँ। ऐसे वह झूठ बोल गया। भाइयोंने समझ लिया कि यह ठीक नहीं बोल रहा है, इसलिये वे चुप हो गये।

दूसरे दिन नींदसे उठकर एक भाई छोटे भाईसे बोला—'अरे भाई! तू सच्ची बात बता दे, क्या तू गंगाजी हो आया और फूल ठीक गंगाजीमें डाल दिये। उसने कहा—हां, बिलकुल गंगाजी जाकर आया हूँ। बड़े भाईने कहा—'देख, रातको स्वप्नमें मेरेको माँ मिली थीं और मॉने मेरेसे कहा कि इसने तो मेरेको गंगाजी पहुँचाया ही नहीं, बीचमें ही डालकर आ गया। अब तू ही बता कि माँकी बात सच्ची या तेरी बात सच्ची? छोटा भाई बोला—'माँ इधर ही क्यों आयी, उधर क्यों नहीं गयी? अर्थात् १५० कोस तो मैंने पहुँचा ही दिया था, यहाँ न आकर उधर ही चली जाती तो ठीक गंगाजी पहुँच जाती।

इस कहानीका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् के शरण होनेके बाद यह कसौटी कसते हैं—'परीक्षा करते हैं कि 'भक्तोंके, सन्तोके लक्षण मेरेमें नहीं आये तो मैं भगवान् के शरण नहीं हुआ'—यह माँ उलटी क्यों आयी, सुलटी ही क्यों नहीं गयी कि 'जब मैं भगवान् के शरण हो गया तो अब इन लक्षणोंकी कमी क्यों रह गयी? मेरेमें ये लक्षण क्यों नहीं आये?' ऐसी मान्यतासे तो साधक शरणागत हो जायगा और पूर्णता भी हो जायगी। परन्तु यह मान्यता करेगा कि 'मेरेमें ऐसे लक्षण नहीं आये तो मैं शरण नहीं हुआ' तो धोखा हो जायगा!

विवाह होनेके बाद कन्याका अपने पिताके घरसे सम्बन्ध-विच्छेद और पतिके घरसे सम्बन्ध स्वतः ही दृढ़ होता चला जाता है। वह सम्बन्ध यहाँतक दृढ़ हो जाता है कि जब वह कन्या दादी-परदादी बन जाती है, तब उसको स्वप्नमें भी यह भाव नहीं आता कि मैं यहाँकी नहीं हूँ। उसके मनमें यह भाव दृढ़ हो जाता है कि मैं तो यहाँकी ही हूँ और ये सब मेरे ही हैं। जब उसके पौत्रकी स्त्री आती है और घरमें उद्घण्डता करती है, खटपट मचाती है तो वह (दादी) कहती है कि इस परायी जायी छोकरीने मेरा घर बिगाड़ दिया! पर उस बूढ़ी दादीको यह बात याद ही नहीं आती कि मैं भी तो परायी जायी (पराये घरमें जन्मी) हूँ। तात्पर्य यह हुआ कि जब बनावटी सम्बन्धमें भी इतनी दृढ़ता हो सकती है, तब भगवान् के ही अंश इस प्राणीका भगवान् के साथ जो नित्य सम्बन्ध है, वह दृढ़ हो जाय—इसमें आश्चर्य ही क्या है! वास्तवमें भगवान् के सम्बन्धकी दृढ़ताके लिये केवल संसारके माने हुए सम्बन्धोंका त्याग करनेकी ही आवश्यकता है।

सच्चे हृदयसे प्रभुके चरणोंकी शरण होनेपर उस शरणागत भक्तमें यदि किसी भाव, आचरण आदिकी किंचित् कमी रह जाय, कभी विपरीत वृत्ति पैदा हो जाय अथवा किसी परिस्थितिमें पड़कर (परवशतासे) कभी किंचित् कोई दुष्कर्म हो जाय, तो उसके हृदयमें जलन पैदा

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३१

ही जायगी। इसलिये उसके लिये अन्य कोई प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं है। भगवान् कृपा करके उसके उस पापको सर्वथा नष्ट कर देते हैं।

भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं, गुणों और अवगुणोंको नहीं१ अर्थात् भगवान्को भक्तके दोष दीखते ही नहीं, उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है, वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान्का है। दोष आगान्तुक होनेसे आते-जाते रहते हैं और वह नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसलिये भगवान्की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है। जैसे, कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है, तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेके मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे, पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं, उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी, तभी केशोंको बाँधूँगी! परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान्को पुकारती है, भगवान् चट आ जाते हैं; क्योंकि भगवान्के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था।

भगवान्के साथ अपनापन होनेमें दो भाव रहते हैं—(१) भगवान् मेरे हैं और (२) मैं भगवान्का हूँ। इन दोनोंमें भगवान्का सम्बन्ध समान रीतिसे रहते हुए भी ‘भगवान् मेरे हैं’—इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा हो सकती है कि ‘भगवान् मेरे हैं तो मेरी इच्छाकी पूर्ति क्यों नहीं करते?’ परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ’ इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा नहीं हो सकती; क्योंकि ‘मैं भगवान्का हूँ तो भगवान् मेरे लिये जैसा ठीक समझें, वैसा ही निःसंकोच होकर करें’। इसलिये साधकको चाहिये कि वह भगवान्की ही मरजीमें सर्वथा अपनी मरजी मिला दे, भगवान्पर अपना किंचित् भी आधिपत्य न माने, प्रत्युत अपनेपर उनका पूरा आधिपत्य माने। कहीं भी भगवान् हमारे मनकी करें तो उसमें संकोच हो कि मेरे लिये भगवान्को ऐसा करना पड़ा! यदि अपने मनकी बात पूरी होनेसे संकोच नहीं होता, प्रत्युत संतोष होता है तो यह शरणागति नहीं है।

शरणागत भक्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके प्रतिकूल परिस्थितिमें भी भगवान्की मरजी समझकर प्रसन्न रहता है।

शरणागत भक्तको अपने लिये कभी किंचिन्मात्र भी कुछ करना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने सम्पूर्ण ममतावाली वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर दिया, जो वास्तवमें प्रभुका ही था। अब करने, कराने आदिका सब काम भगवान्का ही रह गया। ऐसी अवस्थामें वह कठिन-से-कठिन और भयंकर-से-भयंकर घटना, परिस्थितिमें भी अपनेपर प्रभुकी महान् कृपा देखकर सदा प्रसन्न रहता है, मस्त रहता है। जैसे, गरुडजीके पूछनेपर काकभुशुण्डिजीने अपने पूर्वजन्मके ब्राह्मण-शरीरकी कथा सुनायी, जिसमें लोमश ऋषिने शाप देकर उन्हें (ब्राह्मणको) पक्षियोंमें नीच चाण्डाल पक्षी (कौआ) बना दिया; परन्तु काकभुशुण्डिजीके मनमें न कुछ भय हुआ और न कुछ दीनता ही आयी। उन्होंने उसमें भगवान्का शुद्ध विधान ही समझा। केवल समझा ही नहीं, प्रत्युत मन-ही-मन बोल उठे—‘उर प्रेरक रघुवंस विभूषण’ (मानस ७।११३।१)। ऐसा भयंकर शाप मिलनेपर भी जब काकभुशुण्डिजीकी प्रसन्नतामें कोई कमी नहीं आयी, तब लोमश ऋषिने उनको भगवान्का प्यार भक्त समझकर अपने पास बुलाया और बालक रामजीका ध्यान बताया। फिर भगवान्की कथा सुनायी और अत्यन्त प्रसन्न होकर काकभुशुण्डिजीके सिरपर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया—‘मेरी कृपासे तुम्हारे हृदयमें अबाध, अखण्ड रामभक्ति रहेगी। तुम रामजीके प्यारे हो जाओगे। तुम सम्पूर्ण गुणोंकी खान बन जाओगे। जिस रूपकी इच्छा करोगे, वह रूप धारण कर लोगे। जिस स्थानपर तुम रहोगे, उसमें एक योजनपर्यन्त मायाका कण्टक किंचिन्मात्र भी नहीं आयेगा’ आदि-आदि। इस प्रकार बहुत-से आशीर्वाद देते ही आकाशवाणी हुई कि ‘हे ऋषे! तुमने जो कुछ कहा, वह सब सच्चा होगा, यह मन, वाणी, कर्मसे मेरा भक्त है।’ इन्हीं बातोंको लेकर भगवान्के विधानमें सदा प्रसन्न रहनेवाले काकभुशुण्डिजीने कहा है—

भगति पच्छु हठ करि रहेउँ दीन्हि महा रिषि साप।

मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥

(मानस ७।११४ ख)

१-स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्वभावस्य हरिः पेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥

(श्रीमद्भा० ११।५।४२)

‘जो प्रेमी भक्त भगवान्के चरणोंका अनन्यभावसे भजन करता है, उसके द्वारा यदि अकस्मात् कोई पाप-कर्म बन भी जाय तो उसके हृदयमें विराजमान परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसे सर्वथा नष्ट कर देते हैं।’

२-रहित न प्रभु चित्त चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ (मानस १।२१।३)

१२३२

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

यहाँ 'भजन प्रताप' शब्दोंका अर्थ है—भगवान्के विधानमें हर समय प्रसन्न रहना। विपरीत-से-विपरीत अवस्थामें भी प्रेमी भक्तकी प्रसन्नता अधिक-से-अधिक बढ़ती रहती है; क्योंकि प्रेमका स्वरूप ही प्रतिक्षण वर्धमान है।

यह नियम है कि जो चीज अपनी होती है, वह सदा ही अपनेको प्यारी लगती है। भगवान् सम्पूर्ण जीवोंको अपना प्रिय मानते हैं—'सब मम प्रिय सब मम उपजाए' (मानस ७।८६।२) और इस जीवको भी प्रभु स्वतः ही प्रिय लगते हैं। हाँ, यह बात दूसरी है कि यह जीव परिवर्तनशील संसार और शरीरको भूलसे अपना मानकर अपने प्यारे प्रभुसे विमुख हो जाता है। इसके विमुख होनेपर भी भगवान्ने अपनी तरफसे किसी भी जीवका त्याग नहीं किया है और न कभी त्याग कर ही सकते हैं। कारण कि जीव सदासे साक्षात् भगवान्का ही अंश है। इसलिये सम्पूर्ण जीवोंके साथ भगवान्की आत्मीयता अक्षुण्ण, अखण्डितरूपसे स्वाभाविक ही बनी हुई है। इसीसे वे मात्र जीवोंपर कृपा करनेके लिये अर्थात् भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना—इन तीन बातोंके लिये समय-समयपर अवतार लेते हैं (गीता—चौथे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इन तीनों बातोंमें केवल भगवान्की आत्मीयता ही टपक रही है, नहीं तो भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापनासे भगवान्का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भगवान् तो ये तीनों ही काम केवल प्राणिमात्रके कल्याणके लिये ही करते हैं। इससे भी प्राणिमात्रके साथ भगवान्की स्वाभाविक आत्मीयता, कृपालुता, प्रियता, हितैषिता, सुहृता और निरपेक्ष उदारता ही सिद्ध होती है, और यहाँ भी इसी दृष्टिसे अर्जुनसे कहते हैं—'मद्भक्तो भव, मन्यना भव, मद्याजी भव, मां नमस्कुरु।' इन चारों बातोंमें भगवान्का तात्पर्य केवल जीवको अपने सम्मुख करानेमें ही है, जिससे सम्पूर्ण जीव असत् पदार्थोंसे विमुख हो जायँ; क्योंकि दुःख, संताप, बार-बार जन्मना-मरना, मात्र विपत्ति आदिमें मुख्य हेतु भगवान्से विमुख होना ही है।

भगवान् जो कुछ भी विधान करते हैं, वह संसारमात्रके सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं—बस, भगवान्की इस कृपाकी तरफ जीवकी दृष्टि हो जाय, तो फिर उसके

लिये क्या करना बाकी रहा? जीवोंके हितके लिये भगवान्के हृदयमें एक तड़फन है, इसीलिये भगवान् 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज' वाली अत्यन्त गोपनीय बात कह देते हैं। कारण कि भगवान् जीवमात्रको अपना मित्र मानते हैं—'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (५।२९) और उन्हें यह स्वतन्त्रता देते हैं कि वे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं, उनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा सुगमतापूर्वक मेरी प्राप्ति कर सकते हैं और दुःख, संताप आदिको सदाके लिये समूल नष्ट कर सकते हैं।

वास्तवमें जीवका उद्धार केवल भगवत्कृपासे ही होता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, अष्टांगयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि जितने भी साधन हैं, वे सब-के-सब भगवान्के द्वारा और भगवत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा ही प्रकट किये गये हैं। अतः इन सब साधनोंमें भगवत्कृपा ही ओत-प्रोत है। साधन करनेमें तो साधक निमित्तमात्र होता है, पर साधनकी सिद्धिमें भगवत्कृपा ही मुख्य है।

शरणागत भक्तको तो ऐसी चिन्ता भी कभी नहीं करनी चाहिये कि अभी भगवान्के दर्शन नहीं हुए, भगवान्के चरणोंमें प्रेम नहीं हुआ, अभी वृत्तियाँ शुद्ध नहीं हुई, आदि। इस प्रकारकी चिन्ताएँ करना मानो बँदरीका बच्चा बनना है। बँदरीका बच्चा स्वयं ही बँदरीको पकड़े रहता है। बँदरी कूदे-फाँदे, किधर भी जाय, बच्चा स्वयं बँदरीसे चिपका रहता है।

भक्तको तो अपनी सब चिन्ताएँ भगवान्पर ही छोड़ देनी चाहिये अर्थात् भगवान् दर्शन दें या न दें, प्रेम दें या न दें, वृत्तियोंको ठीक करें या न करें, हमें शुद्ध बनायें या न बनायें—यह सब भगवान्की मरजीपर छोड़ देना चाहिये। उसे तो बिल्लीका बच्चा बनना चाहिये। बिल्लीका बच्चा अपनी माँपर निर्भर रहता है। बिल्ली चाहे जहाँ रखे, चाहे जहाँ ले जाय। बिल्ली अपनी मरजीसे बच्चेको उठाकर ले जाती है तो वह पैर समेट लेता है। ऐसे ही शरणागत भक्त संसारकी तरफसे अपने हाथ-पैर समेटकर केवल भगवान्का चिन्तन, नाम-जप आदि करते हुए भगवान्की तरफ ही देखता रहता है। भगवान्का जो विधान है, उसमें परम प्रसन्न रहता है, अपने मनकी कुछ भी नहीं लगाता।

१-हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुष्ट तुष्टार सेवक असुरारी॥ (मानस ७।४७।३)

२-भक्त जो कुछ काम करता है, उसको भगवान्का ही समझकर, भगवान्की ही शक्ति मानकर, भगवान्के ही लिये करता है, अपने लिये किंचिन्मात्र भी नहीं करता—यही उसका हाथ-पैर समेटना है।

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३३

जैसे, कुम्हार पहले मिट्टीको सिरपर उठाकर लाता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर उस मिट्टीको गीला करके उसे रौंदता है तो कुम्हारकी मरजी, फिर चक्केपर चढ़ाकर घुमाता है तो कुम्हारकी मरजी। मिट्टी कभी कुछ नहीं कहती कि तुम घड़ा बनाओ, सकोरा बनाओ, मटकी बनाओ। कुम्हार चाहे जो बनाये, उसकी मरजी है। ऐसे ही शरणागत भक्त अपनी कुछ भी मरजी, मनकी बात नहीं रखता। वह जितना अधिक निश्चिन्त और निर्भय होता है, भगवत्कृपा उसको अपने-आप उतना ही अधिक अपने अनुकूल बना लेती है और जितनी वह चिन्ता करता है, अपना बल मानता है, उतना ही वह आती हुई भगवत्कृपामें बाधा लगाता है अर्थात् शरणागत होनेपर भगवान्की ओरसे जो विलक्षण, विचित्र, अखण्ड, अटूट कृपा आती है, अपनी चिन्ता करनेसे उस कृपामें बाधा लग जाती है।

जैसे धीवर (मछुआ) मछलियोंको पकड़नेके लिये नदीमें जाल डालता है तो जालके भीतर आनेवाली सब मछलियाँ पकड़ी जाती हैं; परन्तु जो मछली जाल डालनेवाले मछुएके चरणोंके पास आ जाती है, वह नहीं पकड़ी जाती। ऐसे ही भगवान्की माया-(संसार-) में ममता करके जीव फँस जाते हैं और जन्मते-मरते रहते हैं; परन्तु जो जीव मायापति भगवान्के चरणोंकी शरण हो जाते हैं, वे मायाको तर जाते हैं—‘मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ’ (गीता ७।१४)। इस दृष्टान्तका एक ही अंश ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि धीवरका तो मछलियोंको जालमें फँसानेका भाव होता है; परन्तु भगवान्का जीवोंको मायामें फँसानेका किञ्चिन्मात्र भी भाव नहीं होता। भगवान्का भाव तो जीवोंको मायाजालसे मुक्त करके अपने शरण लेनेका होता है, तभी तो वे कहते हैं—‘मामेकं शरणं व्रज। ’ जीव संयोगजन्य सुखकी लोलुपतासे खुद ही मायामें फँस जाते हैं।

जैसे चलती हुई चक्कीके भीतर आनेवाले सभी दाने पिस जाते हैं;* परन्तु जिसके आधारपर चक्की चलती है, उस कीलके आस-पास रहनेवाले दाने ज्यों-के-त्यों साबूत रह जाते हैं। ऐसे ही जन्म-मरणरूप संसारकी चलती हुई चक्कीमें पड़े हुए सब-के-सब जीव पिस जाते हैं अर्थात् दुःख पाते हैं; परन्तु जिसके आधारपर संसार-चक्र चलता है, उन भगवान्के चरणोंका सहारा लेनेवाला जीव पिसनेसे बच जाता है—‘कोई हरिजन ऊबरे, कील माकड़ी

पास। ’ परन्तु यह दृष्टान्त भी पूरा नहीं घटता; क्योंकि दाने तो स्वाभाविक ही कीलके पास रह जाते हैं। वे बचनेका कोई उपाय नहीं करते। परन्तु भगवान्के भक्त संसारसे विमुख होकर प्रभुके चरणोंका आश्रय लेते हैं। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्का अंश होकर भी संसारको अपना मानता है अथवा संसारसे कुछ चाहता है, वही जन्म-मरणरूप चक्रमें पड़कर दुःख भोगता है।

संसार और भगवान्—इन दोनोंका सम्बन्ध दो तरहका होता है। संसारका सम्बन्ध केवल माना हुआ है और भगवान्का सम्बन्ध वास्तविक है। संसारका सम्बन्ध तो मनुष्यको पराधीन बनाता है, गुलाम बनाता है, पर भगवान्का सम्बन्ध मनुष्यको स्वाधीन बनाता है, चिन्मय बनाता है और बनाता है भगवान्का भी मालिक!

किसी बातको लेकर अपनेमें कुछ भी विशेषता दीखती है, यही वास्तवमें पराधीनता है। यदि मनुष्य विद्या, बुद्धि, धन-सम्पत्ति, त्याग, वैराग्य आदि किसी बातको लेकर अपनी विशेषता मानता है तो यह उस विद्या आदिकी पराधीनता, दासता ही है। जैसे, कोई धनको लेकर अपनेमें विशेषता मानता है तो यह विशेषता वास्तवमें धनकी ही हुई, खुदकी नहीं। वह अपनेको धनका मालिक मानता है, पर वास्तवमें वह धनका गुलाम है।

संसारका यह कायदा है कि सांसारिक पदार्थोंको लेकर जो अपनेमें कुछ विशेषता मानता है, उसको ये सांसारिक पदार्थ तुच्छ बना देते हैं, पद-दलित कर देते हैं। परन्तु जो भगवान्के आश्रित होकर सदा भगवान्पर ही निर्भर रहता है, उसको अपनी कुछ विशेषता दीखती ही नहीं, प्रत्युत भगवान्की ही अलौकिकता, विलक्षणता, विचित्रता दीखती है। भगवान् चाहे उसको अपना मुकुटमणि बना लें और चाहे अपना मालिक बना लें, तो भी उसको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती। प्रभुका यह कायदा है कि जिस भक्तको अपनेमें कुछ भी विशेषता नहीं दीखती, अपनेमें किसी बातका अभिमान नहीं होता, उस भक्तमें भगवान्की विलक्षणता उतर आती है। किसी-किसीमें यहाँतक विलक्षणता उतर आती है कि उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि प्राकृत पदार्थ भी चिन्मय बन जाते हैं। उनमें जड़ताका अत्यन्त अभाव हो जाता है। ऐसे भगवान्के कई प्रेमी भक्त भगवान्में ही समा गये, अन्तमें उनके शरीर नहीं मिले। जैसे मीराबाई शरीरसहित भगवान्के श्रीविग्रहमें

  • चलती चक्की देखकर दिया कबीरा रोय। दो पाटनमें

आयके साबूत बचा न कोय।

१२३४

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

लीन हो गयीं। केवल पहचानके लिये उनकी साड़ीका छीटा-सा छोर श्रीविग्रहके मुखमें रह गया और कुछ नहीं बचा। ऐसे ही सन्त श्रीतुकारामजी शरीरसहित वैकुण्ठ चले गये।

ज्ञानमार्गमें शरीर चिन्मय नहीं होता; क्योंकि ज्ञानी असत्से सम्बन्ध-विच्छेद करके, असत्से अलग होकर स्वयं चिन्मय तत्त्वमें स्थित हो जाता है। परन्तु जब भक्त भगवान्के सम्मुख होता है, तब उसके शरीर, इन्द्रियाँ, मन, प्राण आदि सभी भगवान्के सम्मुख हो जाते हैं। तात्पर्य यह हुआ कि जिनकी दृष्टि केवल चिन्मय तत्त्वपर ही है अर्थात् जिनकी दृष्टिमें चिन्मय तत्त्वसे भिन्न जडताकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं होती, तो वह चिन्मयता उनके शरीर आदिमें भी उत्तर आती है और वे शरीर आदि चिन्मय हो जाते हैं। हाँ, लोगोंकी दृष्टिमें तो उनके शरीरमें जडता दीखती है, पर वास्तवमें उनके शरीर चिन्मय ही होते हैं।

भगवान्के सर्वथा शरण हो जानेपर शरणागतके लिये भगवान्की कृपा तो विशेषतासे प्रकट होती ही है, पर मात्र संसारका स्नेहपूर्वक पालन करनेवाली और भगवान्से अभिन्न रहनेवाली वात्सल्यमयी माता लक्ष्मीका प्रभु-शरणागतपर कितना अधिक स्नेह होता है, वे कितना अधिक प्यार करती हैं, इसका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। लौकिक व्यवहारमें भी देखनेमें आता है कि पतिव्रता स्त्रीको पितृभक्त पुत्र बहुत प्यारा लगता है।

दूसरी बात, प्रेमभावसे परिपूर्ण प्रभु जब अपने भक्तको देखनेके लिये गरुडपर बैठकर पधारते हैं, तब माता लक्ष्मी भी प्रभुके साथ गरुडपर बैठकर आती हैं, जिस गरुडकी पाँखोंसे सामवेदके मन्त्रोंका गान होता रहता है! परन्तु कोई भगवान्को न चाहकर केवल माता लक्ष्मीको ही चाहता है, तो उसके स्नेहके कारण माता लक्ष्मी आ तो जाती हैं, पर उनका वाहन दिवान्ध उल्लू होता है। ऐसे वाहनवाली लक्ष्मीको प्राप्त करके मनुष्य भी मदान्ध हो जाता है। अगर उस माँको कोई भोग्या समझ लेता है तो उसका बड़ा भारी पतन हो जाता है; क्योंकि वह तो अपनी माँको ही कुदृष्टिसे देखता है, इसलिये वह महान् अधम है।

तीसरी बात, जहाँ केवल भगवान्का प्रेम होता है, वहाँ तो भगवान्से अभिन्न रहनेवाली लक्ष्मी भगवान्के साथ आ ही जाती हैं, पर जहाँ केवल लक्ष्मीको चाहना है, वहाँ लक्ष्मीके साथ भगवान् भी आ जायें—यह नियम नहीं है।

शरणागतिके विषयमें एक कथा आती है। सीताजी, रामजी और हनुमान्जी जंगलमें एक वृक्षके नीचे बैठे थे।

उस वृक्षकी शाखाओं और टहनियोंपर एक लता छायी हुई थी। लताके कोमल-कोमल तन्तु फैल रहे थे। उन तन्तुओंमें कहींपर नयी-नयी कोपलें निकल रही थीं और कहींपर ताम्रवर्णके पत्ते निकल रहे थे। पुष्प और पत्तोंसे लता छायी हुई थी। उससे वृक्षकी सुन्दर शोभा हो रही थी। वृक्ष बहुत ही सुहावना लग रहा था। उस वृक्षकी शोभाको देखकर भगवान् श्रीराम हनुमान्जीसे बोले—‘देखो हनुमान्! यह लता कितनी सुन्दर है! वृक्षके चारों ओर कैसी छायी हुई है! यह लता अपने सुन्दर-सुन्दर फूल, सुगन्धित फूल और हरी-हरी पत्तियोंसे इस वृक्षकी कैसी शोभा बढ़ा रही है! इससे जंगलके अन्य सब वृक्षोंसे यह वृक्ष कितना सुन्दर दीख रहा है! इतना ही नहीं, इस वृक्षके कारण ही सारे जंगलकी शोभा हो रही है। इस लताके कारण ही पशु-पक्षी इस वृक्षका आश्रय लेते हैं। धन्य है यह लता!’

भगवान् श्रीरामके मुखसे लताकी प्रशंसा सुनकर सीताजी हनुमान्जीसे बोलीं—‘देखो बेटा हनुमान्! तुमने खयाल किया कि नहीं? देखो, इस लताका ऊपर चढ़ जाना, फूल-पत्तोंसे छा जाना, तन्तुओंका फैल जाना—ये सब वृक्षके आश्रित हैं, वृक्षके कारण ही हैं। इस लताकी शोभा भी वृक्षके ही कारण है। इसलिये मूलमें महिमा तो वृक्षकी ही है। आधार तो वृक्ष ही है। वृक्षके सहारे बिना लता स्वयं क्या कर सकती है? कैसे छा सकती है? अब बोलो हनुमान्! तुम्हीं बताओ, महिमा वृक्षकी ही हुई न?’

रामजीने कहा—‘क्यों हनुमान्! यह महिमा तो लताकी ही हुई न?’

हनुमान्जी बोले—‘हमें तो तीसरी ही बात सूझती है।’

सीताजीने पूछा—‘वह क्या है बेटा?’

हनुमान्जीने कहा—‘माँ! वृक्ष और लताकी छाया बड़ी सुन्दर है। इसलिये हमें तो इन दोनोंकी छायामें रहना ही अच्छा लगता है अर्थात् हमें तो आप दोनोंकी छाया-(चरणोंके आश्रय- ) में रहना ही अच्छा लगता है!’

सेवक सुत पति मातु भरोसें।

रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें॥

(मानस ४। ३। २)

ऐसे ही भगवान् और उनकी दिव्य आह्लादिनी शक्ति—दोनों ही एक-दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं। परन्तु कोई तो उन दोनोंको श्रेष्ठ बताता है, कोई केवल भगवान्को श्रेष्ठ बताता है और कोई केवल उनकी आह्लादिनी शक्तिको श्रेष्ठ बताता है। शरणागत भक्तके लिये तो प्रभु और उनकी आह्लादिनी शक्ति—दोनोंका आश्रय ही श्रेष्ठ है।

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३५

एक बार एक प्रज्ञाचशु (नेत्रहीन) संत हाथमें लाठी पकड़े हुए यमुनाके किनारे-किनारे चले जा रहे थे। नदीमें बाढ़ आयी हुई थी। उससे एक जगह यमुनाका किनारा पानीमें गिर पड़ा तो बाबाजी भी पानीमें गिर पड़े। हाथसे लाठी छूट गयी थी। दीखता तो था ही नहीं, अब तैरें तो किधर तैरें? भगवान्की शरणागतिकी बात याद आते ही प्रयासरहित होकर शरीरको ढीला छोड़ दिया तो उनको ऐसा लगा कि किसीने हाथ पकड़कर किनारेपर डाल दिया। वहाँ दूसरी कोई लाठी हाथमें आ गयी और उसके सहारे वे चल पड़े। तात्पर्य यह है कि जो भगवान्के शरण होकर भगवान्पर निर्भर रहता है, उसको अपने लिये करना कुछ नहीं रहता। भगवान्के विधानसे जो हो जाय, उसीमें वह प्रसन्न रहता है।

बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगलमें चरने गयीं। उनमेंसे एक बकरी चरते-चरते एक लतामें उलझ गयी। उसको उस लतामेंसे निकलनेमें बहुत देर लगी, तबतक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं। अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवरके किनारे पहुँची। वहाँ किनारेकी गलीली जमीनपर सिंहका एक चरण-चिह्न अंकित था। वह उस चरण-चिह्नके शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रातमें जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि प्राणी बकरीको खानेके लिये पासमें आये तो उस बकरीने बता दिया कि 'पहले देख लेना कि मैं किसके शरणमें हूँ, तब मुझे खाना!' वे चिह्नको देखकर कहने लगे—'अरे, यह तो सिंहके चरण-चिह्नके शरण है, जल्दी भागो यहाँसे! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा।' इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये। अन्तमें

जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरीसे बोला—'तू जंगलमें अकेली कैसे बैठी है?' बकरीने कहा—'यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न है, उसीके मैं शरण हुए बैठी हूँ।' सिंहने देखा कि 'ओह! यह तो मेरा ही चरण-चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई।' सिंहने बकरीको आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो।

रातमें जब जल पीनेके लिये हाथी आया तो सिंहने हाथीसे कहा—'तू इस बकरीको अपनी पीठपर चढ़ा ले। इसको जंगलमें चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठपर ही रखा कर, नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ? मार डालूंगा।' सिंहकी बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सँडुसे झट बकरीको पीठपर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथीकी पीठपर बैठे-बैठे ही वृक्षोंकी ऊपरकी कोंपलें खाया करती और मस्त रहती।

खोज पकड़ सेंठे रहो, धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय।

ऐसे ही जब मनुष्य भगवान्के शरण हो जाता है, उनके चरणोंका सहारा ले लेता है, तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे, विघ्न-बाधाओंसे निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

जो जाको शरणो गहै, ताकहैं ताकी लाज। उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज।

भगवान्के साथ काम, भय, द्वेष, क्रोध, स्नेह आदिसे भी सम्बन्ध क्यों न जोड़ा जाय, वह भी जीवका कल्याण करनेवाला ही होता है*। तात्पर्य यह हुआ कि काम, भय,

  • (१) कामाद् द्वेषाद् भयात् स्नेहाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः। आवेश्य तदर्थं हित्वा बहवस्तदगतिं गताः॥ गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्वादयो नृपाः। सम्बन्धाद् वृण्वयः स्नेहाद् यूर्यं भक्त्या वर्यं विभो॥

( श्रीमद्भागवतम् ७।१।२९-३० )

'एक नहीं, अनेक मनुष्य कामसे, द्वेषसे, भयसे और स्नेहसे अपने मनको भगवान्में लगाकर तथा अपने सारे पाप शोकर वैसे ही भगवान्को प्राप्त हुए हैं, जैसे भक्त भक्तिये। जैसे गोपियोंने कामसे, कंसने भयसे, शिशुपाल-दन्तवक्र आदि राजाओंने द्वेषसे, यदुवंशियोंने परिवारके सम्बन्धसे, तुमलोगों- (युधिष्ठिर आदि- ) ने स्नेहसे और हमलोगों- (नारद आदि- ) ने भक्तिये अपने मनको भगवान्में लगाया है।'

(२) सत्संगेन हि दैतैया यातुधाना मृगाः खगाः। गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्चाराणगृह्यकाः॥ विद्याधरा मनुष्येषु वैश्याः शूद्राः स्त्रियोऽन्यजाः। रजस्तमः प्रकृतयस्तस्मिन्तस्मिन् युगेऽन्य॥ बहवो मत्पदं प्राप्तास्तत्त्व्याष्टकायाधवादयः। वृषपर्वा बलिर्बाणो मयश्चाथ विभीषणः॥ सुग्रीवो हनुमान्शुक्रो गजो गृध्रो वणिक्मथः। व्याधः कुब्जा ब्रजे गोप्यो यज्ञपत्न्यस्तथापरे॥ ते नाधीतश्रुतिगणा नोपासितमहतमाः। अत्रातपतपसः सत्संगान्मायुपाताः॥

( श्रीमद्भागवतम् ११।१२।३-७ )

भगवान् कहते हैं—'निष्पाप उद्धवजी! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक-सी बात है। सत्संग अर्थात् मेरे सम्बन्धद्वारा ही दैत्य-राक्षस, पशु-पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, चारण-गृह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है।'

१२३६

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

द्रेष आदि किसी तरहसे भी जिनका भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ गया, उनका तो उद्धार हो ही गया, पर जिन्होंने किसी तरहसे भी भगवान्के साथ सम्बन्ध नहीं जोड़ा, उदासीन ही रहे, वे भगवत्प्राप्तिसे वंचित रह गये! भगवान्के अनन्य भक्तोंके लिये नारदजीने कहा है— नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः।

(नारदभक्तिसूत्र ७२)

‘उन भक्तोंमें जाति, विद्या, रूप, कुल, धन, क्रिया आदिका भेद नहीं है।’

तात्पर्य यह है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण-शरीरको लेकर सांसारिक जितने भी जाति, विद्या आदि भेद हो सकते हैं, वे सब उनपर लागू नहीं होते जो सर्वथा भगवान्के अर्पित हो गये हैं। कारण कि वे अच्युत भगवान्के ही हैं— ‘यत्तत्तदीयाः’ (नारदभक्तिसूत्र ७३), संसारके नहीं। अच्युत भगवान्के होनेसे वे ‘अच्युत गोत्र’ के ही कहलाते हैं।

शरणागतिका रहस्य

शरणागतिका रहस्य क्या है—इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। फिर भी अपनी समझमें आयी बात कहनेकी चेष्टा की जाती है; क्योंकि हरेक आदमी जो बात कहता है, उससे वह अपनी बुद्धिका ही परिचय देता है। पाठकोंसे प्रार्थना है कि वे यहाँ आयी बातोंका उलटा अर्थ न निकालें; क्योंकि प्रायः लोग किसी तात्त्विक रहस्यवाली बातको गहराईसे

समझे बिना उसका उलटा अर्थ जल्दी निकाल लेते हैं, इसलिये ऐसी बातको कहने-सुननेके पात्र बहुत कम होते हैं।

भगवान्ने गीतामें शरणागतिके विषयमें दो बातें बतायी हैं—

(१) ‘मामेकं शरणं ब्रज ’ (१८।६६) ‘अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा।’

(२) ‘स सर्वविद्धजति मां सर्वभावेन भारत ’ (१५।१९) ‘वह सर्वज्ञ पुरुष सर्वभावसे मेरा भजन करता है’, ‘तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ’ (१८।६२) ‘तू सर्वभावसे उस परमात्माकी शरणमें जा।’

हम भगवान्के शरण कैसे हो जायें? केवल एक भगवान्के शरण हो जायें अर्थात् भगवान्के गुण, ऐश्वर्य आदिकी तरफ दृष्टि न रखें और सर्वभावसे भगवान्के शरण हो जायें अर्थात् साथमें अपनी कोई सांसारिक कामना न रखें।

केवल एक भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि भगवान्के अनन्त गुण हैं, प्रभाव हैं, तत्त्व हैं, रहस्य हैं, महिमा हैं, लीलाएँ हैं, नाम हैं, धाम हैं; भगवान्का अनन्त ऐश्वर्य है, माधुर्य है, सौन्दर्य है—इन विभूतियोंकी तरफ शरणागत भक्त देखता ही नहीं। उसका यही एक भाव रहता है कि ‘मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं।’ अगर वह गुण, प्रभाव आदिकी तरफ देखकर

मनुष्योंमें वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृतिके बहुत-से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है। वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, ब्रजकी गोपियाँ, यज्ञपतियाँ और दूसरे लोग भी सत्संगके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं।

उन लोगोंने न तो वेदोंका स्वाध्याय किया था और न विधिपूर्वक महापुरुषोंकी उपासना ही की थी। इसी प्रकार उन्होंने कुछचूडामन्त्रायण आदि व्रत और कोई तपस्या भी नहीं की थी। बस, केवल सत्संग—मेरे सम्बन्धके प्रभावसे ही वे मुझे प्राप्त हो गये।

१-(१) पुंस्त्वे स्त्रीत्वे विशेषो वा जातिनाश्चाम्नादयः। न कारणं मद्भजने भक्तिरेव हि कारणम्॥ (अध्यात्म०, अरण्य० १०।२०)

‘मेरे भजनमें पुरुष-स्त्रीका भेद अथवा जाति, नाम और आश्रम कारण नहीं है, प्रत्युत मेरी भक्ति ही एकमात्र कारण है।’

(२) किं जन्मना सकलवर्णजोन्मतेन किं विद्यया सकलशास्त्रविचारवत्या।

यस्यास्ति चेत्सि सदा परमेशभक्तिः कोऽन्यततस्त्रिभुवने पुरुषोऽस्ति धन्यः॥ (ब्र० सं० भ० १७)

‘सम्पूर्ण वर्णोंमें उत्तम वर्ण (ब्राह्मण-कुल)-में जन्म होनेसे क्या हुआ? सम्पूर्ण शास्त्रोंके गहरे अध्ययनसे क्या हुआ? अर्थात् कुछ नहीं हुआ जिसके हृदयमें भगवान्की भक्ति विराजमान है, इस त्रिलोकीमें उसके समान दूसरा कौन मनुष्य धन्य हो सकता है?’

(३) व्याधस्याचरणं ध्रुवस्य च वयो विद्या गजेन्द्रस्य का का जातिर्विदुरस्य यादवपतेरुग्रस्य किं पौरुषम्।

कुब्जायाः किमु नाम रूपमधिकं किं तत्सुदाम्नो धनं भक्त्या तुष्यति केवलं न च गुणैर्भक्तिप्रियो माधवः॥

(पद्मावली ८)

‘व्याधका कौन-सा श्रेष्ठ आचरण था? ध्रुवकी कौन-सी बड़ी उम्र थी? गजेन्द्रके पास कौन-सी विद्या थी? विदुरकी कौन-सी ऊँची जाति थी? यदुपति उग्रसेनका कौन-सा पराक्रम था? कुब्जाका कौन-सा सुन्दर रूप था? सुदामाके पास कौन-सा धन था? फिर भी उन लोगोंको भगवान्की प्राप्ति हो गयी। कारण कि भगवान्को केवल भक्ति ही प्यारी है। वे केवल भक्तिये ही सन्तुष्ट होते हैं, आचरण, विद्या आदि गुणोंसे नहीं।

१-पितृगोत्री यथा कन्या स्वामिगोत्रेण गोत्रिका। श्रीरामभक्तिमात्रेणाच्युतगोत्रेण गोत्रकः॥ (नारदपंचरात्र)

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

१२३७

भगवान्की शरण लेता है, तो वास्तवमें वह गुण, प्रभाव आदिके ही शरण हुआ, भगवान्के शरण नहीं हुआ। परन्तु इन बातोंका उलटा अर्थ न लगा लें।

उलटा अर्थ लगाना क्या है? भगवान्के गुण, प्रभाव, नाम, धाम, ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य आदिको मानना ही नहीं है, इनको तरफ जाना ही नहीं है। अब कुछ करना है ही नहीं, न भजन करना है, न भगवान्के गुण, प्रभाव, लीला आदि सुननी है, न भगवान्के धाममें जाना है—यह उलटा अर्थ लगाना है। इनका ऐसा अर्थ लगाना महान् अनर्थ करना है।

केवल एक भगवान्के शरण होनेका तात्पर्य है—केवल भगवान् मेरे हैं। अब वे ऐश्वर्य-सम्पन्न हैं तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कुछ भी ऐश्वर्य नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। वे बड़े दयालु हैं तो बड़ी अच्छी बात और इतने निष्ठुर, कठोर हैं कि उनके समान दुनियामें कोई कठोर है ही नहीं, तो बड़ी अच्छी बात। उनका बड़ा भारी प्रभाव है तो बड़ी अच्छी बात और उनमें कोई प्रभाव नहीं है तो बड़ी अच्छी बात। शरणागतमें इन बातोंकी कोई परवाह नहीं होती। उसका तो एक ही भाव रहता है कि भगवान् जैसे भी हैं, मेरे हैं*। भगवान्की इन बातोंकी परवाह न होनेसे भगवान्का ऐश्वर्य, माधुर्य, सौन्दर्य, गुण, प्रभाव आदि चले जायेंगे, ऐसी बात नहीं है। पर हम उनकी परवाह नहीं करेंगे, तो हमारी असली शरणागति होगी।

जहाँ गुण, प्रभाव आदिको लेकर भगवान्के शरण होते हैं, वहाँ केवल भगवान्के शरण नहीं होते, प्रत्युत गुण, प्रभाव आदिके ही शरण होते हैं; जैसे—कोई रुपयोंवाले आदमीका आदर करे तो वास्तवमें वह आदर उस आदमीका नहीं, रुपयोंका है। किसी मिनिस्टरका कितना ही आदर किया जाय तो वह आदर उसका नहीं, मिनिस्टरी-(पद-) का है। किसी बलवान् व्यक्तिका आदर किया जाय तो वह उसके बलका आदर है, उसका खुदका आदर नहीं है। परन्तु अगर कोई केवल व्यक्ति-(धनी आदि-) का आदर करे तो इससे धनीका धन या

मिनिस्टरकी मिनिस्टरी चली जायगी—यह बात नहीं है। वह तो रहेगी ही। ऐसे ही केवल भगवान्के शरण होनेसे भगवान्के गुण, प्रभाव आदि चले जायेंगे—ऐसी बात नहीं है। परन्तु हमारी दृष्टि तो केवल भगवान्पर ही रहनी चाहिये, उनके गुणों आदिपर नहीं।

सप्तर्षियोंने जब पार्वतीजीके सामने शिवजीके अनेक अवगुणोंका और विष्णुके अनेक सदगुणोंका वर्णन करते हुए उनको शिवजीका त्याग करनेके लिये कहा, तब पार्वतीजीने उनको यही उत्तर दिया—

महादेव अवगुन भवन विष्णु सकल गुन धाम।

जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥

(मानस १।८०)

ऐसी ही बात गोपियोंने भी उद्धवजीसे कही थी—

ऊधौ! मन माने की बात।

दाख छोहरा छाड़ि अमृतफल,

बिषकीरा बिष खात॥

जो चकोर को दै कपूर कोउ,

तजि अंगार अघात।

मधुप करत घर कोरे काठमें,

बैधत कमल के पात॥

ज्यों पतंग हित जान आपनो,

दीपक सों लपटात।

‘सूरदास’ जाको मन जासों,

ताको सोड़ सुहात॥

भगवान्के प्रभाव आदिकी तरफ देखनेवालेको, उससे प्रेम करनेवालेको मुक्ति, ऐश्वर्य आदि तो मिल सकता है, पर भगवान् नहीं मिल सकते। भगवान्के प्रभावकी तरफ न देखनेवाला भगवत्प्रेमी भक्त ही भगवान्को पा सकता है। इतना ही नहीं, वह प्रेमी-भक्त भगवान्को बाँध भी सकता है, उनकी बिन्नी भी कर सकता है! भगवान् देखते हैं कि वह मेरेसे प्रेम करता है, मेरे प्रभावकी तरफ देखतातक नहीं, तो भगवान्के मनमें उसका बड़ा आदर होता है।

प्रभावकी तरफ देखना यह सिद्ध करता है कि हमारेमें

  • (१) असुन्दरः सुन्दरशेखरो वा गुणीर्विहीनो गुणिनां वरो वा। द्वेष्टी मयि स्यात् करुणाम्बुधिर्वा श्यामः स एवाद्य गतिर्मामयम्॥

‘मेरे प्रियतम श्रीकृष्ण असुन्दर हों या सुन्दर-शिरोमणि हों, गुणहीन हों या गुणियोंमें श्रेष्ठ हों, मेरे प्रति द्वेष रखते हों या करुणासिन्धु-रूपसे कृपा करते हों, वे चाहे जैसे हों, मेरी तो वे ही एकमात्र गति हैं।’

(२) आशिलष्य वा पादरतां पिण्डु मामदर्शनात्मर्हतां करोतु वा। यथा तथा वा विदधातु लम्पटो मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥

(शिक्षाष्टक ८)

‘वे चाहे मुझे हृदयसे लगाकर हर्षित करें या चरणोंमें लिपटे हुए मुझे पैरोंतले रौंद डालें अथवा दर्शन न देकर मर्माहत ही करें। वे परम स्वतन्त्र श्रीकृष्ण जैसे चाहें, वैसे करें, मेरे तो वे ही प्राणनाथ हैं, दूसरा कोई नहीं।’

१२३८

  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

कुछ पानेकी कामना है। हमारे मनमें उस कामनावाले पदार्थका आदर है। जबतक हमारे मनमें कामना है, तबतक हम प्रभावको देखते हैं। अगर हमारे मनमें कोई कामना न रहे तो भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ हमारी दृष्टि नहीं जायगी। केवल भगवान्की तरफ दृष्टि होगी तो हम भगवान्के शरण हो जायेंगे, भगवान्के अपने हो जायेंगे। पूतना राक्षसीने जहर लगाकर स्तन मुखमें दिया तो उसको भगवान्ने माताकी गति दे दी* अर्थात् जो मुक्ति यशोदा मैयाको मिले, वह मुक्ति पूतनाको मिल गयी। जो मुखमें जहर देती है, उसे तो भगवान्ने मुक्ति दे दी। अब जो रोजाना दूध पिलाती है, उस मैयाको भगवान् क्या दें? तो अनन्त जीवोंको मुक्ति देनेवाले भगवान् मैयाके अधीन हो गये, उन्हें अपने-आपको ही दे दिया! मैयाके इतने वशीभूत हो गये कि मैया छड़ी दिखाती है तो वे डरकर रोने लग जाते हैं! कारण कि मैयाकी भगवान्के प्रभाव, ऐश्वर्यकी तरफ दृष्टि ही नहीं है। इस प्रकार जो भगवान्ने मुक्ति चाहता है, उसे भगवान् मुक्ति दे देते हैं, पर जो कुछ भी नहीं चाहता, उसे भगवान् अपने-आपको ही दे देते हैं।

सर्वभावसे भगवान्के शरण होनेका रहस्य यह है कि हमारा शरीर अच्छा है, इन्द्रियाँ वशमें हैं, मन शुद्ध-निर्मल है, बुद्धिसे हम ठीक जानते हैं, हम पढ़े-लिखे हैं, हम यशस्वी हैं, हमारा संसारमें मान है—इस प्रकार ‘हम भी कुछ हैं’ ऐसा मानकर भगवान्के शरण होना शरणागति नहीं है। भगवान्के शरण होनेके बाद शरणागतको ऐसा विचार भी नहीं करना चाहिये कि हमारा शरीर ऐसा होना चाहिये; हमारी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये; हमारा मन ऐसा होना चाहिये; हमारा ऐसा ध्यान लगना चाहिये; हमारी ऐसी भावना होनी चाहिये; हमारे जीवनमें ऐसे-ऐसे लक्षण आने चाहिये; हमारे ऐसे आचरण होने चाहिये; हमारेमें ऐसा प्रेम होना चाहिये कि कथा-कीर्तन सुननेपर आँसू बहने लगे, कण्ठ गद्गद हो जाय; पर ऐसा हमारे जीवनमें हुआ ही नहीं तो हम भगवान्के शरण कैसे हुए? आदि-आदि। ये बातें अनन्य शरणागतिकी कसौटी नहीं हैं। जो अनन्य शरण

हो जाता है, वह यह देखता ही नहीं कि शरीर बीमार है कि स्वस्थ है? मन चंचल है कि स्थिर है? बुद्धिमें जानकारी है कि अनजानपना है? अपनेमें मूर्खता है कि विद्वत्ता है? योग्यता है कि अयोग्यता है? आदि। इस सबकी तरफ वह स्वप्नमें भी नहीं देखता; क्योंकि उसकी दृष्टिमें ये सब चीजें कूड़ा-करकट हैं, जिन्हें अपने साथ नहीं लेना है। यदि इन चीजोंकी तरफ देखेगा तो अभिमान ही बढ़ेगा कि मैं भगवान्का शरणागत भक्त हूँ अथवा निराश होना पड़ेगा कि मैं भगवान्के शरण तो हो गया, पर भक्तोंके गुण (गीता—बारहवें अध्यायके तेरहवेंसे उन्नीसवें श्लोकतक) तो मेरेमें आये ही नहीं। तात्पर्य यह हुआ कि अगर अपनेमें भक्तोंके गुण दिखायी देंगे तो उनका अभिमान हो जायगा और अगर नहीं दिखायी देंगे तो निराश हो जायगी। इसलिये यही अच्छा है कि भगवान्के शरण होनेके बाद इन गुणोंकी तरफ भूलकर भी नहीं देखें। इसका यह उलटा अर्थ न लगा लें कि हम चाहे वैर-विरोध करें, चाहे द्वेष करें, चाहे ममता करें, चाहे जो कुछ करें? यह अर्थ बिल्कुल नहीं है। तात्पर्य है कि इन गुणोंकी तरफ खयाल ही नहीं होना चाहिये। भगवान्के शरण होनेवाले भक्तमें ये सब-के-सब गुण अपने-आप ही आयेंगे, पर इनके आने या न आनेसे उसको कोई मतलब नहीं रखना चाहिये। अपनेमें ऐसी कसौटी नहीं लगानी चाहिये कि अपनेमें ये गुण या लक्षण हैं या नहीं।

सच्चा शरणागत भक्त तो भगवान्के गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता और अपने गुणोंकी तरफ भी नहीं देखता। वह भगवान्के ऊँचे-ऊँचे प्रेमियोंकी तरफ भी नहीं देखता कि ऊँचे प्रेमी ऐसे-ऐसे होते हैं, तत्त्वको जाननेवाले जीवन्मुक्त ऐसे-ऐसे होते हैं।

प्रायः लोग ऐसी कसौटी लगाते हैं कि यह भगवान्का भजन करता है तो बीमार कैसे हो गया? भगवान्का भक्त हो गया तो उसको बुखार क्यों आ गया? उसपर दुःख क्यों आ गया? उसका बेटा क्यों मर गया? उसका धन क्यों चला गया? उसका संसारमें अपयश क्यों हो गया? उसका निरादर क्यों हो गया? आदि-आदि। ऐसी कसौटी

  • (१) अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिधांसयापाययदप्यासन्धी। लेभे गतिं धान्युचित्तां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं ब्रजेम॥

(श्रीमद्भा० ३। २। २३)

‘अहो! इस पापिनी पूतनाने जिन्हें मार डालनेकी इच्छासे गति प्राप्त की, जो धात्रीको मिलनी चाहिये, उनके अलावा अपने स्तनोंपर लगाया हुआ कालकूट विष पिलाकर भी वह और कौन दयालु है, जिसकी शरणमें जायें?’

(२) गई मारन पूतना कुछ कालकूट लगाई। मातुकी गति दर्द ताहि कृपालु जादवराइ॥ (विनय-पत्रिका २१४। २)