श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
अर्जुनको धमकानेमँ भगवान्की 'विशेष कृपा' और अपनेपनका भाव टपकता है।
यहाँ 'यथेच्छसि तथा कुरु' कहकर भगवान् जो अपनेपनका त्याग कर रहे हैं, इसमें तो भगवान्की 'अत्यधिक कृपा' और आत्मीयता भरी हुई है। कारण कि भक्त भगवान्का धमकाया जाना तो सह सकता है, पर भगवान्का त्याग नहीं सह सकता। इसलिये 'न श्रोष्यसि विनइच्छ्यसि' आदि कहनेपर भी अर्जुनपर इतना असर नहीं पड़ा जितना 'यथेच्छसि तथा कुरु' कहनेपर पड़ा।
परिशिष्ट भाव— 'यथेच्छसि तथा कुरु'—यह भगवान् त्याग करनेके लिये नहीं कहते हैं, प्रत्युत अपनी तरफ विशेषतासे खींचनेके लिये कहते हैं; जैसे—गँद फेंकते हैं विशेषतासे पीछे लेनेके लिये, न कि त्याग करनेके लिये। तात्पर्य है कि पूर्वश्लोकमें अन्तर्यामी निराकार ईश्वरकी शरणागतिकी बात कहकर अब भगवान् अर्जुनको अपनी तरफ अर्थात् सगुण-साकारकी तरफ खींचना चाहते हैं, जिससे अर्जुन समग्रकी प्राप्तिसे रीता न रह जाय। निराकारमें साकार नहीं आता, पर साकारमें निराकार भी आ जाता है।
सम्बन्ध— पूर्वश्लोकमें भगवान्ने 'विमृश्यैतदशेषेण' पदसे अर्जुनको कहा कि मेरे इस पूरे उपदेशका सार निकाल लेना। परन्तु भगवान्के सम्पूर्ण उपदेशका सार निकाल लेना अर्जुनके वशकी बात नहीं थी; क्योंकि अपने उपदेशका सार निकालना जितना वक्ता जानता है, उतना श्रोता नहीं जानता। दूसरी बात, 'जैसी मरजी आये, वैसा कर'—इस प्रकार भगवान्के मुखसे अपने त्यागकी बात सुनकर अर्जुन बहुत डर गये, इसलिये आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् अपने प्रिय सखा अर्जुनको आश्वासन देते हैं।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥ ६४ ॥
| सर्वगुह्यतमम् | = सबसे अत्यन्त गोपनीय |
|---|---|
| परमम् | = सर्वोत्कृष्ट |
| वचः | = वचन (तू) |
| भूयः | = फिर |
| मे | = मुझसे |
| शृणु | = सुन। (तू) |
|---|---|
| मे | = मेरा |
| दृढम् | = अत्यन्त |
| इष्टः | = प्रिय मित्र |
| असि | = है, |
| ततः | = इसलिये |
| इति | = यह (विशेष) |
|---|---|
| हितम् | = हितकी बात (मैं) |
| ते | = तुझे |
| वक्ष्यामि | = कहूँगा। |
व्याख्या— 'सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः'—पहले तिरसठवँ श्लोकमें भगवान्ने गुह्य (कर्मयोगकी) और गुह्यतर (अन्तर्यामी निराकारकी शरणागतिकी) बात कही और 'इदं तु ते गुह्यतमम्' (९।१) तथा 'इति गुह्यतमं शास्त्रम्' (१५।२०)—इन पदोंसे गुह्यतम (अपने प्रभावकी) बात कह दी, पर सर्वगुह्यतम बात गीतामें पहले कहीं नहीं कही। अब यहाँ अर्जुनकी घबराहटको देखकर भगवान् कहते हैं कि मैं सर्वगुह्यतम अर्थात् सबसे अत्यन्त गोपनीय बात फिर कहूँगा, तू मेरे
इसे सुनकर अर्जुन घबरा गये कि भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे हैं! क्योंकि मैंने यह बड़ी भारी गलती की कि भगवान्के द्वारा प्यारसे समझाने, अपनेपनसे धमकाने और अन्तर्यामीकी शरणागतिकी बात कहनेपर भी मैं कुछ बोला नहीं, जिससे भगवान्को 'जैसी मरजी आये, वैसा कर'—यह कहना पड़ा। अब तो मैं कुछ भी कहनेके लायक नहीं हूँ!—ऐसा सोचकर अर्जुन बड़े दुःखी हो जाते हैं, तब भगवान् अर्जुनके बिना पुछे ही सर्वगुह्यतम वचनोंको कहते हैं, जिसका वर्णन आगेके श्लोकमें है।
परम, सर्वश्रेष्ठ वचनोंको सुन।
इस श्लोकमें 'सर्वगुह्यतमम्' पदसे भगवान्ने बताया कि यह हरेकके सामने प्रकट करनेकी बात नहीं है और सड़सठवँ श्लोकमें 'इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन' पदसे भगवान्ने बताया कि इस बातको असहिष्णु और अभक्तसे कभी मत कहना। इस प्रकार दोनों तरफसे निषेध करके बीचमें (छियासठवँ श्लोकमें) 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'—इस सर्वगुह्यतम बातको रखा है। दोनों तरफसे निषेध करनेका तात्पर्य है कि यह गीताभरमें