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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1222

श्लोक ६४ ]

  • साधक-संजीवनी *

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अत्यन्त रहस्यमय खास उपदेश है।

दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें 'धर्मसमूद्धचेताः' कहकर अर्जुन अपनेको धर्मका निर्णय करनेमें अयोग्य समझते हुए भगवान्से पूछते हैं, उनके शिष्य बनते हैं और शिक्षा देनेके लिये कहते हैं। अतः भगवान् यहाँ (छाछठवें श्लोकमें) कहते हैं कि तू धर्मके निर्णयका भार अपने ऊपर मत ले, वह भार मेरेपर छोड़ दे—मेरे ही अर्पण कर दे और अनन्यभावसे केवल मेरी शरणमें आ जा। फिर तेरेको जो पाप आदिका डर है, उन सब पापोंसे मैं तुझे मुक्त कर दूँगा। तू सब चिन्ताओंको छोड़ दे। यही भगवान्का 'सर्वगृह्यतम परम वचन' है।

'भूयः शृणु' का तात्पर्य है कि मैंने यही बात दूसरे शब्दोंमें पहले भी कही थी, पर तुमने ध्यान नहीं दिया। अतः मैं फिर वही बात कहता हूँ। अब इस बातपर तुम विशेषरूपसे ध्यान दो।

यह सर्वगृह्यतमवाली बात भगवान्ने पहले 'मत्परः' मच्चित्तः सततं भव' (१८।५७) और 'मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि' (१८।५८) पदोंसे कह दी थी; परन्तु 'सर्वगृह्यतमम्' पद पहले नहीं कहा, और अर्जुनका भी उस बातपर लक्ष्य नहीं गया। इसलिये अब फिर उस बातपर अर्जुनका लक्ष्य करानेके लिये और उस बातका महत्त्व बतानेके लिये भगवान् यहाँ 'सर्वगृह्यतमम्' पद देते हैं।

'इच्छोऽसि मे दृढमिति'—इससे पहले भगवान्ने कहा था कि जैसी मरजी आये, वैसा कर। जो अनुयायी है, आज्ञा-पालक है, शरणागत है, उसके लिये ऐसी बात कहनेके समान दूसरा क्या दण्ड दिया जा सकता है! अतः

१-दसवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने 'भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः' कहा और यहाँ 'सर्वगृह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः' कहा। इन दोनोंमें केवल 'एव महाबाहो' की जगह 'सर्वगृह्यतमम्' पद आया है अर्थात् केवल छः अक्षर ही बदले हैं, बाकी दस अक्षर वे-के-वे ही हैं। वहाँ 'भूय एव महाबाहो' कहकर 'मच्चिताः' (१०।१) कहते हैं और यहाँ 'मच्चित्तः' (१८।५७-५८) कहकर 'सर्वगृह्यतमं भूयः' कहते हैं। परन्तु 'मच्चिताः' और 'मच्चित्तः' में थोड़ा फरक है। वहाँ 'मच्चिताः' में प्रथम पुरुषका प्रयोग करके सामान्य रीतिसे सबके लिये बात कही है, और यहाँ 'मच्चित्तः' में मध्यम पुरुषका प्रयोग करके अर्जुनके लिये विशेष आज्ञा दी है। वहाँ भी 'मेरी कृपासे अज्ञान दूर हो जायगा' ऐसा कहा है और यहाँ भी 'मेरी कृपासे तू सब विघ्नोंको तर जायगा' ऐसा कहा है।

वहाँ 'यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाय्या' (१०।१) कहा है और यहाँ 'ततो वक्ष्यामि ते हितम्' कहा है। वहाँ 'ममना भव' (१।३४) कहकर अन्व्यवहितरूपसे (लगतातर, पासमें ही) 'भूय एव महाबाहो' कहा है, और यहाँ 'सर्वगृह्यतमं भूयः' कहकर अन्व्यवहितरूपसे 'ममना भव' (१८।६५) कहा है।

जैसे 'सर्वगृह्यतमम्' पद गीतामें एक ही बार आया है, ऐसे ही 'सर्वधर्मान्यरित्यन्त्य मामेकं शरणं ब्रज'—ऐसा वाक्य भी एक ही बार आया है।

२-सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुह् कर सहज सुभाऊ॥ (मानस १।८१।२)

३-न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः। न च संकर्षणो न श्रीनैवात्मा च यथा भवान्॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१५)

४-सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते। अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥ (वाल्मीकि० ६।१८।३३)

इस बातको सुनकर अर्जुनके मनमें भय पैदा हो गया कि भगवान् मेरा त्याग कर रहे हैं। उस भयको दूर करनेके लिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो। यदि अर्जुनके मनमें भय या संदेह न होता, तो भगवान्को 'तुम मेरे अत्यन्त प्यारे मित्र हो'—यह कहकर सफाई देनेकी क्या जरूरत थी? सफाई देना तभी बनता है, जब दूसरेके मनमें भय हो, सन्देह हो, हलचल हो।

'इष्टः' कहनेका दूसरा भाव यह है कि भगवान् अपने शरणागत भक्तको अपना इष्टदेव मान लेते हैं। भक्त सब कुछ छोड़कर केवल भगवान्को अपना इष्ट मानता है, तो भगवान् भी उसको अपना इष्ट मान लेते हैं; क्योंकि भक्तके विषयमें भगवान्का यह कानून है—'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्' (गीता ४।११) अर्थात् जो भक्त जैसे मेरे शरण होते हैं, मैं भी उनको वैसे ही आश्रय देता हूँ। भगवान्की दृष्टिमें भक्तके समान और कोई श्रेष्ठ नहीं है। भागवतमें भगवान् उद्धवजीसे कहते हैं—'तुम्हारे-जैसे प्रेमी भक्त मुझे जितने प्यारे हैं, उतने प्यारे न ब्रह्माजी हैं, न शंकरजी हैं, न बलरामजी हैं; और तो क्या, मेरे शरीरमें निवास करनेवाली लक्ष्मीजी और मेरी आत्मा भी उतनी प्यारी नहीं है।'

'दृढम्' कहनेका तात्पर्य है कि जब तुमने एक बार कह दिया कि 'मैं आपके शरण हूँ' (दूसरे अध्यायका सातवाँ श्लोक) तो अब तुम्हें बिलकुल भी भय नहीं करना चाहिये। कारण कि जो मेरी शरणमें आकर एक बार भी सच्चे हृदयसे कह देता है कि 'मैं आपका ही हूँ' उसको मैं सम्पूर्ण प्राणियोंसे अभय (सुरक्षित) कर देता हूँ—यह मेरा व्रत है।