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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८

'ततो वक्ष्यामि ते हितम्'-तू मेरा अत्यन्त प्यारा

मित्र है, इसलिये अपने हृदयकी अत्यन्त गोपनीय और

अपने दरबारकी श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ बात तुझे कहूँगा। दूसरी

बात, मैं जो आगे शरणागतिकी बात कहूँगा, उसका यह

तात्पर्य नहीं है कि मेरी शरणमें आनेसे मुझे कोई लाभ हो

जायगा, प्रत्युत इसमें केवल तेरा ही हित होगा। इससे सिद्ध

होता है कि प्राणिमात्रका हित केवल इसी बातमें है कि

वह किसी दूसरेका सहारा न लेकर केवल भगवान्‌की ही

शरण ले।

भगवान्‌की शरण होनेके सिवाय जीवका कहीं भी,

किंचिन्मात्र भी हित नहीं है। कारण यह है कि जीव साक्षात्

परमात्माका अंश है। इसलिये वह परमात्माको छोड़कर

किसीका भी सहारा लेगा तो वह सहारा टिकेगा नहीं। जब

संसारकी कोई भी वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, अवस्था

आदि स्थिर नहीं है, तो फिर उनका सहारा कैसे स्थिर रह

सकता है ? उनका सहारा तो रहेगा नहीं, पर चिन्ता, शोक,

दुःख आदि रह जायँगे ! जैसे, अग्निसे अंगार दूर हो जाता है

तो वह काला कोयला बन जाता है-'कोयला होय नहीं

उजला, सौ मन साबुन लगाय।' पर वही कोयला जब

पुनः अग्निसे मिल जाता है, तब वह अंगार (अग्निरूप) बन

जाता है और चमक उठता है। ऐसे ही यह जीव भगवान्‌से

विमुख हो जाता है तो बार-बार जन्मता-मरता और दुःख

पाता रहता है, पर जब यह भगवान्‌के सम्मुख हो जाता

है अर्थात् अनन्यभावसे भगवान्‌की शरणमें हो जाता है,

तब यह भगवत्स्वरूप बन जाता है और चमक उठता है,

तथा संसारमात्रका कल्याण करनेवाला हो जाता है।

परिशिष्ट भाव-'तमेव शरणं गच्छ' (१८। ६२)-इसमें निराकारकी शरणागति है और 'मामेकं शरणं

व्रज' (१८।६६)-इसमें साकारकी शरणागति है। निराकारकी शरणमें जानेसे मुक्ति हो जायगी; परन्तु

साकारकी शरणमें जानेसे मुक्तिके साथ-साथ प्रेमकी भी प्राप्ति हो जायगी। इसलिये साकारकी शरणागति 'सर्वगुह्यतम'

है। भगवान् भक्तिके प्रसंगमें ही 'परम वचन' कहते हैं। दसवें अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्‌ने कहा है-'शृणु

मे परमं वचः'।

अर्जुनने भगवान्‌से कहा था कि मैं आपका शिष्य हूँ-'शिष्यस्तेऽहम्' (२। ७), पर भगवान् कहते हैं कि

तू मेरा इष्ट मित्र है-'इष्टोऽसि'! तात्पर्य है कि गुरु तो चेला बनाता है, पर भगवान् चेला न बनाकर अपना मित्र

बनाते हैं!

भगवान्‌की तो हरेक बात ही हित करनेवाली है, पर उसमें भी विशेष हितकी बात होनेसे भगवान् 'ततो वक्ष्यामि

ते हितम्' कहते हैं।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ ६५ ॥

मद्भक्तः

भव

मन्मनाः

मद्याजी

माम्

= (तू) मेरा भक्त

= हो जा,

= मुझमें मनवाला (हो

जा),

= मेरा पूजन करनेवाला

(हो जा और)

= मुझे

नमस्कुरु

माम्

एव

एष्यसि

ते

= नमस्कार कर।

(ऐसा करनेसे तू)

= मुझे

= ही

= प्राप्त हो जायगा

(-यह मैं)

= तेरे सामने

सत्यम्

प्रतिजाने

मे

प्रियः

असि

= सत्य

= प्रतिज्ञा करता हूँ;

(क्योंकि तू)

= मेरा

= अत्यन्त

प्रिय

= है।

व्याख्या-'मद्भक्तः'-साधकको सबसे पहले 'मैं

भगवान्‌का हूँ' इस प्रकार अपनी अहंता-(मैं-पन-) को

बदल देना चाहिये। कारण कि बिना अहंताके बदले साधन

सुगमतासे नहीं होता। अहंताके बदलनेपर साधन सुगमतासे,

स्वाभाविक ही होने लगता है। अतः साधकको सबसे पहले

'मद्भक्तः' होना चाहिये।

किसीका शिष्य बननेपर व्यक्ति अपनी अहंताको बदल

देता है कि 'मैं तो गुरु महाराजका ही हूँ।' विवाह हो जानेपर

कन्या अपनी अहंताको बदल देती है कि 'मैं तो ससुरालकी

ही हूँ', और पिताके कुलका सम्बन्ध बिलकुल छूट जाता है।