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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

पृष्ठ 1226, कुल 1299 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1226

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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गीताका पूरा अध्ययन करनेसे यह मालूम होता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें कर्तव्य-कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये। अर्जुन तो युद्धरूप कर्तव्य-कर्म छोड़कर भिक्षा माँगना श्रेष्ठ समझते थे (दूसरे अध्यायका पाँचवाँ श्लोक); परन्तु भगवान्ने इसका निषेध किया (दूसरे अध्यायके इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक)। इससे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ स्वरूपसे धर्मोका त्याग नहीं है।

अब विचार यह करना है कि यहाँ सम्पूर्ण धर्मोंके त्यागसे क्या लेना चाहिये? गीताके अनुसार सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् कर्मोंको भगवान्के अर्पण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। इसमें सम्पूर्ण धर्मोंके आश्रयका त्याग करना और केवल भगवान्का आश्रय लेना—दोनों बातें सिद्ध हो जाती हैं। धर्मका आश्रय लेनेवाले बार-बार जन्म-मरणको प्राप्त होते हैं—‘एवं त्रयीधर्ममनुष्यपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते’ (गीता ९।२१)। इसलिये धर्मका आश्रय छोड़कर भगवान्का ही आश्रय लेनेपर फिर अपने धर्मका निर्णय करनेकी जरूरत नहीं रहती। आगे अर्जुनके जीवनमें ऐसा हुआ भी है।

अर्जुनका कर्णके साथ युद्ध हो रहा था। इस बीच कर्णके रथका चक्का पृथ्वीमें धँस गया। कर्ण रथसे नीचे उतरकर रथके चक्केको निकालनेका उद्योग करने लगा और अर्जुनसे बोला कि ‘जबतक मैं यह चक्का निकाल न लूँ, तबतक तुम ठहर जाओ; क्योंकि तुम रथपर हो और मैं रथसे

वह मिथ्याचारी है (छठों श्लोक); जो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके कर्तव्य-कर्म करता है, वही श्रेष्ठ है (सातवाँ श्लोक); कर्म किये बिना शरीरका निर्वाह भी नहीं होता, इसलिये कर्म करना चाहिये (आठवाँ श्लोक); बन्धनके भयसे भी कर्मोंका त्याग करना उचित नहीं है; क्योंकि केवल कर्तव्य-पालनके लिये कर्म करना बन्धनकारक नहीं है, प्रत्युत कर्तव्य-कर्मकी परम्परा सुरक्षित रखनेके सिवाय अपने लिये कुछ भी कर्म करना ही बन्धनकारक है (नवाँ श्लोक); ब्रह्माजीने कर्तव्यसहित प्रजाकी रचना करके कहा कि इस कर्तव्य-कर्मसे ही तुमलोगोंकी वृद्धि होगी और यही कर्तव्य-कर्म तुमलोगोंको कर्तव्य-सामग्री देनेवाला होगा (दसवाँ श्लोक); मनुष्य और देवता दोनों ही कर्तव्यका पालन करते हुए कल्याणको प्राप्त होंगे (ग्यारहवाँ श्लोक); जो कर्तव्यका पालन किये बिना प्राप्त सामग्रीका उपभोग करता है, वह चोर है (बारहवाँ श्लोक); कर्तव्य-कर्म करके अपना निर्वाह करनेवाला सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और जो केवल अपने लिये ही कर्म करता है, वह पापी पापका ही भक्ष्ण करता है। (तेरहवाँ श्लोक); कर्तव्य-पालनसे ही सुष्ठिचक्र चलता है; परन्तु जो सुष्ठिमें रहकर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, उसका जीना व्यर्थ है (सोलहवाँ श्लोक); आसक्तिसे रहित होकर कर्तव्य-कर्म करनेवाला मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है (उन्नीसवाँ श्लोक); जनकादि ज्ञानिजन भी कर्तव्य-कर्म करनेसे सिद्धिको प्राप्त हुए हैं; लोकसंग्रहकी दृष्टिसे भी कर्तव्य-कर्म करना चाहिये (बीसवाँ श्लोक); भगवान् अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अगर मैं सावधान रहकर कर्तव्य-कर्म न करूँ तो मैं वर्ण-संकरताका उत्पादक और लोकोका नाश करनेवाला बनूँ (तेईसवेंसे चौबीसवें श्लोकतक); ज्ञानी पुरुषको भी आसक्तिरहित होकर आस्तिक अज्ञानीकी तरह अपना कर्तव्य-कर्म करना चाहिये (पचीसवाँ श्लोक); ज्ञानीको चाहिये कि वह अज्ञानियोंमें बुद्धिभेद पैदा न करके अपने कर्तव्यका अच्छी तरहसे पालन करते हुए उनसे भी बेसे ही कराये (छब्बीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार तीसरे अध्यायमें भगवान्ने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करनेमें बड़ा जोर दिया है।

  • आतातयिनमायात्नं हन्यादेवाविचारयन्। नातातयिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन॥ (मनु० ८।३५०-३५१)

‘अपना अनिष्ट करनेके लिये आते हुए आतातयीको बिना विचार किये ही मार डालना चाहिये। आतातयीको मारनेसे मारनेवालेको कुछ भी दोष नहीं लगता।’

रहित हूँ और दूसरे कार्यमें लगा हुआ हूँ। ऐसे समय रथीको उचित है कि उसपर बाण न छोड़े। तुम सहस्त्रार्जुनके समान शस्त्र और शास्त्रके ज्ञाता हो और धर्मको जाननेवाले हो, इसलिये मेरे ऊपर प्रहार करना उचित नहीं है।’ कर्णकी बात सुनकर अर्जुनने बाण नहीं चलाया। तब भगवान्ने कर्णसे कहा कि ‘तुम्हारे-जैसे आतातयीको किसी तरहसे मार देना धर्म ही है, पाप नहीं* और अभी-अभी तुम छः महारथियोंने मिलकर अकेले अभिमन्युको घेरकर उसे मार डाला। अतः धर्मकी दुहाई देनेसे कोई लाभ नहीं है। हाँ, यह सौभाग्यकी बात है कि इस समय तुम्हें धर्मकी बात याद आ रही है, पर जो स्वयं धर्मका पालन नहीं करता, उसे धर्मकी दुहाई देनेका कोई अधिकार नहीं है।’ ऐसा कहकर भगवान्ने अर्जुनको बाण चलानेकी आज्ञा दी तो अर्जुनने बाण चलाना आरम्भ कर दिया।

इस प्रकार यदि अर्जुन अपनी बुद्धिसे धर्मका निर्णय करते तो भूल कर बैठते; अतः उन्होंने धर्मका निर्णय भगवान्पर ही रखा और भगवान्ने धर्मका निर्णय किया भी।

अर्जुनके मनमें सन्देह था कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना श्रेष्ठ है अथवा युद्ध न करना श्रेष्ठ है (दूसरे अध्यायका छठा श्लोक)। यदि हम युद्ध करते हैं तो अपने कुटुम्बका नाश होता है और अपने कुटुम्बका नाश करना बड़ा भारी पाप है। इससे तो अनर्थ-परम्परा ही बढ़ेगी (पहले अध्यायके चालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक)।