श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 1225, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१२२४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय १८ ]
यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु' । फिर तेरी मेरेसे आत्मीयता हो जायगी, जिसके लिये भगवान्ने सातवें अध्यायमें कहा था— 'ज्ञानी त्वात्सैव मे मतम्' (७।१८), 'प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः' (७।१७)।
सम्बन्ध—पीछेके दो श्लोकोंमें अर्जुनको आश्वासन देकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने उपदेशकी अत्यन्त गोपनीय सार बात बताते हैं।
सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ ६६ ॥
| सर्वधर्मान् | = सम्पूर्ण धर्मोंका | शरणम् | = शरणमें | पापोंसे |
|---|---|---|---|---|
| आश्रय | व्रज | = आ जा। | मोक्षयिष्यामि | = मुक्त कर |
| परित्यज्य | = छोड़कर (तू) | अहम् | = मैं | |
| एकम् | = केवल | त्वा | = तुझे | मा, शुचः |
| माम् | = मेरी | सर्वपापेभ्यः | = सम्पूर्ण |
व्याख्या— 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'—भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय, धर्मके निर्णयका विचार छोड़कर अर्थात् क्या करना है और क्या नहीं करना है—इसको छोड़कर केवल एक मेरी ही शरणमें आ जा।
स्वयं भगवान्के शरणागत हो जाना—यह सम्पूर्ण साधनोंका सार है। इसमें शरणागत भक्तको अपने लिये कुछ भी करना शेष नहीं रहता; जैसे—पतिव्रताका अपना कोई काम नहीं रहता। वह अपने शरीरकी सार—सँभाल भी पतिके नाते, पतिके लिये ही करती है। वह घर, कुटुम्ब, वस्तु, पुत्र-पुत्री और अपने कहलानेवाले शरीरको भी अपना नहीं मानती, प्रत्युत पतिदेवका ही मानती है। तात्पर्य यह हुआ कि जिस प्रकार पतिव्रता पतिके परायण होकर पतिके गोत्रमें ही अपना गोत्र मिला देती है और पतिके ही घरपर रहती है, उसी प्रकार शरणागत भक्त भी शरीरको लेकर माने जानेवाले गोत्र, जाति, नाम आदिको भगवान्के चरणोंमें अर्पण करके निर्भय, निःशोक, निश्चिन्त और निःशंक हो जाता है।
गीताके अनुसार यहाँ 'धर्म' शब्द कर्तव्य-कर्मका वाचक है। कारण कि इसी अध्यायके इकतालीसवेंसे चौवालीसवें श्लोकतक 'स्वभावज कर्म' शब्द आये हैं, फिर सैंतालीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें 'स्वधर्म' शब्द आया है।
उसके बाद, सैंतालीसवें श्लोकके ही उत्तरार्धमें तथा (प्रकरणके अन्तमें) अड़तालीसवें श्लोकमें 'कर्म' शब्द आया है। तात्पर्य यह हुआ कि आदि और अन्तमें 'कर्म' शब्द आया है और बीचमें 'स्वधर्म' शब्द आया है तो इससे स्वतः ही 'धर्म' शब्द कर्तव्य-कर्मका वाचक सिद्ध हो जाता है।
अब यहाँ प्रश्न यह होता है कि 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य' पदसे क्या धर्म अर्थात् कर्तव्य-कर्मका स्वरूपसे त्याग माना जाय? इसका उत्तर यह है कि धर्मका स्वरूपसे त्याग करना न तो गीताके अनुसार ठीक है और न यहाँके प्रसंगके अनुसार ही ठीक है; क्योंकि भगवान्की यह बात सुनकर अर्जुने कर्तव्य-कर्मका त्याग नहीं किया है, प्रत्युत 'करिष्ये वचनं तव' (१८।७३) कहकर भगवान्की आज्ञाके अनुसार कर्तव्य-कर्मका पालन करना स्वीकार किया है। केवल स्वीकार ही नहीं किया है, प्रत्युत अपने क्षेत्रधर्मके अनुसार युद्ध भी किया है। अतः उपर्युक्त पदमें धर्म अर्थात् कर्तव्यका त्याग करनेकी बात नहीं है। भगवान् भी कर्तव्यके त्यागकी बात कैसे कह सकते हैं! भगवान्ने इसी अध्यायके छठे श्लोकमें कहा है कि यज्ञ, दान, तप और अपने-अपने वर्ण-आश्रमोंके जो कर्तव्य हैं, उनका कभी त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको जरूर करना चाहिये*।
- तीसरे अध्यायमें तो भगवान्ने कर्तव्य-कर्मको न छोड़नेके लिये प्रकरण-का-प्रकरण ही कहा है—कर्मोंका त्याग करनेसे न तो निष्कर्मताकी प्राप्ति होती है और न सिद्धि ही होती है (चौथा श्लोक); कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता (पाँचवाँ श्लोक); जो बाहरसे कर्मोंका त्याग करके भीतरसे विषयोंका चिन्तन करता है,