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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

दूसरी तरफ हमलोग देखते हैं तो क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर श्रेयका कोई साधन नहीं है। अतः भगवान् कहते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, क्या धर्म है और क्या अधर्म है, इस पच्छेमें तू क्यों पड़ता है? तू धर्मके निर्णयका भार मेरेपर छोड़ दे। यही 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य' का तात्पर्य है।

'मामेकं शरणं ब्रज'—इन पदोंमें 'एकम्' पद 'माम्' का विशेषण नहीं हो सकता; क्योंकि 'माम्' (भगवान्) एक ही हैं, अनेक नहीं। इसलिये 'एकम्' पदका अर्थ 'अनन्य' लेना ही ठीक बैठता है। दूसरी बात, अर्जुनने 'तदेकं वद निश्चित्य' (३।२) और 'यच्छ्रेय एतयोरैकम्' (५।१) पदोंमें भी 'एकम्' पदसे सांख्य और कर्मयोगके विषयमें एक निश्चित श्रेयका साधन पूछा है। उसी 'एकम्' पदको लेकर भगवान् यहाँ यह बताया चाहते हैं कि सांख्ययोग, कर्मयोग आदि जितने भी भगवत्प्राप्तिके साधन हैं, उन सम्पूर्ण साधनोंमें मुख्य साधन एक अनन्य शरणागति ही है।

गीतामें अर्जुनने अपने कल्याणके साधनके विषयमें कई तरहके प्रश्न किये और भगवान्ने उनके उत्तर भी दिये। वे सब साधन होते हुए भी गीताके पूर्वापरको देखनेसे यह बात स्पष्ट दीखती है कि सम्पूर्ण साधनोंका सार और शिरोमणि साधन भगवान्के अनन्यशरण होना ही है।

भगवान्ने गीतामें जगह-जगह अनन्यभक्तिकी बहुत महिमा गायी है। जैसे, दुस्तर मायाको सुगमतासे तरनेका उपाय अनन्य शरणागति ही है (सातवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); अनन्यचेताके लिये मैं सुलभ हूँ (आठवें अध्यायका चौदहवाँ श्लोक); परम पुरुषकी प्राप्ति अनन्य भक्तिये ही होती है (आठवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); अनन्य भक्तोंका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (नवें अध्यायका बाईसवाँ श्लोक); अनन्य भक्तिये ही भगवान्को जाना, देखना तथा प्राप्त किया जा सकता है (ग्यारहवें अध्यायका चौवनवाँ श्लोक); अनन्य भक्तोंका मैं बहुत जल्दी उद्धार करता हूँ (बारहवें अध्यायका छठा-सातवाँ श्लोक); गुणातीत होनेका उपाय अनन्यभक्ति ही है (चौदहवें अध्यायका छब्बीसवाँ श्लोक)। इस प्रकार अनन्य भक्तिकी

महिमा गाकर भगवान् यहाँ पूरी गीताका सार बताते हैं—'मामेकं शरणं ब्रज।' तात्पर्य है कि उपाय और उपेय, साधन और साध्य मैं ही हूँ।

'मामेकं शरणं ब्रज' का तात्पर्य मन-बुद्धिके द्वारा शरणागतिको स्वीकार करना नहीं है, प्रत्युत स्वयंको भगवान्की शरणमें जाना है। कारण कि स्वयंके शरण होनेपर मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि भी उसीमें आ जाते हैं, अलग नहीं रहते।

'अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः'—यहाँ कोई ऐसा मान सकता है कि पहले अध्यायमें अर्जुनने जो युद्धसे पाप होनेकी बातें कही थीं, उन पापोंसे छुटकारा दिलानेका प्रलोभन भगवान्ने दिया है। परन्तु यह मान्यता युक्तिसंगत नहीं है; क्योंकि जब अर्जुन सर्वथा भगवान्के शरण हो गये हैं, तब उनके पाप कैसे रह सकते हैं? और उनके लिये प्रलोभन कैसे दिया जा सकता है अर्थात् उनके लिये प्रलोभन देना बनता ही नहीं। हाँ, पापोंसे मुक्त करनेका प्रलोभन देना हो तो वह शरणागत होनेके पहले ही दिया जा सकता है, शरणागत होनेके बाद नहीं।

'मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा'—इसका भाव यह है कि जब तू सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर मेरी शरणमें आ गया और शरण होनेके बाद भी तुम्हारे भावों, वृत्तियों, आचरणों आदिमें फरक नहीं पड़ा अर्थात् उनमें सुधार नहीं हुआ; भगवत्प्रेम, भगवद्दर्शन आदि नहीं हुए और अपनेमें अयोग्यता, अनधिकारिता, निर्बलता आदि मालूम होती है, तो भी उनको लेकर तुम चिन्ता या भय मत करो। कारण कि जब तुम मेरी अनन्य-शरण हो गये तो वह कमी तुम्हारी कमी कैसे रही? उसका सुधार करना तुम्हारा काम कैसे रहा? वह कमी मेरी कमी है। अब उस कमीको दूर करना, उसका सुधार करना मेरा काम रहा। तुम्हारा तो बस, एक ही काम है; वह काम है—निर्भय, निःशोक, निश्चिन्त और निःशंक होकर मेरे चरणोंमें पड़े रहना! परन्तु अगर तेरेमें भय, चिन्ता, वहम आदि दोष आ जायेंगे तो वे शरणागतिमें बाधक हो जायेंगे और सब भार तेरेपर आ जायगा। शरण होकर अपनेपर भार लेना शरणागतिमें कलंक है।

१-इस श्लोकमें 'एव' पद 'अनन्यता' का ही वाचक है।

२-इस श्लोकमें 'अनन्यचेताः' पद अनन्य आश्रयका वाचक है।

३-सनमुख होड़ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥ (मानस ५।४४।१)

४-काहू के बल भजन की, काहू के आचार। 'व्यास' भरोसे कुँवरि के, सोवत पाँव पसार॥