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भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,299 पृष्ठ

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पृष्ठ 1232

श्लोक ६६ ]

  • साधक-संजीवनी *

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ही जायगी। इसलिये उसके लिये अन्य कोई प्रायश्चित्त करनेकी आवश्यकता नहीं है। भगवान् कृपा करके उसके उस पापको सर्वथा नष्ट कर देते हैं।

भगवान् भक्तके अपनेपनको ही देखते हैं, गुणों और अवगुणोंको नहीं१ अर्थात् भगवान्को भक्तके दोष दीखते ही नहीं, उनको तो केवल भक्तके साथ जो अपनापन है, वही दीखता है। कारण कि स्वरूपसे भक्त सदासे ही भगवान्का है। दोष आगान्तुक होनेसे आते-जाते रहते हैं और वह नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों ही रहता है। इसलिये भगवान्की दृष्टि सदा इस वास्तविकतापर ही जमी रहती है। जैसे, कीचड़ आदिसे सना हुआ बच्चा जब माँके सामने आता है, तब माँकी दृष्टि केवल अपने बच्चेकी तरफ जाती है बच्चेके मैलेकी तरफ नहीं जाती। बच्चेकी दृष्टि भी मैलेकी तरफ नहीं जाती। माँ साफ करे या न करे, पर बच्चेकी दृष्टिमें तो मैला है ही नहीं, उसकी दृष्टिमें तो केवल माँ ही है। द्रौपदीके मनमें कितना द्वेष और क्रोध भरा हुआ था कि जब दुःशासनके खूनसे अपने केश धोऊँगी, तभी केशोंको बाँधूँगी! परन्तु द्रौपदी जब भी भगवान्को पुकारती है, भगवान् चट आ जाते हैं; क्योंकि भगवान्के साथ द्रौपदीका गाढ़ अपनापन था।

भगवान्के साथ अपनापन होनेमें दो भाव रहते हैं—(१) भगवान् मेरे हैं और (२) मैं भगवान्का हूँ। इन दोनोंमें भगवान्का सम्बन्ध समान रीतिसे रहते हुए भी ‘भगवान् मेरे हैं’—इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा हो सकती है कि ‘भगवान् मेरे हैं तो मेरी इच्छाकी पूर्ति क्यों नहीं करते?’ परन्तु ‘मैं भगवान्का हूँ’ इस भावमें भगवान्से अपनी अनुकूलताकी इच्छा नहीं हो सकती; क्योंकि ‘मैं भगवान्का हूँ तो भगवान् मेरे लिये जैसा ठीक समझें, वैसा ही निःसंकोच होकर करें’। इसलिये साधकको चाहिये कि वह भगवान्की ही मरजीमें सर्वथा अपनी मरजी मिला दे, भगवान्पर अपना किंचित् भी आधिपत्य न माने, प्रत्युत अपनेपर उनका पूरा आधिपत्य माने। कहीं भी भगवान् हमारे मनकी करें तो उसमें संकोच हो कि मेरे लिये भगवान्को ऐसा करना पड़ा! यदि अपने मनकी बात पूरी होनेसे संकोच नहीं होता, प्रत्युत संतोष होता है तो यह शरणागति नहीं है।

शरणागत भक्त शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धिके प्रतिकूल परिस्थितिमें भी भगवान्की मरजी समझकर प्रसन्न रहता है।

शरणागत भक्तको अपने लिये कभी किंचिन्मात्र भी कुछ करना शेष नहीं रहता; क्योंकि उसने सम्पूर्ण ममतावाली वस्तुओंसहित अपने-आपको भगवान्के समर्पित कर दिया, जो वास्तवमें प्रभुका ही था। अब करने, कराने आदिका सब काम भगवान्का ही रह गया। ऐसी अवस्थामें वह कठिन-से-कठिन और भयंकर-से-भयंकर घटना, परिस्थितिमें भी अपनेपर प्रभुकी महान् कृपा देखकर सदा प्रसन्न रहता है, मस्त रहता है। जैसे, गरुडजीके पूछनेपर काकभुशुण्डिजीने अपने पूर्वजन्मके ब्राह्मण-शरीरकी कथा सुनायी, जिसमें लोमश ऋषिने शाप देकर उन्हें (ब्राह्मणको) पक्षियोंमें नीच चाण्डाल पक्षी (कौआ) बना दिया; परन्तु काकभुशुण्डिजीके मनमें न कुछ भय हुआ और न कुछ दीनता ही आयी। उन्होंने उसमें भगवान्का शुद्ध विधान ही समझा। केवल समझा ही नहीं, प्रत्युत मन-ही-मन बोल उठे—‘उर प्रेरक रघुवंस विभूषण’ (मानस ७।११३।१)। ऐसा भयंकर शाप मिलनेपर भी जब काकभुशुण्डिजीकी प्रसन्नतामें कोई कमी नहीं आयी, तब लोमश ऋषिने उनको भगवान्का प्यार भक्त समझकर अपने पास बुलाया और बालक रामजीका ध्यान बताया। फिर भगवान्की कथा सुनायी और अत्यन्त प्रसन्न होकर काकभुशुण्डिजीके सिरपर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया—‘मेरी कृपासे तुम्हारे हृदयमें अबाध, अखण्ड रामभक्ति रहेगी। तुम रामजीके प्यारे हो जाओगे। तुम सम्पूर्ण गुणोंकी खान बन जाओगे। जिस रूपकी इच्छा करोगे, वह रूप धारण कर लोगे। जिस स्थानपर तुम रहोगे, उसमें एक योजनपर्यन्त मायाका कण्टक किंचिन्मात्र भी नहीं आयेगा’ आदि-आदि। इस प्रकार बहुत-से आशीर्वाद देते ही आकाशवाणी हुई कि ‘हे ऋषे! तुमने जो कुछ कहा, वह सब सच्चा होगा, यह मन, वाणी, कर्मसे मेरा भक्त है।’ इन्हीं बातोंको लेकर भगवान्के विधानमें सदा प्रसन्न रहनेवाले काकभुशुण्डिजीने कहा है—

भगति पच्छु हठ करि रहेउँ दीन्हि महा रिषि साप।

मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप॥

(मानस ७।११४ ख)

१-स्वपादमूलं भजतः प्रियस्य त्यक्तान्वभावस्य हरिः पेशः। विकर्म यच्चोत्पतितं कथञ्चिद् धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः॥

(श्रीमद्भा० ११।५।४२)

‘जो प्रेमी भक्त भगवान्के चरणोंका अनन्यभावसे भजन करता है, उसके द्वारा यदि अकस्मात् कोई पाप-कर्म बन भी जाय तो उसके हृदयमें विराजमान परमपुरुष भगवान् श्रीहरि उसे सर्वथा नष्ट कर देते हैं।’

२-रहित न प्रभु चित्त चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ (मानस १।२१।३)