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श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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  • श्रीमद्भगवद्गीता *

[ अध्याय १८ ]

यहाँ 'भजन प्रताप' शब्दोंका अर्थ है—भगवान्के विधानमें हर समय प्रसन्न रहना। विपरीत-से-विपरीत अवस्थामें भी प्रेमी भक्तकी प्रसन्नता अधिक-से-अधिक बढ़ती रहती है; क्योंकि प्रेमका स्वरूप ही प्रतिक्षण वर्धमान है।

यह नियम है कि जो चीज अपनी होती है, वह सदा ही अपनेको प्यारी लगती है। भगवान् सम्पूर्ण जीवोंको अपना प्रिय मानते हैं—'सब मम प्रिय सब मम उपजाए' (मानस ७।८६।२) और इस जीवको भी प्रभु स्वतः ही प्रिय लगते हैं। हाँ, यह बात दूसरी है कि यह जीव परिवर्तनशील संसार और शरीरको भूलसे अपना मानकर अपने प्यारे प्रभुसे विमुख हो जाता है। इसके विमुख होनेपर भी भगवान्ने अपनी तरफसे किसी भी जीवका त्याग नहीं किया है और न कभी त्याग कर ही सकते हैं। कारण कि जीव सदासे साक्षात् भगवान्का ही अंश है। इसलिये सम्पूर्ण जीवोंके साथ भगवान्की आत्मीयता अक्षुण्ण, अखण्डितरूपसे स्वाभाविक ही बनी हुई है। इसीसे वे मात्र जीवोंपर कृपा करनेके लिये अर्थात् भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापना—इन तीन बातोंके लिये समय-समयपर अवतार लेते हैं (गीता—चौथे अध्यायका आठवाँ श्लोक)। इन तीनों बातोंमें केवल भगवान्की आत्मीयता ही टपक रही है, नहीं तो भक्तोंकी रक्षा, दुष्टोंका विनाश और धर्मकी स्थापनासे भगवान्का क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भगवान् तो ये तीनों ही काम केवल प्राणिमात्रके कल्याणके लिये ही करते हैं। इससे भी प्राणिमात्रके साथ भगवान्की स्वाभाविक आत्मीयता, कृपालुता, प्रियता, हितैषिता, सुहृता और निरपेक्ष उदारता ही सिद्ध होती है, और यहाँ भी इसी दृष्टिसे अर्जुनसे कहते हैं—'मद्भक्तो भव, मन्यना भव, मद्याजी भव, मां नमस्कुरु।' इन चारों बातोंमें भगवान्का तात्पर्य केवल जीवको अपने सम्मुख करानेमें ही है, जिससे सम्पूर्ण जीव असत् पदार्थोंसे विमुख हो जायँ; क्योंकि दुःख, संताप, बार-बार जन्मना-मरना, मात्र विपत्ति आदिमें मुख्य हेतु भगवान्से विमुख होना ही है।

भगवान् जो कुछ भी विधान करते हैं, वह संसारमात्रके सम्पूर्ण जीवोंके कल्याणके लिये ही करते हैं—बस, भगवान्की इस कृपाकी तरफ जीवकी दृष्टि हो जाय, तो फिर उसके

लिये क्या करना बाकी रहा? जीवोंके हितके लिये भगवान्के हृदयमें एक तड़फन है, इसीलिये भगवान् 'सर्वधर्मान्यरित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज' वाली अत्यन्त गोपनीय बात कह देते हैं। कारण कि भगवान् जीवमात्रको अपना मित्र मानते हैं—'सुहृदं सर्वभूतानाम्' (५।२९) और उन्हें यह स्वतन्त्रता देते हैं कि वे कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि जितने भी साधन हैं, उनमेंसे किसी भी साधनके द्वारा सुगमतापूर्वक मेरी प्राप्ति कर सकते हैं और दुःख, संताप आदिको सदाके लिये समूल नष्ट कर सकते हैं।

वास्तवमें जीवका उद्धार केवल भगवत्कृपासे ही होता है। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, अष्टांगयोग, लययोग, हठयोग, राजयोग, मन्त्रयोग आदि जितने भी साधन हैं, वे सब-के-सब भगवान्के द्वारा और भगवत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा ही प्रकट किये गये हैं। अतः इन सब साधनोंमें भगवत्कृपा ही ओत-प्रोत है। साधन करनेमें तो साधक निमित्तमात्र होता है, पर साधनकी सिद्धिमें भगवत्कृपा ही मुख्य है।

शरणागत भक्तको तो ऐसी चिन्ता भी कभी नहीं करनी चाहिये कि अभी भगवान्के दर्शन नहीं हुए, भगवान्के चरणोंमें प्रेम नहीं हुआ, अभी वृत्तियाँ शुद्ध नहीं हुई, आदि। इस प्रकारकी चिन्ताएँ करना मानो बँदरीका बच्चा बनना है। बँदरीका बच्चा स्वयं ही बँदरीको पकड़े रहता है। बँदरी कूदे-फाँदे, किधर भी जाय, बच्चा स्वयं बँदरीसे चिपका रहता है।

भक्तको तो अपनी सब चिन्ताएँ भगवान्पर ही छोड़ देनी चाहिये अर्थात् भगवान् दर्शन दें या न दें, प्रेम दें या न दें, वृत्तियोंको ठीक करें या न करें, हमें शुद्ध बनायें या न बनायें—यह सब भगवान्की मरजीपर छोड़ देना चाहिये। उसे तो बिल्लीका बच्चा बनना चाहिये। बिल्लीका बच्चा अपनी माँपर निर्भर रहता है। बिल्ली चाहे जहाँ रखे, चाहे जहाँ ले जाय। बिल्ली अपनी मरजीसे बच्चेको उठाकर ले जाती है तो वह पैर समेट लेता है। ऐसे ही शरणागत भक्त संसारकी तरफसे अपने हाथ-पैर समेटकर केवल भगवान्का चिन्तन, नाम-जप आदि करते हुए भगवान्की तरफ ही देखता रहता है। भगवान्का जो विधान है, उसमें परम प्रसन्न रहता है, अपने मनकी कुछ भी नहीं लगाता।

१-हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुष्ट तुष्टार सेवक असुरारी॥ (मानस ७।४७।३)

२-भक्त जो कुछ काम करता है, उसको भगवान्का ही समझकर, भगवान्की ही शक्ति मानकर, भगवान्के ही लिये करता है, अपने लिये किंचिन्मात्र भी नहीं करता—यही उसका हाथ-पैर समेटना है।